आरक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आरक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

राममंदिर के बहाने आदिवासी अस्तित्व पर हमला

ग्लैडसन डुंगडुंग

संघ परिवार के द्वारा आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने की साजिश में एक और तारीख जुड़ गया है और वह है 5 अगस्त 2020, जिस दिन अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया गया। राममंदिर के निर्माण हेतु आर.एस.एस. और भाजपा के नेताओं ने देश के आदिवासी बहुल इलाकों से आदिवासियों के धर्म स्थलों - सरना, देशावली, जहेरस्थान, इत्यादि से मिट्टी इक्ट्ठा करने का अभियान चलाया, जिसका मूल मकसद था आदिवासी समाज को सनातन हिन्दू धर्म में समाहित करते हुए आदिवासियों को अतिशुद्र बनाना। यह आदिवासियों के भारत देश का प्रथम निवासी होने के अस्तित्व को मटियामेट करने का बड़ा साजिश था। यह अभियान झारखंड में विवाद का विषय बन गया क्योंकि संघी आदिवासी नेताओं ने आदिवासी समुदाय से अनुमति लिये बगैर सरना स्थलों एवं जहेरथान की मिट्ठी उठा ली। इन नेताओं पर मिट्ठी चोरी करने का आरोप लगा और उनके उपर मुकदमें भी किये गये।  

झारखंड के 24 प्रमुख आदिवासी संगठनों ने सरना स्थलों से मिट्टी चोरी करने के आरोप में भाजपा नेता गंगोत्री कुजूर, रामकुमार पाहन, आशा लकड़ा एवं आरती कुजूर का हुक्का-पानी बंद करने का ऐलान किया। वहीं सरना स्थल की मिट्टी चोरी करने के आरोप में तथाकथित सरना नेता मेघा उरांव के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज किया गया। हालांकि संघी आदिवासी नेताओं ने इसका विरोध भी किया। भाजपा नेत्री गंगोत्री कुजूर ने कहा कि मिट्टी दिए जाने का विरोध करने वाले नकली आदिवासी। जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट््रीय सह संयोजक डाॅ राजकिशोर हांसदा ने कहा कि जनजातीय समाज सनातन संस्कृति से अलग नहीं, जो अलग होना चाहता वह समाज का शत्रु। भाजपा नेता एवं रांची की मेयर आशा लकड़ा ने तो यहां तक कहा कि आदिवासी समाज का अस्तित्व ही है भगवान राम की वानर सेना। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने भी आदिवासियों को सनातन हिन्दू धर्म का हिस्सा बताया।

इतना ही नहीं संघ परिवार से जुड़े झारखंड के रांची जिलान्तर्गत बेड़ो व लापुंग प्रखंड के कई पहानों ने खुले मैदान में प्रेस वार्ता करते समय आदिवासियों को सनातन हिन्दू धर्म का हिस्सा बताते हुए कहा ‘हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से मंदिरों में स्थापित देवी देवताओं तथा सरना स्थल में मां सरना की पूंजा अर्चना एक साथ सरना सनातन परंपरा के अनुसार करते आए हैं। इसके अलावा खुद को सरना धर्मगुरू बताने वाले जगलाल पहन ने भी कहा कि राममंदिर निर्माण में सरना स्थल की मिट्टी लगाना गौरव की बात है। हालांकि सरना धर्मगुरू बंधन तिग्गा ने कहा कि राममंदिर निर्माण में सरना की मिट्टी का प्रयोग गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि मेयर आशा लकड़ा और पूर्व विधायक गंगोत्री कुजूर खुद को वानर या शुद्र कह सकती है, लेकिन आदिवासियों को यह मान्य नहीं है। आदिवासी बुद्धिजीवी डाॅ. करमा उरांव और आदिवासी अगुआ प्रेमशाही मुंडा ने संघ परिवार के इस अभियान का पूरजोर विरोध किया। 

यदि हम इस मसले का गंभीरता के साथ विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि संघ परिवार अपने अभियान में सफल हो गया। 1960 के दशक में आर.एस.एस. ने वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से आदिवासी बहुल इलाके में काम शुरू करते हुए ईसाई मिशनरियों पर आदिवासियों का धर्मांतरण करने का आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने पर आदिवासियों का हिन्दुकरण करना शुरू किया। इस दरमियान संघ के नेता निरंतर बोलते रहे कि आदिवासी हिन्दू हैं। 1990 के दशक तक संघ परिवार ने आदिवासियों के बीच अपना सशक्त कैडर तैयार कर लिया। अब वही कैडर निरंतर अभियान चलाते हुए बोलते रहते हैं कि आदिवासी वनवासी हैं, आदिवासी वानर हैं, आदिवासी हिन्दू हैं, सरना सनातन एक है, संताल सनातन एक है, इत्यादि। इसके अलावा वे ईसाई मिशनरियों पर आदिवासियांे का धर्मांतरण करने का आरोप लगाकर निरंतर राजनीतिक अभियान चलाते रहते हैं। संघ परिवार का जो भी आदिवासी कैडर जितना ज्यादा ईसाई मिशनरियों पर धर्मांतरण का आरोप लगाता है उसे उतनी ही जल्दी चुनाव लड़ने के लिए भाजपा टिकट देती है। 

इसमें सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि संघ परिवार ने आदिवासी समाज को तीन टुकड़ों में बांट दिया। संघ के नेताओं को मालूम है कि आदिवासी समाज ही एक ऐसे समाज है, जिसने अंग्रजों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि आदिवासी समाज एकजुट था। इस समाज को तोड़े बगैर संघ परिवार के लिए आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करना असंभव था। संघ परिवार के नेताओं को यह भी मालूम है कि आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट किये बगैर आर्यों को भारत का असली निवासी घोषित नहीं किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने के लिए आदिवासियों की एकता को तोड़ना जरूरी था। इस एकता को तोड़ने के लिए धर्म ही सबसे बड़ा हथियार था। हकीकत यह है कि धर्म आफिम के रूप में काम करता है। संघ परिवार ने आदिवासियों को धर्म की आफिम खिलान शुरू कर दिया। 

संघ परिवार ने आदिवासी समाज को सबसे पहले सरना और ईसाई के नाम पर दो हिस्से में बांट दिया। इसके लिए उन्होंने सरना आदिवासियों के बीच भ्रम फैलाया कि ईसाई आदिवासी ही उनके असली दुश्मन है। वे ही उनके अधिकारों को छिन रहे हैं। लेकिन इससे भी काम नहीं बना क्योंकि सरना समाज का एक हिस्स खुद को सनातन हिदू धर्म से अलग मानता है और सरना कोड की निरंतर मांग करता रहा है। इस सरना समूह ने पिछले दो दशक से इतना सशक्त अभियान चलाया कि हजारों आदिवासी परिवार जो खुद को सनातन हिन्दू मानते थे अपने घरों से महावीर झंडा हटाकर सरना झंडा लगाने लगे। फलस्वरूप, यह समूह धीरे-धीरे फैलता जा रहा था, जिसे संघ परिवार को खतरा महसूस होने लगा। फिर क्या था? संघ परिवार ने अपने आदिवासी कैडरों को एक पक्ष में खड़ा करते हुए सरना धर्म के अस्तित्व को लेकर निरंतर अभियान चलाने वाले इस समूह को ही नकली आदिवासी घोषित करना शुरू किया। अंततः आदिवासी एक बार फिर से सरना-सनातन आदिवासी और सरना आदिवासी में बांट गये। संघ परिवार अपना निजी स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए आदिवासी समाज को कई टुकड़ों में बांट दिया फिर भी तथाकथित सरना नेता इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं।         

पिछले कुछ दशकों में तथाकथित सरना नेताओं ने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आर.एस.एस. और भाजपा के साथ मिलकर आदिवासी समाज के अस्तित्व को मटियामेट करने के प्रयास में सबसे ज्यादा योगदान दिया है। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि संघ से जुड़े इन तथाकथित सरना नेताओं को ‘‘सरना धर्म’’ से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि इन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए ‘‘सरना धर्म’’ का उपयोग किया है। ऐसा अक्सर देखा गया है कि जब भी ‘‘सरना’’ और ‘‘हिन्दू’’ धर्मों के बीच टकराहट की स्थिति पैदा होती है, ये लोग ‘‘सरना-सनातन’’ एक है वाला संघ परिवार का राग अलापने लगते हैं और अंततः सनातन हिन्दू धर्म के पक्षधर बन जाते हैं। हकीकत यह है कि इन्हें ‘‘सरना धर्म’’ से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि इनका हिन्दू धर्म में धर्मांतरण हो चुका है। कड़वी सच्चाई यह है कि ‘‘सरना धर्म’’ के अस्तित्व को मटियामेट करने में इन तथाकथित सरना नेताओं की सबसे बड़ी भूमिका है। क्या इन तथाकथित सरना नेताओं को सरना समाज कभी माफ करेगा? 

सरना स्थलों के मिट्टी को राममंदिर निर्माण हेतु भेजना कोई मामूली घटना नहीं है बल्कि यह ‘‘समुदाय आधारित’’ समता मूलक आदिवासी समाज को भेदभाव से सराबोर ‘‘वर्ण एवं जाति’’ आधारित सनातन हिन्दू समाज में तब्दील करने की सबसे बड़ी कोशिश है। यह आदिवासी समाज के अस्तित्व को मटियामेट करने का मसला है। ऐसी परिस्थिति मेें आदिवासी समाज के अस्तित्व को बचाने के लिए आदिवासी बुद्विजीवियों को इसपर गंभीरता से चिंतन-मंथन करते हुए सशक्त कदम उठाने की जरूरत है। संघ परिवार अपने उत्पति काल से ही आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने में लगा हुआ है। इसलिए आदिवासी समाज को सनातन हिन्दू समाज का हिस्सा बताता है। लेकिन असल में न संघ परिवार आदिवासी समाज को परिभाषित कर सकता है और न ही आर.एस.एस. एवं भाजपा से जुड़े हुए कठपुतली आदिवासी नेता। आदिवासी समाज  को हमारे पूर्वजों ने परिभाषित कर दिया है। हम आदिवासी भारत के प्रथम निवासी हैं, और इस सच्चाई को कोई भी ताकत झूठला नहीं सकता है। इसलिए आदिवासी अस्तित्व पर हमला बंद होनी चाहिए। ‘‘सनातन हिन्दू धर्म’’ की उत्पति से हजारों साल पहले से ‘‘सरना धर्म’’ का अस्तित्व रहा है। इसलिए इसे ‘‘सनातन हिन्दू धर्म’’ में समाहित करने की साजिश पर विराम लगाते हुए सरना धर्मावलंबी आदिवासियों को अलग धर्म कोड दिया जाना चाहिए।

बुधवार, 29 मई 2019

आदिवासियों से आहत ब्राह्मणवाद!

ग्लैडसन डुंगडुंग

लोकसभा चुनाव में बम्पर बहुमत मिलने के बाद 25 मई 2019 को जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संविधान पर माथा टेक रहे थे उसी समय तीन ब्राह्मणवादी महिला डाक्टरों - डा. हेमा आहूजा, डा. भक्ति मेहर और डा. अंकिता खंडेलवाल के द्वारा किये गये जातीय, नस्लीय एवं अमानवीय प्रताड़ना से तंग आकर महाराष्ट्र के जलगांव निवासी 26 वर्षीय भील आदिवासी महिला डा. पायल तड़वी के आत्महत्या करने एवं इस ब्राह्मणवादी संस्थागत हत्या के खिलाफ न्याय की मांग से संबंधित खबरें सोशल मीडिया में तैर रही थी। इसी बीच 26 मई 2018 को बीफ खाने को लेकर 29 मई 2017 को किये गये फेसबुक पोस्ट के आधार पर झारखंड के जमशेदपुर निवासी संताल आदिवासी प्रोफेसर जितराई हांसदा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। पुलिस ने बताया कि प्रो. जितराई हांसदा के बीफ खाने से संबंधित फेसबुक पोस्ट ने लोगों के धार्मिक भावनाओं को आहत कर दिया था इसलिए उसे गिरफ्तार करना पड़ा। इन दोनां घटनाओं का संबंध आदिवासियों से ब्राह्मणवाद के आहत होने से जुड़ा है।  

पहली घटना में एक भील आदिवासी लड़की का डाक्टर बनना तीन ब्राह्मणवादी डाक्टरों को पच नहीं रहा था। इन डाक्टरों ने पायल तड़वी को ड्यूटी के समय जमकर प्रताड़ित किया। फिर भी जब उनका मन नहीं भरा तब उन्होंने वाट्सप ग्रुप में पायल के खिलाफ जातीय एवं नस्लीय संदेश भेजा। उनका वाट्सप संदेश उनके अंदर कूट-कूटकर भरा जातीय एवं नस्लीय नफरत को दर्शाता है। वाट्सप संदेश में उन्होंने लिखा, ‘‘तुम आदिवासी लोग जंगली होते हो, तुमको अक्कल नहीं होती... तु आरक्षण के कारण यहां आई हैं... तेरी औकात है क्या हम ब्राह्मणों से बराबरी करने की... तु किसी भी मरीज को हाथ मत लगाया कर वे अपवित्र हो जायंगे... तु आदिवासी नीच जाति की लड़की मरीजों को भी अपवित्र कर देगी...! डा. पायल तड़वी ने हास्पिटल प्रशासक से इसके बारे में मौखिक शिकायत की थी लेकिन इन डाक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे स्पष्ट है कि एक आदिवासी लड़की के डाक्टर बनने से न सिर्फ ये तीन ब्राह्मणवादी डाक्टरों को दिक्कत थी बल्कि हास्पिटल प्रशासक भी आहत थे। 

इन ब्राह्मणवादी डाक्टरों को यह नहीं मालूम था कि आदिवासी भारत के वर्ण व्यवस्था से निकले जाति व्यवस्था की उपज नहीं हैं। इसलिए यदि वे उच्च जातियों में नहीं गिने जाते हैं तो वे नीच जातियों में भी नहीं हैं। वे वर्ण और जाति व्यवस्था में हैं ही नहीं बल्कि उनका अपना अलग व्यवस्था है, जिसका मूल आधार सामूहिकता, समानता, स्वायत्तता, न्याय और भाईचारा है। आदिवासी ‘ब्राह्मा’ के किसी भी अंग से पैदा नहीं हुए हैं इसलिए आदिवासियों को नीच जाति के लोग कहना ब्राह्मणवादियों के अज्ञानता का प्रमाण है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले ’’कैलाश बनाम अन्य एवं महाराष्ट्र सरकार’ में कहा है कि देश के 8 प्रतिशत आदिवासी ही भारत के प्रथम निवासी और मालिक हैं तथा अन्य 92 प्रतिशत लोग आक्रमणकारियों एवं व्यापारियों के वंशज है। इसलिए ब्राह्मणवादियों को यह मालूम होना चाहिए के वे भारत के निवासी नहीं है। उन्हें आदिवासियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने का कोई हक नहीं है। इन ब्राह्मणवादी डाक्टरों के वाट्सप संदेश में स्पष्ट झलकता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद इन तथाकथित उच्च जातियों के इन लोगों में मानव होने का गुण अबतक विकसित नहीं हुआ है। 

प्रो. जितराई हांसदा के मसले का विश्लेषण यह साबित करता है कि ब्राह्मणवादी अपने अनैतिक कार्यों को न्यायोचित ठहराने और उसे छुपाने में माहिर हैं। प्रो. जितराई हांसदा के साथ हुए असंवैधानिक कार्रवाई ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्राह्मणवादी लोग सिर्फ उनके आदिवासी होने के कारण आहत थे न कि बीफ खाने से क्योंकि बीफ को लेकर हकीकत कुछ और ही है। देश में पिछले पांच वर्षों से बीफ पर राजनीति करने वाले संघ परिवार की पाटी भाजपा की सरकार है लेकिन यहां बीफ का कारोबार फल-फूल रहा है। 2018 में भारत विश्व का दूसरा बीफ निर्यातक देश बना जबकि ब्राजील प्रथम देश है। पिछले वर्ष ब्राजील ने 18.55 लाख मेट्रक्स टन और भारत ने 18.50 लाख मेट्रक्स टन बीफ का निर्यात किया। इसके लिए कितने गाय-बैल और भैंसों को काटा गया होगा कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन इससे ब्राह्मणवादी आहत नहीं हुए हैं। उन्होने न भाजपा नेताओं पर सवाल किया और न ही पार्टी का विरोध? 

सबसे रोचक बात यह है कि देश का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक कंपनी है ‘आल कबीर एक्सपोर्टस प्रा. लि. है, जिसने बीफ से 650 करोड़ रूपये कमाया। इस कंपनी का मालिक सतीश सबारवाल है। इसी तरह अराबियन एक्सपोर्ट प्रा. लि. के मालिक सुनील कपूर हैं। एम.के.आर. फ्रोजेन फूड एक्सपोर्ट प्रा. लि. के मालिक मदन अबोट, पी.एफ.एल. इंडस्ट्रीज प्रा.लि. के मालिक ए.एस. बिन्द्रा, ए.ओ.बी. एक्सपोर्टस प्रा. लि. के मालिक ओ.पी. अरोड़ा, स्टॅन्डर्स फ्रोजेन फूड एक्सपोर्टस प्रा. लि. के मालिक कमल वर्मा एवं महाराष्ट्रा फूड प्रोसेसिंग एवं कोल्ड स्टोरेज प्रा. लि. के मालिक सन्नी कट्टर हैं। इसके अलावा और कई बीफ निर्यातक कंपनी हैं, जिनके मालिक खूद सवर्ण हिन्दू हैं। लेकिन इससे भी ब्राह्मणवादियों की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होती है। संघी लोग न इनके उपर हमला करते हैं और न ही उनके खिलाफ कोई मुकदमा। यदि कोई आदिवासी बीफ एक्पोर्ट कंपनी चलाता तब क्या होता? निश्चित ही तब ब्राह्मणवादी, मनुवादी और संघियों की धार्मिक भवनाएं आहत होती। 
मजेदार बात यह है कि संघियां और ब्राह्मणवादियों की पार्टी भाजपा ने बीफ निर्यातक कंपनियों से चंदा लिया है। चुनाव आयोग की वेबसाई के अनुसार बीफ निर्यातक कंपनी फ्राइगोरीफिको अल्लाना प्रा.लि. ने भाजपा को चेक के माध्यम से 2013-14 में 75 लाख रूपये एवं 2014-15 में 50 लाख रूपये चंदा दिया। इसी तरह बीफ निर्यातक कंपनी इनडाग्रो फूट्स लिमिटेड ने भाजपा को 75 लाख रूपये एवं फ्राइगेरिया कानवेरवा अल्लाना लिमिटेड ने 50 लाख रूपये चंदा दिये। यह हैरान करने वाली बात है कि बीफ बेचने वाली कंपनियों से चंदा लेने के बावजूद भाजपा से ब्राह्मणवादियों की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होती है लेकिन एक फेसबुक पोस्ट से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचता है। ऐसा क्यों?

इतना ही नहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 2 जुलाई 2017 को कहा था कि गोवा में बीफ पर प्रतिबंध नहीं लगेगा। इसी तरह 18 जुलाई 2017 को भाजपा नेता और गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर परिकर ने विधानसभा में कहा था कि गोवा में बीफ की कमी न हो यह सुनिश्चित किया जायेगा। गोवा के अलावा जिन पूर्वात्तर राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां बीफ का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। लेकिन बीफ पर दिये गये भाजपा नेताओं के बयान और भाजपा सरकारों के द्वारा बीफ उधोग को दिये गये संरक्षण से ब्राह्मणवादी आहत नहीं होते हैं। लोग हैरान हैं कि आदिवासियों के बीफ खाने से ब्राह्मणवादियों की भावनाएं क्यों आहत होती हैं?  

सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना करने वाले संघियों के हृदयसम्राट विनायक दामोदर सावरकर ने मराठी भाषा में लिखी गई किताब ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ में लिखा है कि गाय की देखभाल कीजिये लेकिन पूजा नहीं। वे लिखते हैं, ‘‘ईश्वर सर्वोच्च है, फिर मनुष्य का स्थान है और उसके बाद पशु जगत है। गाय तो एक ऐसा पशु है जिसके पास मुर्ख से मुर्ख मनुष्य के बराबर भी बुद्धि नहीं होती। गाय को दैवीय मानना और इस तरह से मनुष्य से उपर समझना, मनुष्य का अपमान है।‘‘ वे आगे लिखते हैं, ‘‘गाय एक तरफ से खाती है और दूसरी तरह से गोबर और मूत्र विसर्जित करती रहती है। जब वह थक जाती है तो अपनी ही गंदगी पर बैठ जाती है। फिर वह अपनी पूंछ से यह गंदगी अपने पूरे शरीर पर फैला देती हे। एक ऐसा प्राणी जो स्वच्छता को नहीं समझता उसे दैवी कैसे माना जा सकता है?’’ लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि ब्राह्मणवादियों की धार्मिक भावना को सावरकर भी आहत नहीं करते हैं लेकिन प्रो. जितराई हांसदा का एक फेसबुक पोस्ट आहत करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रारंभ से ही ब्राह्मणवादी लोग अपने कुकर्म को न्यायोचित ठहराते रहे हैं। उनके कथनी और करनी में जमीन-असमान का फर्क है। वे हमेशा दोहरी नीति अपनाते हैं। जब वे बीफ खाते या बीफ से पैसा कमाते हैं तब वह कार्य पवित्र होता है लेकिन जब वही काम दूसरे करते है तब वे उसे पाप का दर्जा देते हैं। 

इसलिए हमें यह समझना पड़ेगा कि कैमरा के सामने संविधान पर माथा टेकने का अभिनय करना और संविधान को जमीन पर लागू करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। अवसर की समता और भोजन का अधिकार हमारा मौलिक आधिकार है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 16 और 21 में प्रदत है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 के द्वारा छुआछूत और भेदभाव को खत्म कर दिया गया है। इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक को समान अवसर और भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करना सरकार की पहली जिम्मेवारी हैं। लोग बीफ, मटन, चिकन, डाग या कैट खाये यह उनका मौलिक अधिकार है। यदि कोई कहता है कि बीफ खाना उसका मौलिक अधिकार है तो क्या सरकार उसे नाकार सकती है? इसलिए प्रश्न उठता है कि संविधान पर माथा टेकने वालों ने डा. पायल ताडवी और प्रो. जितराई हांसदा के मौलिक अधिकारों की रक्षा क्यों नहीं की? क्या उनके दिलो-दिमाग में भी ब्राह्मणवाद राज्य करता है, जो आदिवासियों से आहत हो चुका है? 

सोमवार, 14 जनवरी 2019

क्या सवर्ण आरक्षण संविधान के मूल सिद्धांत के खिलाफ नहीं है?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारतीय संविधान के 124वें संशोधन बिल 2019 के द्वारा आर्थिकरूप से पिछड़े यानी 10 प्रतिशत सवर्णों को सरकारी नौकरी एवं शैक्षणिक संस्थानों में नामंकन के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। आदिवासी और दलितों के लिए सरकारी नौकरी एवं शैक्षणिक संस्थानों में नामंकन के अलावा संसद एवं विधानसभाओं में भी आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसलिए यहां मौलिक प्रश्न यह है कि गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ सरकारी नौकरी एवं शैक्षणिक संस्थानों में नामंकन के लिए क्यों किया गया? क्या आरक्षण गरीबी हटाओ और आर्थिक सशक्तिकरण की योजना है? क्या गरीब सवर्णों को संसद एवं विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व नहीं चाहिए? क्या केन्द्र सरकार ने आगामी चुनाव में सवर्णों के वोट बैंक को भाजपा के पक्ष में करने के लिए संविधान के मूल भावना के साथ खिलवाड़ किया है? क्या सिर्फ वोट बैंक के चक्कर में दलित और आदिवासी नेता भी संविधान में दिये गये आरक्षण के मूल मकसद को भूल गये? क्या सवर्णों को दिया गया आरक्षण संविधान के मूल भावना के खिलाफ नहीं है? 

सवर्णों के द्वारा आम तौर पर कहा जाता है कि गरीब की कोई जाति नहीं होती है इसलिए आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए जातीय नहीं। लेकिन क्या यह सच है? क्या गौरवशाली भारतीय समाज में गरीब सवर्ण और गरीब दलित या आदिवासी की स्थिति एक जैसी है? क्या गरीब सवर्ण भी दलितों जैसा ही अछूत है? हकीकत यह है कि पवित्र गंगा नदी में स्नान करने के बाद भी दलित अपवित्र ही रहते हं जबकि सवर्ण गरीब गंगा में स्नान किये बगैर भी पवित्र है। जब पवित्र गंगा भी दलितों को पवित्र नहीं कर सकती है क्या तब भी कहेंगे कि गरीब की कोई जाति नहीं होती है? क्यों गरीब सवर्ण परिवारों के बच्चे दलित बुजूगों के पैर नहीं छूते हैं? क्या गरीब सवर्ण और दलित मंदिरों में एक साथ पूजा कर सकते हैं? यदि गरीब की कोई जाति नहीं होती है तो सवर्ण और अन्य गरीब एक साथ क्यों नहीं बैठते हैं? इस हकीकत को कोई भी नहीं झूठला सकता है कि बहुसंख्य समाज का आधार वर्ण एवं जाति व्यवस्था है इसलिए यहां सबकुछ जाति के आधार पर ही तय होता है इसलिए गरीब की जाति होती है।  

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सवर्ण गरीब हैं? भारत सरकार ने गरीबी को आंकने के लिए दो अलग-अलग मानक स्थापित किया है। सवर्णों के लिए अलग और अन्य गरीबों के अलग। इसके तहत जिन सवर्ण परिवारों की वार्षिक आय 8 लाख रूपये से कम है उन्हें आर्थिकरूप से कमजोर यानी गरीब मानकर आरक्षण दिया जायेगा लेकिन वहीं जिन आदिवासी, दलित और ओबीसी परिवारों की वार्षिक आय 27,000 रूपये से कम है उन्हें गरीबी रेखा के नीचे रखा गया है। यदि सवर्ण गरीब हैं तो फिर सरकार ने उनके लिए क्यों अलग से गरीबी का मानक तय किया है? कितने सवर्ण परिवारों की वार्षिक आय 27,000 रूपये से कम है? गरीबी का दो मानक कैसे हो सकता है? क्या यह जाति के आधार पर तय किया हुआ मानक नहीं है? इसका अर्थ यह है कि सरकार स्वयं ही असमानता को बढ़ाने का काम रही है जो असंवैधानिक कार्य है और संविधान के खिलाफ काम करना देशद्रोह के अन्तर्गत आता है। 

यहां सवाल यह भी है कि प्रतिदिन 2000 रूपये यानी प्रतिमाह 60,000 रूपये एवं वार्षिक 7,20,000 रूपये  आय वाले सवर्ण परिवार गरीब कहलायेंगे और उनको आरक्षण मिलेगा। जबकि आदिवासी और दलितों के बीच देखा जाये तो मुश्किल से एक प्रतिशत ही लोग होंगे, जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रूपये से ज्यादा है यानी मोदीनोमिक्स के अनुसार लगभग 99 प्रतिशत आदिवासी और दलित गरीब हैं। यदि इस मानक को देश के सभी परिवारों पर लागू किया जायेगा तो लगभग 95 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे आ जायेंगे। भारत एक ऐसा देश है, जो विश्वगुरू बनने का ख्याब देखता है, जिसकी 95 प्रतिशत जनसंख्या गरीब है। क्या यह मोदीनोमिक्स है या जेटलीनोमिक्स? क्या देश के 95 प्रतिशत जनसंख्या को दुनिया के सामने गरीब कहना देश का अपमान नहीं है? क्या मोदी ने सवर्णों के वोट बैंक के चक्कर में देश का आपमान नहीं किया है? क्या सत्तधारियों को आरक्षण का मूल मकसद समझ में आता है?

यदि मोदीनोमिक्स और जेटलीनोमिक्स के अनुसार आरक्षण का मूल मकसद गरीबी हटाना और आर्थिक सशक्तिकरण है तो फिर आयकर का दायरा 2.5 लाख पर क्यों रखा गया है? जब केन्द्र सरकार ने यह मान लिया है कि प्रतिवर्ष आठ लाख से कम आय वाले सवर्ण परिवार गरीब हैं तो फिर 2.5 लाख से ज्यादा कमाने वाले परिवारों से इंकम टैक्स क्यों लिया जाता है? क्या सरकार को 8 लाख तक के वार्षिक आमदनी वाले परिवारों को आयकर माफ नहीं करना चाहिए? दुनिया के कौन से देश में गरीबों से टैक्स वसूलने की व्यवस्था है? यदि देश से गरीबी हटाकर लोगों को आर्थिकरूप से मजबूत करना है तो मोदी और जेटली आयकर का दायरा को बढ़ाकर आठ लाख रूपये क्यों नहीं करते हैं? क्या सरकार का मकसद आरक्षण का झुनझुना दिखाकर सवर्णों से वोट लेने के साथ-साथ 8 लाख तक के वार्षिक आय वाले सवर्णों को आयकर के सिकंजे में कसना तो नहीं है? केन्द्र सरकार का मकसद जो भी हो लेकिन समृद्ध सवर्णों को गरीब बताकर आरक्षण देना गरीबों का मजाक और देश में समानता स्थापित करने के लिए बनाया गया संविधान का अपमान है। 
  
आज के शासकवर्ग को यह समझना होगा कि संविधान में किये गये आरक्षण का प्रावधान गरीबी हटाओ या आर्थिक सशक्तिकरण योजना नहीं है बल्कि इसका मूल मकसद कमजोर तबकों के लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। यदि हम प्रतिनिधित्व को देखें तो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और अन्य सभी जगहों पर सवर्णों का प्रतिनिधित्व 70 प्रतिशत से उपर है। ऐसी स्थिति में सवर्णों को फिर से 10 प्रतिशत आरक्षण देने का क्या तुक है? इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि आरक्षण पर बहस प्रतिनिधित्व के मूल मकसद को लेकर किया जाना चाहिए न कि गरीबी हटाओ और आर्थिक सशक्तिकरण की दृष्टिकोण से। भारत सरकार को एक कानून बनाना चाहिए, जिसके तहत सभी जातीय एवं नस्लीय सामुदायों को जनसंख्या के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के बजट, सरकारी नौकरी, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, सेना, निजी कंपनी, मीडिया और जितने भी तरह के सरकारी व गैर-सरकारी उपक्रम हैं उसमें चपरासी से लेकर निदेशक तक के पदों को जनसंख्या के आधार पर बांट दिया जाना चाहिए, जिससे प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकेगा।  

यदि आज की स्थिति में आरक्षण को देखा जाये तो भारत में आदिवासी, दलित और ओबीसी के लिए कुल 49.5 प्रतिशत आरक्षण है तथा आघोषितरूप से सवर्णों के लिए 50.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है क्योंकि आदिवासी, दलित और ओबीसी के मेरिट धारियों को भी आरक्षित कोटा से ही नौकरी दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में कहा है कि आरक्षित समुदायों के मेरिटधारियों को सामान्य कोटा में भर्ती नहीं दिया जा सकता है तथा आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता है। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि 50.5 प्रतिशत सीटें सवर्णों के लिए अघोषितरूप से आरक्षित है? क्या सवर्णों को 100 प्रतिशत आरक्षण चाहिए? गरीबी के नाम पर सवर्णों को दिया गया आरक्षण भारतीय संविधान के मूल भावना और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है। 

सवर्ण आरक्षण को लेकर कुछ लोगों का मानना है कि इसे आदिवासी, दलित और ओबीसी पर लगाये गये आरक्षण का दाग धुल जायेगा। लेकिन क्या ऐसा होगा? ऐसा नहीं होगा बल्कि अब सवर्ण लोग उन दलित और आदिवासी परिवारों का भी अपमान करेंगे जो स्वयं को गरीबी रेखा से उपर मानते थे, जिनकी वार्षिक आमदनी पांच लाख रूपये से ज्यादा है। इस संशोधन के बाद इन आदिवासी और दलितों को सदा के लिए गरीब मान लिया जायेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आदिवासी और दलित लोग हमेशा ही दबे-कुचले रहेंगे उन्हें उपर उठने नहीं दिया जायेगा। क्या दलित और आदिवासी नेता इन सवालों को लेकर कभी आपस में चर्चा करते हैं? आदिवासी और दलितों का प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए इन नेताओं ने क्या भूमिका निभाया है? क्या ब्राह्मणवाद को पानी पी-पीकर गाली देने वाले दलित नेता मायावती, रामबिलास और अठौले देश और समाज के सामने बेनाकाब नहीं हो गए हैं? क्या इन नेताओं को भी आरक्षण का मूल मकसद समझ में नहीं आता है? क्या दलित और आदिवासी नेता संघ परिवार के गुलाम हो गये हैं? 

संघ परिवार के द्वारा पिछले सात दशकों से आदिवासियों के बीच बांटे जा रहे धर्म का आफिम खाकर उनके ही धुन पर नाचने वाले आदिवासियों के लिए आंख खोलने का समय है क्योंकि तथाकथित गरीब सवर्णों को मिलने वाला 10 प्रतिशत आरक्षण में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य धर्मावलंबी भी शामिल हैं। क्या आदिवासियों को सरना-ईसाई के नाम पर आपस में लड़ाने वाले संघी और भाजपा नेताओं ने सवर्ण आरक्षण में मुस्लिम और ईसाइयों को शामिल करने का विरोध किया? ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को आरक्षण का लाभ से वंचित करने का अभियान चलाने वाले भाजपा और संघ के नेता कहां गये? क्या उन्हें सवर्ण ईसाई और मुस्लिमों को हिन्दू सवर्णों के आरक्षण में हिस्सा देने से कोई दिक्कत नहीं है? इसका सीध सा अर्थ है कि तथाकथित उच्च जातियों के लिए धर्म कोई मायने नहीं रखता है बल्कि उनको उनका समाज से ज्यादा प्रेम है। उन्होंने हमारे उपर शासन करने के लिए धर्म का उपयोग किया है। वे आदिवासियों को धर्म के नाम पर आपस में लड़ाकर उनके वोट से उनके उपर ही शासन कर रहे हैं। सवर्णों को आरक्षण देने के मामले में सभी राजनीतिक दल बेनाकाब हो चुके हैं। 

यह बहुत ही दिलचस्प मामला है। ‘आरक्षण’ की छवि पहले नाकारात्मक थी लेकिन इसके अंदर सवर्णों के प्रवेश होते ही यह साकारात्मक हो गई है। ‘आरक्षण’ को अछूत, देश तोड़ने वाला, देश को बर्बाद करनेवाला, नाकाबिलियत का प्रतीक , सरकारी भीख और न जाने क्या-क्या उपमा दिया गया था क्योंकि इसका फायदा सिर्फ दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलता था। लेकिन वही ‘आरक्षण’ अब पवित्र, देश को आगे बढ़ाने वाला, देश को एकजुट करनेवाला, सबका साथ सबका विकास करनेवाला, मास्टरस्ट्रोक, सबका अधिकार और न जाने क्या-क्या हो गया क्योंकि अब इसमें सर्वणों का प्रवेश हो रहा है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि सवर्ण लोग उन सभी चीजों को पवित्र, श्रेष्ठ और मूल्यवान घोषित करते हैं, जिनका सरोकर उनके जीवन से है और बाकी चीजों को अपवित्र, घटिया और अछूत घोषित करते है जिनका सरोकार दलित और आदिवासी से हैं। 

हमारे देश के 15 प्रतिशत सवर्णों ने 85 प्रतिशत आदिवासी, दलित और ओबीसी को मूर्ख बनाकर रखा है और उनके उपर शासन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बड़ी चलाकी से धर्म का उपयोग किया है। आदिवासी, दलित और ओबीसी धर्म के नामपर आपस में लड़ मर रहे हैं और 15 प्रतिशत सवर्ण मौज मना रहे हं। इन समुदायों के लोगों को नीचा दिखाने के लिए सवर्णों ने कहा कि आरक्षण ने देश को बर्बाद कर दिया लेकिन अब वे भी आरक्षण लेने के लिए टूट पड़ रहे हैं। भारतीय संविधान के प्रस्तावना में कहा गया है कि देश के सभी लोगों को समानता एवं स्वातंत्रता के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय दिया जायेगा। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी संविधान के मूल उद्देश्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है क्योंकि ‘‘वर्ण और जाति व्यवस्था’’ इसके आड़े आ रहे हैं। इसलिए ‘‘वर्ण और जाति व्यवस्था’’ को जड़ से खत्म करने के बाद ही संविधान के मूल मकसद को हासिल किया जा सकेगा।