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गुरुवार, 3 जनवरी 2019

मुंडा दिसुम के मौलिक सवाल?

 ग्लैडसन डुंगडुंग

3 दिसंबर 2018। चुकलू हातु में सनाटा पसरा हुआ है। यह मुंडा आदिवासियों का गांव है, जो झारखंड के खूंटी जिले में जंगल के अंदर स्थित है। सरकारी भाषा में यह सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। यहां प्रकृति का अद्भुत दृश्य है। दूर से सिर्फ घुमावदार जंगल दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जंगल के बीच में गांव है। खेतों में पके धान के पीले पौधे प्रकृति की खुबशूरती में चार चांद लगाते हैं। हवा शुद्ध है, पानी शुद्ध है और लोग भी। लेकिन औद्योगिकरण के प्रभाव से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने यहां भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस वर्ष समय पर बारिश नहीं होने से उपरी सतह के कई खेतों में धान के पौधे सूख गए हैं, उनमें अनाज नहीं है सिर्फ पुआल बचा हुआ है, जो मवेशियों के चारा का काम आयेगा। लेकिन अधिकांश गहरे खेतों में धान की फसल अच्छी हुई है। जीवन में ऐसा द्वंद अक्सर दिखाई पड़ता है। यह कटनी का समय है। सुबह से मुंडा आदिवासी अपने-अपने खेतों में धान काटने में व्यस्त हैं। मन में सवाल उठता है कि धान काटना छोड़कर सभा में शामिल होने कौन आयेगा?  

लेकिन दोपहर होते-होते आस-पास के 15 गांवों के आदिवासी अपनी पीड़ाओं को लेकर चुकलू हातु के अखड़ा में ईमली पेड़ों के नीचे आकर बैठ जाते हैं। यही मुंडा आदिवासियों की खासियत भी है। वे अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए तत्पर रहते हैं। मुंडाओं को लड़ाकू माना जाता है। अखड़ा के एक हिस्से में दो बड़े-बड़े टेबलनुमा पत्थर गाड़े गये हैं, जहां गांव एवं यहां के रैयतों के बारे में जानकारी स्पष्टरूप से लिखा हुआ है। यह गांव का खतियान है, जिसे राजसत्ता भयभीत है क्योंकि वह इस इलाके को कबजाकर पूंजीपतियों को सौपना चाहता है। लेकिन दीवार की तरह खड़े ये निर्जीव पत्थर मुडाओं को उलगुलान का हौसला देते हैं। ये याद दिलाते हैं कि इनके पूर्वजों के खून-पसीना इस मिट्टी से सने हुए हैं, जिसे बचाकर आने वाली पीढ़ी को सौपना इनका फर्ज है। इसलिए मुंडा आदिवासी अपनी जान की परवाह किय बगैर राजसत्ता को चुनौती देते रहते हैं। 

आमसभा की शुरूआत करते हुए गांव के बिरसा हंस दुरंग करते हैं - ‘‘अबु आदिवासी मुंडा को संगबोंगा कबु बागीया, हठि-कुठि राड़ी-बाड़ी जाति को ओते हासा को रेओं जद बुआ।’’ (हम आदिवासी मुंडा लोग सिंगबोंगा को नहीं छोड़ेगें, दिकु हमारी हमीन को लूट रहे हैं।) यह दुरंग बिरसा उलगुलान के समय का है लेकिन आज की हकीकत से पूर्णरूप से मेल खाता है। इसलिए मुंडाओं ने इसे अपने हृदय से लगाकर रखा है। बिरसा उलगुलान का मतलब उन्हें समझाने की जरूरत नहीं होती है। वे जानते हैं की उन्हें अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए अंतिम सांस तक लड़ते रहना होगा।   

125 साल पहले दिकुओं ने मंडा आदिवासियों की जमीन को कई हथकंडे अपनाकर लूटा था तब यह दुरंग गढ़ा गया था। बिरसा उलगुलान के प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू किया रैयतों की जमीन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन सत्ताधीशों ने इस कानून को ईमानदारी से लागू नहीं किया। इसलिए आदिवासियों की जमीन लूट आज और भी ज्यादा भयावह होता जा रहा है। इसी बीच एक युवा उठ खड़ा होता है। वह काफी गुस्से में है। वह ओजस्वी स्वर में सवाल उठाता है, ‘‘झारखंड सरकार ने हमारे गांवों की सामाजिक जमीन, सरना स्थल और जंगल-झाड़ की जमीन को लैंड बैंक में क्यों डाला है? यह ग्रामसभा की जमीन है तो फिर सरकार को इसकी इजाजत किसने दी? क्या सरकार के पास यह अधिकार है? हमारी जमीन कैसे बचेगी?’’ ऐसा ही सवाल प्रत्येक गांव के लोग पूछते हैं। क्या राजसत्ता इन्हें इन सवालों का जवाब दे सकता है?   

मुंडा दिसुम अब शांत प्रतीत होता है लेकिन मुंडाओं के अंदर असंतोष की आग धधक रही है जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह। सरकार ने पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का उपयोग कर जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक का दावा करने वाले अगुओं को जेलों में बंद कर दिया है देशद्रोह का आरोप लगाकर ठीक उसी तरह जिस तरह से अंग्रेज सरकार ने धरती आबा बिरसा मुंडा को जेल में बंद कर दिया था। अब यहां कोई भी सभा सरकार के इजाजत के बिना करना गुनाह है। सरकार से आदेश लेने के बावजूद इस आमसभा में भी सीआपीएफ के एक दिकु आफिर तीन आदिवासी जवानों के साथ आ धमके। वे लोगों के बातों को गौर से सुनते रहे ताकि उन्हें देशद्रोही घोषित कर सके लेकिन इस बार उन्हें खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि मुंडाओं ने इस सभा में सिर्फ अपने संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों को सख्ती से लागू करने की बात की।   

मुंडा दिसुम को पुलिस छवनी में बदल दिया गया है। विडंबना यह है कि यहां प्रत्येक पांच किलोमीटर की दूरी पर अर्द्धसैनिक बलों का एक स्थायी कैंप है। लेकिन बीमार पड़ने पर इलाज करने के लिए मुंडा आदिवासियों को 40 से 50 मिलोमीटर की दूरी तय कर सरकारी अस्पताल जाना पड़ता है जहां सही इलाज और दवा की गारंटी भी नहीं है क्योंकि सरकारी अस्पताल खूद बीमार पड़े हैं। भारत के लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले सतर वर्षों में इस क्षेत्र में एक अच्छी सड़क तक नहीं दिया है। गडढ़े और बोल्डरों का सामना करते हुए लोग किसी तरह अपना गंतब्य स्थानों में पहुंचते हैं। विद्यालय पुलिस कैंप में तब्दील हो चुके हैं। कई स्कूलों में बच्चें कैंप के अंदर ही पढ़ते हैं। उन्हें प्रतिदिन बंदूकों का सामना करना पड़ता है। वे खिचड़ी खाते हैं। इस क्षेत्र में एक भी उच्च विद्यालय नहीं है इसलिए बच्चों को आगे की पढ़ाई करने के लिए 30 से 40 मिलोमीटर की दूरी तय करना होता है, जो साईकिल से संभव नहीं है। इसलिए अधिकांश बच्चे विद्यालय जाना छोड़ देते हैं। निश्चितरूप से ये बच्चे भारत देश के भविष्य नहीं हैं।  

झारखंड सरकार ने इस क्षेत्र के ग्रामसभाओं को सरकारी ग्रामसभा में तब्दील कर दिया है। इसके लिए हातु मुंडा को एक हजार रूपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। असल में यह वेतन नहीं आदिवासियों की जमीन लूटने में मदद करने के लिए राजसत्ता के द्वारा दिया गया घुस है वरना आज तो मजदूर भी प्रतिमाह पांच से आठ रूपये कमाते हैं। यहां सरकार ही कानूनों का कत्ल करती है लेकिन मुंडाओं को देशद्रोही बताकर जेल में डालती है। 23 अक्टूबर 2018 को अड़की के अंचलाधिकारी ने कुरूंग और कोचंग गांवों में ग्रामसभा का आयोजन करने का फरमान जारी किया। आदेश-पत्र में लिखा था कि कुरूंग एवं कोचांग गांवों में सामुदायिक भवन निर्माण हेतु पुलिस अधीक्षक, खूंटी से अधियाचना प्राप्त हुआ है, जिसके लिए दोनों गांवों में 2.47-2.47 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसलिए उक्त योजना हेतु इन गांवों में 29 एवं 30 अक्टूबर को ग्रामसभा आयोजित है, जिसमें सभी सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है।  

भूमि अधिग्रहण को लेकर उक्त गांवों लोग सवाल उठा रहे हैं कि ग्रामसभा के आयोजन का आदेश अंचलाधिकारी कैसे दे सकते हैं? कौन से कानून के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है? गांवों के विकास का काम कब से पुलिस अधीक्षक के हाथों में सौपा गया है? यदि विकास का काम पुलिस अधीक्षक देखेंगे तो जिला के उपायुक्त क्या करेंगे? जब दोनों गांवों में सामुदायिक भवन पहले से मौजूद हैं फिर सामुदायिक भवन किसके लिए बनाना है? 2.47 एकड़ जमीन में किस तरह का सामुदायिक भवन बनेगा? झारखंड मं इतना बड़ा सामुदायिक भवन नहीं है। गांव का सामुदायिक भवन के लिए 10 से 15 डीसमील जमीन काफी है। लेकिन अंदर की बात यह है कि सामुदायिक भवन के नामपर जमीन का अधिग्रहण कर दोनों गांवों में स्थायी पुलिस कैंप बनाने की योजना है इसलिए पुलिस अधीक्षक ने अंचलाधिकारी को अधिसूचना भेजा है। पुलिस कैंप बनाने के लिए सरकार को जमीन नहीं मिल सकता है इसलिए आदिवासियों को अंधेरा में रखकर जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है।  

लेकिन सरकार की असली मांशा को समझकर मुंडा लोग जमीन नहीं देना चाहते है इसलिए पुलिस अपनी शक्ति का प्रयोग कर रही है। 29 अक्टूबर 2018 को कोचांग के हातु मुंडा सुखराम सोय को खूंटी पुलिस ने खूंटी बाजार में चाय पीते समय उठा लिया और थाना में कई घंटो तक रखा। पुलिस पदाधिकारियों ने उन्हें धमकाया कि यदि वे जमीन अधिग्रहण वाले दस्तावेज में दस्तखत नहीं करते हैं तब उसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। उन्हें ‘पत्थलगड़ी’ के केसा में फंसाकर जेल में सड़ा दिया जा सकता है। इसी तरह की धमकी अन्य लोगों को भी मिल रही है। ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन को असंवैधानिक और देशद्रोही कदम बताकर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता एवं कई हातु मुंडाओं को जेल भेज दिया गया है। असल में यह आंदोलन ने ‘भूमि अधिग्रहण’ के लिए खतरा बन चुका था। यह स्पष्ट हो चुका है कि जो आदिवासी अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को सरकार और पूंजीपतियों को देने से इंकार करेगा वह देशद्रोही है। लेकिन मुंडाओं को इसे फर्क नहीं पड़ता है। उनके पूर्व लड़े वे भी लड़ेंगे। 
मुंडा लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पत्थलगड़ी आंदोलन असंवैधानिक था? क्या संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून के खिलाफ ग्रामसभाओं से अनुमति लिये बगैर ग्रामसभाओं की जमीन को लैंड बैंक में डालना असंवैधानिक कार्य नहीं है? क्या अंचलाधिकारी के द्वारा पेसा कानून के खिलाफ ग्रामसभा के आयोजन का आदेश जारी करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या सामुदायिक भवन के नाम पर पुलिस कैंप के लिए जमीन अधिग्रहण करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या उनके इलाके में पुलिस छवनी की स्थापना उनकी सुरक्षा के लिए है या उनकी जमीन लूटने के लिए? क्या राज्यपाल महोदय आदिवासी, उनकी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेगी? आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का हनन करने वाली सरकार देशद्रोही नहीं है तो फिर देशद्रोह का पैमाना क्या है? 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

बस्तर में जीवन इतना सस्ता क्यों है?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

छत्तीसगढ़ का बस्तर प्रमंडल सीआरपीएफ के बहादुर जवानों द्वारा आदिवासी महिलाओं का बलात्कार करने के कारण एक बार फिर से सुर्खियों में है। लेकिन केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, औद्योगिक घराना, राजनीतिक पार्टी एवं देश के बहुसंख्यक मध्यवर्ग के लोगों को इसे कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह समाचार देश के जीडीपी ग्रोथ, छत्तीसगढ़ की आर्थिक तरक्की, खनन पट्टा का सौदा, वोट बटोरने की राजनीति या सरकार एवं औद्योगिक घरानों के गंठजोड़ से मध्यवर्ग को होने वाला फायदा से संबंधित नहीं है। छत्तीसगढ़ में ‘नक्सल मारो अभियान’ से जुड़े सीआरपीएफ के जवानों ने 19 से 22 अक्टूबर 2015 तक बस्तर प्रमंडल के बीजापुर जिले अन्तर्गत बड़ागुड़ा थाना के चिन्नागेलूर, पेदागेलूर, गोदेम और भूर्गीचेरू समेत कई गांवों में माओवादियों की तलाशी के नाम पर आदिवासियों के घरों में लूटपाट की, पुरूषों को उनके घरों से बलपूर्वक निकालकर महिलाओं के साथ बलात्कार किया। बलात्कार पीड़ित चार महिलाओं ने बीजापुर जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कराया। 

बीजापुर के पुलिस अधीक्षक के.एल. ध्रुव ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि वे इस मामले में जांच कर रहे हैं। उक्त जवानों ने इन चार महिलाओं के अलावा कई और लड़कियों के साथ बलात्कार किया है लेकिन वे डर से अपना मुंह नहीं खोल पा रही हैं। आश्चार्य करने वाली बात यह है कि बस्तर रेंज के आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी को इस अमानवीय वरदात के बारे में पता तक नहीं है। वे कहते हैं कि उनकी जानकारी में ऐसी कोई घटना नहीं है। लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया है कि महिलाओं की जो भी शिकायत है, वे एसपी को लिखित में दे दें और वे उसपर कार्रवाई करेंगे। अब सवाल यह है कि जब कल्लूरी घटना की जानकारी लेने के बदले इसे सिरे से खारिज कर रहे हैं तथा कई जिलों में एसपी के पद पर रहते उनका रवैया कैसा था यह सब जानते हैं? ऐसे में उनसे कोई न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है? विगत एक दशक के अनुभव से बस्तर में न्याय की उम्मीद बेईमानी लगती है। 

बस्तर के आदिवासी विगत एक दशक से राज्य प्रायोजित हिंसा के चपेट में है, जिसे केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने आर्थिक तरक्की, देश के विकास एवं सुरक्षा बलों के गौरव के नाम पर जंगलों के अंदर दफन करके रखा है। और जब कभी बर्बता की पोटली खुलती भी है तो माओवादियों को इसके लिए जिम्मवार ठहरा दिया जाता है। सुरक्षा बलों ने नक्सल मारो अभियान के दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या, आदिवासी महिलाओं का बलात्कार और निर्दोष ग्रामीणों पर अत्याचार की है। बावजूद इसके ना केन्द्र और ना ही राज्य सरकार ने इस मसले को कभी गंभीरता से हल करने का प्रयास किया है। एक लोकतंत्रिक देश में कोई सरकार इतना लापरवाह कैसे हो सकता है? कैसे कोई लंबे समय तक एक समस्या को बरकरा रख सकता है? क्या सरकारों का एसा रवैया सिर्फ इसलिए है क्योंकि इस अत्याचार का सरोकार सिर्फ आदिवासियों से है?

बस्तर प्रमंडल एक अलग देश जैसा प्रतीत होता है, जहां सिर्फ और सिर्फ बंदूक का शासन चलता है। वैसे प्रशासनिक तौर पर इस प्रमंडल के अन्तर्गत बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नरायणपुर, सुकमा, कांकेर एवं कोंडागांव जिले आते हैं। नये राज्य के गठन से पहले यह मध्यप्रदेश का हिस्सा था। 1999 में बस्तर को एक अलग प्रमंडल घोषित किया गया, जिसके अन्तर्गत बस्तर, दंतेवाड़ा और कांकेर जिले थे। 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ और बस्तर सुर्खियों में छा गया क्योंकि यहां देश का 18 प्रतिशत लौह-अयस्क है इसलिए इसे एक आर्थिक रूप से उभरता राज्य के रूप में दिखाया जाने लगा। लेकिन इसके पीछे आदिवासियों का छुपा दर्द को सामने लाने का कभी भी ईमानदार कोशिश नहीं की गई। पारंपरिक रूप में यह क्षेत्र दंडाकरणया के रूप में प्रसिद्ध है। यहां अबूझमाड़ एक ऐसा वन क्षेत्र है जो 1500 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसका न ब्रिटिश हुकूमत और न ही भारत सरकार ने कभी सर्वे किया। 1980 के दशक में राज्य सरकार ने इस क्षेत्र में आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दिया था, जिसे 2009 में प्रतिबंधित क्षेत्र से मुक्त कर दिया गया। देश का सबसे ताकतवर नक्सली संगठन ‘माओवादी’ का लड़ाकू दस्ता ‘पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी’ यहां अपना सरकार चलाती है।

नक्सलियों के बस्तर आने की कहानी भी कुछ अलग ही है। 1979 में पीपुल्स वार ग्रुप के बड़े नेताओं ने खाने के मेज पर चर्चा करते समय देश में एक ‘गुरिल्ला जोन’ स्थापित करने की परिकल्पना की, जिसके लिए उन्हें एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र चाहिए था जहां सरकार की कोई पहुंच न हो जिससे युद्ध के समय उनके लड़ाकों को आराम करने एवं स्वयं को पुनः संगठित करने का मौका मिल सके। इस तरह से बस्तर का अबूझमाड़ जंगल उनका ठिकाना बना, जो छत्तीसगढ़, अंध्रपदेश, महाराष्ट्र एवं ओडिसा के बीच में स्थित है। यहां यह बात बहुत स्पष्ट है कि नक्सली बस्तर में आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए नहीं आये थे बल्कि सुरक्षित स्थान की तलाश ने उन्हें बस्तर पहुंचाया था इसलिए आदिवासियों को उनसे ज्यादा उम्मीद करना भी बेईमानी होगा।  

जब पीपुल्स वार ग्रुप का दस्ता बस्तर में प्रवेश किया तो उन्होंने स्वयं को स्थापित करने के लिए रातों में गांवों में बैठक कर वहां के स्थानीय समस्याओं की पहचान की। इसके बाद उन्होंने आदिवासियों को कम मजदूरी देने वाले फोरेस्टर एवं ठेकेदारों को धमकाया। उन्होंने शिक्षकों एवं स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को भी धमकाया जो बिना विद्यालय व स्वास्थ केन्द्र गये वेतन उठा रहे थे। इसके अलावा राजस्व कर्मचारियों एवं पुलिस को भी धमकाया जो आदिवासियों से हरेक काम के लिए पैसे की मांग करते थे। नक्सलियों ने वहां के दुकानदारों को भी धमकाया जो आदिवासियों को ठगते थे। इस तरह से दो-तीन वर्षों के अंदर में ही उन्होंने आदिवासियों का विश्वास जीत लिया। 2004 में जब पीपुल्स वार ग्रुप और एम.सी.सी. ने मिलकर सीपीआई माओवादी का गठन किया तो यह इलाका माओवादियों का सबसे बड़ा ‘लिबरेटेड जान’ के रूप में स्थापित हो गया, जहां उनकी सरकार चलने लगी।  

देश के राजनीतिक मानचित्र में नये राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ की स्थापना के साथ ही यहां एक तरफ जहां नक्सल मारो अभियान की शुरूआत हुई तो वहीं मिनरल पोलिसी बनाकर छत्तीसगढ़ सरकार ने पूंजीपतियों को खुल्ला आमंत्रण भी दे दिया। 2005 में शांति अभियान के नाम पर ‘सलवा जुड़ूम’ की शुरूआत हुई तो वहीं टाटा एवं एस्सर कंपनियों के साथ बस्तर में स्टील फैक्ट्री लगाने हेतु एम.ओ.यू. पर दस्तखत भी किया गया। 2006 में सलवा जुडूम का सरकारीकरण हो गया और आदिवासी युवाओं के हांथों बंदूक थमाकर अपने ही लोगों की निर्मम हत्या, बलात्कार और उनके घरों को जलाने का आदेश दे दिया गया। इस तरह से सलवा जुड़म के शांतिदूतों ने बस्तर में तबाही मचाकर 644 गांवों के 3 लाख आदिवासियों को खदेड़ दिया। इनमें से लगभग 1 लाख लोग सलवा जुड़ूम कैप में रहने के लिए मबजूर किये गये एवं 50,000 लोग अंधप्रदेश की ओर पलायन कर गये और 1.50 लाख लोग जहां-तहां अपनी जान बचाने के लिए चले गए। सलवा जुडूम में 700 लोगों की हत्या की गई एवं 500 महिलाओं के साथ बलात्कार, बदसलूकी और यौन शोषण किया गया। इसी बीच राज्य प्रायोजित हिंसा को दफन करने के लिए ‘‘उभरता छत्तीसगढ़’’ का नारा दिया गया और खाली किये गये गांवों में टाटा, जिंदल, एस्सार, भूषण स्टील जैसी कंपनियों को जमीन दे दी गई।  

2009 में केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर देश में सबसे बड़ा नक्सल मारो अभियान की शुरूआत की, जिसे ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ का नाम दिया गया था। हालांकि तब देश के गृहमंत्री पी. चिदंबरम इसे मीडिया की उपज बताकर इसे खारिज करते रहे। लेकिन सबको पता है कि ‘बिना आग का धुआं नहीं उठता’ और उस समय छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ का बखूबी से प्रचार-प्रसार भी किया। नक्सल मारो अभियान ने नक्सलियों को तो कम नुक्शान पहुंचाया लेकिन इसमें सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष आदिवासियों के लाशों की झड़ी लग गयी। माओवादियों ने 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जंगल में सीआरपीएफ के 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया, जो अबतक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था। इन्होंने 17 मई 2010 को दंतेवाड़ा-सुकमा मार्ग पर यात्री बस पर हमला किया जिसमें 15 पुलिस जवान एवं 20 आम नागरिक मारे गये। इसी तरह 29 जून 2010 को नरायणपुर में सीआरपीएफ के 26 जवानों को मौत के घाट उतार दिया एवं 25 मई 2013 को सुकमा में कांग्रेस पार्टी की रैली में हमला बोलकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस का सफाया कर दिया। 11 मार्च 2014 को दरभा घाटी में हमला कर 15 जवानों को मौत के घाट उतार दिया, जिसमें 1 आम नागरिक, 3 पुलिसकर्मी एवं सीआरपीएफ के 11 जवान शामिल हैं। इसी तरह 1 दिसंबर 2014 को सुकमा में हमला किया जिसमें सीआरपीएफ के 14 जवान मारे गये एवं 12 घायल हुए। 

एक तरफ जहां माओवादियों ने सुरक्षा बल के जवानों पर लगातार हमला बोलकर उनका कमर तोड़ दिया तो वहीं पुलिस, सीआरपीएफ एवं कोबरा जवान माओवादियों के बदले निर्दोष आदिवासियों पर टूट पड़े। 11 एवं 16 मार्च, 2011 को कोया कमांडो, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स एवं कोबरा बटालियन के जवानों ने माओवादियों के खिलाफ चलाये जा रहे ‘‘नक्सल विरोधी अभियान’’ के दौरान छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिलान्तर्गत टिमापुरम, मोरापल्ली एवं तरमेटला गांव के 300 घरों को सारा समान सहित जला डाला, 5 आदिवासियों की हत्या की एवं 5 आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार किया। इसी तरह 28 जून 2012 को बीजापुर जिले के कोट्टागुड़ा गांव में कोट्टागुड़ा, सरकेगुड़ा और राजपेटा गांवों के आदिवासी जब अपना परंपरागत उत्सव ‘‘बीजपेंडुम’’ (बीजोत्सव) के आयोजन की योजना बनाने के मकसद से बैठक कर रहे थे, जिसमें हमला कर 7 नाबालिकों सहित 18 आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया। 17 मई 2013 की रात बीजापुर जिले के इडेस्मेटा गांव में बीजोत्सव मना रहे आदिवासियों पर गोली चलाकर 4 नाबालिकों सहित 8 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। 6 जनवरी 2015 को लकड़ी काटने गये भीमा नूपो को पुलिस ने उसकी पत्नी के सामने गोली मार दी और उसके गांव में तंडाव मचा दिया। देखा जाये तो बस्तर में हरेक सप्ताह कहीं हत्या, कहीं बलात्कार तो कहीं बर्बरता की घटना होती है लेकिन राष्ट्रीय मीडिया के लिए सुर्खियां नहीं बनती। अब सवाल यह उठता है कि आदिवासियों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

यह आम तौर पर लोगों को पता है कि आदिवासियों के साथ ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भारतीय शासनतंत्र अमूमन यह विश्वास करता है कि देशभर में जगलों में रहनेवाले आदिवासी माओवादी या नक्सली हैं, जो देश में पूंजीनिवेश के वातावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। भारत के पूर्व अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह यहां के नागरिकों के संवैधानिक अधिकार के बजाये हमेशा पूंजीनिवेश को लेकर चिंतित रहते थे और अब वहीं कम नरेन्द्र मोदी बढ़चढ़कर कर रहे हैं। 9 मई 2015 को बस्तर दौरे के समय मोदी ने स्पष्ट कह दिया कि विकास ही नक्सल समस्या का हल है और उनके विकास का सीधा अर्थ जमीन, नदी, जंगल, पहाड़ और खनिज को पूंजीपतियों के हाथों में सौप देना। उन्होंने 24,000 करोड़ के नये परियोजनाओं का उदघाटन भी किया। दरअसल भारत सरकार आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर किसी भी कीमत पर कब्जा करना चाहती है, जो कि देश को महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसीलिए विकास और प्रगति के नाम पर जल, जंगल, जमीन, खनिज और अन्य संसाधन भारतीय राज्य को सौंपने से इनकार कर चुके आदिवासियों की हत्या, बलात्कार और अत्याचार करने के लिए आदिवासी इलाकों में सुरक्षाबलों को भर दिया गया है ताकि वे तंग आकर वहां से कहीं और चले जायेंगे। लेकिन सवाल यह है कि वे कहां जायेंगे? बावजूद इसके आदिवासियों का मुद्दा कभी भी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाना भी दुःखद है। 

विगत दिनों गोमांस खाने व रखने के अशांका में अखलक मारा गया। देश भर में हंगामा हुआ। देश में बढ़ते असहिष्णुता के खिलाफ लगातार हंगामा हो रहा है और होना भी चाहिए। साहित्यकार, फिल्मकार और वैज्ञानिकों ने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाया। इसका परिणाम यह हुआ कि किसी सुनामी की तरह देश में अचानक आये मोदी लहर से प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता हासिल करने वाली भाजपा बिहार चुनाव बुरी तरह से हार गई। लेकिन मेरे जेहन में कई सवाल बार-बार आ रहे हैं। देश में आदिवासियों का जीवन इतना सस्ता क्यों है? आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार के खिलाफ मोमबत्ती जलाने वालों की भीड़ कहीं क्यों नहीं दिखाई देती? निर्दोष आदिवासियों के हत्या पर संसद का कामकाज ठप क्यों नहीं होता? आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ विधानसभाओं में कुर्सियां क्यों नहीं तोड़ी जाती? आदिवासी बहुल राज्यों का सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं होता? और सबसे अहम सवाल यह है कि निर्दोष आदिवासियों के निर्मम हत्या, बलात्कार और बर्बरता पर इंडिया गेट की रंगीन शांम कभी गमगीन क्यों नहीं होती? क्या किसी के पास इन सवालों का जवाब है भी? और जब हम बस्तर लौटकर जाते हैं तो बार-बार यही सवाल मन में गुंजता रहता है कि बस्तर में जीवन इतना सस्ता क्यों है? आखिर इस तबाही का जिम्मेवार कौन है?

शनिवार, 27 जून 2015

सारंडा में अंतिम सांस लेता नक्सल आंदोलन?

- ग्लैडसन डुंगडुंग-

‘बाय जाॅनसन, फिर मिलेंगे’। सीआरपीएफ के एलिट फोर्स ‘कोबरा बटालियन’ ने सारंडा जंगल छोड़ते समय वहां के प्रत्येक विद्यालय के दीवारों पर लिखा था, जो यह बताने के लिए काफी है कि यह नाम नक्सल आंदोलन के लिए कितना मायने रखता था। यह महज एक संयोग ही था कि जब जाॅनसन गंझू को ढ़ूढ़ने के लिए कोबरा बटालियन के जवान दिन-रात एक कर दिये थे उस समय हमलोग मानवाधिकर हनन के मामलों की छानबीन के सिलसिले में सारंडा जंगल में थे और जब रोरो गांव में उस क्षेत्र के आदिवासियों ने उसे घेर कर रखा था तब भी हम सारंडा विकास माॅडल की जमीनी हकीकत देखने के लिए सारंडा जंगल में ही मौजूद थे। हमें यह खबर लग चुकी थी कि जाॅनसन को तीन दिनों तक आदिवासियों ने तीर-धनुष, कुल्हाड़ी और बरछा के बल पर एक शिकार की तरह घेर कर रखा है। और जब वह पकड़ा गया तो उससे कई सवाल पूछने के बाद उसकी हत्या कर दी गई। आदिवासियों द्वारा जाॅनसन की हत्या कोई मामूली घटना नहीं है और न ही यह किसी षड्यंत्र का हिस्सा है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से नक्सल आंदोलन के प्रति आदिवासियों के आक्रोश का प्रतिफल है। यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज ऐसा क्या हो गया कि जो आदिवासी लोग नक्सलियों को अपने संरक्षण के लिए सारंडा लेकर आये थे वे ही आज उनकी हत्या कर रहे हैं? क्या नक्सलवाद आदिवासियों के लिए नासूर बन चुका है? क्या नक्सल आंदोलन सारंडा में अंतिम सांस ले रहा है?

माओवादी एरिया कमांडर जाॅनसन गंझू की हत्या करने वाले आदिवासियों में अधिकांश लोग पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन जिन प्रश्नों को उन्होंने जाॅनसन के समक्ष रखा, देश के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी न सिर्फ इन प्रश्नों से मुंह मोड़ लेते हैं अपितु नक्सल आंदोलन को ही आदिवासियों का रक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत करते हैं। मैंने कई बार कहा है कि नक्सल आंदोलन आदिवासियों के लिए नासूर बन चुका है लेकिन ये बुद्धिजीवी नक्सल आंदोलन के खिलाफ कुछ भी सुनना नहीं चाहते हैं। आज नक्सल आंदोलन आदिवासी समाज को समाप्त करने का एक जरिया बनकर रह गया है और निश्चित तौर पर जाॅनसन से पूछा गया प्रश्न उसका प्रतिबिंब है। आदिवासियों ने जाॅनसन से पूछा - माओवादियों ने आजतक कितने पूंजीपतियों की हत्या की है? माओवादियों ने कौन-कौन से कंपनियों को आदिवासी इलाकों से भागने पर मजबूर किया है? आदिवासियों को अधिकार और न्याय दिलाने के नाम आये माओवादी लोग उनकी ही हत्या क्यों कर रहे हैं? माओवादियों के रहते हुए हमारी जमीन, जंगल, पहाड़, पानी और खनिज की लूट क्यों हो रही है? सारंडा जंगल में क्यों नये कंपनियों का आगमन हो रहा है? आदिवासियों को अपना गांव छोड़ने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है? माओवादी लोग कंपनियों से पैसा क्यों लेते हैं? माओवादी लोग गांवों के विकास कार्याें को क्यों रोककर रखा है? जाॅनसन के पास अधिकांश प्रश्नों का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं था। वह पूरी तरह से घिर चुका था और अंततः उसे जान देकर कीमत चुकानी पड़ी। इस इलाका के आदिवासी नक्सलियों के खिलाफ गोलबंद इसलिए हो रहे हैं क्योंकि नक्सलियों ने कई निर्दोष आदिवासियों को पुलिस मुखबिरी बताकर उनकी हत्या कर दी है। गांव से लोग पलायन कर गये हैं। गांवों में लोगों का जीना दूभर हो चुका है। युवा गांवों में नहीं रह सकते हैं। आदिवासी तीन तरह के बंदूकों के बीच फांस गये हैं।

पश्चिम सिंहभूम जिले स्थित सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित प्रखंडों में से एक प्रखंड सोनुवा से अलग हुए गुदड़ी का उदाहरण इस बात का गवाह है कि आदिवासी लोग नक्सलवाद से कितना ज्यादा त्रस्त हैं। इस इलाका में दो नक्सली संगठन - सीपीआई-माओवादी और पीएलएफआई दोनों के बीच चल रहे बर्चस्व की लड़ाई में आदिवासियों की लगातार हत्या की जा रहा है। नमन कंडुलना, जयमसीह बरजो, सोमनाथ, लक्ष्मण इत्यादि की हत्या हो चुकी हैं। आदिवासियों ने माओवादी प्रसाद जी, निर्मल और वरूण पर आदिवासी लड़कियों के यौन शोषण करने का भी आरोप लगाया है। 2009 में अलग प्रखंड बने गुदड़ी में नक्सलियों के भय से अब तक प्रखंड कार्यालय नहीं खुला। अब दोनों नक्सली संगठनों ने गुदड़ी प्रखंड के प्रत्येक गांव से 5-5 युवाओं की मांग की है। यानी प्रत्येक गांव से नक्सल संगठनों के लिए 10 आदिवासी युवा चाहिए जो आगे जाकर इन दो नक्सली संगठनों के बर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा बनकर अपने ही इलाका में आंतक पैदा करेंगे, एक दूसरे की हत्या करेंगे और अपने ही लोगों का जीवन तबाह करेंगे। यह सब आदिवासियों को उनका अधिकार और न्याय दिलाने के नाम पर होगा। अंततः आदिवासी ही सबकुछ गवायेंगे। अब आदिवासियों को यह समझ में आ गया है इसलिए वे लोग दोनों नक्सली संगठनों से दूर भाग रहे हैं।

इस इलाके के युवक गांव छोड़कर छोटे-छोटे टाउन - सोनुआ, गोईलकेरा, मनोहरपुर, बंदगांव, खूंटी, इत्यादि में किराया के मकान में रहते हैं। बुरूलूनिया गांव के प्रकाश लुगून को पीएलएफआई ने दिसंबर, 2014 में माओवादी समर्थक बताकर 2 लाख रूपये लेवी मांगा और नहीं देने की स्थिति में उसकी हत्या करने की धमकी दी। प्रकाश गांव छोड़कर अब गोईलकेरा में एक किराये के मकान में रहता है। इतना ही नहीं गांव के कुछ युवा बड़े शहरों की ओर पलायन कर गये हैं। बुरूलूनिया के ही 20 वर्षीय संतोष बजरो को माओवादियों ने पीएलएफआई समर्थक होने का आरोप लगाकर अगस्त, 2014 में उसकी हत्या करने की कोशिश की। अपनी जान बचाने के लिए उसे अहमदाबाद भागना पड़ा जहां वह 300 रूपये पर दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता चंदन बरजो बताते हैं कि 2010 में पंचायत चुनाव के बाद नक्सलियों के भय से 6 पंचायतों के शिक्षित लोग पलायन कर गये हैं। और जो गांव में बच गये हैं उनमें से लड़कियां रात में एक जगह पर सोती हैं और लड़के जंगल में सोते हैं क्योंकि नक्सली लोग रात में गांवों में आकर युवाओं को जबर्रदस्ती अपने साथ ले जाते हैं।

इस इलाका में वर्ष 2003 में माओवादी लोग गांवों में अपना पकड़ बनाना शुरू किये। माओवादी लड़ाकू विकास, मसीहचरण पूर्ति और बिरसा लुगून ने यहां के आदिवासियों से कहा कि सरकार आपका शोषण कर रहा है, जिसके खिलाफ लड़ने के लिए संगठन बनाना होगा। माओवादियों ने आदिवासियों को अधिकार और न्याय दिलाने का वादा किया इसलिए वे संगठन से जुड़े और माओवादी संगठन बहुत ताकतवर हो गया। झारखंड में यही एक ऐसा इलाका था जहां सिर्फ माओवादियों की तूती बोलती थी। जब नक्सल आंदोलन मजबूत हुआ तो पुलिस अत्याचार भी शुरू हुआ। 2009 में बृहत पैमाने पर नक्सलियों के खिलाफ पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों ने संयुक्त आॅपरेशन चलाया और निर्दोष लोगों पर पुलिस अत्याचार बड़े पैमाने पर हुआ। प्रकाश लुगून, सनिका भूईंया, चंदन बरजो, हेरमन लुगून, बिरजू बुढ़ इत्यादि को पुलिस जवानों ने बुरी तरह से पीटा था। शंकर सिंह मुंडारी सहित कई लोगों को फर्जी मुकदमा लगाकर जेल भी भेजा गया। फलस्वरूप, लोग बड़े पैमाने पर नक्सली आंदोलन से जुड़े। इस दरम्यान पुलिस ने कुछ लोगों को अपना मुखबिर भी बनाया। अब नक्सलियों ने पुलिस मुखबिरी बताकर आदिवासियों की हत्या करना शुरू की। सितंबर, 2011 में माओवादियों ने पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाकर जाजोदा के निर्दोष बिमल लोंगा की हत्या कर दी, जिसके खिलाफ आदिवासियों के बीच रोष पैदा हुई। बाद में माओवादियों ने आदिवासियों से माफी भी मांग ली लेकिन काम नहीं बना।  

इसी बीच निर्दोष आदिवासियों की हत्या के खिलाफ आदिवासियों ने माओवादियों को सबक सिखाने के लिए नक्सली संगठन पीएलएफआई का शरण लेना उचित समझा। इस तरह से 2014 में इस क्षेत्र में पीएलएफआई की पकड़ मजबूत हो गई, जो बर्चस्व की लड़ाई को जन्म दिया। न्याय और अधिकार के लिए बंदूक का शरण लिए आदिवासी लोग अब तीन तरह के बंदूकों के बीच फंस चुके थे। पुलिस उन्हें नक्सल समर्थक बताकर अत्याचर करने लगी, माओवादी आदिवासियों को पुलिस मुखबिर एवं पीएलएफआई समर्थक बताकर उनपर जुल्म ढ़ाह रहे थे तो वहीं पीएलएफआई उन्हें माओवादी समर्थक बताकर उनका जीना हराम कर दिया। यहां तक कि गांव के मुंडा को भी अपना गांव छोड़ना पड़ा। सखड़ीउली गांव के मुंडा सोमा लोंगा कहते हैं कि वे गांव के मुंडा होने के बावजूद गांव में नहीं रह सकते हैं। यहां के मानकी और 52 गांवों के मुंडाओं को लगा कि नक्सल आंदोलन आदिवासी समाज को अधिकार और न्याय नहीं दिला सकता है। अब उनके लिए स्वयं को बचाना ज्यादा जरूरी है इसलिए उन्होंने पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक से निवेदन किया है कि गुदड़ी प्रखंड में 5 से 8 सीआरपीएफ कैप लगाया जाये। उन्हें यह भी मालूम है कि सीआरपीएफ कैम्प उनके समस्या का समाधान नहीं है। गुदड़ी मौजा के मानकी मनोहर बरजो कहते हैं कि निर्दोष लोगों को पुलिस जेल में डाले तो कम से कम वे जिन्दा तो रह सकते है उन्हें हमलोग बाद में रिहा करवा लेंगे लेकिन नक्सली तो हमें सीधे जान से ही मार दे रहे हैं। आज जान बचाना ही हमारी पहली प्राथमिकता है।

सारंडा में माओवादियों के आने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय इस इलाके में कुछ छोटी-मोटी नक्सली घटनाएं जरूर हुई थी लेकिन यहां नक्सल आंदोलन खड़ा नहीं हो सका क्योंकि यहां आदिवासी लोग अपने बलबूते पर जल, जंगल और जमीन की रक्षा हेतु आंदोलन चला रहे थे और झारखंड आंदोलन भी साथ-साथ चल रहा था। 80 के दशक में सारंडा और पोड़हाट के इलाके में बड़े पैमाने पर जंगल आंदोलन हुआ। यहां के आदिवासियों ने वन विभाग के खिलाफ आंदोलन छेड़ते हुए इन जंगलों पर अपना पारंपरिक अधिकार का दावा कर दिया। फलस्वरूप, उनके उपर बड़े पैमाने पर पुलिस अत्याचार हुआ। 19 पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुइ, जिसमें 36 लोग मारे गये एवं 4100 लोगों को जेल जाना पड़ा। इसी बीच 15 नवंबर, 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ और देवेन्द्र मांझी जैसे चमत्कारिक नेतृत्व के अभाव में जंगल आंदोलन भी कमजोर पड़ गया। अब जंगल आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को लगा कि नयी सरकार आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर देगी और इसी डर से उन्होंने माओवादियों को सारंडा जंगल बुला लिया।

इस तरह से वर्ष 2000 के अंत में 7 सदस्यी एमसीसी का एक दस्ता सारंडा जंगल में प्रवेश किया। 27 नवंबर, 2001 को एम.सी.सी. के एरिया कमंडर, ईश्वर महतो को पुलिस ने बिटकिलसोय गांव में मार गिराया था, जो यहां की पहली घटना थी। इसके जवाब में एम.सी.सी. ने अपना ताकत दिखाते हुए 20 दिसंबर, 2002 को इसी गांव के पास पुलिस वहन को बिस्फोट से उड़ा दिया था, जिसमें दो आम जनता सहित 20 लोग मारे गये थे। इसी बीच 21 सितंबर, 2004 में एमसीसी और पीडब्यूजी का विलय होकर नया संगठन सीपीआई माओवादी का जन्म हुआ और देखते ही देखते सारंडा जंगल माओवादी संगठन के पूर्वी जोन का मुख्यालय बन गया। सारंडा जंगल में मौजूद देश का 25 प्रतिशत लौह-अयस्क भी माओवादी आंदोलन को मजबूती प्रदान किया। माओवादी लोग खनन कंपनियों से लेवी, बिस्फोटक और जरूरत का समान लेकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करते रहे और कई मरतबा ऐसा भी देखा गया जब वे स्वयं गैर-कानूनी उत्खनन मेें शामिल रहे। इस तरह से माओवादियों ने सारंडा जंगल से बड़े पैमाने पर पैसा कमाया जबकि वहां के आदिवासियों को अपने आजीविका के संसाधनों से हाथ धोना पड़ा, साथ ही पुलिस अत्याचार और नक्सलियों का प्रताड़ना झेलना पड़ा। और यही वजह है, जिसके कारण आदिवासियोें ने नक्सल आंदोलन से मुंह मोड़कर सीआरपीएफ का शरण लिया है। माओवादियों का गढ़ थोलकोबाद, तिरिलपोशी, बिटकिलसोय, बालिबा, कोदलीबाद इत्यादि गांवों का चबुतरा सुनसान पड़ा है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव के चबुतरा पर ही माओवादियों की बैठक होती थी और दिन में भी वे बंदूक के साथ गांव में मौजूद रहते थे लेकिन अब वे दिखाई नहीं पड़ते हैं। यद्धपि सारंडा जंगल में सीआरपीएफ कैंप होने से वहां के आदिवासी लोग ज्यादा सुरक्षित जरूर महसूस कर रहे है लेकिन उन्हें जमीन और जंगल खोने का डर भी सता रहा है क्योंकि झारखंड सरकार ने जिंदल, मित्तल, टाटा, रूंगटा, एलेक्ट््रो स्टील सहित कई कंपनियों को 22 नया माईनिंग लीज दिया है। यहां यह देखना दिलचस्प होगा कि नक्सली आंदोलन और आदिवासी लोग यहां से किस दिशा में जाते हैं।

इस क्षेत्र के आदिवासियों से बात करने से एक बात बहुत ही स्पष्ट हैं कि हकीकत में बहुसंख्यक लोग नक्सल आंदोलन में विचारधारा के बदले भय से जुड़े थे। लेकिन दुनियां में कई ऐसे उदाहरण है जो इस बात को स्पष्ट करता है कि भय के बल पर ज्यादा दिन तक शासन नहीं चलाया जा सकता है। और नक्सल आंदोलन का हस्र भी यही हो रहा है। आदिवासी लोग सरकारी बंदूक से संघर्ष करने के लिए नक्सलियों के बंदूक का सहारा लिया। लेकिन अब सरकारी और नक्सली दोनो के बंदूक से बचने के लिए अपने पारंपरिक हथियारों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन सबकुछ स्पष्ट हो रहा है कि अब बहुसंख्यक आदिवासी लोग शांति से जीना चाहते है उन्हें न ही पुलिस का बंदूक और न ही नक्सलियों का सहारा चाहिए। हकीकत यही है कि सरकार ने जिस तरह से आदिवासियों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया थी ठीक उसी तरह नक्सलियों ने भी आज आदिवासियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया हैं और अंततः अधिकार और न्याय की आस में बंदूक का साथ लेने वाला आदिवासी समुदाय सबकुछ गवां रहा है। इसलिए सरकार और नक्सल आंदोलन दोनों को अपनी रणनीति पर पुर्नविचार करना चाहिए। आदिवासियों को भी यह समझना होगा कि उन्हें बंदूक से कभी न्याय नहीं मिल सकता है क्योंकि वह दौर समाप्त हो चुका है जब उन्होंने तीर-धनुष के बल पर अपनी जमीन, जंगल, पहाड़, नदी और खनिज सम्पदाओं को सुरक्षित किया था।

बंदूक से अधिकार और न्याय की आस लगाने की वजह से झारखंड राज्य के गठन से अबतक यहां के लगभग 6000 आदिवासी लोग विभिन्न जेलों में बंद हैं, 3000 आदिवासियों की हत्या हो चुकी है, कई महिलाओं के साथ बलात्कार हुई, हजारों आदिवासी यातना के शिकार हुए और सरकार के लिए लोकतंत्रिक आंदोलनों को भी नक्सल आंदोलन बताकर कुचलने के लिए आसान हो गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की नक्सल आंदोलन ने आदिवासी समाज को गर्त में धकेल दिया। ऐसे समय में आदिवासियों को अपने संवैधानिक, कानून और पारंपरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए न्याय हासिल करना चाहिए। यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि नक्सल आंदोलन आदिवासियों को कभी न्याय नहीं दे सकता है क्योंकि अब यह बर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो चुकी है इसलिए अब आदिवासियों को अधिकार और न्याय हासिल करने के लिए लोकतंत्रिक तरीके से ही संघर्ष को आंजाम देना होगा। निश्चित तौर पर आदिवासियों द्वारा जाॅनसन की हत्या नक्सल आंदोलन के समाप्ति की ओर इशारा है।   

बुधवार, 19 नवंबर 2014

पानी पीने की सजा बाईस टांके

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

सुबह के सात बज रहे थे। सूर्य की रोशनी सखुआ के उंचे-उंचे पेड़ों को चीरते हुए धान की पीली पतियों पर पड़ रही थी, झाड़ियों में फूदक-फूदक कर चिड़िया चहचहा रहीं थीं और गांव के लोग अपने खेतों में जाने की तैयारी में जुटे थे। लालगलियारा में रात गुजरने के बाद हमारी टीम भी वापस लौटने के लिए चारपहिया वाहन पर सवार हो गई। गाड़ी चल पड़ी और थोड़ी ही देर के बाद हम लोग गाडी नामक गांव पहुंचे, जो झारखंड के लातेहार जिलान्तर्गत बरवाडीह थाना क्षेत्र में स्थित है। हमने देखा कि एक 40 वर्षीय व्यक्ति सड़क से सटे अपने घर के चबुतरा पर उदास बैठा हुआ था। वह व्यक्ति कोई और नहीं अपितु नागेन्द्र सिंह नामक चेरो आदिवासी था, जिसके सिर पर बाईस टांके पड़े थे, जो उन्हें बेतला अभयारण के पास स्थापित पुलिस पिकेट के पास स्थित चपाकल में पानी पीने की सजा के रूप में मिला था। क्या हम यह कल्पना भी कर सकते हैं कि एक आजाद देश में किसी व्यक्ति को सिर्फ पानी पीने की इतनी बड़ी सजा मिले?  

यह सोचकर हम स्तब्ध थे, शरीर सिहर उठा और हमें गुस्सा भी आने लगा था। बेशक यह निंदनीय और शर्मनाक घटना थी। हमने नागेन्द्र से पूरी घटना सुनने का मन बनाया इसलिए उसके साथ चबुतरा पर बैठ गये। हालांकि शुरू में नागेन्द्र चैंक गये कि हम कौन है जो उनके दुःख, दर्द और पीड़ा को जानने चाहते हैं? उनको इसलिए भी हम पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि वे जिन्हें वोट देते हैं उनके पास उनका दुःख, दर्द और पीड़ा सुनने के लिए समय नहीं है। एक बार चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि उनके क्षेत्र में झांकने भी नहीं जाते। उन्हें यह डर भी सता रहा था कि उनको अपनी आपबीती बताना कहीं महंगा तो नहीं पड़ेगा? लेकिन उनको पूरा विश्वास दिलाने के बाद उन्होंने अपनी आपबीती बतायी जो काफी भयावह है।  

नगेन्द्र बेतला अभयारण में एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्यरत है। उन्हें प्रतिदिन 177 रूपये मजदूरी मिलती है, जिसे वे अपना परिवार चलाते हैं । उनके परिवार में उनकी पत्नी 30 वर्षीय गीता के अलावा 9 वर्षीय बेटी दुर्गीवती एवं 7 वर्ष का बेटा श्रीशांत है। प्रतिवर्ष 1 नवंबर को ‘पलामू किला’ में मेला का आयोजन किया जाता है जहां भारी संख्या में लोग मेला देखने जाते हैं। चूंकि नागेन्द्र सिंह काम पर गये थे इसलिए उनकी पत्नी गीता अपने दोनों बच्चों को लेकर पलामू किला मेला देखने गयी थी। काम खत्म करने के बाद नगेन्द्र सिंह भी पलामू किला पहुंचे और शांम को पूरा परिवार एक साथ घर लौटने लगा। शांम के लगभग 6 बज रहे थे जब वे बेतला पुलिस पिकेट के पास पहुंचे। 

इसी बीच नागेन्द्र की बेटी दुर्गावती को प्यास लगी इसलिए उसने बेतला के पास चपाकल देखकर अपने पिता से पानी पिलाने को कहा। वे वहां पर रूककर पानी पीने लगे। इतने में ही पुलिस पिकेट में तैनात लातेहार जिला पुलिस बल के जवान उपेन्द्र पासवान ने नागेन्द्र सिंह को यह कहते हुए गाली देना शुरू किया कि ‘‘साला तुम नक्सली होकर यहां का पानी क्यों पी रहे हो? इस पर नागेन्द्र सिंह ने जवाब देते हुए कहा कि ‘‘सर मैं नक्सली नहीं हूॅ। बेतला अभयारण में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करता हूँ।’’ लेकिन उपेन्द्र पासवान ने उनकी एक न सुनी और उनके साथ धक्का-मुक्की शुरू कर दी। इसी बीच दो और जवान - रमेश महतो एवं बिन्देश्वरी सिंह भी वहां आ धमके और तीनों ने मिलकर नागेन्द्र को लाठी, लात और घूसा से बुरी तरह से पीटा। ये तीनों पुलिस जवान नशे में धूत थे। 

जब नागेन्द्र की पत्नी गीता बीच बचाव करने वहां गयी तो उसे भी लाठी से पीटा। उसके दाहिने हाथ एवं पीठ पर लाठियां बरसायी। पुलिस जवानों ने बच्चों को भी नहीं छोड़ा। इसी बीच नागेन्द्र के सिर में कई लाठियां बरसायी। फलस्वरूप, उनका सिर दो जगहों पर फट गया और वे लहूलुहान हो गए तथा वहीं गिरकर कुछ समय के लिए बेहोश हो गए। उनके सिर से भयानक खून बहने लगा। उनकी पत्नी गीता डर गयी कि कहीं वह अपने पति को खो तो नहीं देगी? उसने तुरंत अपनी साड़ी से नगेन्द्र का सिर बांध दिया। फिर कुछ समय के बाद जब नागेन्द्र होश में आये तो वे सब घर की ओर आगे बढ़ने लगे लेकिन इन जवानों ने उन्हें मुख्य सड़क से जाने नहीं दिया। अंततः वे पीछे से निकल पड़े और इलाज कराने के लिए हाॅस्पिटल पहुंचे। इलाज हुई और वे बच गये। उन्हें सिर में बाईस टंके पड़े और इलाज कराने में 5000 रूपये भी लगा। गीता भी दर्द से कराहती है। इसी से समझा जा सकता है कि वार्दीवाले गुंड्डों ने उनकी कितनी पिटाई की होगी? 

इधर 2 नवंबर, 2014 को सुबह 10 बजे नागेन्द्र सिंह तीनों पुलिस जवानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिए बरवाडीह थाना पहुंचे। चूंकि यह घटना छिपादोहर थाना के जवानों से संबंधित थी इसलिए वे बरवाडीह थाना गये जहां थानेदार ने पुलिस जवानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने से साफ मना कर दिया। लेकिन नागेन्द्र भी कहां मानने वाले थे? वे वहीं डटे रहे। अंततः थानेदार ने उनका लिखा हुआ आवेदन-पत्र रख लिया एवं हस्ताक्षर कर एक प्रति वापस भी दे दी लेकिन हकीकत में मुकदमा दर्ज ही नहीं किया क्योंकि वहां के थानेदार इन जवानों को बचाना चाहते थे। आजादी के 6 दशक बाद भी पुलिस थानों में एफ.आई.आर. कराना युद्ध जीतने के बराबर लगता है। जो भी हो लेकिन पुलिस अधिकारी का हस्ताक्षरयुक्त आवेदन-पत्र वापस मिलना भी नागेन्द्र के लिए एक हाथियार ही था, जिसके बदौलत वह अपनी लड़ाई आगे बढ़ा सकता था।  

लेकिन अचानक शांम को लगभग 4 बजे बरवाडीह थाना के दारोगा धनंज्जय प्रसाद पुलिस बल के साथ नागेन्द्र सिंह के घर पहुंचे और उन्होंने नागेन्द्र से इस मामले को वापस लेने का कहा। पुलिस के वहां पहुंचते ही भीड़ जुट गई और पूरा महौल ही नागेन्द्र के खिलाफ हो गया। पुलिस आॅफसर ने नागेन्द्र को इलाज कराने के लिए 8 हजार रूपये दे दी और खून से लतपथ साड़ी को भी धोने की सलाह दी। अंत में उन्होंने स्वंय एक आवेदन लिखा और नागेन्द्र से दस्तखत करवा लिया, जिसपर लिखा था कि हम लोगों ने आपस में सुलाह कर लिया है और आगे लड़ाई नहीं करेंगे। ऐसा लग रहा था मानो नागेन्द्र ही पुलिस जवानों से भिड़ गये थे। क्या कमाल के पुलिस आॅफसर हमारे देश में हैं, जो हर परिस्थिति में अपने सहपाठियों को बचा लेते हैं? ऐसे में आप न्याय की उम्मीद किससे कर सकते हैं?

नागेन्द्र अभी भी डरे सहमें दिखते हैं लेकिन उनकी पत्नी गीता बहुत चतुर महिला है। उसने खून से सनी साड़ी को अपने पास रखा है क्योंकि वह पुलिसिया जुल्म के खिलाफ लड़ना चाहती है। वह पानी पीने की इतनी बड़ी सजा भुगतने को तैयार नहीं दिखती। गीता कहती है, ‘‘हमने क्या अपराध किया था जो हमें बैल-बकरी जैसा पीटा गया? मैं पुलिस अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हूँ.’’ इधर झारखंड ह्यूमन राईट्स मूवमेंट ने इस मामले को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पास दर्ज कर दिया है। इसलिए अब देखना होगा कि ऊंट किस ओर करवट लेता है। लेकिन निश्चित तौर पर पानी पीने की इतनी बड़ी सजा देना धरती के महान लोकतंत्र के लिए शर्मनाक नहीं तो और क्या है?

शनिवार, 15 नवंबर 2014

कायर युद्ध नहीं जीतते मामू!

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

वर्ष 2008 में ब्रिटिश बैंकिंग कंपनी ‘एक्सीक्यूशन नाॅबल लिमिटेड’ द्वारा इस बात का खुलासा करने के बाद कि देश के लालगलियारे में 80 बिलियन डाॅलर का व्यापार माओवादियों की वजह से रूका हुआ है, अक्टूबर, 2009 में भारत सरकार ने देश के 9 राज्यों की सरकारों के साथ मिलकर माओवादियों के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ दिया, जिसे ‘आॅपरेशन ग्रीनहंट’ नाम दिया गया था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने उस समय संसद में कहा था कि माओवाद देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है, जिससे देश में विनिवेश का परिवेश प्रभावित हो सकता है। इसके बाद लालगलियारे में शांति स्थापित करने के नाम पर लगभग 2 लाख अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को मोर्चा पर लगा गया। और जब नागरिक संगठनों ने इसका मूल मकसद प्रकृति संसाधनों की वैश्विक लूट बताकर इसके खिलाफ हल्ला बोला तो बाद में इस अभियान में बंदूक के साथ विकास गतिविधियों को ठीक उसी तरह जोड़कर उन्हें शांत कर दिया गया जैसे भौंकते कुत्तों को हड्डी देकर शांत कर दी जाती है। असल में यह बिना लाठी तोड़े ही सांप को मारने की सरकारी रणनीति थी। लेकिन ऐसा लगता है कि बंदूक और विकास का अजब-गजब गांठजोड़ बनाने के बाद भी सरकार को सफलता हाथ नहीं लगी और हम जहां थे वहीं हैं।

लालगलियारे का दौरा तो यही एहसास दिलाता है कि शांति के बजाये आज भी वहां भय, दहशत और आतंक का महौल कायम है। नक्सली होने के आरोप में निर्दोष व्यक्तियों की हत्या, बलात्कार, यातना, फर्जी मुकदमा और उन्हें जेल भेजने का सिलसिला जारी है लेकिन माओवादियों को कोई खास क्षति हुई प्रतीत नहीं होती है। वहीं दूसरी ओर नागरिकों के सुरक्षा हेतु तैनात किये गये सुरक्षा बल के जवान, आम लोगों से ज्यादा असुरक्षित, भयभीत और आतंकित दिखाई देते हैं। मैं इस बात को दावे के साथ इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि लालगलियारे में स्थित पुलिस थाने और अर्द्धसैनिक बलों के कैंप ईट-सीमेंट की चाहरदीवारी के साथ कांटीले तारों से घिरे पड़े हैं और गेट अंदर से बंद रहता हैं, डयूटी में लगाये गये बंदूकधारी जवान बैरिकेट खोलने की हिम्मत तक नहीं जुटाते और गाड़ियों की जांच करते समय पूरी तरह भयभीत नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि मानो नागरिकों से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत हमारे बंदूकधारी जवानों को है। ऐसे सुरक्षा बलों से आप अपनी सुरक्षा की क्या उम्मीद कर सकते हैं? क्या ऐसे भयभीत सुरक्षा बलों के बदौलत कोई राज्य माओवादियों के खिलाफ युद्ध जीतने का सपना देख सकता है? ये बंदूकधारी जवान निर्दोष ग्रामीणों को भयभीत करने और क्षेत्र में आतंक फैलाने के अलावा कर भी क्या रहे हैं?

विगत दिनों लालगलियारे का दौरा करते समय मेरे मन में कई प्रश्न बार-बार उठ रहे थे कि आधुनिक हाथियारों से लैस पुलिस व अर्द्धसैनिक बल, माओवादियों के खिलाफ युद्ध क्यों नहीं जीत पा रहे हैं? पुलिस आधुनिकीकरण के लिए खर्च किये गये अरबों रूपये का क्या परिणाम निकला है? और समाज का अंतिम व्यक्ति कब यह महसूस करेगा कि लोकतंत्र के स्तंभ उसके सुरक्षा के लिए भी खड़े हैं? केन्द्र सरकार दावा करती है कि माओवादियों को खदेड़ कर सारंडा जंगल जैसे माओवादियों के ‘लिबरेटेड जाॅन’ को पुनः कब्जा कर लिया गया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय यह भी दावा करती है कि मार्च 2008 से लेकर 2013 तक 11,088 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन साथ ही यह आॅकड़ा गंभीर सवाल भी खड़ा करता है क्योंकि खुफिया विभाग की माने तो देश में लगभग 20,000 माओवादी लड़ाकू गुरिल्ल थे, जिसमें 2138 मारे जा चुके हैं और 1758 लोगों ने हथियार डाल दिया है। इसका मतलब यह है कि लगभग 15,000 माओवादी लड़ाके सरकार के हाथ में आ चुके हैं। इस तरह से अब मात्र 5000 माओवादी गुरिला ही सरकार के खिलाफ 9 राज्यों में युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में यहां लाख टक्के का सवाल यह है कि क्या इतनी शक्तिशाली सरकार के खिलाफ इतने कम लोग बंदूक के बल पर युद्ध लड़ सकते हैं? क्या हमारा खुफियातंत्र फेल है या सरकारी आॅकड़े में निर्दोष लोग शामिल हैं?

हमें यह भी समझना होगा कि आखिर माओवादियों के ताकत का आधार क्या है, जो इतनी शक्तिशाली सरकार को चुनौती दे रहे है? यह विवादहीन सत्य है कि सरकार का फेल होना ही माओवादियों की सबसे बड़ी ताकत है, जिसके बदौलत वे आदिवासी, दलित और गरीब तबके के लोगों को अपने पक्ष में करने में सफल हुए हैं। वहीं सैन्य अभियान की असफलता से खीजकर जवानों द्वारा निर्दोष व्यक्ति की हत्या, बलात्कार और प्रताड़ना ने आमजनों में सरकार के खिलाफ गुस्से को उफान पर ला दिया है। और जिस तरह से सरकार लोगों की आजीविका के संसाधनों को उनसे छिनकर विकास व आर्थिक तरक्की के नाम पर पूंजीपतियों को सौपने की कवायद में जुटी है, आग में घी डालने का काम कर रहा हैं वहीं अपने मुनाफा के लिए माईनिंग कंपनियों का धन और हाथियार से सहयोग उनको ताकतवर बना रहा। यह भी कठोर सत्य है कि लोकतंत्र का दरवाजा आमजनों के लिए बंद होने से न चाहते हुए भी लोग माओवादी आंदोलन से जुड़ रहे है और उनके खुफियातंत्र की मजबूती भी इसी का परिणाम हैं। ऐसी स्थिति में जबतक आम लोग सरकार के साथ नहीं होंगे, माओवादी कभी युद्ध नहीं हार सकते हैं।

हम माओवादी लड़ाकू और सुरक्षा बलों को होने वाले खतरों पर भी बात करेंगे तो सामने यही निकल कर आयेगा कि माओवादी लड़ाके हमारे सुरक्षा बल के जवानों से ज्यादा खतरे में रहते हैं। वे जंगलों में घुमते हैं जहां कभी भी सुरक्षा बल उन्हें मार गिरा सकते हैं, जंगल में मच्छड़ों का हमला है सो अलग, रहने के लिए उनका कोई ठिकाना नहीं, बीमार पड़ने पर इलाज कराने में भी पकड़े जाने का डर और खाने-पीने के लिए भी इतनी अच्छी व्यवस्था नहीं। उनके सामाजिक सुरक्षा की बात करें तो एक माओवादी गुरिल्ला को सिर्फ परिवार चलाने के लिए कुछ पैसे मिलते हैं और अगर वह मारा जाता है तो उसे शहीद घोषित करने के अलावे उसके परिवार को कुछ भी नसीब नहीं होता है। बावजूद इसके वे अपनी जान पर खेलकर अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संघर्ष जारी रखते हैं। जबकि वहीं दूसरी ओर हमारे बंदूकधारी जवानों के लिए सामाजिक सुरक्षा, उनके परिवार को नौकरी, मुआवजा और क्या नहीं मिलता है? फिर भी उनमें वो जज्बा, जुनून और हिम्मत नहीं दिखाई देता हंै जो एक माओवादी गुरिल्ल में मौजूद है। सवाल यह है कि हम में अपने उतरदायित्व के प्रति सजगता कब आयेगी?

हमें युद्ध रणनीति पर भी बात करनी होगी। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी युद्ध में दुश्मन को अपने ताकत का एहसास दिलाने का सबसे बड़ा तरीका है उसके घर में घुसकर हमला करना और माओवादी इसका बाखूबी उपयोग करते हैं, जबकि हमारे सुरक्षा बल अपने कैंपों से बाहर जाने की हिम्मत नहीं करते हैं। लालगलियारा में माओवादियों ने बारूहातु सहित कई ऐसे घटनाओं को अंजाम दिया है, जो सुरक्षा बलों के कैंप से मात्र 200 से 300 मीटर की दूरी पर स्थित है, बावजूद इसके हमारे बंदूकधारी जवान घटना स्थल पर 2 घंटे बाद पहुंचे। और अक्सर यही सुनने को मिलता है कि हमारे बंदूकधारी जवान घटना स्थल पर माओवादियों के चले जाने के बाद ही पहुंचते हैं। क्या हम माओवादियों के खिलाफ ऐसा युद्ध लड़ रहे हैं? लालगलियारे में यह आम चर्चा है कि सुरक्षा बलों के कैंपों के प्रवेश द्वार के पास भी बिस्फोट करने से जवान भय से बाहर नहीं निकलते हैं।

टेलिविजन चैनलों में यह अक्सर देखने को मिलता है कि 5 शेरों का एक झुंड 100 से ज्यादा ताकतवर वनभैंसों को न सिर्फ पराजित कर देता है बल्कि उन्हें अपना शिकार भी बना लेता है। ऐसा क्यों हैं? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शेर शारीरिक रूप से शक्तिशाली और फुर्तिले होने के साथ-साथ मानसिक रूप से काफी बुलंद होते हैं, जबकि वनभैंसा शारीरिक रूप से विशाल और ताकतवर तो हैं लेकिन मानसिक रूप से शेरों से कमजोर हैं। इसलिए शेरों को देखते ही वे भयभीत हो जाते हैं। माओवादी और अर्द्धसैनिक बलों के बीच चल रहे युद्ध का भी लगभग यही हाल है। माओवादी मानसिक रूप से ताकतवर हैं जबकि सैन्य शक्ति उनकी कमजोर है। वहीं हमारे अर्द्धसैनिक बलों का मनोबल टूट चुका है जबकि उनकी सैन्य शक्ति जबर्दस्त है। मैं यह बात इसलिए कह रहा हॅंू क्योंकि जबतक हम अपने कमजोरियों से मुक्त नहीं होंगे, माओवादियों के खिलाफ गुरिला युद्ध नहीं जीत सकते हैं। यह मानोवैज्ञानिक सत्य है कि मानसिक रूप से हरा हुआ व्यक्ति शरीरिक रूप से कभी नहीं जीत सकता है। और सच यही है कि हमारे बंदूकधारी जवान माओवादियों के खिलाफ मानसिक रूप से युद्ध हार चुके हैं इसलिए हमें अपने रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

लालगलियारे के सन्नाटे में

ग्लैडसन डुंगडुंग












लालगलियारे के सन्नाटे में
घुन की तरह पीस रहा आदमी
भूत का यहां पता नहीं
दुःख, दर्द और पीड़ा से है भरा वर्तमान,
उम्मीद की कोई किरण नहीं यहां
भविष्य में अंधेरा छाया है।

आतंक है लाल और खाकी का 
बच न पाया कोई भी अबतक यहां
हत्या, बलात्कार और यातना
रोजमर्रा की मर्म है
निर्दोष तड़प रहे जेल में
प्रफुल्लित हैं दोषी खाकी संग यहां।

विद्यालय में बच्चे नहीं
कोबरा का तांडव है
गुरूजी पड़े हैं जेल में
माओवादियों का मोहरा बनकर
बारह खाड़ी जानते नहीं बच्चे
एस.एल.आर. और ए.के. 47 के बने हैं ज्ञाता।

पड़े हैं बीमार स्वास्थ्य केन्द्र भी
मरीजों का ख्याल रहा नहीं किसी को
डाॅक्टर और नर्सों की मौज है
बैठे बिठाए मिल रहा वेतन उनको
बेच रहे सरकारी दवा भी 
माओवादियों के नाम पर।

जंगल के पहरूए रहे सदियों से जो
उसके ही दुश्मन बनाये गये हैं आज वो
तड़प रहे काल-कोठरी में
पेड़ काटने के इल्जाम में।

माओवादी, पूंजीपति और ठेकेदारों का है
बेजोड़ गांठजोड़, जंगल के अंदर
खजाना विकास का 
निगल रहे वो अनाकोंडा की तरह। 

ब्लाडर जैसे पेट लिए
जंगल के बीच सन्नाटे में
कांच की गोली खेलते बच्चे
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बन गए हैं खतरे।

चल रहा युद्ध लालगलियारे में
सरकार और लोहा-लक्कड़ वालों के बीच
शांति और न्याय के नाम पर
जंगल भी है हैरान
एक-दूसरे का देखकर कत्लेआम।

पूंजीपतियों की मौज है
लूट रहे प्रकृतिक सम्पदा
विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर  
और दम तोड़ रहा 
देश का अंतिम आदमी
लालगलियारे के संन्नाटे में
तड़प-तड़प कर।