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सोमवार, 22 जुलाई 2019

साहब का फैसला

ग्लैडसन डुंगडुंग










साहब आप ने हमें
जंगलों से अलग
करने का फैसला
कैसे कर दिया 
वातानुकूलित कमरे में
बैठकर?
क्या जंगल में
सखुआ के पेड़ों से टकराने वाले
हवा के झोंके से कभी
टकराये हैं आप?
क्या जंगल में
सीना तान के खड़े
पेड़ों के नाम
जानते है आप?
क्या जिनहोर के फूलों की खुशबू
कभी आपके नाक तक पहुंची है?
क्या गेठी, पुटू और करील का स्वाद
कभी चखा है आप ने?
क्या महुआ की महक
के बारे में जानते हैं आप?
फिर जंगलों से हमें
खदेड़ने का फैसला
कैसे कर दिया साहब आप ने?
जंगल में हमारे
न होने का मतलब
जानते हैं आप?
आपके फैसले से
भयभीत हैं जंगल
थरथरा रहे हैं पेड़
कंप उठे हैं भय से
छोटे-छोटे पौधे भी
बंद कर दिया है
चिड़ियों ने चहचहाना
खामोश हैं
बाघ, भालू और बंदर
झींगुरों ने शोरगुल
बंद कर दिया है
वे जान गये हैं
पूंजीपतियों के पंजों से
उन्हें बचानेवाला
अब कोई नहीं बचेगा
जंगलों में। 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

वनभूमि और जंगल के असली हकदार कौन?

ग्लैडसन डुंगडुंग

28 फरवरी 2019। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विगत ‘आदिवासी खदेड़ो आदेश’ पर रोक लगाते हुए आदेश दिया कि वन अधिकार कानून 2006 के तहत खारिज दावा-पत्रों का सही मूल्यांकन कर राज्य सरकारें हल्फनामा दायर करें। आदेश का पालन करते हुए देश के 20 राज्यों की सरकारों ने खारिज दावा-पत्रों का मूल्यांकन अद्भूत तरीके से किया। ओडिसा इसका एक बड़ा उदाहरण मात्र है। आडिसा के नौकरशाहों ने दावा-पत्रों के मूल्यांकन के नामपर वनभूमि के दावेदारों को शपथ-पत्रों में अपना नाम और उम्र लिखकर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लगवाकर अपना ड्यूटी पूरा किया। शपथ-पत्रों में लिखा था - हमारे पास वनभूमि पर दावेदारी करने के लिए प्रमाण नहीं हैं। इसलिए जिला स्तरीय समिति का निर्णय सही है। इस तरह से नौकरशाहों ने एक झटके में वनभूमि एवं जंगल के 10,000 असली दावेदारों एवं हकदारोंका दावा-पत्र खारिज कर दिया। ये लोग कई पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं और वनभूमि पर खेती करते हैं।  

एक उदाहरण है मयूरभंज जिले के चंडक वाईल्डलाईफ सेंचूरी में स्थित अम्बापड़िया गांव। अम्बापड़िया में 52 आदिवासी परिवार 1950 से रह रहे हैं। इन्होंने ही गांव बसाया है। वन अधिकार कानून 2006 में वाईल्डलाईफ संचूरी के अंदर आवास और आजीविका का अधिकार दिया गया है। जब यह कानून लागू हुआ तब इन आदिवासियों ने 2008 में ही दावा-पत्र भरा लेकिन 2010 में उनकी दावेदारी को खारिज कर दिया गया लेकिन उन्हें सूचना नहीं दिया गया। जब उन्हें इसकी भनक लगी तब उन्होंने सरकारी आफसरों को पत्र लिखा लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 15 जून 2019 को आफसरों ने उन्हें 18 जून को अनुमंडल स्तरीय समिति के पास उपस्थिति होने का आदेश जारी किया। आदिवासियों ने 3000 रूपये खर्च करते हुए गाड़ी का इंतिजाम कर समिति के जनसुनवाई में भाग लिया। लेकिन पदाधिकारियों ने शपथ-पत्रों पर उनका हस्ताक्षर एवं अंगूठे का ठप्पा लगाकर उन्हें गांव वापस भेज दिया। ऐसा ही सभी दावेदारों के साथ हुआ है।        

इस सच्चाई को जानकार कोई भी हैरान हो सकता है। केन्द्र सरकार ने दावा किया था कि वन अधिकार कानून को आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के उपर किये गये ऐतिहासिक अन्याय को न्याय में बदलने के लिए कानून लागू किया जा रहा है। कानून में प्रावधान स्पष्ट है कि जो दावेदार 13 दिसंबर 2005 के पहले से वनभूमि पर काबिज हैं या जंगल में घर बनाकर रह रहे तथा जंगल का उपयोग कर रहे हैं तो उसमें उन्हें खेती की जमीन और आवासीय भूमि पर व्यक्तिगत तथा जंगल पर सामुदायिक अधिकार मिलेगा। सरकारी आफसरों का काम सिर्फ सही दावेदारों की पहचान कर पट्टा निर्गत करना है। यहां सवाल उठता है कि जो आदिवासी वनभूमि और जंगलों पर कई पीढ़ियों से काबिज हैं उनका दावा-पत्र क्यों खारिज किया जा रहा है? यदि सुप्रीम कोर्ट का आदिवासी खदेड़ों आदेश लागू होता है तब इन आदिवासियों के आजीविका का क्या होगा? इसके लिए कौन जिम्मेवार है?     

हमें इस मसले को गंभीरता के साथ समझना होगा, जिसे सरकारें समझने को तैयार नहीं हैं। आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को खदेड़ने के पीछे तथाकथित संरक्षणवादी ताकतें हैं जो यह मानते हैं कि जंगल सरकार का है, जहां सिर्फ जंगली जानवारों को रहने का अधिकार है तथा जो लोग जंगलों के अंदर या उसके आस-पास रहते हैं वे वनभूमि एवं जंगलों का अतिक्रमण किये हुए हैं। ऐसे लोग न सिर्फ जंगलों के बर्बादी के लिए जिम्मेवार हैं बल्कि वे जंगल के दुश्मन तथा वन्यजीवन के लिए खतरा हैं। इसलिए इन लोगों को जंगलों से बेदखल किया जाना चाहिए। 2006 में जब भारत सरकार ने संसद में वन अधिकार कानून पारित करवाया था तब यही लोग अडंगा लगाकर दो वर्षाें तक कानून को लागू करने नहीं दिया। लेकिन जब केन्द्र सरकार ने 1 जनवरी 2008 को वन अधिकार कानून को देशभर में लागू कर दिया तब उसे कानूनी तौर पर रोकने के लिए इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाया खटखटाया।         

आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को जंगलों से बेदखल करने का अभियान चलाने वाले तथाकथित संरक्षणवादी एनजीओ हैं - बाम्बे नेच्यूरल हिट्री सोसाईटी, वाईल्डलाईफ ट्रस्ट आफ इंडिया, वाईल्डलाईफ फस्ट, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशनट्रस्ट, नेचर काजर्वेंशन सोसाईटी एवं वाईल्डलाईफ सोसाईटी आफ ओडिसा। इनमें से अधिकांश एनजीओ वन विभाग से सेवानिवृत अधिकारियों एवं तथाकथित उच्च जातियों के हं, जिन्होंने जीवन भर जंगलों को बेचकर अपना घर भरा तथा बाघों के खाल पर बैठकर पूजा किया। असल में जंगल और बाघ के नष्ट होने के पीछे ये ही हैं। लेकिन अब वन एवं वन्यजीवन बचाने के नामपर जंगलों से आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को हमेशा के लिए बेदखल करना चाहते हैं ताकि वे बिना रोक-टोक के टिम्बर एवं जंगली जानवरों की तस्करी कर सकें। हकीकत में आदिवासियों ने ही जंगलों को बचाकर रखा है। फोरेस्ट सर्वे रिपोर्ट 2017 में भारत सरकार ने माना है कि देश के आदिवासी बहुल जिलों में जंगलों का क्षेत्र बढ़ा है। फिर भी तथाकथित संरक्षणवादी आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करना चाहते हैं। 

इसके लिए सबसे पहले 2008 में वाईल्डलाईफ फस्ट, वाईल्डलाईफ ट्रस्ट आफ इंडिया, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशन ट्रस्ट एवं नेचर काजर्वेंशन सोसाईटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका सं. 50/2008 वाईल्डलाईफ फस्ट एवं अन्य बनाम यूनियन आफ इंडिया दाखिल करते हुए वन अधिकार कानून 2006 को असंवैधानिक करार देने की मांग की। लेकिन जब बात नहीं बनी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त याचिका को लंबित रखा है, तब वाईल्डलाईफ फस्ट, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशन ट्रस्ट एवं नेचर काजर्वेंशन सोसाईट ने सुप्रीम कोर्ट में दूसरा याचिका सं. 109/2008 दाखिल करते हुए मांग किया कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए उन्हें वनों से बेदखल किया जाये। इसके अलावा कई याचिकाएं राज्यों के उच्च न्यायालयों में दाखिल किये गये। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं ‘वाईल्डलाईफ फस्ट एवं अन्य बनाम यूनियन आफ इंडिया सं. 109/2008’ में समाहित करते हुए 2015 में सुनवाई शुरू किया तथा विगत 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने वन अधिकार कानून के तहत निरस्त किये गये दावा के संदर्भ में बेदखलीकरण का आदेश जारी किया था।हालांकि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए बेदखलीकरण का आदेश पर रोक लगवा दिया।

लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि ये तथाकथित वन एवं वन्यजीवन के रक्षकों ने जंगल उजाड़ने के लिए जिम्मेवार पूंजीपतियों के खिलाफ याचिका में कोई सवाल नहीं उठाया है जबकि 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। इतना ही नहीं विगत पांच वर्षों  में 2014 से 2018 तक 2347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले किया गया। इससे स्पष्ट है कि ये तथाकथित वन एवं वन्यजीवन के संरक्षक सिर्फ आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करना चाहते हैं। आगामी 24 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई करेगा। चुनाव समाप्त हो चुका है इसलिए हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट फिर से बेदखलीकरण का आदेश जारी कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो लगभग 20 लाख परिवारों के 1 करोड़ लोग अपने पुश्तैनी आवास, वनभूमि एवं जंगलों से बेदखल किये जायेंगे, जबकि वे वनभूमि एवं जंगलों के असली दावेदार और हकदार हैं। 

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘सह-अस्तित्व’’ प्रकृति का मूल सिद्धांत है, जो आदिवासी जीवन-दर्शन का एक प्रमुख आधार भी, जिसके तहत आदिवासी, जंगल और वन्यजीवन एक-दूसरे के पूरक हैं। इस अवधारणा को राष्ट्रीय वन नीति 1988 में ‘परस्पर’ संबंध कहा गया हैं। वन अधिकार कानून 2006 के तहत जंगलों में निवास करने का अधिकार भी इसी सह-अस्तित्व को स्वीकार करते हुए दिया गया है। वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 में वाईल्डलाईफ सेंचूरियों के अंदर बफर जोन में मनुष्य एवं जंगली जानवारों के सह-अस्तित्व को बढ़ाने पर जोर दिया गया है। लेकिन कुछ तथाकथित संरक्षणवादी एवं बाघ बचाने के नामपर करोड़ों रूपये कमाने वाले एनजीओ ‘सह-अस्तित्व’ की अवधारणा को नकारते हुए आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को जंगलों से निकाल बाहर करने के लिए पिछले कई दशकों से अभियान चला रहे हैं, जिन्हें यह मालूम होना चाहिए कि आदिवासी तब से जंगल एवं वन्यजीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण कर रहे जब ‘सुरक्षा’, ‘संरक्षण’ जैसे शब्द गढ़े नहीं गये थे। आदिवासियों के पास वन एवं वन्यजीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए पीढ़ियांें पुराना नियम, कानून और पद्धति है। आदिवासियों के बगैर न जंगल और न ही वन्यजीवन बचेगा। वे ही जंगल के असली हकदार, दावेदार और संरक्षक हैं इसलिए उन्हें वनभूमि एवं जंगलों पर मालिकाना हक दिया जाना चाहिए।    

मंगलवार, 25 जून 2019

आदिवासियों के उपर मंडराता बेदखलीकरण का खतरा

ग्लैडसन डुंगडुंग

वैश्विक मंच ‘‘ग्लोबल लैंडस्केप फोरम’’ लोगों के अधिकार, जमीन का सत्त उपयोग एवं स्थायी विकास के मसले पर प्रतिबद्ध दुनिया का सबसे बड़ा फोरम है। इस फोरम में अबतक दुनिया के 185 देशों के 4,400 संगठनों से जुड़े 180,000 लोग भाग ले चुके हैं। इस बार यह फोरम जर्मनी के बोन शहर में 22 एवं 23 जून 2019 को सम्पन्न हुआ, जिसमें 150 देशों के 700 लोग सीधे तथा 14,000 लोग आनलाईन शामिल हुए। इसके अलावा सोशल मीडिया के द्वारा फोरम का संदेश 1 करोड़ 40 लाख लोग तक पहुंचा। इस बार मुझे भी ग्लोबल लैडस्केप फोरम में शामिल होने का मौका मिला। मैंने मजबूती, दृढ़ता और प्रखरता के साथ जंगलों से आदिवासियों के बेदखलीकरण के मुद्दे को फोरम के पटल पर रखा। 

इन दिनों भारत के विभिन्न जंगलो के अंदर रहने वाले आदिवासी कई खतरों से जुझ रहे हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 13 फरवरी 2019 को दिया गया बेदखलीकरण का आदेश सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने उन आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वननिवासियों को वनभूमि एवं जंगलों से बेदखल करने का आदेश दिया था, जिनका दावा-पत्र वन अधिकार कानून 2006 के तहत खारिज किया जा चुका है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने इस आदेश पर रोक लगवा दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 20 राज्यों के राज्य सरकारों आगामी 12 जुलाई 2019 तक इस मसले पर अपना एफिडेविट दायर करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट आगामी 24 जुलाई 2019 को इस मामले की सुनवाई करेगा। वन अधिकार के मामले पर राज्य सरकारों के द्वारा पुर्नावलोकन के बाद भी 15 लाख दावा-पत्रों को खारिज मान लिया गया है, जिसका अर्थ है कि 75 लाख आदिवासियों के उपर जंगलों से बेदखल होने का खतरा मंडरा है। यदि इन्हें जंगलों से बेदखल किया गया तो ये लोग कहां जायेंगे? 

इसके अलावा दूसरा खतरा है भारतीय वन अधिनियम 1927 का संशोधन प्रस्ताव। भारत सरकार भारतीय वन अधिनिय 1925 को संशोधन करते हुए वन अधिनियम 2019 बनाने की प्रक्रिया चला रही है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार राज्य सरकारें किसी भी जंगल को रिजर्व जंगल घोषित करते हुए आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर सकती हैं। वन सुरक्षा गार्डों के पास जंगलों में तीर-धनुष एवं कुल्हड़ी जैसे औजारों के साथ दिखाई देने वाले लोगों को सीधे गोली मारने की शक्ति होगी एवं गोली चलाने वाले सुरक्षा गार्डों के उपर कानूनी कार्रवाई करने के लिए पीड़ितों को लिए सरकार से अनुमति लेना होगा। 
इसी तरह तीसरा खतरा यह है कि केन्द्र सरकार आदिवासी बहुल राज्यों में मौजूद नेशनल पार्क, वाईल्डलाईफ सेंक्चूरी एवं अभ्यरणों को जोड़कर वाईल्ड लाईफ कारिडोर बना रही है। उदाहरण के लिए झारखंड में तीन कारिडोर एवं तीन-सब कारिडोर बनाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत 870 गांवों को जंगलों से बाहर करने का प्रस्ताव है। पलामू टाईगर रिजर्व के अंदर आने वाले 8 गांवों को नोटिस दिया जा चुका है। इस परियोजना से लगभग 5 लाख आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। सरकार इन्हें बंजर भूमि पर बसाना चाहती है। ऐसी स्थिति में इनकी आजीविका का स्रोत समाप्त हो जायेगा। 

इसके अतिरिक्त चैथा खतरा है लैंड बैंक का गठन। कारपोरेट घरानों को बसाने के लिए राज्य सरकारें लैंड बैंक बना रहीं हैं। झारखंड सरकार राज्यभर के 20 लाख एकड़ सामुदायिक, धार्मिक एवं वनभूमि को लैंड बैंक में डाला दिया है, जिसमें 10 लाख एकड़ वनभूमि है। वन अधिकार कानून 2006 के तहत उक्त वनभूमि पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देना है लेकिन सरकार इस जमीन को पूंजीपतियों को देना चाहती है। 

इसके अलावा पांचवां खतरा है भारत सरकार ने द्वारा लागू किया गया कैफ कानून 2016। यह कानून कम्पा फंड में रखे गये 66,000 करोड़ रूपये को वनरोपन में खर्च करने के लिए बनाया गया है। यह पैसा तथाकथित विकास परियोजनाओं को स्थापित करते समय जंगलों को बर्बाद करने के एवज में कंपनियों ने वनरोपन के लिए केन्द्र सरकार के फंड में जमा किया है। वनरोपन का कार्य गैर-वनीय भूमि पर किया जाना है। लेकिन वन विभाग आदिवासियों को बेदखल करते हुए गांवों के जंगलों पर वनरोपन कर रही है। फलस्वरूप, वनविभाग और आदिवासियों के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। कैफ कानून के द्वारा आदिवासियों को उनकी आजीविका के संसाधनों से बेदखल किया जा रहा है। झारखंड और ओड़िसा में इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं। 

यदि आदिवासियों के उपर मंडराने वाले इन सारे खतरों का आंकलन एक साथ किया जाये तो स्थिति भयावह दिखती है। भारत में 10 करोड़ आदिवासी रहते हैं, जिनमें से 91.1 प्रतिशत यानी 9 करोड़ आदिवासियों की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि एवं वन है। ऐसी स्थिति में सरकार के द्वारा जंगल छीनने के लिए किये जा रहे प्रयासों से 9 करोड़ आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। हमलोग आदिवासी लोग इन खतरों से निपटने के लिए जनांदोलन कर रहे हैं, ग्रामसभाओं की शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं, कानून एवं संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग कर रहे हैं, कोर्ट का सहारा ले रहे हैं और मीडिया, सोशल मीडिया और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का सहयोग ले रहे हैं। लेकिन यह काफी नहीं है क्योंकि इसका मूल जड़ है ‘‘राजसत्ता और कारपोरेट जगत’’ के बीच गहरा सांठ-गांठ। 

कई रिपोर्टों में कहा गया है कि विगत लोकसभा चुनाव में 60,000 करोड़ रूपये खर्च हुआ है, जिसमें से सिर्फ एक राजनीतिक दल का खर्च 27,000 करोड़ रूपये यानी कुल खर्च का 45 प्रतिशत है। एक राजनीतिक दल के पास इतना पैसा कहां से आया? निश्चितरूप से यह कारपोरेट घरानों का पैसा है, जो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर पैसा कमाना चाहते हैं। सरकार की गतिविधियांें में दूर से द्वंद दिखाई पड़ता है लेकिन ऐसा है नहीं। आप कह सकते हैं कि एक तरफ सरकार आदिवासी हितों के पक्ष में वन
अधिकार कानून जैसे कानून लागू कर रही है और दूसरे तरफ वनभूमि एवं जंगलों को पूंजीपतियों को सौप रही है। लेकिन वर्तमान सरकार ने आदिवासियों लिए ऐसा कोई कानून नहीं लाया है बल्कि कई भूमि सुरक्षा कानूनों का संशोधन किया है। केन्द्र में शासन कर रही पार्टी की कई राज्यों में सरकारें हैं, जिन्होंने आदिवासियों के वनाधिकार को भी नकारा है। छत्तीसगढ़ के घटबारा गांव में कोयला खनन के लिए तीन सामुदायिक पट्टे खारिज कर दिये गये, बैलाडीला में अडानी कंपनी को लौह-अयस्क पहाड़ सौप दिया गया और झारखंड के रिंची गांव के 72 आदिवासियों को वन अधिकार इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वहां कोयला का भंडार है।     

लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी हम आदिवासियों के अधिकरों की रक्षा हो सकती है। भारत में हमारे लिए वन अधिकार कानून, पेसा कानून एवं भूमि सुरक्षा संबंधी कई अच्छे कानून हैं और संवैधानिक प्रावधान भी है, जिन्हें जमीन पर हू-ब-हू लागू करने से हमारी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी। इसलिए मैं इस ग्लोबल लैंडस्केप फोरम के माध्यम से भारत सरकार से मांग करता हॅं कि इन कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों को जमीन पर सख्ती से लागू करे। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी आदिवासी घोषणा-पत्र एवं आई.एल.ओ. कान्वेंशन 169 को लागू करे। मैं निवेदन करता हॅं कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा नियुक्त आदिवासी मामलों के रपटकर्ता ‘‘विकी’’ भारत का दौरा करें। इसका हम आदिवासियों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। 

मैं अंत में कहना चाहता हॅं कि जब हम आदिवासी लोग अपनी भूमि, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए आंदोलन करते हैं तब सरकारी महकमा और तथाकथित मुख्यधारा के लोग हमें विकास विरोधी कहते हैं और हमारे उपर राष्ट्रद्रोही का तमगा लगाते हैं। मैं उन्हें अक्सर कहता रहता हॅं और आज भी कह रहा हॅं कि हम आदिवासियों को विकास विरोधी और राष्ट्रद्रोही कहना बंद कीजिये। हमलोग न विकास विरोधी हैं, न राष्ट्रदोही और न ही स्वार्थी। हमलोग न सिर्फ अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है बल्कि सभी लोगों का भविष्य हमारे संघर्ष पर निर्भर है क्योंकि जिस दिन हमलोग संघर्ष करना बंद कर देंगे उस दिन सरकार और कारपोरेट मिलकर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को बेच कर खत्म कर देंगे। इसलिए हम आदिवासियों पर आरोप लगाने के बजाय आप हमारे संघर्ष का हिस्सा बनें। 

रविवार, 9 जून 2019

लैंड बैंक और वन अधिकार

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 55 मिलोमीटर की दूरी पर खूंटी जिले के मुड़हू प्रखंड में स्थिति है मुंडाओं का गांव पेरका। जेठ की दोपहर में गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था। अधिकांश मुंडा लोग गर्मी और लू से बचने के लिए अपने-अपने घरों के अंदर थे। सिर्फ दो-चार लोग पेड़ों की छाया मेें खटिया पर आराम फरमा रहे थे। झारखंड सरकार के द्वारा तैयार किये गये लैंड बैंक की सूची को लेकर मैं गांव पहुंचा हुआ था सरकार ने राज्यभर के 20,97,003.81 एकड़ सामाजिक, धार्मिक एवं वनभूमि को लैंड बैंक में डाल दिया है, जिसे कारपोरेट घरानों को दिया जा रहा है। पेरका गांव की सामाजिक, धार्मिक एवं वनभूमि को भी लैंड बैंक में डाला गया है। मैं आज वनभूमि और लैंड बैंक की जमीनी सच्चाई को उजागर करने के लिए पेरका गांव पहुंचा हॅं। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत सरकार ने आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को न्याय में बदलने के लिए वन अधिकार कानून 2006 बनाया था। लेकिन झारखंड की भाजपा सरकार वनभूमि जिसपर वन अधिकार कानून 2006 के तहत आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के अधिकारों को मान्यता देना है, पूंजीपतियों को देने के लिए तुली हुई है। 

हैरान होने वाली बात यह है कि झारखंड सरकार ने राज्य के 33,620 गांवों की सामाजिक, धार्मिक एवं वनभूमि को भूमि बैंक में डाल दिया है। पेरका गांव इसका एक उदाहरण मात्र है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के द्वारा तैयार की गई लैंड बैंक की सूची में पेरका गांव के जंगल का तीन प्लाट क्रमशः खाता सं. 44 के प्लाट सं. 1037 का 5.36 एकड़, प्लाट सं. 392 का 3.17 एकड़ एवं प्लाट सं. 88 का 3.61 एकड़ जंगल को भूमि बैंक में डाला गया है। गांव के लोग यह सुनकर हैरान हैं। पेतरूष तिड़ू बताते हैं कि पेरका गांव के जंगल को 1932 के खतियान भाग-2 में गांव को उपयोग करने का अधिकार दिया गया है। वे खतियान हाथ में लिए हुए कहते हैं, ’’यह गांव का जंगल है। सरकार इसको लैंड बैंक में कैसे डाल सकती है?’’ गांव के संतोष सोय स्तब्ध हैं। वे कहते हैं, ‘‘हमलोग पिछले 20-25 वर्षों से जंगल की रक्षा कर रहे हैं। प्रतिदिन गांव के दो व्यक्ति जंगल का पहरा देने जाते हैं ताकि कोई पेड़ न काट सके। प्रत्येक सप्ताह ग्रामसभा की बैठक होती है, जिसमें जंगल सुरक्षा और उपयोग पर चर्चा होती है। गांव की सहम्मति के बगैर सरकार ऐसा कैसे कर सकती है?’’ 

लैंड बैंक का निर्माण मौलिकरूप से औद्योगिक घरानों को जमीन उपलब्ध कराने के लिए किया गया है, जिसके बारे में स्पष्ट करते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 27 जुलाई 2016 को कहा, ‘‘भूमि अधिग्रहण हमारे लिए कभी भी चुनौतीपूर्ण नहीं रहा क्योंकि हमारे पास लैंड बैंक में 1,75,000 एकड़ जमीन विभिन्न उधोगों के लिए तैयार है, जिसपर वे अपना व्यवसाय स्थापित कर सकते हैं। वर्तमान में हमारे पास देश का 40 प्रतिशत खनिज सम्पदा है इसलिए झारखंड 2019 तक देश का पावर हब बनेगा।’’ असल में झारखंड सरकार लैंड बैंक को आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने हेतु एक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। उदाहरण के तौर पर झारखंड सरकार ने पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड में स्थित डिम्बूली गांव के 42 एकड़ परती जमीन को वेदांता कंपनी को दे दिया है। अब वेदंता कंपनी आदिवासियों से कह रही है कि उनके रैयती जमीन के चारो तरफ मौजूद परती जमीन को उसने सरकार से खरीद लिया है। इसलिए आदिवासी अपनी रैयती जमीन कंपनी को दे दे क्योंकि जमीन नहीं देने पर भी वे अपने खेतों में खेती नहीं कर पायेंगे। उनकी जमीन में जाने के लिए रास्ता नहीं बचा है।

यहां हमें यह भी समझना होगा कि आखिर झारखंड सरकार को लैंड बैंक बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इस सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए हमें झारखंड के पिछले डेढ़ दशक के इतिहास को समझना होगा। झारखंड राज्य आदिवासियों के संघर्ष के लिए जाना जाता है, जहां आदिवासी लोग अपनी पहचान, स्वायत्तता, संस्कृति, भाषा, जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने के लिए पिछले 300 वर्षों से संघर्षरत हैं। झारखंड राज्य का निर्माण भी संघर्ष का परिणाम है। लेकिन राज्य गठन के बाद यह संघर्ष विस्थापन पर केन्द्रित हो गया क्योंकि राज्य सरकार ने देशी-विदेशी कंपनियों के साथ 74 एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किया, जिसके खिलाफ लंबा संघर्ष चला। आदिवासियों के संघर्ष के कारण मित्तल, जिंदल और टाटा जैसे बड़ी कंपनियों का नया परियोजना नहीं लग पाया। कारपोरेट घरानों को लगा कि झारखंड में गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाये बगैर उनका व्यापार आगे नहीं बढ़ सकता है। 

2014 के विधानसभा चुनाव में एक रणनीति के तहत अर्जुन मुंडा जैसे दिग्गज आदिवासी नेताओं को चुनाव में हरवाया गया। इस तरह से रघुवर दास झारखंड के प्रथम गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने भूमि अधिग्रहण को आसान बनाने के लिए 31 दिसंबर 2014 को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के द्वारा लैंड बैंक के निर्माण हेतु सभी जिलों के उपायुक्तों को पत्र जारी करवाया। सभी जिलों से भूमि का आंकड़ा इक्टठा करने के बाद ‘झारभूमि’ के नाम से एक वेबसाईट बनाया गया, जिसे 5 जनवरी 2016 को रघुवर दास ने जारी किया। इसी के बाद ‘औद्योगिक एवं निवेश बढ़ावा नीति 2016’ बनायी गई, जिसके तरह राज्य में दो औद्योगिक गलियारा बनाने का प्रस्ताव है, जिसमें लगभग 5 लाख एकड़ जमीन का अधिग्रहण होगा। इसी के बाद 16-17 फरवरी 2017 को रांची के खेलगांव में ग्लोबल इंवेस्टर्स सम्मिट का आयोजन किया गया, जिसमें दुनियाभर के 11,200 व्यापारी शामिल हुए और 3.10 लाख करोड़ रूपये के पूंजीनिवेश से संबंधित 210 नया एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किया। लैंड बैंक की जमीन को दिखाकर सरकार ज्यादा से ज्यादा पूंजीनिवेश के लिए अग्रसर रही। 

इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि झारखंड सरकार जिस जमीन को परती यानी सरकारी जमीन बताकर लैंड बैंक में डाल दी है वह असल में ग्रामसभाओं की जमीन है। लैंड बैंक में तीन तरह की जमीन है - 1. सामाजिक जमीन यानी गोचर, खेल का मैदान, बाजार-हट, रास्ता, अखड़ा, इत्यादि, 2. धार्मिक जमीन जैसे सरना, देशावली, जाहेरथान, हड़गड़ी, मसना, इत्यादि और 3. वनभूमि एवं जंगल-झाड़ जिसपर वन अधिकार कानून 2006 के तहत आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों को अधिकार मिलना है। हैरान करने वाली बात यह है कि लैंड बैक का 20,97,003.81 एकड़ जमीन में से 10,016,680.81 एकड़ जमीन वनभूमि है, जो लैंड बैंक की कुल जमीन का 48.4 प्रतिशत है (देखें सारणी 1)। झारखंड सरकार का यह कदम शुद्धरूप से आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकारों को नकारते हुए वनभूमि एवं जंगलों को पूंजीपतियों को सौपन की प्रक्रिया है।
सारणी 1: भूमि बैंक में वनभूमि की स्थिति
क्.स. जिला    प्लाटों की              रकबा एकड़ में               वनभूमि
संख्या                                          कुल क्षेत्र            प्रतिशत में
1.रांची              10,327             1,07,677.69     78,256.44        72.68
2.खूंटी              5,863               53,387.93        12,888.14        24.14
3.लोहरदगा       3,951               14,372.30        9,742.95          67.79
4.गुमला           98,209             1,81,222.78     87,082.74        48.05
5.सिमडेगा        1,10,766          3,58,450.52     2,44,434.50     68.19
6.पूर्वी सिंहभूम  22,151             31,607.71        8,159.21          25.81
7.प. सिंहभूम    27,041             3,75,662.09     49.922.02        13.29
8.सरायकेला     5,609               24,467.66        5,008.71          20.47
9.बोकारो           2,624               21,827.03        19,823.80        90.82
10.धनबाद        6,504               30,769.46        11,648.14        37.86
11.रामगढ        574                  4,284.94          2,795.72          65.25
12.कोडरमा       278                  4,128.11          73.38               1.78
13.हजारीबाग    1,973               25,190.21        15,801.12        62.73
14.चतरा           482                  6,490.65          5,993.08          92.33
15.पलामू          --                     3,005.20          1,668.50          55.52
16.गढ़वा           31,319             33,546.72        7,536.10          22.46
17.लातेहार       12,508             79,177.25        34,407.49        43.46
18.दुमका          17,308             77,762.05        16,629.96        21.39
19.पाकुड़          15,460             69,241.36        31,436.90        45.40
20.देवघर          7,106               43,562.69        15,424.56        35.41
21.गिरिडिह      16,642             4,52,074.26     3,29,539.12     72.89
22.गोड्डा          4,956               23,417.28        5,929.15          25.32
23.जामताड़ा     9,607               36,086.36        5,803.17          16.08
24.साहेबगंज     7,889               39,591.56        16,675.58        42.12
  कुल   4,19,147          20,97,003.81   10,16,680.48   48.48

      स्रोतः भूमि बैंक, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, झारखंड सरकार
    
वनभूमि एवं जंगल-झाड़ को लैंड बैंक में डालना वन अधिकार कानून 2006 की धारा 4(1) एवं (5) का घोर उल्लंघन है, जो वनभूमि एवं जंगल पर आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के अधिकारों को मन्यता देता है एवं उन्हें अधिकार देने का काम पूरा होने से पहले अन्य गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाता है। सरकार का यह कदम पेसा कानून 1996 का उल्लंघन है, जो गांव के प्राकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभा को पूर्ण अधिकार देता है। लेकिन झारखंड सरकार ने ग्रामसभाओं के अधिकारों को ताक पर रखकर पूंजीपतियों के लिए रास्ता बनाया है। इसके अलावा भूमि बैंक सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘ओडिसा माईनिंग कारपोरेशन बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय’ केस सं. 180 आफ 2011 का भी खुल्ला उल्लंघन है, जो गांवों के प्राकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभाओं के अधिकारों को मान्यता देता है। इसलिए ग्रामसभाओं के सहम्मति के बगैर लैंड बैंक का निर्माण करना गैर-कानूनी है। इसलिए समय रहते झारखंड सरकार को लैंड बैंक को रद्द करना चाहिए।