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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

राममंदिर के बहाने आदिवासी अस्तित्व पर हमला

ग्लैडसन डुंगडुंग

संघ परिवार के द्वारा आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने की साजिश में एक और तारीख जुड़ गया है और वह है 5 अगस्त 2020, जिस दिन अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया गया। राममंदिर के निर्माण हेतु आर.एस.एस. और भाजपा के नेताओं ने देश के आदिवासी बहुल इलाकों से आदिवासियों के धर्म स्थलों - सरना, देशावली, जहेरस्थान, इत्यादि से मिट्टी इक्ट्ठा करने का अभियान चलाया, जिसका मूल मकसद था आदिवासी समाज को सनातन हिन्दू धर्म में समाहित करते हुए आदिवासियों को अतिशुद्र बनाना। यह आदिवासियों के भारत देश का प्रथम निवासी होने के अस्तित्व को मटियामेट करने का बड़ा साजिश था। यह अभियान झारखंड में विवाद का विषय बन गया क्योंकि संघी आदिवासी नेताओं ने आदिवासी समुदाय से अनुमति लिये बगैर सरना स्थलों एवं जहेरथान की मिट्ठी उठा ली। इन नेताओं पर मिट्ठी चोरी करने का आरोप लगा और उनके उपर मुकदमें भी किये गये।  

झारखंड के 24 प्रमुख आदिवासी संगठनों ने सरना स्थलों से मिट्टी चोरी करने के आरोप में भाजपा नेता गंगोत्री कुजूर, रामकुमार पाहन, आशा लकड़ा एवं आरती कुजूर का हुक्का-पानी बंद करने का ऐलान किया। वहीं सरना स्थल की मिट्टी चोरी करने के आरोप में तथाकथित सरना नेता मेघा उरांव के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज किया गया। हालांकि संघी आदिवासी नेताओं ने इसका विरोध भी किया। भाजपा नेत्री गंगोत्री कुजूर ने कहा कि मिट्टी दिए जाने का विरोध करने वाले नकली आदिवासी। जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट््रीय सह संयोजक डाॅ राजकिशोर हांसदा ने कहा कि जनजातीय समाज सनातन संस्कृति से अलग नहीं, जो अलग होना चाहता वह समाज का शत्रु। भाजपा नेता एवं रांची की मेयर आशा लकड़ा ने तो यहां तक कहा कि आदिवासी समाज का अस्तित्व ही है भगवान राम की वानर सेना। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने भी आदिवासियों को सनातन हिन्दू धर्म का हिस्सा बताया।

इतना ही नहीं संघ परिवार से जुड़े झारखंड के रांची जिलान्तर्गत बेड़ो व लापुंग प्रखंड के कई पहानों ने खुले मैदान में प्रेस वार्ता करते समय आदिवासियों को सनातन हिन्दू धर्म का हिस्सा बताते हुए कहा ‘हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से मंदिरों में स्थापित देवी देवताओं तथा सरना स्थल में मां सरना की पूंजा अर्चना एक साथ सरना सनातन परंपरा के अनुसार करते आए हैं। इसके अलावा खुद को सरना धर्मगुरू बताने वाले जगलाल पहन ने भी कहा कि राममंदिर निर्माण में सरना स्थल की मिट्टी लगाना गौरव की बात है। हालांकि सरना धर्मगुरू बंधन तिग्गा ने कहा कि राममंदिर निर्माण में सरना की मिट्टी का प्रयोग गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि मेयर आशा लकड़ा और पूर्व विधायक गंगोत्री कुजूर खुद को वानर या शुद्र कह सकती है, लेकिन आदिवासियों को यह मान्य नहीं है। आदिवासी बुद्धिजीवी डाॅ. करमा उरांव और आदिवासी अगुआ प्रेमशाही मुंडा ने संघ परिवार के इस अभियान का पूरजोर विरोध किया। 

यदि हम इस मसले का गंभीरता के साथ विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि संघ परिवार अपने अभियान में सफल हो गया। 1960 के दशक में आर.एस.एस. ने वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से आदिवासी बहुल इलाके में काम शुरू करते हुए ईसाई मिशनरियों पर आदिवासियों का धर्मांतरण करने का आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने पर आदिवासियों का हिन्दुकरण करना शुरू किया। इस दरमियान संघ के नेता निरंतर बोलते रहे कि आदिवासी हिन्दू हैं। 1990 के दशक तक संघ परिवार ने आदिवासियों के बीच अपना सशक्त कैडर तैयार कर लिया। अब वही कैडर निरंतर अभियान चलाते हुए बोलते रहते हैं कि आदिवासी वनवासी हैं, आदिवासी वानर हैं, आदिवासी हिन्दू हैं, सरना सनातन एक है, संताल सनातन एक है, इत्यादि। इसके अलावा वे ईसाई मिशनरियों पर आदिवासियांे का धर्मांतरण करने का आरोप लगाकर निरंतर राजनीतिक अभियान चलाते रहते हैं। संघ परिवार का जो भी आदिवासी कैडर जितना ज्यादा ईसाई मिशनरियों पर धर्मांतरण का आरोप लगाता है उसे उतनी ही जल्दी चुनाव लड़ने के लिए भाजपा टिकट देती है। 

इसमें सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि संघ परिवार ने आदिवासी समाज को तीन टुकड़ों में बांट दिया। संघ के नेताओं को मालूम है कि आदिवासी समाज ही एक ऐसे समाज है, जिसने अंग्रजों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि आदिवासी समाज एकजुट था। इस समाज को तोड़े बगैर संघ परिवार के लिए आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करना असंभव था। संघ परिवार के नेताओं को यह भी मालूम है कि आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट किये बगैर आर्यों को भारत का असली निवासी घोषित नहीं किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने के लिए आदिवासियों की एकता को तोड़ना जरूरी था। इस एकता को तोड़ने के लिए धर्म ही सबसे बड़ा हथियार था। हकीकत यह है कि धर्म आफिम के रूप में काम करता है। संघ परिवार ने आदिवासियों को धर्म की आफिम खिलान शुरू कर दिया। 

संघ परिवार ने आदिवासी समाज को सबसे पहले सरना और ईसाई के नाम पर दो हिस्से में बांट दिया। इसके लिए उन्होंने सरना आदिवासियों के बीच भ्रम फैलाया कि ईसाई आदिवासी ही उनके असली दुश्मन है। वे ही उनके अधिकारों को छिन रहे हैं। लेकिन इससे भी काम नहीं बना क्योंकि सरना समाज का एक हिस्स खुद को सनातन हिदू धर्म से अलग मानता है और सरना कोड की निरंतर मांग करता रहा है। इस सरना समूह ने पिछले दो दशक से इतना सशक्त अभियान चलाया कि हजारों आदिवासी परिवार जो खुद को सनातन हिन्दू मानते थे अपने घरों से महावीर झंडा हटाकर सरना झंडा लगाने लगे। फलस्वरूप, यह समूह धीरे-धीरे फैलता जा रहा था, जिसे संघ परिवार को खतरा महसूस होने लगा। फिर क्या था? संघ परिवार ने अपने आदिवासी कैडरों को एक पक्ष में खड़ा करते हुए सरना धर्म के अस्तित्व को लेकर निरंतर अभियान चलाने वाले इस समूह को ही नकली आदिवासी घोषित करना शुरू किया। अंततः आदिवासी एक बार फिर से सरना-सनातन आदिवासी और सरना आदिवासी में बांट गये। संघ परिवार अपना निजी स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए आदिवासी समाज को कई टुकड़ों में बांट दिया फिर भी तथाकथित सरना नेता इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं।         

पिछले कुछ दशकों में तथाकथित सरना नेताओं ने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आर.एस.एस. और भाजपा के साथ मिलकर आदिवासी समाज के अस्तित्व को मटियामेट करने के प्रयास में सबसे ज्यादा योगदान दिया है। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि संघ से जुड़े इन तथाकथित सरना नेताओं को ‘‘सरना धर्म’’ से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि इन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए ‘‘सरना धर्म’’ का उपयोग किया है। ऐसा अक्सर देखा गया है कि जब भी ‘‘सरना’’ और ‘‘हिन्दू’’ धर्मों के बीच टकराहट की स्थिति पैदा होती है, ये लोग ‘‘सरना-सनातन’’ एक है वाला संघ परिवार का राग अलापने लगते हैं और अंततः सनातन हिन्दू धर्म के पक्षधर बन जाते हैं। हकीकत यह है कि इन्हें ‘‘सरना धर्म’’ से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि इनका हिन्दू धर्म में धर्मांतरण हो चुका है। कड़वी सच्चाई यह है कि ‘‘सरना धर्म’’ के अस्तित्व को मटियामेट करने में इन तथाकथित सरना नेताओं की सबसे बड़ी भूमिका है। क्या इन तथाकथित सरना नेताओं को सरना समाज कभी माफ करेगा? 

सरना स्थलों के मिट्टी को राममंदिर निर्माण हेतु भेजना कोई मामूली घटना नहीं है बल्कि यह ‘‘समुदाय आधारित’’ समता मूलक आदिवासी समाज को भेदभाव से सराबोर ‘‘वर्ण एवं जाति’’ आधारित सनातन हिन्दू समाज में तब्दील करने की सबसे बड़ी कोशिश है। यह आदिवासी समाज के अस्तित्व को मटियामेट करने का मसला है। ऐसी परिस्थिति मेें आदिवासी समाज के अस्तित्व को बचाने के लिए आदिवासी बुद्विजीवियों को इसपर गंभीरता से चिंतन-मंथन करते हुए सशक्त कदम उठाने की जरूरत है। संघ परिवार अपने उत्पति काल से ही आदिवासी अस्तित्व को मटियामेट करने में लगा हुआ है। इसलिए आदिवासी समाज को सनातन हिन्दू समाज का हिस्सा बताता है। लेकिन असल में न संघ परिवार आदिवासी समाज को परिभाषित कर सकता है और न ही आर.एस.एस. एवं भाजपा से जुड़े हुए कठपुतली आदिवासी नेता। आदिवासी समाज  को हमारे पूर्वजों ने परिभाषित कर दिया है। हम आदिवासी भारत के प्रथम निवासी हैं, और इस सच्चाई को कोई भी ताकत झूठला नहीं सकता है। इसलिए आदिवासी अस्तित्व पर हमला बंद होनी चाहिए। ‘‘सनातन हिन्दू धर्म’’ की उत्पति से हजारों साल पहले से ‘‘सरना धर्म’’ का अस्तित्व रहा है। इसलिए इसे ‘‘सनातन हिन्दू धर्म’’ में समाहित करने की साजिश पर विराम लगाते हुए सरना धर्मावलंबी आदिवासियों को अलग धर्म कोड दिया जाना चाहिए।

सोमवार, 8 जून 2020

नागरिकता से वंचित आदिवासी?

ग्लैडसन डुंगडुंग

मई महीने की तपती धूप को झेलते हुए सारंडा जंगल में विचरण करते समय अचानक ही कुछ लोगों की आवाज सुनाई पड़ी। जंगल के बीचो-बीच तीर-धनुुष, बरछा, कुल्हाड़ी और गुलेल के साथ आदिवासी दिखाई पड़े। ये लोग शिकार पर निकले थे। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। असामान्य बात यह थी कि ये आदिवासी थे पर भारतीय नागरिक नहीं। हमें देखते ही इस उम्मीद के साथ अपनी समस्या सुनाने लगे कि शायद उन्हें भी देश की नागरिकता और वन अधिकार कानून 2006 के तहत जिस जमीन पर वे काबिज हैं तथा जिस जंगल का उपयोग करते हैं उसका पट्टा मिल जाये। 

हमें सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि देश की नागरिकता प्रमाणित करने के लिए उनके पास कोई सरकारी दस्तावेज नहीं है। यह सिर्फ एक छोटा सा समूह की बात नहीं है बल्कि सारंडा जंगल के अंदर इनके जैसे लगभग 800 परिवारों के 4000 आदिवासी निवास करते हैं, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड या आधार कार्ड जैसे कोई सरकारी दस्तावेज मौजूद नहीं है। फलस्वरूप, वे कानूनी तौर पर भारत देश के नागरिक नहीं हैं। 

ये लोग इस बात से अशांकित है कि यदि उन्हें अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए मतदाता प्रमाण-पत्र, आधार कार्ड या राशन कार्ड और वन अधिकार कानून 2006 के तहत जोत-आबाद कर रहे जमीन का पट्टा नहीं मिला तो वन विभाग कभी भी उन्हें अतिक्रमणकारी बताकर सारंडा जंगल से खदेड़ देगा। प्रतिकार करने पर घुसपैठिये या नक्सली बताकर गोली मार दी जायेगी या उनके उपर पुलिस अत्याचार होगा और उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जायेगा। वे आतंकित हैं।  

सारंडा जंगल के इस अतिमहŸवपूर्ण मसले को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। सारंडा का शब्दिक अर्थ है सात सौ पहाड़ों का जंगल । यह एशिया में सखुआ का सबसे बड़ा जंगल है , जो झारखंड राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित है। यह जंगल जैव विविधता, वन्यजीवन और लौह-अयस्क के लिए प्रसिद्ध है। यह ‘‘हो’’ एवं ‘‘मुंडा’’ आदिवासियों का निवास स्थान भी है, जहां 25,000 परिवारों के लगभग 125,000 लोग निवास करते हैं । 

ब्रिटिश हुकूमत के समय वन संरक्षण के नाम पर सारंडा वन क्षेत्र के 1,99,740 एकड़ जंगल को चिन्हित कर 17 मई 1882 आरक्षित वन घोषित कर दिया गया और जंगल में निवास करने वाले आदिवासियों को वहां से खदेड़ दिया गया। यहीं से सरकार और आदिवासियों के बीच विवाद शुरू हुआ जो आजतक जारी है। जंगल में अकूत खनिज सम्पदा मौजूद होने के कारण सरकार इसे हड़पना चाहती है और आदिवासी यहां सदियों से रहते आये हैं इसलिए वे उसपर अपना मालिकाना हक की दावेदारी करते हैं। सारंडा जंगल का कुल क्षेत्रफल 86,055 हेक्टेअर है जो 860 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 82,055 हेक्टेअर रिजर्व जंगल एवं 3,989 हेक्टेअर सुरक्षित जंगल शामिल है । 

हमारे देश में खनिज सम्पदा का दोहन और औद्योगिकरण का इतिहास सारंडा जंगल से ही शुरू होता है, जहां देश का 25 प्रतिशत लौह-अयस्क मौजूद है । देश की पहली स्टील कंपनी ‘‘टाटा स्टील’’ ने 1925 में यहां लौह-अयस्क का खान कार्य शुरू किया था। आज सारंडा जंगल में 14,410.09 हेक्टेअर पर लौह-अयस्क के 50 खनन परियोजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा राज्य सरकार ने 22 नया लौह-अयस्क का लीज दिया है। भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवत्र्तन मंत्रालय से अंतिम मंजूरी मिल जाने के बाद 9,337.54 हेक्टेअर जंगल पर खनन कार्य शुरू हो जायेगा। विकास एवं आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर सारंडा जंगल से प्रतिवर्ष लगभग 3000 करोड़ रूपये के मूल्य का लौह-अयस्क उत्खनन किया जाता है। विडंबना यह है कि यहां के 80 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषित हैं एवं 70 प्रतिशत आदिवासी महिलाएं खून की कमी से जुझ रहीं हैं। यहां विकास गौण है। 

सारंडा जंगल में देश की बड़ी-बड़ी खनन कंपनियां कार्य कर रही है लेकिन यहां के आदिवासियों को रोजगार नहीं मिलता है। उन्हें रोजी-रोटी कमाने के लिए महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता है। देश के अलग-अलग हिस्से में पलायन करने वाले आदिवासी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर लौटे हैं। मौलिक सवाल यह है कि ये आदिवासी किस-किस से लड़ंे? अपनी आजीविका के लिए? रोजगार के लिए? कोरोना वायरस से? वन अधिकर के लिए या नागरिकता हासिल करने के लिए?   

सारंडा जंगल के 4000 आदिवासियों के नागरिकता की जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए आदिवासी समन्वय समिति ने बीहांड़ में स्थित 17 वनग्रामों का सैम्पल सर्वे किया है। इन गांवों में 431 आदिवासी परिवारों के 1918 लोगों निवास करते है, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड या आधार कार्ड जैसे कोई पहचान-पत्र मौजूद नहीं है। 

2014 में आदिवासी समन्वय समिति के संयोजक सुशील बरला ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की मांग की थी। आयोग ने संविधान की धारा 338(क) का उपयोग करते हुए 17 अक्टूबर, 2014 को झारखंड सरकार को आदेश दिया था कि इन्हें जल्द से जल्द मताधिकार पहचान-पत्र, राशन कार्ड एवं आधार कार्ड जारी किया जाये। साथ ही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा एवं स्वाथ्य जैसे बुनियादी सुविधा उपलब्ध किया जाये। आयोग ने 15 दिनों के अन्दर कारईवाई कर जवाब देने को कहा था बावजूद इसके राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं किया। 

2014 में झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी सिंहभूम जिले के उपायुक्त अब्बुबक्कर सिद्दिकी ने कहा था कि मुझे इस बात की अशांका है कि किसी के पास वोटर कार्ड नहीं है। उन्होंने इसपर जांच और कार्रवाई करते हुए चुनाव से पहले मतदाता सूची में इन आदिवासियों  का नाम शामिल कर उन्हें वोट देने का अधिकार सुनिश्चित करने का वादा किया था। लेकिन यह भी चुनावी जुमला बनकर रह गया। ऐसा लगता है कि अब नौकरशाह भी राजनेताओं जैसा ही वादा करने के बाद भूल जाते हैं। 

पिछले कुछ वर्षों के अंदर बंगलादेश, पाकिस्तान और आफगनिस्तान के लगभग 20,000 लोगों को भारत की नागरिकता दी गई है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि सारंडा जंगल के 4000 आदिवासियों को अबतक सरकार भारतीय नागरिक मानने को तैयार नहीं है। इन लोगों को जंगल का अतिक्रमणकारी बताया जाता है। यदि इन्हें नागरिकता नहीं माना जाता और वन अधिकार से बेदखल किया जाता है तो वे भूखे करने को विवस हो जायेंगे। क्या कभी इन्हें न्याय मिलेगा?     

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

आदिवासी हितों का संरक्षण हो सर्वोपरि

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 में से 25 सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली महागठबंधन को जीताकर राज्य के आदिवासियों ने नयी सरकार को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि उनकी संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करना ही इस सरकारी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि यह सरकार भी पिछली भाजपा सरकार की तरह ही कारपोरेट और व्यापारियों के हितों को साधने की कोशिश करती है तो उसे भी इसका खमियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। झारखंड के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए काम करना आसान नहीं होगा फिर भी उन्हें आदिवासियों के इन मौलिक हितों को अपनी प्राथमिक सूची में रखना होगा।    
1. झारखंड की भाजपा सरकार ने सीएनटी एक्ट 1908 एवं एसपीटी एक्ट 1949 में संशोधन करते हुए आदिवासियों की कृषि जमीन को गैर-कृषि घोषित कर उसे कारपोरेट एवं व्यापारियों को सौपने की कोशिश की, जिससे आदिवासियों के बीच भय का महौल बना गया था। आदिवासी हर कीमत पर अपनी जमीन की रक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं क्योंकि जमीन उनके लिए सम्पति न होकर उनकी पहचान, संस्कृति, इतिहास, विरासत और अस्तित्व है। इसलिए नयी सरकार को सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों को सख्ती से लागू करते हुए उनकी जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी एवं गैर-आदिवासियों के द्वारा अवैध तरीके से लिये गये आदिवासियों की जमीन को मूल रैयतों को वापस करना होगा। 

2. झारखंड के पांचवीं अनुसूची इलाका की सुरक्षा यहां के आदिवासियों के लिए बहुत बड़ा मसला बन चुका है क्योंकि अब यहां बाहरी गैर-आदिवासियों की जनसंख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। पत्थलगड़ी आंदोलन उसी का एक प्रतिकार था और आगे भी ऐसा महौल देखने को मिल सकता है। इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के उप-अनुच्छेद 5 एवं 6 का उपयोग करते हुए सरकार को इस क्षेत्र की सुरक्षा हेतु कानून बनाकर बाहरी आबादी को यहां बसने, नौकरी-पेशा एवं व्यवसाय करने पर प्रतिबंध लगाना होगा, जिससे आदिवासी जमीन, पहचान, रोजगार, भाषा और संस्कृति का संरक्षण होगा। इस क्षेत्र में बेहतर शिक्षा की व्यवस्था विद्यालयों में आदिवासी भाषाओं में करना होगा।   

3. भाजपा सरकार के द्वारा लागू किये गये स्थानीय नीति 2016 को खारिज करते हुए झारखंडी हित में नयी स्थानीय नीति बनाकर यहां के युवाओं को सरकारी नियोजनों में नियुक्ति देना होगा। राज्य सरकार के अन्दर खाली पड़े पदों को जल्द से जल्द भरना होगा तथा जेपीएससी का सफल परीक्षा सम्पन्न करते हुए यहां के यवक-युवतियों के द्वारा निचले स्तर के नौकरशाही के रिक्त पदों को भरना होगा। राज्य में विगत वर्षों हुई नियुक्तियों में लगभग 80 प्रतिशत बाहरी लोगों को नौकरी मिली है, जिसे यहां के युवाओं में आक्रोश है, जिसे सरकार को समझना होगा।  

4. भाजपा सरकार के द्वारा राज्य में लागू किये गये गो हत्या निरोधक कानून 2005 एवं झारखंड धर्मस्वतंत्र कानून 2017 को खारिज करते हुए लोगों के भोजन का अधिकार, जीवन जीने का अधिकार और धार्मिक आजादी के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना होगा क्योंकि इन दोनों कानूनों की आड़ में लाखों लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया है। खान-पान और आस्था हर व्यक्ति का निजी मसला है, जिसकी सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक जिम्मेवारी है। 

5. भाजपा सरकार ने विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन, जंगल और खनिज सम्पदाओं को लूटकर यहां भय का महौल बना दिया था। झारखंड राज्य के गठन के बाद से ही अलग-अलग समय पर बने भाजपा सरकारों के द्वारा कारपोरेट घरानों के साथ एमओयू करने का सिलसिला चल पड़ा था जो पिछले पाॅच वर्षों में चरमसीमा पर पहुंच गया था, जिसे आदिवासी रैयत भयभीत हो चुके थे। यही कारण है कि भाजपा को सत्ता गवांना पड़ा है। इसलिए इस सरकार को भाजपा सरकार के द्वारा लागू किये गये औद्योगिक एवं पूंजीनिवेश बढ़ावा नीति 2016, भूमि बैंक में सूचिबद्ध 21 लाख एकड़ सामाजिक, धार्मिक एवं वनभूमि और कारपोरेट घरानों के साथ अबतक किये गये सभी एमओयू को रद्द करना होगा।

6. आदिवासियों के भारी विरोध के कारण सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों का संशोधन नहीं कर पाने के बाद भाजपा सरकार ने आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना कानून 2013 का संशोधन किया था, जिसका चुनाव में असर पड़ा। इसलिए नयी सरकार को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना संशोधन कानून 2017 को खारिज करते हुए मूल कानून को सख्ती से लागू करना होगा। इसके अलावा रैयतों और ग्रामसभाओं की सहमति के बगैर अधिगृहित किये गये जमीन को मूल रैयतों को वापस करना होगा, जिसमें गोड्डा में अडानी एवं मनोहरपुर में वेदांता कंपनी की जमीन शामिल है।   

7. केन्द्र की यूपीए सरकार ने 1 जनवरी 2008 को आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वनभूमि एवं जंगलों पर व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकार देने के लिए वन अधिकार कानून 2006 लागू किया था। लेकिन भाजपा सरकार ने कारपोरेट घरानों को खनन पट्टा देने के लिए वनाधिकार के दावेदारों के साथ जानबूझकर अन्याय किया है। इसलिए वन अधिकार कानून को लागू करते हुए दावेदारों को जल्द से जल्द वनभूमि और जंगलों पर मालिकाना हक दिया जाना चाहिए।  

8. पेसा कानून 1996 एवं सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट एवं नियमगिरी जजमेंट को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। ग्रामसभाओं की सहम्मति के बगैर गांव के किसी भी तरह की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत एवं खनिज सम्पदा का दोहन नहीं किया जाना चाहिए। पेसा कानून के विरूद्ध भाजपा सरकार के द्वारा गठित कमल कलब, ग्रामीण विकास समिति एवं भूमि बैंक को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। ग्रामसभाओं की सहमति के बगैर गांवों में किसी भी तरह का कार्य नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा पांचवीं अनुसची क्षेत्र के अन्तर्गत गठित नगर निगम एवं नगर पालिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।  

9. आदिवासियों की धार्मिक पहचान को सुनिश्चित करने के लिए राज्य में यथाशीघ्र ‘‘सरना कोड’’ लागू करना ताकि संघ परिवार के द्वारा आदिवासियों का बड़े पैमाने पर किया जा रहा हिन्दूकरण को रोका जा सकेगा। इसके लिए नयी सरकार को जल्द से जल्द विधानसभा में ‘‘सरना कोड बिल’’ पारित किया जाना चाहिए।  

10. ‘‘अबुआ दिसुम, अबुआ राज्य’’ एवं ’’अबुआ हातु रे अबुआ राज’’ यानी स्वायत्तता की मांग को लेकर चले पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े 11,200 आदिवासियों के उपर किये गये देशद्रोह का मुकदमा तत्काल खारिज किया जाना चाहिए। इसके अलावा भारतीय संविधान, कानून एवं पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण हेतु कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं आंदोलनकारियों पर किये गये मुकदमां को खारिज करते हुए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। 
झारखंड विधानसभा चुनाव ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि यदि नयी सरकार आदिवासी और झारखंडी हितों की संरक्षण नहीं कर पाती है तो आगामी चुनाव में इस सरकार को भी सत्ता गवांना पड़ेगा। अब आदिवासियों को धर्म, समुदाय या पार्टियों में बांटकर उनके हितों को चोट नहीं पहुंचाया जा सकता है। हेमंत सोरेन के लिए झारखंड में लंबे समय तक शासन करने का यह शानदार अवसर हो सकता है। अब सत्ता उनके पास है इसलिए उन्हं तय करना है कि वे लंबे रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं या क्षणिक सत्ता सुख भोगना।   

बुधवार, 6 नवंबर 2019

आदिवासी समाज की चुनौतियां

ग्लैडसन डुंगडुंग

आज हमारा आदिवासी समाज चैराहे पर खड़ा दिखाई पड़ता है। एक तरफ जहां संघ परिवार और सरकार हम आदिवासियों की पहचान, धर्म और संस्कृति को तय कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ हमारी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को हमसे छीनकर कारपोरेट को देने का काम भी जारी है। आज की विकट परिस्थिति में हमारी पहली चुनौती है आदिवासी पहचान, भाषा और संस्कृति को बरकरार रखना। हम अपनी आदिवासी पहचान, भाषा एवं संस्कृति से निरंतर बेदखल किये जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2011 को ‘कैलाश एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र सरकार’ के मसले पर फैसला देते समय आदिवासियों की मूल पहचान को स्थापित करते हुए स्पष्ट कहा कि 8 प्रतिशत आदिवासी ही भारत देश के प्रथम निवासी और मालिक हैं तथा शेष 92 प्रतिशत लोग आक्रमणकारी या व्यापारियों के संतान हैं। लेकिन संघ परिवार से संचालित सरकार आदिवासियों की मूल पहचान को खत्म करते हुए उन्हें सिर्फ वनवासी बनाकर वर्ण एवं जाति व्यवस्था के अंदर घुसाने का प्रयास कर रही है। 

एक तरफ जहां हम आदिवासियों के उपर वर्ण एवं जाति व्यवस्था को थोपकर हमारा हिन्दूकरण करने का निरंतर प्रयास हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ हम आदिवासियों की पहचान को धर्म के आधार पर तय करने की भी कोशिश की जा रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि सिर्फ सरना धर्म मानने वाले लोग ही आदिवासी है। यहां प्रश्न उठता है कि संघ परिवार और सरकार हम आदिवासियों की पहचान, धर्म और संस्कृति को कैसे तय कर सकती है? कौन आदिवासी हैं और कौन नहीं हैं यह सरकार या संघ परिवार कैसे तय कर सकते हैं? क्या यदि गैर-आदिवासी सरना धर्म को मानेंगे तो वे भी आदिवासी हो जायेंगे? हमारे पूर्वज हमारी आदिवासियत तय कर चुके हैं। यदि देश में सही एनआसी हो जाये तो हम आदिवासियों को छोड़कर बाकी सभी लोगों को देश छोड़कर जाना पड़ेगा। हमें मजबूती के साथ सरकार को बताना होगा कि हम पहले आदिवासी हैं, बाद में भी आदिवासी हैं और आखिरी में भी आदिवासी हैं। हम आदिवासी ही भारत देश के प्रथम निवासी और संरक्षक हैं। हमें अपनी आदिवासी पहचान की मजबूत दावेदारी करने के साथ-साथ अपनी भाषा एवं संस्कृति को भी बचाना होगा।  

हमारी दूसरी चुनौती है आदिवासी स्वायत्तता को बरकरा रखना। झारखंड अलग राज्य आंदोलन के जनक मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने नारा दिया था - ‘‘अबुआ दिसुम, अबुआ राईज’’ यानी हमारे राज्य में हमारा शासन। झारखंड अलग राज्य बना लेकिन आज यहां बाहरी लोग शासन कर रहे हैं। यहां की विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और व्यवसाय में बाहरी लोगों का ही बोल-बाला है। यदि हम इसे नारा के रूप में कहें तो आज का झारखंड ‘‘अबुआ दिसुम, दिकूआ राईज’’ बन गया है। दिकुओं के राज में हम आदिवासियों को कभी न्याय नहीं मिल सकता है। झारखंड सरकार ग्रामसभाओं के निर्णय को नहीं मानती है। स्वायत्तता आंदोलनों को आज सरकार विरोधी, राष्ट्रविरोधी एवं देशद्रोही कहा जाता है। गांवों की स्वायत्तता की मांग करने वाले आदिवासियों के उपर द्रेशद्रोही का मुकदमा किया गया है। ऐसी परिस्थिति में ’अबुआ दिसुम, अबुआ राज’ का सपना साकार करना बड़ी चुनौती है। क्या हम आदिवासी अपनी स्वायत्तता की दावेदारी करना छोड़ देंगे? 

तीसरी चुनौती है जमीन की सुरक्षा। जमीन ही आदिवासी समाज का मूल आधार है। जमीन हम आदिवासियों के लिए सम्पति नहीं है बल्कि यह हमारी पहचान, अस्मिता, संस्कृति, विरासत और अस्तित्व है। हमारे पूर्वजों ने जंगल-झाड़ को साफ कर तथा उंचा-नीचा स्थल को कोड़कर खेती योग्य जमीन बनाया। उन्होंने जमीन को हमारे लिए सुरक्षित रखने हेतु अपना खून बहाया और कुर्बानी दी। फलस्वरूप, ब्रिटिश हुकूमत को हमारी जमीन बचाने के लिए विशेष कानून - छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 बनाना पड़ा, जिसमें प्रावधान किया गया कि आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं। लेकिन कानून का उल्लंघन करते हुए लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों से लूट लिया गया। इसके बावजूद आज भी हमारे पास काफी जमीन है। हम आदिवासियों को समझना होगा कि यदि जमीन चला गया तो हमारा अस्तित्व भी मटियामेट हो जायेगा। 

चैथी चुनौती है प्राकृतिक संसाधनों को बचाना। झारखंड सरकार ने कारपोरेट के साथ अबतक लगभग 250 एमओयू किया है। वह हर कीमत पर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को कारपोरेट को देने पर तुली हुई है क्योंकि यही कापोरेट घरानों ने इन्हें चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाकर सत्ता सौपा है। जंगलों को उजाड़कर एवं पहाड़ों को खोदकर वहां से खनिज सम्पदा निकाला जा रहा है। इसके अलावा कम्पा कानून 2016 एवं राष्ट्रीय वन नीति 2018 के द्वारा जंगलों को कारपोरेट को सौपने की कोशिश चल रही है तथा आदिवासियों से जंगल छीनने के लिए भारतीय वन संशोधन अधिनियम 2019 लाने का भी प्रयास हो रहा है। इस कानून के द्वारा सरकार कोई भी जंगल को आरक्षित जंगल घोषित करते हुए आदिवासियों से छीनना सकती है। कानून में आरक्षित जंगलों में प्रवेश करने वालों पर गोली चलाने का प्रावधान, बिना वारंट की गिरफ्तारी एवं छापामारी का प्रावधान किया गया है। क्या जंगल के बगैर आदिवासी अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है? जमीन और जंगल आदिवासी अस्तित्व के लिए सबसे जरूरी है। इसके बगैर आदिवासी सभ्यता का अंत हो जायेगा। इसलिए जंगल की सुरक्षा एवं संरक्षण अतिआवश्यक है। 

पांचवीं चुनौती है अनुसूचित क्षेत्र यानी आदिवासी इलाके में बड़े पैमाने पर हो रही गैर-आदिवासियों की घुसपैठी को रोकना। संवैधानिक रूप से राज्य के राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास की जिम्मेवारी दी गई है। इस क्षेत्र के लिए नीति निर्धारण को लेकर ट्राईब एडवाईजरी काउंसिल की भी बड़ी भूमिका है। इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद अनुच्छेद 46 के तहत स्टेट यानी विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को आदिवासियों के उपर होने वाले हर तरह के शोषण एवं अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करना है तथा अनुच्छेद 19 उप-अनुच्छेद 5 एवं 6 का उपयोग करते हुए इनके लिए सुरक्षा घेरा बनाना है। इतने मजबूत प्रावधान होने के बावजूद आदिवासी इलाके में गैर-आदिवासियों की घुसपैठी हो रही है और आदिवासियों की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोज और खनिज सम्पदा को लूटकर बाजार भाव से बेचा जा रहा है। आज इस घुसपैठी, जमीन लूट के अलावा आदिवासियों पर होने वाले शोषण, दमन एवं अत्याचार को रोकना जरूरी है।

हमारी छठवीं चुनौती है आर्थिक संकट से निपटना। अगले 30 वर्षों के अंदर आदिवासी समाज में गंभीर आर्थिक संकट आने की संभावना है क्योंकि सरकारी नौकरी में अवसर न के बराबर होगा। केन्द्र एवं राज्य सरकारें आरक्षण को खत्म करने के लिए सरकारी संस्थानों का निजीकरण कर रही हैं। इसके अलावा आने वाले समय में बड़े पैमाने पर रोबोट का उपयोग होगा, जो लोगों का नौकरी निगल लेगा। जब आदिवासी युवक-युवतियों को नौकरी नहीं मिलेगा तब शहरों में निवास करने वाले आदिवासी अपनी आजीविका कैसे चलायेंगे? इसी तरह जलवायु परिवर्तन ने वनोपज और खेती को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है जो आने वाले समय में गांवों में रहने वाले आदिवासियों के लिए आर्थिक चुनौती खड़ा करेगा। इस चुनौती से निपटने के लिए हम आदिवासियों को अभी से व्यवसाय को अपनाना होगा। हमारें पूर्व बाजार पर निर्भर नहीं थे। उन्होंने अपने लिए बहुत कुछ उत्पादन किया। हमें भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए आदिवासी इलाके का बाजार को अपने कब्जा में करना होगा। यही रास्ता हमें आर्थिक संकट से निपटने में मद्दगार होगा।  

सातवीं चुनौती है आदिवासी एकता के द्वारा राजनीतिक शक्ति हासिल करना। हम आदिवासी राजनीतिकरूप से निरंतर पीछे कमजोर हो रहे हैं क्योंकि हमलोग बंटे हुए हैं। हम लोग कई राजीतिक पार्टी, धर्म एवं समुदायों में विभाजित है, जिसका फायदा उठाकर हमारे दुश्मन हमारी राजनीतिक शक्ति छीनकर हमारे खिलाफ कानून एवं नीतियां बनाते हैं। ये लोग कारपोरेट, व्यापारी एवं बाहरी लोगों के हितों को साधने के लिए हमारे हित में बने कानूनों को संशोधन करते हैं। यही लोग खान-पान, धर्म, संस्कृति, भाषा जैसे हमारे मौलिक अधिकारों को खत्म करने के लिए कानून एवं नीतियां तय करते हैं। ऐसी परिस्थिति में यदि हमलोग एकजुट नहीं हुए तो हम अपना अस्तित्व नहीं बचा पायेंगे। आदिवासी एकजुटता समय की मांग है क्योंकि राजनीति पार्टी, धर्म और समुदाय के नामपर आपस में लड़ते रहने से हम अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति, स्वायत्तता और जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों को नहीं बचा पायेंगे।

रविवार, 3 नवंबर 2019

सामूहिक आत्महत्या के लिए बेचैन लोग?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारत की राजधानी दिल्ली विगत कुछ वर्षों से निरंतर ‘‘गैस चैंबर’’ में तब्दील होती जा रही है, जहां पैसा खर्च किये बगैर शुद्ध हवा मिलना असंभव हो चुका है। अक्टूबर से दिसंबर महीने तक प्रतिवर्ष शहर की हवा इतनी जहरीली हो जाती है कि लोगों को अपने घरों से बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की सुरक्षा हेतु विद्यालयों को बंद करना पड़ता है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। इस वर्ष वायु प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ गया कि सरकार को ‘‘हेल्थ इमरजेंसी’’ घोषित करते हुए लाखों की संख्या में मास्क बांटना पड़ा। इतना कुछ होने के बावजूद लोग ‘‘दीपावली और छठ पूजा’ में बेहिस्साब पटाखे जलाकर खुशियां मनाये। ऐसा प्रतीत होता है कि लोग सामूहिक आत्महत्या करने के लिए बेचैन हैं। हवा जहरीली हो जाये, धरती का तापमान बढ़ जाये या धरती पर तबाही आ जाये उसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे जबतक जिन्दा हैं तबतक धर्म और परंपरा के नाम पर सबकुछ करेंगे जो करते आये हैं। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर बहस छेड़िये तो उसके जवाब में धर्म आधारित राजनीति प्रबल हो जाती है। 

मैं सोच में पड़ जाता हॅ कि सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा में होने का दंभ भरने वाले ये लोग क्यों बेवकूफों जैसे व्यवहार करने लगते हैं? वे थोड़ा भी क्यों नहीं सोचते हैं? क्या उन्हें अपने बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचना चाहिए? यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की समस्या है? क्या हमें ग्लोबल वार्मिंग के कारण हमारे देश में होने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सचेत नहीं होना चाहिए? अब पानी की तरह ही मुफ्त में मिलने वाली हवा को हमारे देश में कनाडा की कंपनी ‘‘विटालिटी एयर’’ एवं अस्ट्रेलिया की कंपनी ‘‘औजेर’’ ने बोतलों में बंदकर उसके उपर ‘‘हिमालय की शुद्ध हवा’’ का रैपर लगाकर 550 से 1500 रूपये प्रति बोतल बेच रहे हैं। एक व्यक्ति को औसत प्रति मिनट 8 से 10 लीटर हवा चाहिए। शुद्ध हवा लेने के लिए हमें प्रति व्यक्ति को प्रति मिनट कम से कम 500 रूपये खर्च करना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति पैदा होने के बाद भी यदि हम संवेदनशील नहीं होगें तो हमें कौन बचा सकता है? क्या हम सरकार के भरोसे अपना भविष्य को दांव पर लगा सकते हैं? 

हाल ही में क्लाइमेट इंपैक्ट और यूनिवर्सिटी आफ शिकागो के टाटा सेंटर फार डेवलपमेंट ने ‘‘जीवन एवं अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव’’ का अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी रफतार से बढ़ता रहा, तो 2050 तक भारत का औसत तापमान चार डिग्री तक बढ़ सकता है, जिसके कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख लोग बेमौत मारे जायेंगे। वायु प्रदूषण से होने वाले बीमारियों के कारण हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 7 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं लेकिन इस गंभीर विषय पर कहीं चर्चा तक नहीं होती है। यह मसला अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती। यदि हमलोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव को इसी तरह दरकिनार करते रहे तो वह समय दूर नहीं है जब देश में अत्याधिक गर्मी से लाशों की ढेर लग जायेगी लेकिन तब हमारे पास रोने-चिल्लाने के अलावा और कुछ नहीं बचेगा। क्या हमलोग तबतक चर्चा करना, सोचना और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए काम करना शुरू नहीं करेंगे जबतक आफत हमारे दरवाजे पर नहीं पहुंचती है?   
  
इससे पहले 8 अक्टूबर 2018 को संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को वातावरण से खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके से खत्म करते हुए हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन पूंजीवाद पर सवार लोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन हेतु विकसित देशों के उपर जिम्मेवारी मढ़कर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को बाजार भाव से बेचकर मुनाफा कमाने में लगे हुए है।  

हकीकत यह है कि हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती को नहीं बचा सकते हैं। जब धरती ही नहीं बचेगी तो हम कहां रहेंगे? जब लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे तब विकसित देशों को कोसने से काम चलेगा? हमें जलवायु संकट से बचने के लिए कदम उठाना होगा। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी। 2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। 

इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है एवं झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर प्रतिबंधित जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

जलवायु संकट के कारणों में ही इसका समाधान भी छुपा हुआ है। दिल्ली के गैस चैंबर बनने का प्रमुख कारण हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश के किसानों के द्वारा पराली जलाना बताया जाता है, जिसका इसमें 46 प्रतिशत योगदान है। लेकिन हमें 54 प्रतिशत प्रदूषण का कारण कारण भी ढ़ूढ़ना होगा? पराली जलाना तात्कालिक कारण हो सकता है। लेकिन जलवायु संकट का सबसे बड़ा कारण है औद्योगिकरण और प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन। कोयला, बाक्साईट और लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए अंधाधुंध जंगलों को उजाड़ा जा रहा है, काक्रीट जंगल बसाने के लिए जलस्रोतों को खत्म किया जा रहा है और कोयला, डीजल और पेट्रोल का बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है, जिससे वातावारण में ग्रीन हाउस गैस भरता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैस, जिससे कार्बन डाई आक्साइट, जल-वाष्प, मिथेन, आदि हैं, जो वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृति अधिक बढ़ाते हैं, जिसे धरती गरम होती जा रही है, जो धरती के तबाही और जीवन की समाप्ति का इशारा है। यदि धरती और जीवन को बचाने के लिए हमने अभी कदम नहीं उठाया तो बाद में बहुत देर हो चुकी होगी।  

जलवायु संकट आधुनिक विकास की देन है, जिसका समाधान सरकारों के भरोसे कभी संभव नहीं है क्योंकि आज का लोकतंत्र कारपोरेट का गुलाम हो चुका है। यही कारपोरेट जगत चुनाव में अरबों रूपये पानी की तरह बहाकर सरकार बनाता है। इसलिए लोकतंत्र के आड़ में कारपोरेट के पैसे से बनी सरकारें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कभी नहीं रोक सकते हैं। इसके लिए देश के प्रत्येक व्यक्ति को सजग होकर दो स्तर पर कदम उठाना होगा। जंगलों को उजाड़ने, खनिज सम्पदा का दोहन करने एवं पेड़ों को काटकर काक्रीट का जंगल खड़ा करने की नीतियों को खत्म करने के लिए सरकारों पर निरंतर दबाव बनाना होगा। इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जरूरतों को कम करना और वातावरण को दूषित करने वाले वस्तुओं का उपयोग बंद करना तथा कोयला, रसोईगैस, पेट्राल-डीजल सहित प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग करना क्योंकि जलवायु संकट का एकमात्र समाधान है प्राकृतिक संसाधनों यानी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा की सुरक्षा। हम आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हेतु निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। अब हमारे देश के तथाकथित सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा वालों को तय करना है कि वे बचना चाहते हैं या सामूहिक आत्महत्या करना।  

रविवार, 27 अक्टूबर 2019

ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर संगठित हमला

ग्लैडसन डुंगडुंग
भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार और इनके संहयोगी संगठन चुनाव के समय राजनीतिक लाभ लेने के लिए एक रणनीति के तहत ईसाई मिशनरी एवं ईसाई आदिवासी धर्मावलंबियों पर संगठित हमला करते हैं। ईसाई मिशनरियों के द्वारा झारखंड में कानूनी रूप से हासिल की गई जमीन को लेकर जांच एवं कानूनी कार्रवाई के नाम पर झारखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, नौकरशाह, भाजपा एवं इनके सहायोगी संगठनों के द्वारा किया जा रहा हमला इसका सटीक उदाहरण है। 

यह गौरतलब है कि जो राजनीतिक पार्टी छोटानागपुर, कोल्हान और संताल परगना के विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करेगा, झारखंड का सत्ता उसी को मिलेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ईसाई मिशनरियों और ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर हमलावर है क्यांकि इन क्षेत्रों में कुछ सीटों को छोड़कर सरना एवं हिन्दू आदिवासियों का बोल-बाला है। इसलिए इन आदिवासियों का भावनात्मक शोषण कर भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव जीतना चाहती है।

2017 में भाजपा सरकार के द्वारा धर्मांतरण के खिलाफ राज्य में कानून लागू करने के बावजूद सरना कोड पर सरकार की चुप्पी और सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन को आदिवासी नहीं भूले हैं। जमीन आदिवासियों का सबसे बड़ा मुद्दा है इसलिए आगामी विधानसभा चुनाव में सीएनटी एवं एसपीटी संशोधन का मुद्दा प्रभावी रहेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए एक रणनीति के तहत सरना एवं हिन्दू आदिवासियों को गुमराह करते हुए उन्हें खुश करने हेतु संघ परिवार, भाजपा एवं इनके सहयोगी संगठनों ने एक बार फिर से ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबियों पर हमला बोलना शुरू किया है। 

इसके लिए सबसे पहले भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा, झारखंड के द्वारा विधायक रामकुमार पाहन की अगुआई में 23 जून 2019 को झारखंड के राज्यपाल को एक स्मार-पत्र देते हुए ईसाई मिशनरियों पर आरोप लगाया गया कि वे राज्य में बड़े पैमाने पर जनजातियों की भूमि एवं गैर-मजरूआ भूमि दोनों पर अवैध दखल कब्जा एवं बन्दोबस्त कर राष्ट्र विरोधी गतिविधि चला रहे हैं। इसलिए इसकी जांच एवं इनके खिलाफ कार्रवाई की जाये। अगले दिन राज्यपाल को स्मार-पत्र सौपने वाली तस्वीर के साथ अखबारों में बड़ी खबर छपी, जिसे भाजपा के हित में राजनीतिक महौल बनना शुरू हो गया। 

इसी बीच उक्त स्मार-पत्र पर कार्रवाई करते हुए राज्यपाल के प्रधान सचिव ने 5 जुलाई 2019 को झारखंड के मुख्य सचिव को ईसाई मिशनरियों के द्वारा आदिवासियों की जमीन हड़पने के मसले पर जांच एवं कानूनी कार्रवाई करने का अनुरोध करते हुए पत्र लिखा। राजभवन के द्वारा ऐसी त्वरित कार्रवाई नहीं देखी गई है। संविधान के पांचवीं अनुसूची में किये गये प्रावधान के अनुसार राज्यपाल को आदिवासियों के विकास एवं काल्याण से संबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रतिवर्ष भेजना है लेकिन राजभवन इस कार्य में शिथिल है। झारखंड के जनसंगठन, आदिवासी संगठन एवं जनांदोलनों ने राज्यपाल को सैकड़ों स्मार-पत्र सौपें लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। तत्कालीन राज्यपाल को मैंने ‘‘लैंड बैंक’’ और ‘‘वाईल्ड लाईफ कारिडोर परियोजना’’ रद्द करने का अनुरोध करते हुए स्मार-पत्र सौंपा लेकिन अबतक राजभवन से कोई जवाब नहीं आया। लेकिन भाजपा नेताओं के स्मार-पत्र पर त्वरित कार्रवाई संदेह में डालता है।  

संघ परिवार और भाजपा ने पूरा सरकारी महकमा को ही अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया हैं। ईसाई मिशनरियों की जमीन जांच संबंधी राजभवन से पत्र मिलते ही झारखंड सरकार के संयुक्त सचिव कमलेश्वर प्रसाद सिंह ने 12 जुलाई 2019 को सभी जिले के उपायुक्तों को उक्त मामले पर जांच एवं कानूनी कार्रवाई करने हेतु पत्र जारी किया। 24 जुलाई 2019 को उन्होंने फिर से पत्र लिखकर उपायुक्तों को याद दिलवाया कि उन्होंने क्या कार्रवाई की उसके बारे में जवाब दें। इसी बीच जिलें के उपायुक्तों ने भी अपने अधीनस्त पदाधिकारियों को पत्र जारी कर कार्रवाई करने का आदेश दिया। सरकारी दफ्तरों से पत्र जारी होता रहा और मीडिया में खबरें छपती रही कि भाजपा सरकार ईसाई मिशनरियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है। इस संदेश को संघ परिवार, भाजपा और उनके सहयोगी संगठन सरना एवं हिन्दू आदिवासियों के बीच जमकर संचार करते रहे। 

लेकिन इतना में बात नहीं बना। भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा ने 19 अगस्त 2019 को एक साथ सभी जिलों के उपायुक्तों के पास प्रदर्शन करते हुए उन्हें स्मार-पत्र सौप कर ईसाई मिशनरियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। यह मसला फिर से अखबारों में छाया रहा। यहां सवाल उठता है कि जब राजभवन, राज्य सरकार और जिले के उपायुक्त ईसाई मिशनरियों की जमीन के मसले पर जांच और काईवाई में जुटे हुए है तो फिर से प्रदर्शन करने की क्या जरूरत पड़ी? जाहिर सी बात है कि राज्य में भाजपा के पक्ष में राजनीतिक महौल बनाने के लिए ऐसा किया गया।

इसके अलावा 15 सितंबर 2019 को संघ परिवार का सहमना संगठन ‘‘जनजाति सुरक्षा मंच, झारखंड’’ ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास से मिलकर ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति के अधिकार से बेदखल करने की मांग करते हुए एक स्मार-पत्र सौंपा। फिर 23 अक्टूबर 2019 को मंच ने दुमका में सम्मेलन का आयोजन किया और अंत में एक स्मार-पत्र उपायुक्त को सौपते हुए मांग किया कि धर्मांतरित ईसाई आदिवासियों को एसटी के अधिकार से वंचित किया जाये।  

भाजपा, संघ परिवार एवं इनके सहयोगी संगठनों के द्वारा ऐसा करने के पीछे ऐहितासिक कारण हैं। इसका मूल कारण यह है कि अलग-अलग धर्म मानने वाले आदिवासी पहले कांग्रेस के वोट बैंक हुआ करते थे। लेकिन 1950 एवं 60 के दशक में झारखंड पार्टी की सफलता को देखकर कांग्रेस घबरा गई। कांग्रेस ने इसके लिए दो रास्ता अपनाया - झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करना और आदिवासियों को धर्म के आधार पर बांटना। 

ईसाई और गैर-ईसाई आदिवासी का विवाद सबसे पहले जेना उरांव ने उठाया, जिसे कांगेरस नेता ठेबले उरांव के द्वारा कांग्रेस आगे बढ़ाती रही। 1970 के दशक में कांग्रेस नेता कार्तिक उरांव ने इसे सरना बनाम ईसाई बना दिया। कार्तिक उरांव ने ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को एसटी का आरक्षण से वंचित करने का मांग की।  इसका परिणाम यह हुआ कि सरना आदिवासी फिर से कांग्रेस के वोट बैंक बन गये। 

संघ परिवार ने 1952 में ही आदिवासी इलाकों में अपना पैठ जमाने के लिए जशपुर में ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम’’ की स्थापना की थी, जिसके पीछे भी कांग्रेस का हाथ था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रवि चन्द्र शुक्ला आदिवासी इलाकों से मिशनरियों को खत्म करना चाहते थे क्योंकि झारखंड आंदोलनकारियों ने उन्हें काला झंडा दिखाया था। उन्हें लगा कि यह काम ईसाई मिशनरियों के इशारे पर ही किया गया है। 

इसका परिणाम यह हुआ कि ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम’’ के द्वारा संघ परिवार आदिवासी इलाकों में घुस गया। जब 1980 में भाजपा का जन्म हुआ तबतक संघ परिवार ने आदिवासी इलाकों में अपना पैठ बना लिया था। संघ परिवार और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के द्वारा आदिवासियों को धर्म के आधार पर बांटे गये मसले को गहराई से समझ और उसे एक हथियार के रूप में उपयोग करना शुरू किया। इन्होंने धर्मांतरण और ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को आरक्षण से वंचित करने को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया। 

इन्होंने सरना एवं हिन्दू धर्मालंबी आदिवासियों के दिमाग में यह बात डाल दिया कि ईसाई मिशनरी उनके दुश्मन है, जो उनको उनकी संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ियों से बेदखल कर धर्मांतरण कराते हैं तथा ईसाई धर्म में धर्मांतरित आदिवासी उनके आरक्षण के अधिकार को छीन रहे हैं। वे ईसाई धर्म मानते हैं इसलिए ईसाई मिशनरियों के शिक्षण संस्थानों में उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता है और एसटी आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी हासिल कर लेते हैं। इस तरह से वे दोहरा लाभ लेते हुए समृद्ध हो रहे हैं। ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों के पास नौकरी है इसलिए वे अच्छा घर बनाकर रहते हैं, उनके पास गाड़ी और पैसा भी है। इसलिए वे शान से जीते हैं। 

संघी नेताओं ने उन्हें समझाया कि यदि ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को एसटी का आरक्षण मिलना बंद हो जायेगा तो वे खत्म हो जायेंगे और सरना आदिवासियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा। संघ परिवार और भाजपा ने ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को सरना एवं हिन्दू आदिवासियों के बीच विलेन के रूप में स्थापित कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने कांग्रेस पार्टी को भी ईसाई आदिवासियों का हितैशी तथा सरना एवं हिन्दू आदिवासियों का विरोधी के रूप में स्थापित कर दिया। फलस्वरूप, अधिकांश सरना एवं हिन्दू आदिवासी कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा का वोट बैंक बन गये। 

झारखंड राज्य के गठन के बाद संघ परिवार और भाजपा के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे बड़ा राजनीतिक चुनौती बना क्योंकि इस पार्टी के पीछे झारखंड आंदोलन का एक बड़ा विरासत था। भाजपा ने जेएमएम को अपने साथ खड़ा करने की कोशिश की और साथ में सरकार भी बनाया। लेकिन जब साथ नहीं चल सके तब संघ परिवार और भाजपा ने जेएमएम को भ्रष्ट, वंशवाद और ईसाई समुदाय का मुखौटा के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। छोटानागपुर को कब्जा करने के बाद भाजपा ने संताल परगना और कोल्हान का रूख किया। विगत कुछ वर्षों से पार्टी अपना पूरा ताकत इन्हीं क्षेत्रों में लगा रहा है। 

संघ परिवार और भाजपा ने एक रणनीति के तहत सरना एवं हिन्दू धर्मावलंबी आदिवासियों को अपना मुखौटा बनाया, जिसके लिए धर्मांतरण, ईसाई धर्मावलंबियों के आरक्षण खारिज करने की मांग और ईसाई मिशनरियों के खिलाफ आग उगलने वाले व्यक्तियों को चुना। भाजपा के अंदर अनुसूचित जनजाति मोर्चा का भी गठन किया गया, जिसके नेता ईसाई मिशनरियों के खलाफ आग उगलते हैं। इसके बाद अनुसूचित जनजाति मोर्चा और सरना जागरण मंच जैसे कई संगठनों का गठन कर अपने कैडरों को के द्वारा ईसाई समुदाय के खिलाफ आग उगलवाते हैं। 

इसके अलावा सरना आदिवासियों की सामाजिक एवं धार्मिक संगठन जैसे केन्द्रीय सरना समिति, आदिवासी हो महासभा, सपाहोड़, इत्यादि को अपना सहयोगी संगठन के रूप में रखा। ये संगठन संघ परिवार के एजंडा को आगे बढ़ाने का काम करते हैं और भाजपा को वोट दिलाते हैं। इन संगठनों को संघ परिवार एवं भाजपा के कैडर ही चलाते हैं। इन्हें संघ परिवार और भाजपा का बी टीम कहा जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि जो आदिवासी ईसाई मिशनरियों के खिलाफ जितना ज्यादा जहर उगलता है उसे उतना ही जल्दी भाजपा चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती है। इसलिए संघ परिवार, भाजपा और इनके सहयोगी संगठनों में कार्यरत आदिवासियों के बीच मिशनरियों के खिलाफ जहर उगलने का प्रतिस्पर्धा है।  

झारखंड बनने के बाद से लगभग एक दशक तक संघ परिवार, भाजपा और इनके सहयोगी संगठनों ने मिलकर धर्मांतरण, नेम्हा बाईबल, लालपाड़ साड़ी और ईसाई धर्मावलंबियों को एसटी के आरक्षण से वंचित करने जैसे मुद्दों पर हंगामा खड़ा करके रखा था। विगत कुछ वर्षों से इन्होंने ईसाई संस्थानों को मिलने वाले विदेशी फंड का दुरूपयोग, सिस्टरां के द्वारा बच्चा बेचने एवं आदिवासियों की जमीन को कब्जा करके चर्च एवं अन्य संस्थान बनाने का झूठा आरोप लगाकर ईसाई मिशनरियों को बदनाम करने हेतु अभियान चलाया है। इस अभियान को न सिर्फ सरकार का सहयोग है बल्कि राजभवन भी इसमें शामिल है क्योंकि इसके पीछे संघ परिवार खड़ा है। ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर संगठित हमला सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

क्या हम जंगल उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

अपने घर के पास साग-सब्जी उगाने हेतु बारी बनाने के लिए पलामू टाईगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित पुटूस की झाड़ी काटने के कारण परहिया आदिवासी समुदाय के अगुआ खरिदन परहिया को 55 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। वन विभाग ने उनके उपर जंगल को बर्बाद करने का आरोप लगाकर उसे जेल भेज दिया था। जेल से बाहर आने के बाद वे न्यायालय में मुकदमा लड़ते रहे। अंततः न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। लेकिन वह दर्द आज भी उनके दिल में बरकरार है। जब से उन्होंने यह खबर सुना है कि मंडल डैम के निर्माण हेतु पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र के 3.5 लाख पेड़ काटे जायेंगे, उनका गुस्सा उफान पर है। वे कहते हैं कि वन विभाग कहां चला गया, जिसने हमें सिर्फ पुटूस की झाड़ी काटने के लिए जेल भेज दिया था? हम जंगल बचाने के लिए लड़ेंगे। रैली करेंगे, धरना करेंगे और चक्का जाम करेंगे। 

यहां मसला सिर्फ यह नहीं है कि अपनी आजीविका के लिए वन संपदा का उपयोग करने वाले आदिवासियों पर वन विभाग लगातार अत्याचार एवं कानूनी कार्रवाई करती है लेकिन विकास के नाम पर वह स्वयं जगलों को उजाड़ती है। असली मसला यह है कि क्या हमलोग देश के जंगलों को विकास, आर्थिक तरक्की, देशहित या कोई और टैग लगाकर उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं? क्या विश्व में हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को हम अपनी आंखें मूंदकर नकार सकते हैं? हम लोग विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित के नामपर कब तक केन्द्र और राज्य सरकारों को बचा-खुचा जंगलों को उजाड़ने देंगे? क्या हमें खरिदन परहिया जैसे जंगलों को बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासियों के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए? क्या देशभर में जंगल बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासी सिर्फ अपनी आजीविका के लिए लड़ रहे हैं? क्या आदिवासियों के संघर्ष में धरती और हमारा भविष्य छिपा हुआ नहीं है?    

हम सबसे पहले यह समझ लें कि खरिदन परहिया क्यों गुस्से में है? 5 जनवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंडल डैम से संबंधित पाईपलाईन योजना की आधारशिला रखी। इसके बाद केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। काटे जाने वाले पेड़ों में ज्यादातर साल के पेड़ हैं। हास्यास्पद बात यह है कि वन विभाग ने सिर्फ बड़े पेड़ों को गिना है जबकि यह प्राकृतिक जंगल का इलाका है, जिसमें हजारों किस्म की वनस्पितियां मौजूद हैं, जो डैम के निर्माण से स्वतः ही डूबकर समाप्त हो जायेंगे। 

हैरान करने वाली बात यह है कि इसी डैम के लिए वन विभाग ने 1981-82 में लगभग 3.5 लाख पेड़ों को काट दिया था, जिसके एवज में अबतक एक पौधा भी नहीं लगाया है। अब वन विभाग कह रही है कि मंडल डैम के डूब क्षेत्र में काटे जाने वाले पेड़ों के एवज में पलामू, गढ़वा एवं लातेहात जिले में दो हजार हेक्टेयर में पौधरोपन करेगा, जिसके लिए जलसंसाधन विभाग ने उसे 461 करोड़ रूपये भी दे दिया है। मंडल डैम के डूब क्षेत्र में 2266.72 एकड़ वनभूमि हैं। इसलिए अब एक बार फिर से वन विभाग ने भारत सरकार के ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन’’ मंत्रालय से पेड़ काटने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। काटे जाने वाले पेड़ों में सैकड़ों पेड़ 40-50 फुट उंचे तथा 1-1.5 व्यास की मोटाई के हैं। सवाल उठता है कि क्या वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जंगल बचाने के लिए बनाया गया है या पेड़ काटने और जंगल बर्बाद करने हेतु आदेश पारित करने के लिए? 

ज्ञात हो कि 1970 के दशक में उतरी कोयल जलाशय परियोजना के तहत मंडल डैम निर्माण की योजना बनायी गयी थी, जिसकी लागत 300 करोड़ रूपये थी, जो झारखंड गठन के उपरांत 1622 करोड़ रूपये हो गई थी। अब यह राशि बढ़कर 2391 करोड़ रूपये हो गयी है। डैम के निर्माण में अभी तक 792 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। 1990 के दशक में उग्रवादी हिंसा में एक इंजीनियर के मारे जाने के बाद कार्य बंद कर दिया गया था। अब एक बार फिर से मंडल डैम का निर्माण कार्य शुरू हो रहा है, जिसके लिए 2855 वर्ग किलोमीटर जमीन का अधिग्रहण होगा, जिसमें 15 गांव के 1600 परिवार विस्थापित होंगे। इस परियोजना से 111,521 हेक्टेयर जमीन सिंचित होगा, जिसमें झारखंड का मात्र 19,604 और बिहार का 91,917 हैक्टेयर भूमि शामिल है। यहां किस राज्य के किसानों को कितना फायदा मिलेगा यह मुद्दा नहीं है बल्कि मूल मुद्दा यह है कि क्या हम जंगलों को उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?
हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगल को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है। 

इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौपने के लिए निरंतर प्रयासरत है। छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है, जिसके खिलाफ आदिवासी संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर नो गो एरिया वाले जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। हमें मालूम होना चाहिए कि पर्यावरण संतुलन के लिए देश के कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत हिस्सा में जंगल होना अनिवार्य है। फोरेस्ट सर्वें रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 21.6 प्रतिशत वनक्षेत्र है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास के नाम पर डैम में डुबोना और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने 8 अक्टूबर 2018 को जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया है कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए पर्यावरण से 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके यानी ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर, जंगल बचाकर एवं वनक्षेत्र को विस्तार करके ही हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती नहीं बचा सकते हैं। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी।

2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमें समझना होगा कि चुनावी वादा खोखला हो सकता है लेकिन यदि हम पेरिस समझौता को भी चुनावी वादा समझने की भूल की तो आगामी एक दशक के बाद धरती पर कयामत आ जायेगा। हम लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे। यदि हम अपना अच्छा भविष्य चाहते हैं तो पेड़ काटने तथा जंगलों और पहाड़ों को उजाड़ने से बचाना होगा।  हमें केन्द्र एवं राज्य सरकारों को जिम्मवार बनाना होगा। इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है।   

स्वीडेन की 16 वर्षी क्लाईमेट एक्टिविस्ट ग्रेटा थन्बर्ग, जिन्होंने धरती को बचाने के लिए स्कूल जाना बंद करते हुए संयुक्त राष्ट्र पहुंची और दुनिया के नेताओं को यह सवाल पूछते हुए स्तब्ध कर दिया था कि आप ने अपने खोखले शब्दों से मेरा भविष्य छीन लिया है। आपकी हिम्मत कैसे हुए? क्या भारत के 130 करोड़ लोगों के बीच कोई है जो हमारे देश के जंगलों को उजाड़ने वाली केन्द्र एवं राज्य सरकारों से सवाल पूछ सके कि जंगलों को उजड़ने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? हमारे भविष्य को दांव पर लगाने की हिम्मत आपको कहां से आयी? आप कब विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित की ढकोसला बंद करेंगे? हमें हर हाल में पेड़ काटना और जंगलों को उजाड़ना बंद करना होगा। यदि हम आज जंगल को बचाने के लिए उठ खड़े नहीं हुए तो समझ लीजिये आने वाली पीढ़ी का कोई भविष्य नहीं है।   

बुधवार, 14 अगस्त 2019

आजादी का पहला योद्धा

ग्लैडसन डुंगडुंग

‘जमीन हमें भगवान ने दिया है, सरकार बीच में कहां से आयी? हम सरकार को अपनी जमीन का लगान नहीं देंगे।’ ये साहसिक शब्द उस शख्स के हैं, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे पहले क्रांति का बिगुल फंका था। उस शक्स का नाम है बाबा तिलका मांझी। हैरानी की बात यह है कि जिस शख्स की प्रतिमा देश के हर कोने में होना चाहिए था उन्हें आजाद भारत के इतिहास में गौन कर दिया गया है। यही वजह है कि आज उन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। आज के युवा उनसे बिल्कुल अनभिज्ञा हैं। पेररणा के इतने बड़े श्रोत को छिपा दिया गया है जबकि आजादी के योद्धाओं के बीच यदि तुलनात्मक विश्लेषण किया जाये तो निश्चित तौर पर बाबा तिलका मांझी पहली पंक्ति में होंगे। शायद, उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि वे आदिवासी समुदाय में जन्म लिये थे। फलस्वरूप, तथाकथित मुख्यधारा के इतिहासकारों ने उन्हें आजादी के इतिहास में उन्हें जगह नहीं दिया।   

निःसंदेह, बाबा तिलका मांझी आदिवासी योद्धा थे। लेकिन उनके पहाड़िया और संताल होने पर भी विवाद है। पहाड़िया आदिवासी उन्हें अपना नेता बताते हैं। वे कहते हैं कि पहाड़िया नेता जबरा पहाड़िया ही तिलका मांझी के रूप में स्थापित हैं। वहीं संताल आदिवासी उन्हें अपने समुदाय का नेता करार देते हैं। वे कहते हैं कि संताली लोक गीतों में बाबा तिलका मांझी का जिक्र हैं। इन दावों के इतर तथ्य यह है कि संताल आदिवासी वर्तमान संताल परगना जो उस समय ‘दामिन-इ-कोह’ एवं ‘राजमहल’ के रूप में जाना जाता था, उस इलाके में 1790 से 1810 के मध्य में वीरभूम के उत्तरी मार्ग से आये और बसे। आदिवासी इतिहासकार बताते हैं कि बाबा तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को तिलकपुर नामक गांव में हुआ था। उन्होंने 1772 से 1784 तक ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहाड़िया विद्रोह का नेतृत्व किया। इससे स्पष्ट होता है कि बाबा तिलका मांझी पहाड़िया आदिवासी समुदाय से थे। 

मैं यहां बाबा तिलका मांझी के कार्यों पर चर्चा करना चाहता हॅं, जिसमें उनकी महानता झलकती है। बाबा तिलका मांझी की महानता इस बात से पता चलता है कि उन्होंने 13 जनवरी 1784 को ताड़ के पेड़ पर चढ़कर तीर-धनुष से भागलपुर के कलक्टर अगस्टिन क्लीवलैंड को मार गिराया था। तीर का प्रहर इतना खतरनाक था कि कलक्टर साहब की वहीं मृत्यु हो गई थी। यहां बाबा तिलका मांझी का साहस, जज्बा और जुनून देखने लायक है। कलक्टर साहब बाबा तिलका मांझी को पकड़ना या मुठभेड़ मं मार गिराना चाहते थे। वे घोड़ा से घुमघुमकर उनकी खोज में जुटे हुए थे। बाबा तिलका मांझी छुपने के बजाय कलक्टर साहक को ही मार गिराया। बाबा तिलका मांझी के पास अपनी सेना थी लेकिन उन्होंने अकेले ही कलटकर साहब से भिड़ गये। हालांकि 1785 में ब्रिटिश शासक वारेन हेस्टिंग्स की अगवाई में बाबा तिलका मांझी को पकड़ लिया गया तथा उन्हें भागलपुर ले जाकर चार घोड़ों के पीछे मोटी रस्सियों से बांधकर पूरे टाउन में सारे आम घसीटा गया उसके बाद उन्हं बरगद के पेड़ पर फांसी दी दी गयी। निश्चितरूप से यह बाबा तिलका मांझी के महानता को दर्शाता है।
  
हमें यह भी समझना चाहिए कि ऐसी परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई? 22 अक्टूबर 1764 को बाक्सर की लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मुगल बदशाहों की संयुक्त सेना हो हरा दिया। फलस्वरूप, 16 अगस्त 1765 की इलाहाबाद संधि के तहत कंपनी को बंगाल, बिहार एवं ओड़िसा की दीवानी अधिकार मिल गई। इस तरह से भारत में ब्रिटिश हुकूमत की शुरूआत हुई। 1769 में छोटानागपुर एवं संताल परगना को भी इसमें जोड़ दिया गया। इसी बीच 1770 में भयांकर सूखा पड़ा, जिसे भूखमरी की स्थिति पैदा हो गई। फिर भी ब्रिटिश हुकूमत ने जमीन की बंदोबस्ती जारी रखी और रैयतों से जमीन का लगान मांगा। पहाड़िया आदिवासियों ने इसका विरोध करना शुरू किया। इस तरह से 1772 में पहाड़िया विद्रोह की शुरूआत हो गई जो 1785 तक चला। यही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहला सुनियोजित आंदोलन था। क्या इतिहासकारों को आजादी के इन महान योद्धाओं के साथ ऐसा अन्याय करना चाहिए था?   

सोमवार, 5 अगस्त 2019

आदिवासी दिवस क्यों मनाया जाता है?

ग्लैडसन डुंगडुंग

9 अगस्त को प्रतिवर्ष अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विश्वभर में आदिवासी समुदाय के लोग, आदिवासी संगठन और संयुक्त राष्ट्र व कई देशों की सरकारी संस्थानों के द्वारा परिचर्चा, नाच-गान और सामूहिक समारोह का आयोजन किया जाता है। 9 अगस्त 1995 को पहली बार विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन किया गया था। यह दिवस दुनियाभर में आदिवासियों का सबसे बड़ा दिवस है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस क्यों मनाया जाता है? यह तारीख आदिवासियों के लिए क्या महत्व रखता है? आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा कहां से शुरू हुई? संयुक्त राष्ट्र ने विश्व आदिवासी दिवस की घोषणा क्यों की? विश्व आदिवासी दिवस मनाने का क्या उद्देश्य है?  

विश्व के 195 देशों में से 90 देशों में 5,000 आदिवासी समुदाय हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 37 करोड़ हैं। उनकी अपनी 7,000 भाषाएं हैं। लेकिन इनके अधिकारों का सबसे ज्यादा हनन होता रहा है। इसी को मद्देनजर रखते हुए विश्व आदिवासी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया, जिसका मूल उद्देश्य है आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा एवं बढ़ावा को सुनिश्चित करना। इसके अलावा खासकर विश्व के पर्यावरण संरक्षण में आदिवासियों के योगदान को चिन्हित करना। 

आदिवासियों के अधिकारों का मसला और आदिवासी दिवस मनाने के पीछे एक लम्बा इतिहास है। आदिवासियों के साथ हो रहे प्रताड़ना एवं भेदभाव के मुद्दे को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने, जो लीग आफ नेशन के बाद यूनाईटेड नेशन्स का एक प्रमुख अंग बना, 1920 में उठाना शुरू किया। इस संगठन ने 1957 में ‘इंडिजिनस एंड ट्राईबल पापुलेशन कान्वेंशन सं. 107 नामक दस्तावेज को अंगीकृत किया, जो आदिवासी मसले का पहला अन्तर्राष्ट्रीय दस्तावेज है, जिसे दुनियाभर के आदिवासियों के उपर किये जाने वाले प्रताड़ना एवं भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने के लिए समर्पित किया गया था। 

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने पुनः 1989 में उक्त दस्तावेज को संशोधित करते हुए ‘इंडिजिनस एंड ट्राईबल पीपुल्स कान्वेशन 169, जिसे आईएलओ कान्वेंशन 169 भी कहा जाता है, जारी किया। यह दस्तावेज आदिवासियों के आत्म-निर्णय के अधिकार को मान्यता देते हुए जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों के मालिकाना हक को स्वीकृति प्रदान करता है। इसी दस्तावेज ने संयुक्त राष्ट्र के द्वारा 13 दिसंबर 2007 को जारी किये गये आदिवासी अधिकार घोषणा-पत्र में प्रमुख भूमिका निभाया।

हालांकि विश्व आदिवासी दिवस मनाने के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका के आदिवासियों की सबसे बड़ी भूमिका है। अमेरिकी देशों में 12 अक्टूबर को कोलम्बस दिवस मनाने की प्रथा है, जिसका वहां के आदिवासियों ने घोर विरोध करते हुए उसी दिन आदिवासी दिवस मनाना शुरू किया। उन्होंने सरकारों से मांग किया कि कोलम्बस दिवस के जगह पर आदिवासी दिवस मनाया जाना चाहिए क्योंकि कोलम्बस उस उपनिवेशी शासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके लिए बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ है। 

यह मामला संयुक्त राष्ट्र पहुंचा। अमेरिकी देशों के आदिवासियों के साथ हुए भेदभाव के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से 1977 में जेनेवा में एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में कोलम्बस दिवस को हटाकर उसके जगह पर आदिवासी दिवस मनाने की मांग की गई। इस तरह से यह मांग जोर पकड़ता गया। आदिवासियों ने 1989 से आदिवासी दिवस मनाना शुरू कर दिया, जिसे काफी समर्थन मिला। अंततः 12 अक्टूबर 1992 को अमेरिकी देशों में कोलम्बस दिवस के जगह पर आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हो गई। 

इसी बीच संयुक्त राष्ट्र ने आदिवासी अधिकारों को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कार्यदल का गठन किया, जिसकी प्रथम बैठक 9 अगस्त 1982 को जेनेवा में हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने 1994 को आदिवासी वर्ष घोषित किया। 23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1995 से 2004 को प्रथम आदिवासी दशक घोषित किया तथा आदिवासियों के मुद्दे पर 9 अगस्त 1982 को हुए प्रथम बैठक के स्मरण में 9 अगस्त को प्रतिवर्ष आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा की। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र ने 2005 से 2014 को द्वितीय आदिवासी दशक घोषित किया, जिसका मकसद आदिवासियों के मानव अधिकार, पर्यावरण, शिक्षा, स्वस्थ्य, आर्थिक एवं सामाजिक विकास के मुद्दों को सुलझाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है।

विश्व आदिवासी दिवस दुनियाभर के आदिवासियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने और उन्हें बढ़ावा देने का दिन है। इसलिए प्रतिवर्ष 9 अगस्त को हमें अपनी एकजुटता, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष और प्रतिबद्धता को प्रदर्शित चाहिए। इस दिन हमें घोषणा करना चाहिए कि हम आदिवासी अपनी मातृभूमि के प्रथम निवासी हं। यहां की जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों पर हमारा पहला हक है।

शनिवार, 27 जुलाई 2019

जमीन के लिए जनसंहार

ग्लैडसन डुंगडुंग

17 जुलाई 2019। आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में किये गये जनसंहारों के इतिहास में और एक भयावह अध्याय। यह अध्याय जुड़ा है उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिलान्तर्गत मूर्तियां पंचायत के उम्भा और सपही गांव के गोड़ आदिवासियों की जनसंहार का। यह जनसंहार प्रायोजित था। सत्ता चलाने वाले सवर्णों के द्वारा। 32 ट्रैक्टर, दो दर्जन हथियार बंद सहित 300 हमलावर, 10 लोगों की निर्मम हत्या, 4 लोग गंभीररूप से घायल एवं सैकड़ों लोग चोटिल। बिहार से बंदूकधारी मंगवाकर हमला किया गया। क्या यह सब अचानक हो गया? क्या सत्ता को इसकी भनक तक नहीं थी? क्या जिला प्रशासन कुछ नहीं जानता था? निश्चित तौर पर इसके बारे में सबलोग जानते थे। यह जमीन के लिए जनसंहार है। इसका सबूत भी है। यूपी के उप-मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा ने इस जनसंहार को मामूली घटना करार दिया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आदिवासी कब से जमीन के मालिक हो गए? प्राचीनकाल से इनका काम मल-मूत्र उठाने और बेगार करने का रहा है। फिर इनके पास कहां से जमीन आया और वे कैसे मालिक बन गए? इनका काम केवल खेतों में मजदूरी करने का रहा है। 

यह सवर्णों के द्वारा प्रायोजित जनसंहार है। गोड़ आदिवासियों की 638 बीघा जमीन को लूटने के लिए। गोड़ आदिवासी उक्त जमीन पर सदियों से जोत-कोड़ रहे हैं। यह इलाका जंगल का इलाका है, जहां वे रहते हैं। उनके पूवर्जों ने जंगलों को साफकर खेती योग्य जमीन बनाया। यहां अब जंगल न के बराबर है इसलिए उनकी आजीविकास पूर्णरूप से खेती पर निर्भर है। आदिवासी उक्त जमीन का पट्टा भी मांगते रहे हैं लेकिन उन्हें पट्टा नहीं दिया गया। बल्कि सरकार के नौकरशाहों के द्वारा बड़ी चलाकी से उक्त जमीन को कानूनी जामा पहनाकर गोड़ आदिवासियों से छीनने की पूरी कोशिश की गई। इसके लिए सबसे पहले ‘आदर्श कापरेटिव सोसाईटी’ का गठन किया गया। इसके बाद 17 दिसंबर 1955 को राबर्ट्गंज के तहसीलदार के द्वारा उक्त जमीन को उक्त सोसाईटी के नाम पर लिखा लिया गया। लेकिन 1966 में उत्तर प्रदेश में सहकारिता समिति अधिनियम खत्म हो गया। इस तरह से जमीन सोसाईटी से मुक्त हो गया। आदिवासी लोग जमीन पर जोतते-कोड़ते रहे और उसका मालिकाना हक के लिए सरकारी बाबुओं के दफ्तरों का चक्कर काटते रहे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा।  

इसी बीच पटना निवासी आईएएस अफसर प्रभात कुमार मिश्रा मीरजापुर के जिलाधिकारी बनाये गये।  तब सोनभद्र अलग जिला नहीं था बल्कि मीरजापुर के अन्तर्गत आता था। प्रभात कुमार मिश्रा ने अपने पद और रूतवा का गलत इस्तेमाल करते हुए 6 सितंबर 1989 को उक्त जमीन को अपने, पत्नी आशा मिश्रा, विनीत शर्मा और भानु शर्मा के नाम पर लिखवा लिया। लेकिन आदिवासियों की एकजुटता के कारण वे जमीन कब्जा नहीं कर सके। जब आदिवासियों को पता चला कि जमीन किसी और के नाम पर लिखवा लिया गया है तक उन्होंने इस मामले को अंचल, जिलाधिकारी एवं आयुक्त के पास दर्ज कराया। लेकिन सभी जगहों पर उनके दावों को खारिज कर दिया गया। फिर आदिवासियों ने न्यायालय का शरण लिया। जमीन को हथियाने के लिए प्रभात कुमार मिश्रा ने अपने ताकत और पहुंच का खूब इस्तेमाल किया। फिर भी आदिवासियों के विरोध के कारण जमीन को कब्जा नहीं कर सका तब उन्होंने एक नयी रणनीति अपनायी, जिसके तहत जमीन के एक हिस्से को स्थानीय दबंगों को बेचकर जमीन पर कब्जा शुरू करने की मुहिम छेड़ी। 

17 अक्टूबर 2017 को प्रभात कुमार मिश्रा ने 140 बीघा जमीन को गांव के दबंग ग्रामप्रधान यज्ञदत्त गुजर को बेच दिया। 6 फरवरी 2019 को उक्त जमीन की दखिल खारिज कर दी गई। गुजर यहां पलायन करके आया था, जो अपने दबंगई के कारण गांव की जमीन कब्जाकर स्थानीय निवासी बन गया। लेकिन मिश्रा से खरीदने के बाद भी उक्त जमीन पर गुजर कब्जा नहीं कर पाया। जमीन को आदिवासी ही जोत-आबाद करते रहे। गुजर ने आदिवासियों से जमीन खाली करवाले के लिए प्रशासन का सहारा लिया लेकिन आदिवासियों की एकजुटता एवं प्रतिकार के सामने प्रशासन घूटने टेक दिया। अंत में गुजर और मिश्रा ने मिलकर जनसंहार का खूनी खेल खेला। 

जनसंहार के बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इसके लिए पूर्व के कांग्रेस सरकार को जिम्मेवार ठहराया है ठीक उसी तरह जैसे देश के प्रत्येक समस्या के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, कांग्रेस और नेहरू को जिम्मेवार ठहराते हैं। अब यह फिक्स मैच बन चुका है। सत्ताधीश जिम्मेवारी से बचना चाहते हैं। यूपी में कांग्रेस के अलावा भाजपा, बसपा और सपा भी सत्ता में रह चुके हैं लेकिन जनसंहार की जिम्मेवारी सिर्फ कांग्रेस पर। यह अद्भूत है! इतना बड़ा जनसंहार होने के बाद भी अब यूपी में जंगल राज नहीं है। मैं हैरान हॅं। यूपी में सपा और बसपा, बिहार में आरजेडी और झारखंड में जेएमएम व उसके सहयोगी दलों के शासनकाल में ऐसी घटना घटने पर उक्त शासन को जंगल राज बताने में एक संकेड का देरी नहीं करने वाली मीडिया कहां गुम हो गई है? 

इस जनसंहार के लिए मूलरूप से प्रभात कुमार मिश्रा, अन्य नौकरशाह और स्थानीय पुलिस जिम्मेवार हैं, जिन्होंने जमीन पर वर्षों से काबिज आदिवासियों को उसका पट्टा निर्गत करने के बजाय अपने पदों का दुरूपयोग करते हुए आदिवासियों से उनकी जमीन छीनने की कोशिश की और उनका जनसंहार करवाया। घटना के दिन पुलिस ने सुबह में आदिवासियों को थाना बुलाया था और थाना नहीं जाने की स्थिति में कोई बड़ी घटना की ओर इशारा किया था। इसका क्या अर्थ है? पुलिस, प्रशासन और जमीन माफिया   के बीच बने मजबूत गांठजोड़ ही इस जनसंहार को अंजाम दिया है। इसलिए इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। इसकी से स्पष्ट होगा कि गोड़ आदिवासियों के जनसंहार का असली दोषी कौन-कौन हैं। गोड़ आदिवासियों को हिन्दू बनाने वाला संघ परिवार कहां है? क्या संघी इन्हें न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे? क्या संघियों के गोद में बैठे आदिवासियों को अब अपनी आंखें नहीं खोलनी चाहिए? 

सोमवार, 22 जुलाई 2019

साहब का फैसला

ग्लैडसन डुंगडुंग










साहब आप ने हमें
जंगलों से अलग
करने का फैसला
कैसे कर दिया 
वातानुकूलित कमरे में
बैठकर?
क्या जंगल में
सखुआ के पेड़ों से टकराने वाले
हवा के झोंके से कभी
टकराये हैं आप?
क्या जंगल में
सीना तान के खड़े
पेड़ों के नाम
जानते है आप?
क्या जिनहोर के फूलों की खुशबू
कभी आपके नाक तक पहुंची है?
क्या गेठी, पुटू और करील का स्वाद
कभी चखा है आप ने?
क्या महुआ की महक
के बारे में जानते हैं आप?
फिर जंगलों से हमें
खदेड़ने का फैसला
कैसे कर दिया साहब आप ने?
जंगल में हमारे
न होने का मतलब
जानते हैं आप?
आपके फैसले से
भयभीत हैं जंगल
थरथरा रहे हैं पेड़
कंप उठे हैं भय से
छोटे-छोटे पौधे भी
बंद कर दिया है
चिड़ियों ने चहचहाना
खामोश हैं
बाघ, भालू और बंदर
झींगुरों ने शोरगुल
बंद कर दिया है
वे जान गये हैं
पूंजीपतियों के पंजों से
उन्हें बचानेवाला
अब कोई नहीं बचेगा
जंगलों में। 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

वनभूमि और जंगल के असली हकदार कौन?

ग्लैडसन डुंगडुंग

28 फरवरी 2019। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विगत ‘आदिवासी खदेड़ो आदेश’ पर रोक लगाते हुए आदेश दिया कि वन अधिकार कानून 2006 के तहत खारिज दावा-पत्रों का सही मूल्यांकन कर राज्य सरकारें हल्फनामा दायर करें। आदेश का पालन करते हुए देश के 20 राज्यों की सरकारों ने खारिज दावा-पत्रों का मूल्यांकन अद्भूत तरीके से किया। ओडिसा इसका एक बड़ा उदाहरण मात्र है। आडिसा के नौकरशाहों ने दावा-पत्रों के मूल्यांकन के नामपर वनभूमि के दावेदारों को शपथ-पत्रों में अपना नाम और उम्र लिखकर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लगवाकर अपना ड्यूटी पूरा किया। शपथ-पत्रों में लिखा था - हमारे पास वनभूमि पर दावेदारी करने के लिए प्रमाण नहीं हैं। इसलिए जिला स्तरीय समिति का निर्णय सही है। इस तरह से नौकरशाहों ने एक झटके में वनभूमि एवं जंगल के 10,000 असली दावेदारों एवं हकदारोंका दावा-पत्र खारिज कर दिया। ये लोग कई पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं और वनभूमि पर खेती करते हैं।  

एक उदाहरण है मयूरभंज जिले के चंडक वाईल्डलाईफ सेंचूरी में स्थित अम्बापड़िया गांव। अम्बापड़िया में 52 आदिवासी परिवार 1950 से रह रहे हैं। इन्होंने ही गांव बसाया है। वन अधिकार कानून 2006 में वाईल्डलाईफ संचूरी के अंदर आवास और आजीविका का अधिकार दिया गया है। जब यह कानून लागू हुआ तब इन आदिवासियों ने 2008 में ही दावा-पत्र भरा लेकिन 2010 में उनकी दावेदारी को खारिज कर दिया गया लेकिन उन्हें सूचना नहीं दिया गया। जब उन्हें इसकी भनक लगी तब उन्होंने सरकारी आफसरों को पत्र लिखा लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 15 जून 2019 को आफसरों ने उन्हें 18 जून को अनुमंडल स्तरीय समिति के पास उपस्थिति होने का आदेश जारी किया। आदिवासियों ने 3000 रूपये खर्च करते हुए गाड़ी का इंतिजाम कर समिति के जनसुनवाई में भाग लिया। लेकिन पदाधिकारियों ने शपथ-पत्रों पर उनका हस्ताक्षर एवं अंगूठे का ठप्पा लगाकर उन्हें गांव वापस भेज दिया। ऐसा ही सभी दावेदारों के साथ हुआ है।        

इस सच्चाई को जानकार कोई भी हैरान हो सकता है। केन्द्र सरकार ने दावा किया था कि वन अधिकार कानून को आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के उपर किये गये ऐतिहासिक अन्याय को न्याय में बदलने के लिए कानून लागू किया जा रहा है। कानून में प्रावधान स्पष्ट है कि जो दावेदार 13 दिसंबर 2005 के पहले से वनभूमि पर काबिज हैं या जंगल में घर बनाकर रह रहे तथा जंगल का उपयोग कर रहे हैं तो उसमें उन्हें खेती की जमीन और आवासीय भूमि पर व्यक्तिगत तथा जंगल पर सामुदायिक अधिकार मिलेगा। सरकारी आफसरों का काम सिर्फ सही दावेदारों की पहचान कर पट्टा निर्गत करना है। यहां सवाल उठता है कि जो आदिवासी वनभूमि और जंगलों पर कई पीढ़ियों से काबिज हैं उनका दावा-पत्र क्यों खारिज किया जा रहा है? यदि सुप्रीम कोर्ट का आदिवासी खदेड़ों आदेश लागू होता है तब इन आदिवासियों के आजीविका का क्या होगा? इसके लिए कौन जिम्मेवार है?     

हमें इस मसले को गंभीरता के साथ समझना होगा, जिसे सरकारें समझने को तैयार नहीं हैं। आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को खदेड़ने के पीछे तथाकथित संरक्षणवादी ताकतें हैं जो यह मानते हैं कि जंगल सरकार का है, जहां सिर्फ जंगली जानवारों को रहने का अधिकार है तथा जो लोग जंगलों के अंदर या उसके आस-पास रहते हैं वे वनभूमि एवं जंगलों का अतिक्रमण किये हुए हैं। ऐसे लोग न सिर्फ जंगलों के बर्बादी के लिए जिम्मेवार हैं बल्कि वे जंगल के दुश्मन तथा वन्यजीवन के लिए खतरा हैं। इसलिए इन लोगों को जंगलों से बेदखल किया जाना चाहिए। 2006 में जब भारत सरकार ने संसद में वन अधिकार कानून पारित करवाया था तब यही लोग अडंगा लगाकर दो वर्षाें तक कानून को लागू करने नहीं दिया। लेकिन जब केन्द्र सरकार ने 1 जनवरी 2008 को वन अधिकार कानून को देशभर में लागू कर दिया तब उसे कानूनी तौर पर रोकने के लिए इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाया खटखटाया।         

आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को जंगलों से बेदखल करने का अभियान चलाने वाले तथाकथित संरक्षणवादी एनजीओ हैं - बाम्बे नेच्यूरल हिट्री सोसाईटी, वाईल्डलाईफ ट्रस्ट आफ इंडिया, वाईल्डलाईफ फस्ट, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशनट्रस्ट, नेचर काजर्वेंशन सोसाईटी एवं वाईल्डलाईफ सोसाईटी आफ ओडिसा। इनमें से अधिकांश एनजीओ वन विभाग से सेवानिवृत अधिकारियों एवं तथाकथित उच्च जातियों के हं, जिन्होंने जीवन भर जंगलों को बेचकर अपना घर भरा तथा बाघों के खाल पर बैठकर पूजा किया। असल में जंगल और बाघ के नष्ट होने के पीछे ये ही हैं। लेकिन अब वन एवं वन्यजीवन बचाने के नामपर जंगलों से आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को हमेशा के लिए बेदखल करना चाहते हैं ताकि वे बिना रोक-टोक के टिम्बर एवं जंगली जानवरों की तस्करी कर सकें। हकीकत में आदिवासियों ने ही जंगलों को बचाकर रखा है। फोरेस्ट सर्वे रिपोर्ट 2017 में भारत सरकार ने माना है कि देश के आदिवासी बहुल जिलों में जंगलों का क्षेत्र बढ़ा है। फिर भी तथाकथित संरक्षणवादी आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करना चाहते हैं। 

इसके लिए सबसे पहले 2008 में वाईल्डलाईफ फस्ट, वाईल्डलाईफ ट्रस्ट आफ इंडिया, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशन ट्रस्ट एवं नेचर काजर्वेंशन सोसाईटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका सं. 50/2008 वाईल्डलाईफ फस्ट एवं अन्य बनाम यूनियन आफ इंडिया दाखिल करते हुए वन अधिकार कानून 2006 को असंवैधानिक करार देने की मांग की। लेकिन जब बात नहीं बनी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त याचिका को लंबित रखा है, तब वाईल्डलाईफ फस्ट, टाईगर रिसर्च एंड काजर्वेशन ट्रस्ट एवं नेचर काजर्वेंशन सोसाईट ने सुप्रीम कोर्ट में दूसरा याचिका सं. 109/2008 दाखिल करते हुए मांग किया कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए उन्हें वनों से बेदखल किया जाये। इसके अलावा कई याचिकाएं राज्यों के उच्च न्यायालयों में दाखिल किये गये। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं ‘वाईल्डलाईफ फस्ट एवं अन्य बनाम यूनियन आफ इंडिया सं. 109/2008’ में समाहित करते हुए 2015 में सुनवाई शुरू किया तथा विगत 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने वन अधिकार कानून के तहत निरस्त किये गये दावा के संदर्भ में बेदखलीकरण का आदेश जारी किया था।हालांकि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए बेदखलीकरण का आदेश पर रोक लगवा दिया।

लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि ये तथाकथित वन एवं वन्यजीवन के रक्षकों ने जंगल उजाड़ने के लिए जिम्मेवार पूंजीपतियों के खिलाफ याचिका में कोई सवाल नहीं उठाया है जबकि 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। इतना ही नहीं विगत पांच वर्षों  में 2014 से 2018 तक 2347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले किया गया। इससे स्पष्ट है कि ये तथाकथित वन एवं वन्यजीवन के संरक्षक सिर्फ आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करना चाहते हैं। आगामी 24 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई करेगा। चुनाव समाप्त हो चुका है इसलिए हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट फिर से बेदखलीकरण का आदेश जारी कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो लगभग 20 लाख परिवारों के 1 करोड़ लोग अपने पुश्तैनी आवास, वनभूमि एवं जंगलों से बेदखल किये जायेंगे, जबकि वे वनभूमि एवं जंगलों के असली दावेदार और हकदार हैं। 

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘सह-अस्तित्व’’ प्रकृति का मूल सिद्धांत है, जो आदिवासी जीवन-दर्शन का एक प्रमुख आधार भी, जिसके तहत आदिवासी, जंगल और वन्यजीवन एक-दूसरे के पूरक हैं। इस अवधारणा को राष्ट्रीय वन नीति 1988 में ‘परस्पर’ संबंध कहा गया हैं। वन अधिकार कानून 2006 के तहत जंगलों में निवास करने का अधिकार भी इसी सह-अस्तित्व को स्वीकार करते हुए दिया गया है। वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 में वाईल्डलाईफ सेंचूरियों के अंदर बफर जोन में मनुष्य एवं जंगली जानवारों के सह-अस्तित्व को बढ़ाने पर जोर दिया गया है। लेकिन कुछ तथाकथित संरक्षणवादी एवं बाघ बचाने के नामपर करोड़ों रूपये कमाने वाले एनजीओ ‘सह-अस्तित्व’ की अवधारणा को नकारते हुए आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों को जंगलों से निकाल बाहर करने के लिए पिछले कई दशकों से अभियान चला रहे हैं, जिन्हें यह मालूम होना चाहिए कि आदिवासी तब से जंगल एवं वन्यजीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण कर रहे जब ‘सुरक्षा’, ‘संरक्षण’ जैसे शब्द गढ़े नहीं गये थे। आदिवासियों के पास वन एवं वन्यजीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए पीढ़ियांें पुराना नियम, कानून और पद्धति है। आदिवासियों के बगैर न जंगल और न ही वन्यजीवन बचेगा। वे ही जंगल के असली हकदार, दावेदार और संरक्षक हैं इसलिए उन्हें वनभूमि एवं जंगलों पर मालिकाना हक दिया जाना चाहिए।    

मंगलवार, 25 जून 2019

आदिवासियों के उपर मंडराता बेदखलीकरण का खतरा

ग्लैडसन डुंगडुंग

वैश्विक मंच ‘‘ग्लोबल लैंडस्केप फोरम’’ लोगों के अधिकार, जमीन का सत्त उपयोग एवं स्थायी विकास के मसले पर प्रतिबद्ध दुनिया का सबसे बड़ा फोरम है। इस फोरम में अबतक दुनिया के 185 देशों के 4,400 संगठनों से जुड़े 180,000 लोग भाग ले चुके हैं। इस बार यह फोरम जर्मनी के बोन शहर में 22 एवं 23 जून 2019 को सम्पन्न हुआ, जिसमें 150 देशों के 700 लोग सीधे तथा 14,000 लोग आनलाईन शामिल हुए। इसके अलावा सोशल मीडिया के द्वारा फोरम का संदेश 1 करोड़ 40 लाख लोग तक पहुंचा। इस बार मुझे भी ग्लोबल लैडस्केप फोरम में शामिल होने का मौका मिला। मैंने मजबूती, दृढ़ता और प्रखरता के साथ जंगलों से आदिवासियों के बेदखलीकरण के मुद्दे को फोरम के पटल पर रखा। 

इन दिनों भारत के विभिन्न जंगलो के अंदर रहने वाले आदिवासी कई खतरों से जुझ रहे हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 13 फरवरी 2019 को दिया गया बेदखलीकरण का आदेश सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने उन आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वननिवासियों को वनभूमि एवं जंगलों से बेदखल करने का आदेश दिया था, जिनका दावा-पत्र वन अधिकार कानून 2006 के तहत खारिज किया जा चुका है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने इस आदेश पर रोक लगवा दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 20 राज्यों के राज्य सरकारों आगामी 12 जुलाई 2019 तक इस मसले पर अपना एफिडेविट दायर करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट आगामी 24 जुलाई 2019 को इस मामले की सुनवाई करेगा। वन अधिकार के मामले पर राज्य सरकारों के द्वारा पुर्नावलोकन के बाद भी 15 लाख दावा-पत्रों को खारिज मान लिया गया है, जिसका अर्थ है कि 75 लाख आदिवासियों के उपर जंगलों से बेदखल होने का खतरा मंडरा है। यदि इन्हें जंगलों से बेदखल किया गया तो ये लोग कहां जायेंगे? 

इसके अलावा दूसरा खतरा है भारतीय वन अधिनियम 1927 का संशोधन प्रस्ताव। भारत सरकार भारतीय वन अधिनिय 1925 को संशोधन करते हुए वन अधिनियम 2019 बनाने की प्रक्रिया चला रही है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार राज्य सरकारें किसी भी जंगल को रिजर्व जंगल घोषित करते हुए आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर सकती हैं। वन सुरक्षा गार्डों के पास जंगलों में तीर-धनुष एवं कुल्हड़ी जैसे औजारों के साथ दिखाई देने वाले लोगों को सीधे गोली मारने की शक्ति होगी एवं गोली चलाने वाले सुरक्षा गार्डों के उपर कानूनी कार्रवाई करने के लिए पीड़ितों को लिए सरकार से अनुमति लेना होगा। 
इसी तरह तीसरा खतरा यह है कि केन्द्र सरकार आदिवासी बहुल राज्यों में मौजूद नेशनल पार्क, वाईल्डलाईफ सेंक्चूरी एवं अभ्यरणों को जोड़कर वाईल्ड लाईफ कारिडोर बना रही है। उदाहरण के लिए झारखंड में तीन कारिडोर एवं तीन-सब कारिडोर बनाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत 870 गांवों को जंगलों से बाहर करने का प्रस्ताव है। पलामू टाईगर रिजर्व के अंदर आने वाले 8 गांवों को नोटिस दिया जा चुका है। इस परियोजना से लगभग 5 लाख आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। सरकार इन्हें बंजर भूमि पर बसाना चाहती है। ऐसी स्थिति में इनकी आजीविका का स्रोत समाप्त हो जायेगा। 

इसके अतिरिक्त चैथा खतरा है लैंड बैंक का गठन। कारपोरेट घरानों को बसाने के लिए राज्य सरकारें लैंड बैंक बना रहीं हैं। झारखंड सरकार राज्यभर के 20 लाख एकड़ सामुदायिक, धार्मिक एवं वनभूमि को लैंड बैंक में डाला दिया है, जिसमें 10 लाख एकड़ वनभूमि है। वन अधिकार कानून 2006 के तहत उक्त वनभूमि पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देना है लेकिन सरकार इस जमीन को पूंजीपतियों को देना चाहती है। 

इसके अलावा पांचवां खतरा है भारत सरकार ने द्वारा लागू किया गया कैफ कानून 2016। यह कानून कम्पा फंड में रखे गये 66,000 करोड़ रूपये को वनरोपन में खर्च करने के लिए बनाया गया है। यह पैसा तथाकथित विकास परियोजनाओं को स्थापित करते समय जंगलों को बर्बाद करने के एवज में कंपनियों ने वनरोपन के लिए केन्द्र सरकार के फंड में जमा किया है। वनरोपन का कार्य गैर-वनीय भूमि पर किया जाना है। लेकिन वन विभाग आदिवासियों को बेदखल करते हुए गांवों के जंगलों पर वनरोपन कर रही है। फलस्वरूप, वनविभाग और आदिवासियों के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। कैफ कानून के द्वारा आदिवासियों को उनकी आजीविका के संसाधनों से बेदखल किया जा रहा है। झारखंड और ओड़िसा में इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं। 

यदि आदिवासियों के उपर मंडराने वाले इन सारे खतरों का आंकलन एक साथ किया जाये तो स्थिति भयावह दिखती है। भारत में 10 करोड़ आदिवासी रहते हैं, जिनमें से 91.1 प्रतिशत यानी 9 करोड़ आदिवासियों की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि एवं वन है। ऐसी स्थिति में सरकार के द्वारा जंगल छीनने के लिए किये जा रहे प्रयासों से 9 करोड़ आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। हमलोग आदिवासी लोग इन खतरों से निपटने के लिए जनांदोलन कर रहे हैं, ग्रामसभाओं की शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं, कानून एवं संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग कर रहे हैं, कोर्ट का सहारा ले रहे हैं और मीडिया, सोशल मीडिया और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का सहयोग ले रहे हैं। लेकिन यह काफी नहीं है क्योंकि इसका मूल जड़ है ‘‘राजसत्ता और कारपोरेट जगत’’ के बीच गहरा सांठ-गांठ। 

कई रिपोर्टों में कहा गया है कि विगत लोकसभा चुनाव में 60,000 करोड़ रूपये खर्च हुआ है, जिसमें से सिर्फ एक राजनीतिक दल का खर्च 27,000 करोड़ रूपये यानी कुल खर्च का 45 प्रतिशत है। एक राजनीतिक दल के पास इतना पैसा कहां से आया? निश्चितरूप से यह कारपोरेट घरानों का पैसा है, जो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर पैसा कमाना चाहते हैं। सरकार की गतिविधियांें में दूर से द्वंद दिखाई पड़ता है लेकिन ऐसा है नहीं। आप कह सकते हैं कि एक तरफ सरकार आदिवासी हितों के पक्ष में वन
अधिकार कानून जैसे कानून लागू कर रही है और दूसरे तरफ वनभूमि एवं जंगलों को पूंजीपतियों को सौप रही है। लेकिन वर्तमान सरकार ने आदिवासियों लिए ऐसा कोई कानून नहीं लाया है बल्कि कई भूमि सुरक्षा कानूनों का संशोधन किया है। केन्द्र में शासन कर रही पार्टी की कई राज्यों में सरकारें हैं, जिन्होंने आदिवासियों के वनाधिकार को भी नकारा है। छत्तीसगढ़ के घटबारा गांव में कोयला खनन के लिए तीन सामुदायिक पट्टे खारिज कर दिये गये, बैलाडीला में अडानी कंपनी को लौह-अयस्क पहाड़ सौप दिया गया और झारखंड के रिंची गांव के 72 आदिवासियों को वन अधिकार इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वहां कोयला का भंडार है।     

लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी हम आदिवासियों के अधिकरों की रक्षा हो सकती है। भारत में हमारे लिए वन अधिकार कानून, पेसा कानून एवं भूमि सुरक्षा संबंधी कई अच्छे कानून हैं और संवैधानिक प्रावधान भी है, जिन्हें जमीन पर हू-ब-हू लागू करने से हमारी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी। इसलिए मैं इस ग्लोबल लैंडस्केप फोरम के माध्यम से भारत सरकार से मांग करता हॅं कि इन कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों को जमीन पर सख्ती से लागू करे। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी आदिवासी घोषणा-पत्र एवं आई.एल.ओ. कान्वेंशन 169 को लागू करे। मैं निवेदन करता हॅं कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा नियुक्त आदिवासी मामलों के रपटकर्ता ‘‘विकी’’ भारत का दौरा करें। इसका हम आदिवासियों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। 

मैं अंत में कहना चाहता हॅं कि जब हम आदिवासी लोग अपनी भूमि, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए आंदोलन करते हैं तब सरकारी महकमा और तथाकथित मुख्यधारा के लोग हमें विकास विरोधी कहते हैं और हमारे उपर राष्ट्रद्रोही का तमगा लगाते हैं। मैं उन्हें अक्सर कहता रहता हॅं और आज भी कह रहा हॅं कि हम आदिवासियों को विकास विरोधी और राष्ट्रद्रोही कहना बंद कीजिये। हमलोग न विकास विरोधी हैं, न राष्ट्रदोही और न ही स्वार्थी। हमलोग न सिर्फ अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है बल्कि सभी लोगों का भविष्य हमारे संघर्ष पर निर्भर है क्योंकि जिस दिन हमलोग संघर्ष करना बंद कर देंगे उस दिन सरकार और कारपोरेट मिलकर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को बेच कर खत्म कर देंगे। इसलिए हम आदिवासियों पर आरोप लगाने के बजाय आप हमारे संघर्ष का हिस्सा बनें।