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रविवार, 3 नवंबर 2019

सामूहिक आत्महत्या के लिए बेचैन लोग?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारत की राजधानी दिल्ली विगत कुछ वर्षों से निरंतर ‘‘गैस चैंबर’’ में तब्दील होती जा रही है, जहां पैसा खर्च किये बगैर शुद्ध हवा मिलना असंभव हो चुका है। अक्टूबर से दिसंबर महीने तक प्रतिवर्ष शहर की हवा इतनी जहरीली हो जाती है कि लोगों को अपने घरों से बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की सुरक्षा हेतु विद्यालयों को बंद करना पड़ता है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। इस वर्ष वायु प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ गया कि सरकार को ‘‘हेल्थ इमरजेंसी’’ घोषित करते हुए लाखों की संख्या में मास्क बांटना पड़ा। इतना कुछ होने के बावजूद लोग ‘‘दीपावली और छठ पूजा’ में बेहिस्साब पटाखे जलाकर खुशियां मनाये। ऐसा प्रतीत होता है कि लोग सामूहिक आत्महत्या करने के लिए बेचैन हैं। हवा जहरीली हो जाये, धरती का तापमान बढ़ जाये या धरती पर तबाही आ जाये उसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे जबतक जिन्दा हैं तबतक धर्म और परंपरा के नाम पर सबकुछ करेंगे जो करते आये हैं। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर बहस छेड़िये तो उसके जवाब में धर्म आधारित राजनीति प्रबल हो जाती है। 

मैं सोच में पड़ जाता हॅ कि सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा में होने का दंभ भरने वाले ये लोग क्यों बेवकूफों जैसे व्यवहार करने लगते हैं? वे थोड़ा भी क्यों नहीं सोचते हैं? क्या उन्हें अपने बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचना चाहिए? यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की समस्या है? क्या हमें ग्लोबल वार्मिंग के कारण हमारे देश में होने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सचेत नहीं होना चाहिए? अब पानी की तरह ही मुफ्त में मिलने वाली हवा को हमारे देश में कनाडा की कंपनी ‘‘विटालिटी एयर’’ एवं अस्ट्रेलिया की कंपनी ‘‘औजेर’’ ने बोतलों में बंदकर उसके उपर ‘‘हिमालय की शुद्ध हवा’’ का रैपर लगाकर 550 से 1500 रूपये प्रति बोतल बेच रहे हैं। एक व्यक्ति को औसत प्रति मिनट 8 से 10 लीटर हवा चाहिए। शुद्ध हवा लेने के लिए हमें प्रति व्यक्ति को प्रति मिनट कम से कम 500 रूपये खर्च करना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति पैदा होने के बाद भी यदि हम संवेदनशील नहीं होगें तो हमें कौन बचा सकता है? क्या हम सरकार के भरोसे अपना भविष्य को दांव पर लगा सकते हैं? 

हाल ही में क्लाइमेट इंपैक्ट और यूनिवर्सिटी आफ शिकागो के टाटा सेंटर फार डेवलपमेंट ने ‘‘जीवन एवं अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव’’ का अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी रफतार से बढ़ता रहा, तो 2050 तक भारत का औसत तापमान चार डिग्री तक बढ़ सकता है, जिसके कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख लोग बेमौत मारे जायेंगे। वायु प्रदूषण से होने वाले बीमारियों के कारण हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 7 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं लेकिन इस गंभीर विषय पर कहीं चर्चा तक नहीं होती है। यह मसला अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती। यदि हमलोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव को इसी तरह दरकिनार करते रहे तो वह समय दूर नहीं है जब देश में अत्याधिक गर्मी से लाशों की ढेर लग जायेगी लेकिन तब हमारे पास रोने-चिल्लाने के अलावा और कुछ नहीं बचेगा। क्या हमलोग तबतक चर्चा करना, सोचना और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए काम करना शुरू नहीं करेंगे जबतक आफत हमारे दरवाजे पर नहीं पहुंचती है?   
  
इससे पहले 8 अक्टूबर 2018 को संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को वातावरण से खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके से खत्म करते हुए हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन पूंजीवाद पर सवार लोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन हेतु विकसित देशों के उपर जिम्मेवारी मढ़कर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को बाजार भाव से बेचकर मुनाफा कमाने में लगे हुए है।  

हकीकत यह है कि हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती को नहीं बचा सकते हैं। जब धरती ही नहीं बचेगी तो हम कहां रहेंगे? जब लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे तब विकसित देशों को कोसने से काम चलेगा? हमें जलवायु संकट से बचने के लिए कदम उठाना होगा। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी। 2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। 

इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है एवं झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर प्रतिबंधित जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

जलवायु संकट के कारणों में ही इसका समाधान भी छुपा हुआ है। दिल्ली के गैस चैंबर बनने का प्रमुख कारण हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश के किसानों के द्वारा पराली जलाना बताया जाता है, जिसका इसमें 46 प्रतिशत योगदान है। लेकिन हमें 54 प्रतिशत प्रदूषण का कारण कारण भी ढ़ूढ़ना होगा? पराली जलाना तात्कालिक कारण हो सकता है। लेकिन जलवायु संकट का सबसे बड़ा कारण है औद्योगिकरण और प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन। कोयला, बाक्साईट और लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए अंधाधुंध जंगलों को उजाड़ा जा रहा है, काक्रीट जंगल बसाने के लिए जलस्रोतों को खत्म किया जा रहा है और कोयला, डीजल और पेट्रोल का बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है, जिससे वातावारण में ग्रीन हाउस गैस भरता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैस, जिससे कार्बन डाई आक्साइट, जल-वाष्प, मिथेन, आदि हैं, जो वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृति अधिक बढ़ाते हैं, जिसे धरती गरम होती जा रही है, जो धरती के तबाही और जीवन की समाप्ति का इशारा है। यदि धरती और जीवन को बचाने के लिए हमने अभी कदम नहीं उठाया तो बाद में बहुत देर हो चुकी होगी।  

जलवायु संकट आधुनिक विकास की देन है, जिसका समाधान सरकारों के भरोसे कभी संभव नहीं है क्योंकि आज का लोकतंत्र कारपोरेट का गुलाम हो चुका है। यही कारपोरेट जगत चुनाव में अरबों रूपये पानी की तरह बहाकर सरकार बनाता है। इसलिए लोकतंत्र के आड़ में कारपोरेट के पैसे से बनी सरकारें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कभी नहीं रोक सकते हैं। इसके लिए देश के प्रत्येक व्यक्ति को सजग होकर दो स्तर पर कदम उठाना होगा। जंगलों को उजाड़ने, खनिज सम्पदा का दोहन करने एवं पेड़ों को काटकर काक्रीट का जंगल खड़ा करने की नीतियों को खत्म करने के लिए सरकारों पर निरंतर दबाव बनाना होगा। इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जरूरतों को कम करना और वातावरण को दूषित करने वाले वस्तुओं का उपयोग बंद करना तथा कोयला, रसोईगैस, पेट्राल-डीजल सहित प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग करना क्योंकि जलवायु संकट का एकमात्र समाधान है प्राकृतिक संसाधनों यानी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा की सुरक्षा। हम आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हेतु निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। अब हमारे देश के तथाकथित सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा वालों को तय करना है कि वे बचना चाहते हैं या सामूहिक आत्महत्या करना।  

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

क्या हम जंगल उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

अपने घर के पास साग-सब्जी उगाने हेतु बारी बनाने के लिए पलामू टाईगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित पुटूस की झाड़ी काटने के कारण परहिया आदिवासी समुदाय के अगुआ खरिदन परहिया को 55 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। वन विभाग ने उनके उपर जंगल को बर्बाद करने का आरोप लगाकर उसे जेल भेज दिया था। जेल से बाहर आने के बाद वे न्यायालय में मुकदमा लड़ते रहे। अंततः न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। लेकिन वह दर्द आज भी उनके दिल में बरकरार है। जब से उन्होंने यह खबर सुना है कि मंडल डैम के निर्माण हेतु पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र के 3.5 लाख पेड़ काटे जायेंगे, उनका गुस्सा उफान पर है। वे कहते हैं कि वन विभाग कहां चला गया, जिसने हमें सिर्फ पुटूस की झाड़ी काटने के लिए जेल भेज दिया था? हम जंगल बचाने के लिए लड़ेंगे। रैली करेंगे, धरना करेंगे और चक्का जाम करेंगे। 

यहां मसला सिर्फ यह नहीं है कि अपनी आजीविका के लिए वन संपदा का उपयोग करने वाले आदिवासियों पर वन विभाग लगातार अत्याचार एवं कानूनी कार्रवाई करती है लेकिन विकास के नाम पर वह स्वयं जगलों को उजाड़ती है। असली मसला यह है कि क्या हमलोग देश के जंगलों को विकास, आर्थिक तरक्की, देशहित या कोई और टैग लगाकर उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं? क्या विश्व में हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को हम अपनी आंखें मूंदकर नकार सकते हैं? हम लोग विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित के नामपर कब तक केन्द्र और राज्य सरकारों को बचा-खुचा जंगलों को उजाड़ने देंगे? क्या हमें खरिदन परहिया जैसे जंगलों को बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासियों के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए? क्या देशभर में जंगल बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासी सिर्फ अपनी आजीविका के लिए लड़ रहे हैं? क्या आदिवासियों के संघर्ष में धरती और हमारा भविष्य छिपा हुआ नहीं है?    

हम सबसे पहले यह समझ लें कि खरिदन परहिया क्यों गुस्से में है? 5 जनवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंडल डैम से संबंधित पाईपलाईन योजना की आधारशिला रखी। इसके बाद केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। काटे जाने वाले पेड़ों में ज्यादातर साल के पेड़ हैं। हास्यास्पद बात यह है कि वन विभाग ने सिर्फ बड़े पेड़ों को गिना है जबकि यह प्राकृतिक जंगल का इलाका है, जिसमें हजारों किस्म की वनस्पितियां मौजूद हैं, जो डैम के निर्माण से स्वतः ही डूबकर समाप्त हो जायेंगे। 

हैरान करने वाली बात यह है कि इसी डैम के लिए वन विभाग ने 1981-82 में लगभग 3.5 लाख पेड़ों को काट दिया था, जिसके एवज में अबतक एक पौधा भी नहीं लगाया है। अब वन विभाग कह रही है कि मंडल डैम के डूब क्षेत्र में काटे जाने वाले पेड़ों के एवज में पलामू, गढ़वा एवं लातेहात जिले में दो हजार हेक्टेयर में पौधरोपन करेगा, जिसके लिए जलसंसाधन विभाग ने उसे 461 करोड़ रूपये भी दे दिया है। मंडल डैम के डूब क्षेत्र में 2266.72 एकड़ वनभूमि हैं। इसलिए अब एक बार फिर से वन विभाग ने भारत सरकार के ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन’’ मंत्रालय से पेड़ काटने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। काटे जाने वाले पेड़ों में सैकड़ों पेड़ 40-50 फुट उंचे तथा 1-1.5 व्यास की मोटाई के हैं। सवाल उठता है कि क्या वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जंगल बचाने के लिए बनाया गया है या पेड़ काटने और जंगल बर्बाद करने हेतु आदेश पारित करने के लिए? 

ज्ञात हो कि 1970 के दशक में उतरी कोयल जलाशय परियोजना के तहत मंडल डैम निर्माण की योजना बनायी गयी थी, जिसकी लागत 300 करोड़ रूपये थी, जो झारखंड गठन के उपरांत 1622 करोड़ रूपये हो गई थी। अब यह राशि बढ़कर 2391 करोड़ रूपये हो गयी है। डैम के निर्माण में अभी तक 792 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। 1990 के दशक में उग्रवादी हिंसा में एक इंजीनियर के मारे जाने के बाद कार्य बंद कर दिया गया था। अब एक बार फिर से मंडल डैम का निर्माण कार्य शुरू हो रहा है, जिसके लिए 2855 वर्ग किलोमीटर जमीन का अधिग्रहण होगा, जिसमें 15 गांव के 1600 परिवार विस्थापित होंगे। इस परियोजना से 111,521 हेक्टेयर जमीन सिंचित होगा, जिसमें झारखंड का मात्र 19,604 और बिहार का 91,917 हैक्टेयर भूमि शामिल है। यहां किस राज्य के किसानों को कितना फायदा मिलेगा यह मुद्दा नहीं है बल्कि मूल मुद्दा यह है कि क्या हम जंगलों को उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?
हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगल को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है। 

इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौपने के लिए निरंतर प्रयासरत है। छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है, जिसके खिलाफ आदिवासी संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर नो गो एरिया वाले जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। हमें मालूम होना चाहिए कि पर्यावरण संतुलन के लिए देश के कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत हिस्सा में जंगल होना अनिवार्य है। फोरेस्ट सर्वें रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 21.6 प्रतिशत वनक्षेत्र है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास के नाम पर डैम में डुबोना और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने 8 अक्टूबर 2018 को जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया है कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए पर्यावरण से 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके यानी ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर, जंगल बचाकर एवं वनक्षेत्र को विस्तार करके ही हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती नहीं बचा सकते हैं। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी।

2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमें समझना होगा कि चुनावी वादा खोखला हो सकता है लेकिन यदि हम पेरिस समझौता को भी चुनावी वादा समझने की भूल की तो आगामी एक दशक के बाद धरती पर कयामत आ जायेगा। हम लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे। यदि हम अपना अच्छा भविष्य चाहते हैं तो पेड़ काटने तथा जंगलों और पहाड़ों को उजाड़ने से बचाना होगा।  हमें केन्द्र एवं राज्य सरकारों को जिम्मवार बनाना होगा। इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है।   

स्वीडेन की 16 वर्षी क्लाईमेट एक्टिविस्ट ग्रेटा थन्बर्ग, जिन्होंने धरती को बचाने के लिए स्कूल जाना बंद करते हुए संयुक्त राष्ट्र पहुंची और दुनिया के नेताओं को यह सवाल पूछते हुए स्तब्ध कर दिया था कि आप ने अपने खोखले शब्दों से मेरा भविष्य छीन लिया है। आपकी हिम्मत कैसे हुए? क्या भारत के 130 करोड़ लोगों के बीच कोई है जो हमारे देश के जंगलों को उजाड़ने वाली केन्द्र एवं राज्य सरकारों से सवाल पूछ सके कि जंगलों को उजड़ने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? हमारे भविष्य को दांव पर लगाने की हिम्मत आपको कहां से आयी? आप कब विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित की ढकोसला बंद करेंगे? हमें हर हाल में पेड़ काटना और जंगलों को उजाड़ना बंद करना होगा। यदि हम आज जंगल को बचाने के लिए उठ खड़े नहीं हुए तो समझ लीजिये आने वाली पीढ़ी का कोई भविष्य नहीं है।   

रविवार, 17 मार्च 2019

जंगल से प्यार

ग्लैडसन डुंगडुंग













जंगल से प्यार है
साहब तुम्हें?
बता सकते हो
कितने हरे पेड़ हैं
तुम्हारे काक्रीट के जंगल में?
नकली प्यार दिखाना
बंद करो साहब
हमारे साथ
हम जानते हैं
कटवाकर पेड़ तुमने
सजाया है महल अपना
आंगन में तुम्हारा
पेड़ कहां है साहब?
आकर देखो
घर हमारा
हरे पेड़-पौधों से
कैसे सजाया है हमने
आंगन अपना
बंद करों साहब
हमें अतिक्रमणकारी बताकर
बेदखल करना जंगलों से
याद रखना साहब
हम बेदखल हो गये
तो जंगल खत्म हो जायेगा
और तुम भी। 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

असूर आदिवासियों को चिढ़ाता विकास

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड के नेतरहाट की वादियों में स्थित टुटवापानी विस्थापन विरोधी जनांदोलन का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। इस क्षेत्र के आदिवासियों ने पिछले तीन दशक से भारतीय सेना के लिए प्रस्तावित ‘नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज’ परियोजना को रोक कर रखा है। ’’जान देंगे, जमीन नहीं देंगे’’। यही वह नारा है, जिसने सेना के आफसरों और जवानों को भयभीत कर रखा है। लेकिन विडंबना यह है कि बाक्साइट पत्थरों से भरे सैकड़ों ट्रक प्रतिदिन इसी टुटवापानी मोड़ से गुजरते हुए शहर की ओर जाते हैं। इस क्षेत्र में उरांव, मुंडा, बिरजिया, नगेशिया और असूर आदिवासी रहते हैं लेकिन ट्रकों से ढोये जा रहे बाक्साइट के अधिकांश पहाड़ असूरों के हैं। बाक्साइट के पहाड़ों को तोड़-तोड़कर और जमीन के अंदर पड़े बाक्साइट के पत्थरों को कोड़-कोड़कर बेचा जा रहा है विकास के नाम पर। टुटवापानी मोड़ से असूरों की दुनिया शुरू होती है। असूर आदिवासी यहां पठारों के उपर निवास करते हैं। 

ऐतिहासिक रूप से असूरों को यहां का प्रथम निवासी माना जाता है, जिन्होंने सबसे पहले लोहे की खोज की थी। असूरों के वंशज बताते हैं कि असूर दंपति सुकरा और सुकरी जब पत्थरों से बनाये गये चुल्हे पर खाना पकाने लगे तब आग की गर्मी से पत्थर पिघलकर लोहा बन गया। उन्होंने उस लोहा से तीर और कुल्हाड़ी बनाया। धीरे-धीरे यह पेशा का रूप लिया और असूरों की निर्भरता औजार बनाकर बेचने पर हुई। लेकिन जब टाटा जैसे कंपनी कृषि औजार बनाकर बेचने लगे तब असूरों के द्वारा बनाये गये औजारों की मांग खत्म हो गई। इसके बाद इन्होंने अपनी आजीविका को पूर्णरूप से खेती पर निर्भर बना दिया। लेकिन आज भी वे  हथौड़ा को भगवान मानकर उसकी पूजा करते हैं। पूंजीवाद के समर्थक कहते हैं कि बड़े उद्योग रोजगार देते हैं लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। कड़वा सच्च यह है कि बड़े उद्योग आदिवासियों से न सिर्फ उनकी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधन छीनते हैं लेकिन उनका पारंपरिक रोजगार भी खत्म कर देते हैं। इस तरह से आदिवासियों को संसाधनविहीन किया जाता है।

28 दिसंबर 2018 को हम 21 लोगों का एक समूह, जिसमें शोधकर्ता, लेखक एवं एक्टिविस्ट थे, आदिवासियत को समझने के लिए जंगलों की ओर निकल पड़े थे। जब हमलोग टुटवापानी पहुंचे तब शांम के लगभग सात बज रहे थे। लेकिन इलाका में शनाटा पसरा हुआ था। यहां का तापमान रात में काफी नीचे गिर जाता है। इसलिए लोग काम का निपटाकर शांम को जल्दी ही अपना-अपना बिस्तर पकड़ लेते हैं। हमारी गाड़ी जैसे ही मुख्यसड़क को छोड़कर असूरों की दुनिया में प्रवेश करने वाली कच्ची सड़क पर उतरी, गाड़ी की लाल-पीली रोशनी में बाक्साइट के धुलकण तैरने लगे। सड़क और गड्डढ़े सामानांतर चल पड़े। सड़क पर पत्थर भी दिखाई देने लगे। ये बाक्साइट के पत्थर हैं। जब ट्रक चलते-चलते सड़कों को गडढ़ों में तब्दील कर देते हैं तब बाक्साइट के कम अंश वाले पत्थरों को इन गड्डढ़ों में डालकर सड़क बनाया जाता है। यहां प्रतिदिन सुबह चार बजे से लेकर रात दस बजे तक बाक्साइट की ढुलाई होती है। इसी से आप समझ सकते हैं कि पहाड़ों को बेचने की कितनी जल्दबाजी है। जंगल के बीच रात के अंधेरे को चीरते हुए अलग-अलग हिस्से से चार स्थानों से निकलने वाले प्रकाश और बीच में रंगबिरंगी छोटी-छोटी बल्ब की खुबशुरत प्रकाश थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दिखाई पड़ते हैं। ये असल में बाक्साइट के पहाड़ों को ढोकर जंगल से शहर की ओर जा रहे ट्रक हैं। हर शांम ऐसे ही रोशन होता है जंगल लेकिन यह असूरों को थोड़ी सी भी खुशी नहीं दे पाता।  

असूरों की दुनिया में बाक्साइट खनिज की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता उनके लिए कलंक बन गया है। उनको अपने पूर्वजों की जमीन से बेदखल होना पड़ रहा है। सरकारी दस्तावेज में असूर समुदाय को आदिम जनजाति का दर्जा दिया गया है। केन्द्र और राज्य सरकारें दावा करते हैं कि वे इनके कल्याण के लिए लगे हुए है लेकिन पिछले सात दशकों में इनका कल्याण नहीं हो पाया है बल्कि इनकी जनसंख्या निरंतर घटती जा रही है। वे अब सिमटकर सिर्फ 7783 जन बचे हुए हैं। असूरों का इलाका मूलतः गुमला, लोहरदगा, लातेहार और पलामू जिले तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र उंचाई पर मौजूद समतल स्थल है इसलिए इसे पाट कहा जाता है। यहां अधिकांश गांवों के नाम के साथ पाट शब्द जोड़ा गया है। चारों तरफ बाक्साइट ही बाक्साइट है। लेकिन बाक्साइट खनन से उन्हें काफी नुक्शान हुआ है। सरकार, खनन कंपनियां और खनन माफिया यहां देश के संविधान और कानूनों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन करते हैं।  

रात के अंधेरे में प्रमुख कच्ची सड़क से जुड़े प्रत्येक गांव का सड़क एक ही तरह के दिखाई पड़ते हैं क्योंकि इनमें ट्रक, ट्रैक्टर और धरती कोड़ मशीनों के अवागमन के निशान हैं। गांव का रास्ता दिखाने के लिए असूर दंपति हमारे साथ हैं लेकिन हमलोग जंगल में दिशाहीन होकर एक घाटी पर पहुंच जाते हैं। हमें भटकाने के जिम्मेवार ट्रक और धरती कोड़ मशीन हैं असूर दंपति नहीं। ये असूर दंपति यहां आखिरी बार कुछ एक साल पहले आये थे तब स्थिति कुछ अलग थी। बाक्साइट उत्खनन के कारण आज उन्हें भी अपना इलाका पहचानने में काफी कठिनाई हो रही है। अंततः आठ बजे रात को हमलोग चैरापाट पहुंचते हैं। यह असूरों का गांव था लेकिन अब यह मुंडा बहुल हैं। लोहे की खोज में अधिकांश असूर परिवार यहां से कहीं और चले गये। हालांकि विद्यालय में काफी संख्या में असूर बच्चियां अब भी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, जो आस-पास के गांवों के हैं। लंबी यात्रा के कारण सभी लोग थककर चूर हो गए है। इसलिए खीचड़ी भात खाकर सो जाते हैं।

अगले दिन, आवासीय विद्यालय के टूटे खिड़की से तीर की तरह प्रवेश कर रहा सूर्य की रोशनी हमें बता रहा है कि काफी पहले ही सुबह हो चुकी है। विद्यालय का पहरेदार पांच बजे ही नहाधोकर तैयार है हमें जंगलों और पहाड़ों के बीच झरने के पास ले जाने के लिए। बिस्तर पर पड़े हुए आंख खोलते ही खंडहर के अंदर होने का एहसास होता है। खिड़कियां टूटे हुए हैं। बरसात में पानी टपकने के निशान स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। कई जगहों पर छट का भीतरी हिस्सा टूटकर गिरा है। आवासीय विद्यालय में वर्ग आठ तक की 88 बच्चियां रहती हैं। वे छुट्टिया मनाने अपने-अपने घर गये हुए हैं। 

विद्यालय परिसर के अंदर मौजूद चपाकल में पानी नहीं निकलता है और पानी टंकी में कभी पानी नहीं आया। विद्यालय के देखभाल का जिम्मा संभालने वाले मेलन असूर बताते हैं कि पानी की टंकी सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए बनाया गया है। यहां सिर्फ दो शौचालय हैं लेकिन उपयोग लायक नहीं। ये बच्चियां सुबह-सुबह शौच करने के लिए जंगल जाती हैं। झरना में नहाती हैं, कपड़े धोती हैं और उसी झरना के पानी को पीती भी हैं। यहां स्वच्छ भारत अभियान का नमोनिशानी नहीं है। लकड़ी के जलावन से खाना पकाया जाता है इसलिए कई कमरे में सखुआ की लकड़ी भर दी गई है। विद्यालय के चारो तरफ लगभग आठ-दस सोलर लाईट लगाये गये हं, लेकिन बैट्री के अभाव में ये सिर्फ शोभा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। कक्षा एक से आठ तक के बच्चियों को पढ़ाने के लिए सिर्फ तीन सरकारी शिक्षक हैं। इसे आसानी से समझा जा सकता है कि इन बच्चियों का भविष्य कैसे गढ़ा जा रहा है। 

विद्यालय कैम्पस से बाहर निकलते ही इलाका लाल दिखाई पड़ता है। विद्यालय के पास बाक्साइट खनन कार्यालय है, जहां ट्रक और धरती कोड़ मशीन खड़े हैं लेकिन कंपनी का कोई साईनबार्ड नहीं है। यह पहला इशारा है कि यहां सबकुछ अच्छा नहीं है। अमूमन खनन लीज मिलते ही खनन कंपनियां सबसे पहले अपना साईनबोर्ड गाड़कर घोषणा कर देते हैं कि यह इलाका उनका है। यहां की बेनामी कंपनियां ऐसे नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पकड़ाने का डर सताता है। थोड़ा आगे बढ़ने पर जंगल दिखाई पड़ते हैं और जंगल के बीच-बीच में बाक्साइट निकलने के लिए खुदाई की गई गड्डढ़े और लाल मिट्टी। ऐसा दिखाई पड़ता है मानो कोई रात में आकर बाक्साइट चुराकर भाग गया हो। गांव के लोग इसका राज खोलते हैं। यहां दो तरह का खनन होता है एक कानूनी और दूसरा गैर-कानूनी। इस क्षेत्र में अदित्या बिड़ला की बाक्साइट कंपनी ‘हिंडल्को’ सरकार से लीज लेकर खनन कार्य कर रही है। हिंडल्को बाक्साइट की सबसे बड़ी उत्खनन कंपनी है, जो प्रतिवर्ष 2.23 मिलियन टन बाक्साइट का उत्खनन करती है। लेकिन कई निजी बेनामी कंपनियां गैर-कानूनी तरीके से खनन कार्य कर रहे हैं। 
चैरापाट में आदिवासियों की रैयती जमीन और जंगलों के बीच-बीच में खोद-खोदकर बाक्साइट निकाला गया है और अब उत्खनन का काम जंगल में चल रहा है। इसके लिए बेनामी कंपनियों के पास एक छोटा सा कार्यालय, कई ट्रक और धरती कोड़ मशीन हैं। इन्होंने बड़ी चलाकी से स्थानीय युवाओं को अपने जाल में फंसा कर रखा है। ये कंपनियां स्थानीय युवाओं को ठेकेदार के रूप में खड़ा किये हुए हैं, जिनका काम बाक्साइट खनन हेतु रैयतों को जमीन देने के लिए तैयार करना होता है। इसके बदले में कंपनी इन्हें प्रति ट्रक 1500 रूपये देती है तथा जमीन मालिक को 200 रूपये। ये बेनामी कंपनियां कच्चा माल को हिंडल्को जैसी कानूनी लीजधारियों को 9500 रूपये प्रति ट्रक की दर से बाक्साइट बेचते हैं। यदि जमीन मालिक, स्थानीय ठेकेदार, मजदूर, ढुलाई एवं आफसर व नक्सली लेवी के खर्च को अलग कर दिया जाये तो ये बेनामी कंपनी के मालिक प्रति ट्रक कम से कम 5000 रूपये कमाते हैं। ये बेनामी कंपनियां वन संरक्षण कानून 1980, वन अधिकार कानून 2006 एवं पेसा कानून 1996 के तहत अनुमति लिये बगैर ही खनन कार्य कर रहे हैं। यह संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधान, वन संरक्षण कानून 1980, वन अधिकार कानून 2006 एवं पेसा कानून 1996 तथा सुप्रीम कोर्ट के समता एवं नियमगिरि जजमेंट का उल्लंघन है। यहां ग्रामसभा से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? क्या गांव वाले सवाल नहीं उठाते हैं? क्या बड़े पैमाने पर हो रहे गैर-कानूनी उत्खनन के बारे में सरकार को नहीं पता? इनमें से कुछ सवालों का जवाब हमें बहुत जल्द ही मिल जाता।   

गांव वाले बताते हैं कि 25 दिसंबर 2018 की रात यानी हमारे गांव पहुंचने से सिर्फ तीन दिन पहले ग्यारह माओवादी लड़ाके विद्यालय के पास स्थित खनन कंपनी के दफ्तर में पहुंचे थे। उनके लिए देसी मुर्गा पकाया गया था। वे खाना खाने के बाद निकल पड़े। गांव वालों ने हमें बताया कि वे पास के ही जंगल में हैं और हमारे मौजूदगी के बारे में उनको खबर मिल चुकी है। यदि हम उनके लिए खतरा पैदा करेंगे तो वे हमारे उपर हमला करेंगे। जब खनन माफिया और मोआवादियों के बीच इस तरह का गांठजोड़ हो तो कौन व्यक्ति या ग्रामसभा उनके खिलाफ आवाज उठा सकता है? क्या आवाज उठाने वालों को सरकार संरक्षण दे पायेगी? माओवादियों को आदिवासियों का मसीहा बताने वाले बौद्धिक जगत के लोगों के लिए यह एक तमाचा है। ये माओवादी यहां सड़क बनाने नहीं दे रहे हैं। इसलिए असूर आदिवासियों को 20 से 25 किलोमीटर की दूरी बाक्साइट पत्थरों से मुठभेड़ करते हुए गुजरना पड़ता है। माओवादियों को लगता है कि सड़क बनते ही खनन माफिया के साथ उनका गांठजोड़ टूट सकता है। पुलिस कभी भी यहां पहुंच सकती है। उनका सुरक्षित स्वर्ग असुरक्षित हो जायेगा। यहां माओवादियों ने बाक्साइट उत्खनन को उगाही का जड़िया बना दिया है। वे अब गांव के आदिवासियों के साथ बैठक नहीं करते हैं बल्कि उनकी बैठक खनन माफिया के साथ होती है। अब आप ही समझ लीजिये के वे किनके लिए लड़ रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वे असूरों के लिए नहीं लड़ रहे हैं बल्कि अपना पाकेट भर रहे हैं और पूंजीपतियों का भला कर रहे हैं।

अब गांव के आदिवासियों की आजीविका पर सवाल खड़ा हो गया है क्योंकि खेती लायक टांड को बाक्साइट उत्खननकर बर्बाद कर दिया गया है। अभी जंगलों के बीच और छोटे-छोटे टिल्हों पर खुदाई की जा रही है। लेकिन जब खेतों की खुदाई की जायेगी तब लोग क्या करेंगे? एक बार खुदाई हो गई तो खेत खेती करने लायक नहीं रह जायेंगे और प्रति ट्रक मिले 200 रूपये से कितना दिन जिन्दा रहा जा सकता है? यहां के आदिवासी पूर्णरूप से खेती पर ही निर्भर हैं। खेतों में धान के कटे तने और लकड़ी से बनाये गये मचान में मवेशियों के लिए सुरक्षित रखा गया पुआल इस बात के सबूत हैं कि इस वर्ष यहां धान की फसल अच्छी हुई है। यहां के आदिवासी खेती से खुश हैं। अपने दहिने हाथ के अंगली से इशारा करते हुए मेलन असूर बताते हैं कि यदि इन खेतों में बाक्साइट उत्खनन शुरू होता है तो यहां के आदिवासियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इन आदिवासियों के अस्तित्व के बारे में किनको चिंता है? लेकिन हकीकत में यहां कोई भी सुरक्षित नहीं है। आदिवासी, जंगल--पहाड़, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और नदी-झरना सभी का अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है। आदिवासी खनन कंपनियों के द्वारा जंगल, पहाड़ और जमीन से अलग कर दिये गये पत्थरों को बारी का घेरा बनाकर अपनापन का एहसास कराते हैं। 

गांव के बीच घरों से गुजरते हुए आदिवासी बच्चों के मन में बन रही तस्वीर उभर आती है। अब इन बच्चों के चित्रकला में फल-फूल, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी गायब हो चुके हैं। यहां प्रत्येक घर के दिवारों पर बाक्साइट से लदे ट्रक और धरती कोड़ मशीनों की तस्वीर भरी पड़ी है। मन में सवाल उठता है कि क्या अब ये बच्चे अपना भविष्य जमीन को बचाने के बजाय उसे कोड़कर बाक्साइट के रूप में वहां छिपे खजाना को बेचकर पैसा कमाने में देख रहे हैं? मैं सोचता हॅं कि इस क्षेत्र के विद्यालयों में शिक्षक बच्चों को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या पढ़ाते होंगे? क्या वे कभी बाक्साइट उत्खनन का पर्यावरण पर प्रभाव को लेकर बात करते हैं?

हमलोग बाक्साइट के पत्थरों से टकराकर गांव के नीचे ठंढ़ से ठिठुरते हुए झरना के पास पहुंचते हैं। बाक्साइट के पहाड़ों से निकलते हुए झरना का पानी खेतों की ओर बहते हुए नदी में मिल जाती है। नदी का पानी काफी ठंढ़ है। सूखी घास पर पडे ओस के बूंदें बर्फ में तब्दील होकर पूरे इलाके को सफेद चादर की तरह ढाक दिये हैं। नदी का पानी छूने भर से बिजली के करेंट की तरह झटका देते हैं।  गांव के आदिवासी पास के जंगल में शौच करने के लिए जाते हैं और इसी पानी का उपयोग करते हैं।  हम भी उनका ही अनुशरण करते हैं। यहां गांव में किसी के घर में शौचालय नहीं है। हालांकि झारखंड सरकार ने बिशुनपुर प्रखंड को खुले में शौच मुक्त प्रखंड के रूप में घोषित कर दिया है। गांव के लोग कहते हैं कि शौचालय बनाने से भी नीचे से पानी ढ़ोकर कौन यहां लायेगा। खाना बनाने और पीने के लिए लाना ही काफी है। हमारे साथियों को खुल्ले में शौच करते वक्त तस्वीर लेने की मनाही है क्योंकि ये तस्वीर राजसत्ता को असाहय कर सकते हैं और भारतीय मीडिया हमें मोदी विरोधी गैंग साबित करने में अपना वक्त बर्बाद कर सकती है। गांव के आदिवासी बच्चियां और महिलाएं झरना  के पानी में बर्तन धोती हैं और बाक्साइट को गलाकर बनाये गये अल्मुनियम के बर्तन में भरकर खाना बनाने और पीने के लिए सिर में ढोकर ले जाती हैं। इस पानी में काफी मात्रा में मिनरल है। 

इस इलाके में कोई अस्पाताल नहीं है। गांव के लोग बताते हैं कि बीमार पड़ने पर वे बिशनपुर जाते हैं जो गांव से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां जाने के लिए आवागमन की कोई सुविधान नहीं है। इसलिए लोग बाक्साइट के ट्रकों को ही भाड़ा देकर बस की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह ट्रक चालाक और सह-चालाक के उपरी अमदनी का बड़ा स्रोत है। मेलन असूर बताते हैं आवासीय विद्यालय के बच्चे बीमार पड़ते है तो उन्हें उनके माता-पिता को सौप दिया जाता है क्योंकि यहां इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी अस्पताल 40 से 50 मिलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। खनन कंपनियों को विद्यालय या अस्पताल चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। यदि यहां के आदिवासी बाक्साइट पहाड़ों को लादकर ले जाने वाले ट्रकों को रोकते तब उन्हें अपना सामाजिक दायित्व याद आती और वे विद्यालय एवं अस्पताल खोलने का प्रयास करते। लेकिन इन ट्रकों को रोकने की कोई साहस नहीं करता है। इस क्षेत्र में पांच सरकारी आवासीय विद्यालय हैं, जिनमें लड़कों के लिए तीन एवं लड़कियों के लिए दो है। लड़कों के विद्यालयों में छात्रों के लिए संख्या भी ज्यादा निर्धारित किया गया है। यह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं का नारा देने वाली सरकार के द्वारा लिंगभेद का एक अद्भूत नमूना है। आवासीय विद्यालय, जोभीपाट में प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत हुए चैत असूर बताते हैं कि इन विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है, शौचालय की व्यवस्था नहीं है और विद्यालय भवन जर्जर हालत में हैं। वे कहते हैं, ‘‘सिर्फ कागज में ही सबकुछ अच्छा है।’’ 

गांव में बिजली के पोल गाड़े गये हैं और कुछ पोलों को बिजली के तारों से एक-दूसरों को जोड़ा गया है लेकिन कई पोलों के बीच तार टूटे हुए हैं। झारखंड सरकार ने पहले ही घोषणा कर दिया है कि उसने राज्य के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंचा दिया है। भारत के आजादी के 70 साल बाद गांवों में बिजली पहुंचाने की खबरे अखबरों में सुर्खियां बनी सो बनी लेकिन राज्य सरकार ने विज्ञापन में करोड़ों रूपये खर्च कर अखबार और टीवी चैनलों के माध्यम से वोटरों को बताया कि झारखंड के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच दी गई है। अब कौन सा अखबार और टीवी चैनल वाले सच जांचने के लिए गांव जाते हैं? असल में सरकारी विज्ञापन मीडिया घरानों को दिया गया एक तरह का सरकारी रिश्वत है ताकि वे सच्चाई को छुपाकर रखें और सिर्फ विकास का ढोल पीटते रहें। लेकिन सच्चाई को कबतक छुपाया जा सकता है? 
       
आदिवासियत को समझने के लिए जंगल, खेत और जलस्रोतों के पास चिंतन करने, विकास के नामपर बाक्साइट पहाड़ों की लूट का गवाह बनने और गांव के विकास की हकीकत देखने के बाद अगले दिन हमलोग असूरों की दुनियां को छोड़कर लौटने लगे। ट्रकों के आवागमन से सड़क लाल दिखाई देने लगा। नियमतः सड़क पर पानी डालना है ताकि धूलकण हवा में न उड़े लेकिन यहां नियम लागू करने वाले ही नियमों को तोड़ते हैं। बाक्साइट के धूलकण से सखुआ के हरे पत्ते लालरंग में तब्दील हो गए हैं। ये धुलकंण हवा के द्वारा मनुष्य और जानवरों के फेफड़ों में जमा हो रहे हैं। यहां मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे सभी सांस लेने की परेशानियों को झेल रहे हैं। हमलोग टुटवामोड़ पहुंचते हैं। मन में प्रश्न उठता है कि शक्तिशाली भारतीय सेना की टुकड़ी को इसी मोड़ से कई बार वापस भेजने वाली आदिवासियों की शक्ति, बाक्साइट लदे ट्रको को रोकने में असफल क्यों है? कई दशकों से बाक्साइट के पहाड़ों को बेचने वाली सरकार और निजी कंपनियां यहां के आदिवासी, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं? क्या पहाड़ों को बेचना ही विकास है? क्या खेती की जमीन को खंडहरों में तब्दील करना विकास हैं? क्या यह विकास असूर आदिवासियों को नहीं चिढ़ा रहा है? 

मुंडा दिसुम के मौलिक सवाल?

 ग्लैडसन डुंगडुंग

3 दिसंबर 2018। चुकलू हातु में सनाटा पसरा हुआ है। यह मुंडा आदिवासियों का गांव है, जो झारखंड के खूंटी जिले में जंगल के अंदर स्थित है। सरकारी भाषा में यह सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। यहां प्रकृति का अद्भुत दृश्य है। दूर से सिर्फ घुमावदार जंगल दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जंगल के बीच में गांव है। खेतों में पके धान के पीले पौधे प्रकृति की खुबशूरती में चार चांद लगाते हैं। हवा शुद्ध है, पानी शुद्ध है और लोग भी। लेकिन औद्योगिकरण के प्रभाव से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने यहां भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस वर्ष समय पर बारिश नहीं होने से उपरी सतह के कई खेतों में धान के पौधे सूख गए हैं, उनमें अनाज नहीं है सिर्फ पुआल बचा हुआ है, जो मवेशियों के चारा का काम आयेगा। लेकिन अधिकांश गहरे खेतों में धान की फसल अच्छी हुई है। जीवन में ऐसा द्वंद अक्सर दिखाई पड़ता है। यह कटनी का समय है। सुबह से मुंडा आदिवासी अपने-अपने खेतों में धान काटने में व्यस्त हैं। मन में सवाल उठता है कि धान काटना छोड़कर सभा में शामिल होने कौन आयेगा?  

लेकिन दोपहर होते-होते आस-पास के 15 गांवों के आदिवासी अपनी पीड़ाओं को लेकर चुकलू हातु के अखड़ा में ईमली पेड़ों के नीचे आकर बैठ जाते हैं। यही मुंडा आदिवासियों की खासियत भी है। वे अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए तत्पर रहते हैं। मुंडाओं को लड़ाकू माना जाता है। अखड़ा के एक हिस्से में दो बड़े-बड़े टेबलनुमा पत्थर गाड़े गये हैं, जहां गांव एवं यहां के रैयतों के बारे में जानकारी स्पष्टरूप से लिखा हुआ है। यह गांव का खतियान है, जिसे राजसत्ता भयभीत है क्योंकि वह इस इलाके को कबजाकर पूंजीपतियों को सौपना चाहता है। लेकिन दीवार की तरह खड़े ये निर्जीव पत्थर मुडाओं को उलगुलान का हौसला देते हैं। ये याद दिलाते हैं कि इनके पूर्वजों के खून-पसीना इस मिट्टी से सने हुए हैं, जिसे बचाकर आने वाली पीढ़ी को सौपना इनका फर्ज है। इसलिए मुंडा आदिवासी अपनी जान की परवाह किय बगैर राजसत्ता को चुनौती देते रहते हैं। 

आमसभा की शुरूआत करते हुए गांव के बिरसा हंस दुरंग करते हैं - ‘‘अबु आदिवासी मुंडा को संगबोंगा कबु बागीया, हठि-कुठि राड़ी-बाड़ी जाति को ओते हासा को रेओं जद बुआ।’’ (हम आदिवासी मुंडा लोग सिंगबोंगा को नहीं छोड़ेगें, दिकु हमारी हमीन को लूट रहे हैं।) यह दुरंग बिरसा उलगुलान के समय का है लेकिन आज की हकीकत से पूर्णरूप से मेल खाता है। इसलिए मुंडाओं ने इसे अपने हृदय से लगाकर रखा है। बिरसा उलगुलान का मतलब उन्हें समझाने की जरूरत नहीं होती है। वे जानते हैं की उन्हें अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए अंतिम सांस तक लड़ते रहना होगा।   

125 साल पहले दिकुओं ने मंडा आदिवासियों की जमीन को कई हथकंडे अपनाकर लूटा था तब यह दुरंग गढ़ा गया था। बिरसा उलगुलान के प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू किया रैयतों की जमीन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन सत्ताधीशों ने इस कानून को ईमानदारी से लागू नहीं किया। इसलिए आदिवासियों की जमीन लूट आज और भी ज्यादा भयावह होता जा रहा है। इसी बीच एक युवा उठ खड़ा होता है। वह काफी गुस्से में है। वह ओजस्वी स्वर में सवाल उठाता है, ‘‘झारखंड सरकार ने हमारे गांवों की सामाजिक जमीन, सरना स्थल और जंगल-झाड़ की जमीन को लैंड बैंक में क्यों डाला है? यह ग्रामसभा की जमीन है तो फिर सरकार को इसकी इजाजत किसने दी? क्या सरकार के पास यह अधिकार है? हमारी जमीन कैसे बचेगी?’’ ऐसा ही सवाल प्रत्येक गांव के लोग पूछते हैं। क्या राजसत्ता इन्हें इन सवालों का जवाब दे सकता है?   

मुंडा दिसुम अब शांत प्रतीत होता है लेकिन मुंडाओं के अंदर असंतोष की आग धधक रही है जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह। सरकार ने पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का उपयोग कर जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक का दावा करने वाले अगुओं को जेलों में बंद कर दिया है देशद्रोह का आरोप लगाकर ठीक उसी तरह जिस तरह से अंग्रेज सरकार ने धरती आबा बिरसा मुंडा को जेल में बंद कर दिया था। अब यहां कोई भी सभा सरकार के इजाजत के बिना करना गुनाह है। सरकार से आदेश लेने के बावजूद इस आमसभा में भी सीआपीएफ के एक दिकु आफिर तीन आदिवासी जवानों के साथ आ धमके। वे लोगों के बातों को गौर से सुनते रहे ताकि उन्हें देशद्रोही घोषित कर सके लेकिन इस बार उन्हें खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि मुंडाओं ने इस सभा में सिर्फ अपने संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों को सख्ती से लागू करने की बात की।   

मुंडा दिसुम को पुलिस छवनी में बदल दिया गया है। विडंबना यह है कि यहां प्रत्येक पांच किलोमीटर की दूरी पर अर्द्धसैनिक बलों का एक स्थायी कैंप है। लेकिन बीमार पड़ने पर इलाज करने के लिए मुंडा आदिवासियों को 40 से 50 मिलोमीटर की दूरी तय कर सरकारी अस्पताल जाना पड़ता है जहां सही इलाज और दवा की गारंटी भी नहीं है क्योंकि सरकारी अस्पताल खूद बीमार पड़े हैं। भारत के लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले सतर वर्षों में इस क्षेत्र में एक अच्छी सड़क तक नहीं दिया है। गडढ़े और बोल्डरों का सामना करते हुए लोग किसी तरह अपना गंतब्य स्थानों में पहुंचते हैं। विद्यालय पुलिस कैंप में तब्दील हो चुके हैं। कई स्कूलों में बच्चें कैंप के अंदर ही पढ़ते हैं। उन्हें प्रतिदिन बंदूकों का सामना करना पड़ता है। वे खिचड़ी खाते हैं। इस क्षेत्र में एक भी उच्च विद्यालय नहीं है इसलिए बच्चों को आगे की पढ़ाई करने के लिए 30 से 40 मिलोमीटर की दूरी तय करना होता है, जो साईकिल से संभव नहीं है। इसलिए अधिकांश बच्चे विद्यालय जाना छोड़ देते हैं। निश्चितरूप से ये बच्चे भारत देश के भविष्य नहीं हैं।  

झारखंड सरकार ने इस क्षेत्र के ग्रामसभाओं को सरकारी ग्रामसभा में तब्दील कर दिया है। इसके लिए हातु मुंडा को एक हजार रूपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। असल में यह वेतन नहीं आदिवासियों की जमीन लूटने में मदद करने के लिए राजसत्ता के द्वारा दिया गया घुस है वरना आज तो मजदूर भी प्रतिमाह पांच से आठ रूपये कमाते हैं। यहां सरकार ही कानूनों का कत्ल करती है लेकिन मुंडाओं को देशद्रोही बताकर जेल में डालती है। 23 अक्टूबर 2018 को अड़की के अंचलाधिकारी ने कुरूंग और कोचंग गांवों में ग्रामसभा का आयोजन करने का फरमान जारी किया। आदेश-पत्र में लिखा था कि कुरूंग एवं कोचांग गांवों में सामुदायिक भवन निर्माण हेतु पुलिस अधीक्षक, खूंटी से अधियाचना प्राप्त हुआ है, जिसके लिए दोनों गांवों में 2.47-2.47 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसलिए उक्त योजना हेतु इन गांवों में 29 एवं 30 अक्टूबर को ग्रामसभा आयोजित है, जिसमें सभी सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है।  

भूमि अधिग्रहण को लेकर उक्त गांवों लोग सवाल उठा रहे हैं कि ग्रामसभा के आयोजन का आदेश अंचलाधिकारी कैसे दे सकते हैं? कौन से कानून के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है? गांवों के विकास का काम कब से पुलिस अधीक्षक के हाथों में सौपा गया है? यदि विकास का काम पुलिस अधीक्षक देखेंगे तो जिला के उपायुक्त क्या करेंगे? जब दोनों गांवों में सामुदायिक भवन पहले से मौजूद हैं फिर सामुदायिक भवन किसके लिए बनाना है? 2.47 एकड़ जमीन में किस तरह का सामुदायिक भवन बनेगा? झारखंड मं इतना बड़ा सामुदायिक भवन नहीं है। गांव का सामुदायिक भवन के लिए 10 से 15 डीसमील जमीन काफी है। लेकिन अंदर की बात यह है कि सामुदायिक भवन के नामपर जमीन का अधिग्रहण कर दोनों गांवों में स्थायी पुलिस कैंप बनाने की योजना है इसलिए पुलिस अधीक्षक ने अंचलाधिकारी को अधिसूचना भेजा है। पुलिस कैंप बनाने के लिए सरकार को जमीन नहीं मिल सकता है इसलिए आदिवासियों को अंधेरा में रखकर जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है।  

लेकिन सरकार की असली मांशा को समझकर मुंडा लोग जमीन नहीं देना चाहते है इसलिए पुलिस अपनी शक्ति का प्रयोग कर रही है। 29 अक्टूबर 2018 को कोचांग के हातु मुंडा सुखराम सोय को खूंटी पुलिस ने खूंटी बाजार में चाय पीते समय उठा लिया और थाना में कई घंटो तक रखा। पुलिस पदाधिकारियों ने उन्हें धमकाया कि यदि वे जमीन अधिग्रहण वाले दस्तावेज में दस्तखत नहीं करते हैं तब उसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। उन्हें ‘पत्थलगड़ी’ के केसा में फंसाकर जेल में सड़ा दिया जा सकता है। इसी तरह की धमकी अन्य लोगों को भी मिल रही है। ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन को असंवैधानिक और देशद्रोही कदम बताकर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता एवं कई हातु मुंडाओं को जेल भेज दिया गया है। असल में यह आंदोलन ने ‘भूमि अधिग्रहण’ के लिए खतरा बन चुका था। यह स्पष्ट हो चुका है कि जो आदिवासी अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को सरकार और पूंजीपतियों को देने से इंकार करेगा वह देशद्रोही है। लेकिन मुंडाओं को इसे फर्क नहीं पड़ता है। उनके पूर्व लड़े वे भी लड़ेंगे। 
मुंडा लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पत्थलगड़ी आंदोलन असंवैधानिक था? क्या संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून के खिलाफ ग्रामसभाओं से अनुमति लिये बगैर ग्रामसभाओं की जमीन को लैंड बैंक में डालना असंवैधानिक कार्य नहीं है? क्या अंचलाधिकारी के द्वारा पेसा कानून के खिलाफ ग्रामसभा के आयोजन का आदेश जारी करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या सामुदायिक भवन के नाम पर पुलिस कैंप के लिए जमीन अधिग्रहण करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या उनके इलाके में पुलिस छवनी की स्थापना उनकी सुरक्षा के लिए है या उनकी जमीन लूटने के लिए? क्या राज्यपाल महोदय आदिवासी, उनकी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेगी? आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का हनन करने वाली सरकार देशद्रोही नहीं है तो फिर देशद्रोह का पैमाना क्या है? 

औद्योगिक विकास का परिणाम

ग्लैडसन डुंगडुंग 

आगामी एक दशक के बाद कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे शहर रहने लायक नहीं होंगे क्योंकि वहां का तापमान एवं प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ जायेगा। ऐसा भी स्थिति पैदा हो सकता है कि लोग बड़े शहरों को छोड़कर छोटे शहरों, गांवों और जंगलों की ओर भागने लगेंगे। लेकिन तब कोई भी स्थान पर्यावरण की दृष्टिकोण से सुरक्षित नहीं बचेगा। लोग कहीं बाढ़ से तबाह होंगे, कहीं सुखाड़ उनका जान ले लेगा, कहीं वे खतरनाक लू के चपेट में आयेंगे, कहीं हिमपात उनका जान ले लेगा और कहीं खेती नहीं होने से भूखमरी आफत बानकर आयेगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जनहित, राष्ट्रहित एवं विकास के नाम पर किये गये बेहिस्साब औद्योगिकरण और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ने धरती के तापमान को बढ़ा दिया है और यदि यह बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियत तक पहुंचता है तो तबाही होना तय है। इस खतारनाक स्थिति में पहुंचने के बाद भी हमारे देश के नेता औद्योगिकरण और पूंजीनिवेश पर ही जोर दे रहे हैं। वे दुनिया के पूंजीपतियों को भारत में पूंजीनिवेश करने के लिए आमांत्रित कर रहे हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने यह कहते हुए दुनिया में चेतावनी जारी कर दिया है कि यदि धरती को बचाकर रखना है तो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोकना होगा जो औद्योगिकरण से बढ़ रहा है।   

वैश्विक जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी के द्वारा 8 अक्टूबर 2018 को जारी ‘‘ग्लोबल वार्मिग आफ 1.5डीसी’’ नामक रिपोर्ट ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है और हमें भी। रिपोर्ट का सारंश यह है कि तबाही की दिशा में बढ़ते जलवायु संकट को रोकने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा है। यदि हम धरती को जीने लायक जगह बनाये रखना चाहते हैं तो हमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकना ही होगा, जिसका सीधा अर्थ है प्राकृतिक संसाधनां का बेहिस्साब दोहन को रोकना यानी खनिज आधारित उद्योगों को बंद करना एवं पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग कम करना। धरती का औसत तापमान औद्योगिकरण के शुरूआती दशकों 1880 से 1910 में सालाना 13.7 डिग्री सेल्सियस था जो 21वीं सदी के पहले दशक में बढ़कर 14.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। संस्था ने चेतावनी देते हुए कहा है कि औद्योगिकरण के शुरूआती दशकों के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि को धरती बर्दाश्त कर सकती है लेकिन यदि यह 2 डिग्री तक बढ़ गया तो दुनिया में तबाही मच जायेगी, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित भारत, पाकिस्तान और चीन होगा। फलस्वरूप, करोड़ों लोग भीषण गर्मी, लू, सुखाड़, बाढ़ और हिमपात की चपेट में आयेंगे।  

वैश्विक जलवायु परिवर्तन को लेकर 12 दिसंबर 2015 को हुए ‘पेरिश समझौता’ में दुनियां के सभी देशों ने मिलकर धरती के तापमान को 2 डिग्री सेल्सिलय से नीचे रखने का निर्णय लिया है। इस निर्णय में भारत भी शामिल है लेकिन हमारे देश की जमीनी हकीकत कुछ अलग दिखाई देती है। भारत में अक्टूबर 1980 से जुलाई 2016 तक कुल 8,97,698.40 हेक्टेअर वनक्षेत्र को विकास कार्यों में लगा दिया गया जबकि देश में मात्र 21 प्रतिशत वनक्षेत्र बचा हुआ है जो पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक एक तिहाई क्षेत्रफल यानी 33 प्रतिशत से बहुत कम है। लेकिन विकास के नाम पर पेड़ काटने और जंगलों को उजाड़ने का काम जारी है। देश में पर्यावरण की हालत इतना खराब होने के बावजूद केन्द्र एवं राज्य सरकारे औद्योगिकरण पर क्यों जोर देती हैं? क्या गरीबी, अशिक्षा एवं बेरोजगारी को खत्म करने के लिए औद्योगिकरण जरूरी है? प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किसके हितों को साधने के लिए किया जा रहा है? जब जनहित, विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है तो उन प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित सामुदाय यानी आदिवासियों का जीवन स्तर में बदलाव क्यों नहीं आ रहा है? खनिज सम्पदाओं से भरे इलाके का अबतक विकास क्यों नहीं हुआ? क्या सिर्फ खनिज सम्पदा का दोहन करने के लिए ‘विकास’ शब्द को पासवर्ड की तरह उपयोग किया जाता है? खनिज सम्पदा से निकला पैसा कहां जा रहा है? 

औद्योगिक विकास के नाम पर हो रहे प्राकृतिक संसाधनों का बेहिस्साब दोहन के पीछे दो बड़े कारण हैं - लालच और मुनाफाखोरी पर आधारित बाजारू अर्थव्यवस्था और खरीद-बिक्री वाला लोकतंत्र। आज का अर्थव्यवस्था लालच और मुनाफाखोरी पर आधारित है। कारपोरेट घराने के लोग प्राकृतिक सम्पदा का बेहिस्साब दोहन कर रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए वैसे वस्तुओं का उत्पादन कर रहे हैं जो जरूरी नहीं है। कारपोरेट घनाना और राजनीतिक दलों के बीच बहुत बड़ा गांठजोड़ है। यह गांठजोड़ प्राकृतिक सम्पदा की लूट का मूल कारण है। इनके लिए पर्यावरण कोई मायने नहीं रखता है। यही गांठजोड़ जंगलों और पहाड़ों को नष्ट करते हुए इंट, सीमंट, बालू, गिट्टी और लोहा से बना कांक्रीट का जंगल खड़ा कर रहे हैं। इनके लालच और मुनाफाखोरी के कारण ही जलवायु संकट पैदा हुआ है, जसका सबसे ज्यादा असर कमजोर तबकों पर पड़ रहा है। हमारे देश के नेता अपने भाषणों में ‘आम जनता’ को अपना आलाकमान बताते हैं लेकिन वे किन-किन औद्योगिक घरानों से चन्दा लेते हैं उसे उन्हें बताने से डरते हैं। जैसे देश की एक राष्ट्रीय पार्टी ने अडाणी कंपनी से चुनाव लड़ने के लिए चंदा लिया और सरकार बनाने के बाद विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन, पानी और खनिज सम्पदा उसे दे दिया। क्या लाभ कमाने के लिए चुनाव में पैसा खर्च करने के बाद जमीन, पानी और खनिज सम्पदा हासिल करने वाली कंपनी को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से कुछ लेना-देना रहेगा? राजसत्ता, राजनीतिक दल और पूंजीपतियों का गांठजोड़ धरती को बर्बाद कर देगा।   

जलवायु संकट से दुनिया को बचाने के लिए सिर्फ एक ही तरीका है और वह है आदिवासी जीवन-दर्शन, जिसका मूल है प्रकृति के साथ सामूहिकता में जीना और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक सम्पदा का उपयोग करना है। आप विज्ञान के तरक्की का चाहे जितना भी दावा कर लें लेकिन सच्चाई यही है कि गर्म हो रही धरती को वैज्ञानिक ढंठा नहीं कर सकते हैं। वैश्विक जलवायु परिवर्तन को आप कोई यंत्र से नहीं रोक सकते हैं बल्कि इसके लिए ज्यादा से पेड लगाना और वनक्षेत्र को बढ़ाना होगा। आज हमारी हालत ऐसी इसलिए हुई है क्योंकि गैर-आदिवासी जो सभ्य, शिक्षित एवं विकसित होने का दावा तो करते हैं लेकिन असल में उनका जीवन-दर्शन लालच, मुनाफाखोरी, बेईमानी, शोषण और दोहन पर आधारित है। वे अपने लालच को पूरा करने के लिए मानव का शोषण और प्राकृतिक सम्पदा का बेहिस्साब दोहन करते हैं। ऐसी स्थिति में यदि उर्जा के स्रोत को कोयला और कच्चा तेल से हटाकर सौर उर्जा या कोई अन्य विकल्प में तब्दील कर भी दिया जाता है तब भी स्थिति बहुत ज्यादा तबतक नहीं बदलेगी जबतक हम जरूरत पर आधारित अर्थव्यवस्था को नहीं अपनायेंगे। इसलिए इंधन से लेकर आवागमन के संसाधनों का उपयोग, प्राकृतिक सम्पदाओं की उपयोगिता, औद्योगिक विकास, गाड़ियों का निर्माण एवं इमारतों का निर्माण सिर्फ जरूरत के आधार पर करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए न कि कारपोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए जनहित, विकास और आर्थिक तरक्की जैसे शब्दों का लेबल लगाकर धरती को बर्बाद करने हेतु नीति। क्या आपलोग आदिवासियों की सुन रहे हैं?

आदिवासी फिलोसिफी से ही बचेगी दुनिया

ग्लैडसन डुंगडुंग

मैं पिछले कुछ वर्षों से निरंतर पश्चिमी देशों का भ्रमण करते हुए यह समझने की कोशिश कर रहा हॅं कि जिन देशों ने प्रगति, विकास एवं आर्थिक तरक्की जैसे शब्दों को गढ़ने के बाद पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद कर सबसे पहले औद्योगिकरण का जाल बिछाया, आधुनिक विकास के पथ पर चला और सीमेंट, बालू एवं लोहा से बने काक्रीट जंगलों को खड़ा किया अब उनकी हालत कैसी है। क्या उन देशों के लोग बहुत खुश हैं? क्या उन्होंने अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचाकर रखा भी है? क्या भविष्य में उनके बच्चे प्रकृति के इस खुबसूरत सृजन को देख पायेंगे? यही आधुनिक विकास ने अबतक करोड़ों वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के अस्तित्व को धरती से मिटा दिया है। आज दुनिया विनाश के मुहाने पर खड़ी है। धरती, वन्यजीवन एवं मानव सभ्यता का अस्तित्व दांव पर लग हुआ है। कहीं ग्लोबल वार्मिंग तो कहीं ग्लोबल कूलिंग का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। इस जलवायु परिवर्तन ने विकसित देशों को चिंता में डाल दिया है। ऐसी परिस्थिति में धरती को कैसे बचाया जा सकता है? क्या कोई विज्ञानिक है जो इस काम को कर सकता है? प्रकृति, वन्यजीवन एवं मानव के सह-अस्तित्व की वकालत करने वाली आदिवासी फिलोसोफी को छोड़कर कोई दूसरा रास्ता बचा भी है?      

यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारे देश में भी गंभीर चिंतन के बगैर ही पश्चिमी देशों का नकल करते हुए आधुनिक विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद कर काक्रीट जंगल खड़ा करने का काम बड़ी तेजी से निरंतर चल रहा है। फलस्वरूप, देश में बड़ी तेजी से वायु, जल एवं घ्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण पर चर्चा जरूर होती है लेकिन धरती को क्षति पहुंचाने वाले इस विकास प्रक्रिया के खिलाफ प्रकृति के साथ जीने वाले आदिवासियों को पिछड़ा, जंगली, बोका, अनपढ़ एवं विकास विरोधी कहा जाता है। जबकि देश में प्राकृतिक संसाधन आदिवासियों के प्रतिरोध की वजह से ही सुरक्षित है। जब आदिवासी प्रतिरोध करना बंद कर देंगे तब जंगल खंडहरों में तब्दील हो जायेंगे क्योंकि कारपोरेट जगत को सिर्फ मुनाफा कमाने से मतलब है। भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जिनका मौलिक कार्य वन एवं पर्यावरण की सुरक्षा है, ने अक्टूबर 1980 से जुलाई 2016 तक 8,97,698.40 हेक्टेअर वनक्षेत्र को विकास के नामपर उजाड़ने की अनुमति दे दी और 40,000 हेक्टेअर अतिरिक्त वनक्षेत्र को कारपोरेट जगत को सौपने की तैयारी में जुटी हुई है जबकि देश में मात्र 21 प्रतिशत वनक्षेत्र बचा हुआ है, जो पर्यावरण के लिए निर्धारित न्यूनतम मानक से 12 प्रतिशत कम है।   

यह हास्यास्पद ही है कि सूचना क्रांति के इस दौर में भी शासक वर्ग आधुनिक विकास माडल के सिर्फ एकपक्ष से दुनिया को रू-ब-रू कराता है। आधुनिक विकास के नाम पर किये गये प्रकृति का विनाश, वन्य-जीवन की बर्बादी और आदिवासियों की तबाही पर चर्चा नहीं की जाती है। विज्ञान एवं टेक्नोलाजी के तरक्की पर वहवाही लूटी जाती है लेकिन उसके नकारात्मक प्रभाव पर चर्चा नहीं होती है चाद पर जाने की शोरगुल है लेकिन वहां जाते समय राके के द्वारा धरती पर छोड़े गये गर्मी और धुंआ के प्रभाव पर चर्चा नहीं होती है। पश्चिमी देशों ने आधुनिक विकास के नामपर किये कुकर्म को रेड कारपेट से ढांककर रखता था। लेकिन प्रकृति अपने नियम के अनुसार चलती है, जिसने समय के साथ दुनिया के सामने इन्हें नंगा कर दिया। अब पश्चिमी देश जलवायु परिवर्तन का रोना रो रहे हैं। पश्चिमी देशों ने आधुनिक विकास के नामपर पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद करते हुए बड़े-बड़े इमारत खड़े किये, जिससे विकास मान लिया गया। 

लेकिन आज फ्रांस जैसे कई देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ की पहाड़ी पिछलकर खत्म हो रहा है। पेरिस जैसे शहरों में न पेड़ दिखाई पड़ते हैं, न बरसात में मेंढ़कों का टर्राना सुनाई देता है और न ही सुबह-शांम पक्षी चहचहाते दिखाई पड़ते हैं। यहां का तापमान बढ़ने से लोग चिंतित हैं। पश्चिमी देशों के विकसित शहर अब शमशान या कब्रगाह जैसा विरान लगने लगे हैं। ऐसा लगता है कि अंधाधुंध विकास की दौड़ में इन शहरों को विकसित करते समय अपने वाले पीढ़ियों के लिए ठीक से सोचा नहीं गया। यह मूलतः आधुनिक विकास और मुनाफा आधारित आर्थिक माडल की देन है, जिसे नाकारना बहुत मुश्किल है। क्या आनेवाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों को नहीं कोसेंगे? इसी को ध्यान में रखकर आदिवासी अपने आने वाले कई पीढ़ियों के बारे में सोच-विचार कर कोई कदम उठाते हैं। वे प्रकृति, वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के अस्तित्व को अपने अस्तित्व के लिए जरूरी मानते हैं।        

आदिवासी भाषाओं में ‘लाभ, मुनाफा, लालच, शोषण एवं दोहन’ जैसे शब्द नहीं हैं। इसलिए वे न मुनाफा कमाने के लिए सोचते हैं, न किसी का शोषण करते हैं और न ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन। बल्कि वे प्रकृति के साथ जीते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं। आदिवासी जंगलों के अंदर रहते हैं, जंगलों की सुरक्षा करते हैं और वनोपज से अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते हैं न कि वे पूरा जंगल को ही काटकर रख लेते हैं। लेकिन स्वयं को मुख्यधारा, सभ्य, शिक्षित, विकसित एवं आधुनिक घोषित कर चुका गैर-आदिवासी समाज के शब्दकोष में ‘लाभ, मुनाफा, लालच, शोषण एवं दोहन’ शब्द मौजूद हैं। इसलिए यह समाज सिर्फ मुनाफा कमाकर अपनी लालच को पूरा करने के लिए एक-दूसरे का शोषण एवं प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन करता है। मुनाफा पर आधारित अर्थव्यवस्था एवं आधुनिक विकास ने दुनिया को तबाही की दिशा में लाकर खड़ा कर दिया है। दुनिया के महान वैज्ञानिक स्टेफन हाकिंग ने दुनिया छोड़ने से पहले कहा कि हमने धरती को तबाह करने के लिए बहुत कुछ अविष्कार किया है लेकिन धरती को बचाने के लिए एक भी नहीं। क्या कोई वैज्ञानिक है जो गर्म हो रही धरती को ठंढ़ा करने का मशीन बना सकता है? 

अब पश्चिमी देशों में हो रहे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में चर्चा चल रहा है कि धरती, वन्यजीवन और मानव सम्यता को बचाने के लिए आदिवासियों के जैसा जीना पड़ेगा यानी प्रकृति से प्यार करना, उसकी रक्षा करना और उसके साथ जीना। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करना न कि इसका दोहन करना। इतना ही नहीं मैंने देखा है कि लंदन में रहने वाले 25 समृद्ध परिवारों ने अपनी पूरी सम्पति बेचकर वेल्स नामक छोटे से देश में 175 एकड़ जंगल खरीदकर जंगल के अंदर छोटा-छोटा घर बनाकर रह रहे हैं। वे कहते हैं कि आधुनिक विकास पागलपन है। इससे दुनिया बर्बादी को ओर जा रही है। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि धरती को बचाने के लिए पेड़-पौधो, पहाड़ों और जंगलों से प्यार करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आदिवासी समाज उत्पत्ति से यही कर रहा है। दुनिया को आदिवासी समाज से अभी बहुत-कुछ सीखना बाकी है क्योंकि आदिवासी फिलोसोफी को छोड़कर दुनिया को बचाने का दूसरा रास्ता ही नहीं बचा है।      

सोमवार, 22 जनवरी 2018

विकास के नाम पर दगाबाजी

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने घोषणा किया है कि वेदांता कंपनी का प्रस्तावित स्टील परियोजना उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है यानी वेदांता कंपनी को झारखंड में स्थापित करना उनका सपना है। यह परियोजना झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले स्थित मनोहरपुर प्रखंड के डिम्बुली एवं अनंतपुर गांव में स्थापित किया जाना है। इस परियोजना से प्रतिवर्ष 1 मिलियन टन स्टील उत्पादन करने का प्रस्ताव है, जिसके लिए 15,000 करोड़ रूपये का पूंजीनिवेश होगा। वेदांता कंपनी ने दावा किया है कि इस विकास परियोजना से लगभग 7,000 लोगों को रोजगार मिलेगा, जिसमें 2,000 लोगों को प्रत्यक्ष एवं 5,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलना शामिल है। 

कंपनी में मिलने वाली नौकरी को ही रोजगार माना जाता था लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों कहा है कि किसी दफ्तर के बाहर चाय-पकौड़ा बेचना भी रोजगार है। इसलिए इसे कंपनी के द्वारा अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराना माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि वेदांता कंपनी का स्टील प्लांट स्थापित होने से 2000 लोगों को कंपनी में नौकरी मिलेगा और 5000 लोगों को कंपनी के बाहर चाय-पकौड़ा, हड़िया-दारू, सिगरेट-बिड़ी, इत्यादि बेचने का अवसर उपलब्ध होगा। कंपनी के द्वारा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का कितना शानदार तरीका है? चाय-पकौड़ा, हड़िया-दारू, सिगरेट-बिड़ी, इत्यादि बेचने के लिए पूँजी लोग लगायेंगे और वेदांता कंपनी इसको अपना उपलब्धि गिनायेगी? क्या यह लोगों के घाव पर नमक छिड़कने जैसा नहीं है?   

वेदांता कंपनी को प्रस्तावित प्लांट के लिए 600 एकड़ जमीन चाहिए, जिसमें 300 एकड़ प्लांट स्थापित करने और टाउनशीप इत्यादि कार्य के लिए 300 एकड़। कंपनी के पास अभी कुल 151.10 एकड़ जमीन है, जिसमें वी.एस. डेम्पो कंपनी के द्वारा ग्रामीणों से खरीदी गई 110 एकड़ रैयती जमीन और झारखंड सरकार के द्वारा लीज पर दिया गया 41.10 एकड़ परती जमीन शामिल है। लेकिन डिम्बुली गांव के रैयत वेदांता कंपनी के प्रस्तावित परियोजना का जोरदार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि विकास के नाम पर उनके साथ दगाबाजी किया गया है। इस मामले को गंभीरता से देखने पर रैयतों का विरोध जायज दिखाई देता है। 

गोवा की कंपनी ‘वी.एस. डेम्पो एंड को. प्रा. लि. ने 6 अक्टूबर 2005 को झारखंड सरकार के साथ एक समझौता किया था, जिसके तहत निम्न कोटि के लौह-अयस्क में उच्च गुणवता में परिवर्तित कर स्टील बनाने वाले स्टील प्लांट का स्थापना करना था, जिसमें एक हजार करोड़ रूपये की पूंजीनिवेश का प्रस्ताव था। 18 अक्टूबर 2005 को कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर के.के. कलाम ने पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण करने हेतु आवेदन भेजा। 

इसके बाद कंपनी ने मनोहरपुर प्रखंड के डेम्बुली गांव में जमीन चिन्हित किया, जिसमें आदिवासी रैयतों का 126 एकड़, गैर-आदिवासी रैयतों का 12.81 एकड़ एवं 145 एकड़ परती (गैर-मजरूआ) जमीन शामिल था। रैयतों से जमीन खरीदने के लिए कंपनी ने गांव के ही दो लोगों को काम पर लगा दिया। ये लोग गांव के प्रत्येक रैयत से अलग-अलग बात करने लगे। इन्होंने रैयतों से कहा कि कंपनी रैयतों के परिवारों के सभी सदस्यों को नौकरी देगा, विस्थापितों का पुनर्वास करेगा, रैयतों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध करायेगा। इस तरह से उनका विकास होगा। आदिवासी रैयतों ने इनकी बात मानकर कंपनी को अपनी जमीन देने हेतु सहमति दे दी। 12 फरवरी 2007 को कंपनी ने 32 रैयतों एवं परियोजना मैंनेजर के हस्ताक्षर युक्त घोषणा-पत्र स्टाम्प पेपर पर जारी कर दिया और रैयतों से जमीन खरीदने का काम भी शुरू हो गया।  

इस तरह से वर्ष 2007 से 2009 तक वी.एस. डेम्पो कंपनी ने जमीन दलालों के माध्यम से चुपचाप डिम्बुली के रैयतों से 950 रूपये प्रति डीसमील की कीमत पर 110.53 एकड़ जमीन खरीद लिया। लेकिन रैयतों के साथ स्टाम्प पेपर पर जमीन का समझौता करते समय कंपनी फंस गया। कंपनी के अधिकारियों को लगा कि वे पांच वर्षों के अंदर डिम्बुली में स्टील प्लांट स्थापित कर लेगें इसलिए उन्होंने समझौता-पत्र में लिखा कि यदि वी.एस. डेम्पो पांच वर्षों के अंदर उक्त जमीन पर प्लांट स्थापित नहीं करता है तो जमीन रैयतों को वापस दे दिया जायेगा। इतना ही नहीं समझौता-दस्तावेज में यह भी लिखा गया कि कंपनी उक्त जमीन को किसी दूसरे कंपनी को नहीं बेचेगा। 

इसी बीच जब वी.एस. डेम्पों के द्वारा गांव की जमीन खरीदने की भनक पूरे गांव के लोगों को हुई तो उन्होंने इसका विरोध करना शुरू किया। लोगों के विरोध को देखते हुए कंपनी के आफसरों ने गांव में एक आमसभा का आयोजन किया, जिसमें कंपनी के आफसर जमीन बेचने वाले रैयतों के साथ-साथ पूरे गांव के लोगों के साथ बात-चीत कर गांव में प्लांट स्थापित करने हेतु रास्ता बनाना चाहते थे। लेकिन आमसभा में कंपनी के आफसरों के पहुंचते ही हंगामा शुरू हो गया। ग्रामीणों का जोरदार विरोध को देखते हुए जमीन बेचने वाले रैयत भी सहम गये और कंपनी के आफसरों को बैरंग वापस लौटना पड़ा। 

जब पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी कंपनी अपना प्लांट स्थापित करने में असफल हो गया तो 2013 में डेम्पों के मालिक ने ‘‘डेम्पो माईनिंग कारपोरेशन’ को 1750 करोड़ रूपये में देश की सबसे बड़ी खनन कंपनी गोवा स्थित ‘सेसा गोवा लिमिटेड’ को बेच दिया। सेसा गोवा लि. ने सारंडा जंगल स्थित दुबिल माईंस से 999.40 हेक्टेयर का खनन लीज हासिल कर चुका है। इस तरह से डिम्बुली गांव की जमीन पर सेसा गोवा लि. के पास आ गया। सेसा गोवा लि. गोवा, कर्नाटक और ओड़िसा में बड़े पैमाने पर लौह-अयस्क का खनन कार्य करता है और अब यह कंपनी झारखंड में भी प्रवेश कर चुका था।  

यह मामला यहीं खत्म नहीं होती है। लंदन स्थित वेदांता कंपनी ने भारत में स्टील उत्पादन के क्षेत्र में कूदने का मन बना लिया था। लेकिन कंपनी नये सिरे से काम शुरू करने के बजाये स्थापित कंपनी का अधिग्रहण कर अपना कदम बढ़ाना चाहता था। इसके लिए वेदांता ने सेसा गोवा लि. का 51 प्रतिशत शेयर जो जापानी कंपनी ‘मिटसुई’ के पास था उसे अप्रील 2007 में ही 981 मिलियन डालर में खरीद लिया था। इस तरह से वह सेसा गोवा लि. का मालिक बन गया। लेकिन 2013 वेदांता के शेयर की कीमत 6.7 प्रतिशत बढ़ गया, जिससे सेसा गुवा लि. में वेदांता का मार्केट कैपिटल 15,122 करोड़ रूपये हो गया। वेदांता कंपनी ने सेसा गुआ लि. का 45,000 करोड़ रूपये का कर्ज भी भर दिया। इस तरह से वेदांता कंपनी ने सेसा गुवा लि. को खरीद लिया। वेदांता रिर्सोसेस ने सेसा गोवा एवं स्टारलाईट इंडस्ट्रीज को मिला कर सेसा स्टारलाईट नामक कंपनी बना दिया, जिसे बाद में वेदांता लिमिटेड का नाम दिया गया। अब स्टील खनन के क्षेत्र में यह कंपनी वेदांता लिमिटेड के नाम से काम कर रहा है।  

सेसा गोवा कंपनी को खरीदने का परिणाम यह हुआ कि वेदांता लिमिटेड सारंडा का खनन लीज और डिम्बुली गांव की जमीन का स्वतः हकदार हो गया। इस तरह से वेदांता का डिम्बुली गांव में प्रवेश हुआ। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची स्थित खेलगांव में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट हुआ, जिसमें दुनियाभर से 11,000 छोटे-बड़े व्यापारी शामिल हुए, जिसमें वेदांता कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल भी थे। इसी समिट के बाद स्टील प्लांट के लिए झारखंड सरकार एवं वेदांता कंपनी के बीच समझौता हुआ था। अब वेदांता कंपनी डिम्बुली गांव के उन्हीं दलालों के माध्यम से उक्त जमीन को अधिग्रहण करने का प्रयास कर रही है, जिसका गांव के लोग विरोध कर रहे है। 

यहां यह भी जानना मजेदार होगा कि झारखंड में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों के मद्देनजर झारखंड सरकार ने 2015 में भूमि बैंक का गठन कर राज्यभर के 21 लाख एकड़ गैर-मजरूआ जमीन को इसमें सूचीबद्ध कर दिया है। इसी भूमि बैंक में डिम्बुली गांव की परती जमीन को भी डाल दिया गया था, जिसमें से 41.10 एकड़ परती जमीन को झारखंड सरकार ने चुपके से वेदांता कंपनी को दे दिया है। यह जमीन गांव में अलग-अलग जगहों पर कहीं रास्ता, कहीं सामाजिक जमीन तो कहीं धार्मिक जमीन के रूप में मौजूद है। परती जमीन के अगल-बगल में ग्रमीणों का रैयती जमीन है। हकीकत में गांव के परती जमीन पर ग्रामसभा का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने ’’ओड़िसा माईनिंग कारपोरेशन बनाम वन व पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य(सी) सं. 180 आफ 2011’’ के मामले पर फैसला देते हुए कहा है कि गांव के प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करने के लिए ग्रामसभा सक्षम है। इसलिए यह ग्रामसभा को ही तय करना है कि गांव के प्राकृतिक संसाधनों का कैसे उपयोग हो। डिम्बुली के मामले में झारखंड सरकार ने पेसा कानून 1996 और सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का खुलम-खुला उल्लंघन किया है क्योंकि ग्रामसभा से बगैर अनुमति के ही परती जमीन को वेदांता कंपनी को दे दिया है। क्या परती जमीन पर सरकार का सम्पूर्ण हक बनता है?     

जब डेम्बुली गांव के आदिवासियों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने 12 जून 2017 को ग्रामसभा का आयोजन किया गया, जिसमें 85 ग्रामीणों का हस्ताक्षरयुक्त आपŸ-पत्र तैयार कर मनोहरपुर के अंचलाधिकारी को सौंप दिया। ग्रामीणों का कहना है कि उनके रैयती जमीन के बीच-बीच में स्थित गैर-मजरूआ जमीन को सरकार वेदांता कंपनी को कैसे दे देगी? उक्त जमीन पर प्लांट कैसे लगेगे? यह तो उनके जमीन को कब्जा करने का एक षड्यंत्र है। ग्रामीणों ने ग्रामसभा के माध्यम से मनोहरपुर के अंचलाधिकारी को लिखा कि ग्रामसभा राजस्व ग्राम डिम्बुली थाना न. 86 की परती जमीन को वेदांता लिमिटेड को लीज बन्दो बस्ती पर आपŸ करता है तथा तत्काल इस प्रस्ताव को खारिज किये जाये। 

वी.एस. डेम्पो को अपनी जमीन देने वाले रैयत देवदत नायक, गोपबंधु, रंजीत नायक, बैद्यनाथ मुंडारी, संजय नायक, पार्वती नायक, किशोरी नायक, निर्मला नायक, गोविंद नायक कहते हैं कि उन्होंने डेम्पो कंपनी को पांच वर्ष के लिए अपनी जमीन दी थी अब जमीन के एग्रीमंट की अवधि खत्म हो गई है और कंपनी इस अवधि मंप्लांट नहीं लगा पायी है इसलिए अब उन्हें जमीन वापस देना होगा। डेम्बुली गांव के रैयत कह रहे हैं कि वी.एस. डेम्पो ने सशर्त एग्रीमेंट के तहत प्लांट स्थापित नहीं किया इसलिए अब उनके द्वारा कंपनी को दी गई जमीन उन्हें वापस मिलनी चाहिए। पूर्व-ग्रामप्रधान अखिलेन्द्र नायक कहते हैं कि उन्होंने वी.एस. डेम्पो को जमीन दी थी वेदांता को नहीं। इसलिए उन्हें उनकी जमीन वापस मिलनी चाहिए। वे वेदांता को जमीन नहीं देंगे। 

पिछले वर्ष छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संतालपरगना काश्तकारी अधिनियम 1949 में संशोधन करने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बार-बार कहा था कि वे झारखंड और आदिवासियों का विकास करना चाहते हैं इसलिए इन कानूनों का संशोधन कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा था कि यदि किसी भी विकास परियोजना के लिए अधिगृहित जमीन पर पांच वर्षों के अन्दर प्लांट स्थापित नहीं होता है तो उक्त जमीन को रैयतों को वापस कर दिया जायेगा और उन्हें दिया हुआ मुआवजा राशि भी लौटाना नहीं पड़ेगा। 

लेकिन क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि वी.एस. डेम्पो कम्पनी के द्वारा रैयतों से किये गये समझौता की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी डेम्बुली गांव के रैयतों को जमीन वापस करने के बजाये रघुवर दास उक्त जमीन को वेदांता कंपनी को देने पर तुले हुए हैं। क्या यह विकास के नाम पर रैयतों के साथ दगाबाजी नहीं है? इस स्थिति में कंपनी और मुख्यमंत्री रघुवर दास के द्वारा किये गये वादों पर कैसे विश्वास किया जाये? क्या सरकार विकास शब्द का उपयोग रैयतों से जमीन छीनने के लिए नहीं कर रही है? यह विकास किसके लिए और किसके कीमत पर हो रहा है? क्या रैयतों से जमीन खरीदते समय पारदर्शी तरीके से उनकी पूर्ण सहमति नहीं लेनी चाहिए?   

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

किसका विकास?

ग्लैडसन डुंगडुंग


झारखंड में चारों तरफ विकास का शोरगुल है। झारखंड सरकार विज्ञापनों के माध्यम से आम जनता को बता रही है कि राज्य में विकास हो रहा है, झारखंड बदल रहा है, नया झारखंड बन रहा है, इत्यादि। विकास तो जरूर हो रहा है लेकिन यहां के आदिवासी और मूलवासियों का नहीं बल्कि बाहर से यहां व्यापार करने आये औद्योगिक घरानों, व्यापारियों एवं ठेकेदारों का क्योंकि सरकार की नीति ऐसी ही बनायी गई है, जिसमें स्थानीय लोगों को फायदा नहीं पहुंचेगा। विकास के इस शोरगुल में पूंजीपति लोग कैसे मलाई मार रहे हैं इसको समझने के लिए झारखंड की उर्जा नीति 2012 एवं सरकार की गतिविधियों को गंभीरता से समझना होगा। इस उर्जा नीति के तहत बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी अपने कुल उत्पादन का मात्र 25 प्रतिशत हिस्सा ही राज्य को देगा और 75 प्रतिशत हिस्से को बाहर बेचेगा। झारखंड में बिजली उत्पादन होगा लेकिन झारखंडियों को नहीं मिलेगा। यह कैसा विकास है? किसका विकास है? और किसके कीमत पर ऐसा विकास किया जा रहा है?   

झारखंड में 32,620 गांव हैं। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना के तहत 29,492 गांवों को ही मानव निवास माना गया है। सरकार की रिपोर्ट को माने तो इन गांवों में से 29,223 गांवों में बिजली पहुंच चुकी है तथा शेष 269 गांवों में दिसंबर 2017 तक बिजली पहुंचा दिया जायेगा। ऐसा दिखाई पड़ता है कि गांवों में बिजली पहुंच गई है यानी गांवों का विकास हो रहा है। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना का रिपोर्ट चैकाने वाला तथ्य पेश करता है। बिजली गांवों में जरूर पहुंच रही है लेकिन सभी घरों में नहीं। इस रपोर्ट में बताया गया है कि झारखंड के गांवों में कुल 54.89 लाख परिवार रहते हैं। इनमें से अबतक मात्र 24.60 लाख परिवारों के लिए ही बिजली उपलब्ध हो पायी है। राज्य में अभी भी 30.29 लाख परिवारों तक बिजली पहुंचाना बाकी है जो बड़ी चुनौती है। यदि इसे प्रतिशत में देखें तो झारखंड के 55.2 प्रतिशत परिवारों के पास अबतक बिजली नहीं पहुंची है। 

झारखंड में सभी लोगों को बिजली मिल सकती है। लेकिन ऐसा इसलिए संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि सरकार अपने बिजली उपक्रमों का सही रख-रखाव एवं इस्तेमाल करने के बजाये पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने में लगी हुई है। राज्य में लगभग 5700 मेगावट बिजली की जरूरत है जबकि उत्पादन सिर्फ 3002 मेगावट ही हो पा रहा है। इस तरह से राज्य में अभी 2600 मेगावट बिजली की कमी है। सरकार के बिजली उपक्रम पतरातू थर्मल पावर, तेनुघाट थर्मल पावर एवं सिकिदरी हाईडल पावर को मिलाकर मात्र 520 मेगावट ही उत्पादन हो रहा है जबकि उनकी क्षमता 3,650 मेगावट है। सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। डीवीसी झारखंड को 1600 मेगावट बिजली देती है तथा शेष जरूरत को नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन एवं अन्य निजी कंपनियों से पूरा किया जाता है। राज्य में बिजली की काफी कमी होने के बावजूद नये बिजली परियोजनाओं से राज्य को मात्र 25 प्रतिशत ही बिजली मिल पायेगी क्योंकि राज्य सरकार ने बिजली कंपनियों के साथ ऐसा ही समझौता किया है।   

ऐसा इसलिए किया गया है ताकि बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियां अपने उत्पादन का 75 प्रतिशत बिजली दूसरे राज्यों या देश के बाहर बेचकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकेगी क्योंकि ये कारपोरेट घराना ही चुनाव के समय पानी की तरह पैसा बहाते हैं इसलिए सरकार बनने के बाद वे अपने हितों को साधने वाली नीति भी बनवाते हैं। हकीकत में ये पूंजीपति ही देश में सरकार चला रहे हैं। इसलिए केन्द्र एवं राज्य सरकारें जनहित, विकास एवं आर्थिक तरक्की का बड़ा-बड़ा नारा देकर आम जनता को बेवकूफ बनाते हुए कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अडानी कंपनी का गोड्डा में प्रस्तावित पावर प्रोजेक्ट। 

अडानी पावर लिमिटेड का मालिक है गौतम अडानी जो गुजरात का बड़ा व्यापारी है। वे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबसे चहेता चेहरा में से एक हैं। भारतीय जनता पार्टी के साथ इनका क्या रिश्ता है यह सबको पता है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही गौतम अडानी ने झारखंड में पावर प्रोजेक्ट लगाने का प्रस्ताव रखा। इससे पहले उन्होंने झारखंड में कोई भी परियोजना लगाने पर रूचि नहीं दिखाई थी। इस तरह से 17 फरवरी एवं 21 अक्टूबर 2016 को गौतम अडानी की कंपनी ‘अडानी पावर लिमिटेड’ ने झारखंड सरकार के साथ 15,000 करोड़ रूपये पूंजीनिवेश से संबंधित दो समझौतों पर हस्ताक्षर किया। इस समझौता के तहत गोड्डा में कुल 1600 मेगावट यानी 800-800 मेगावट का दो तापीय विद्युत सयंत्र स्थापित किया जायेगा। 

झारखंड सरकार ने अडानी कंपनी को परियोजना स्थापित करने के लिए गोड्डा जिले के गोड्डा एवं पोड़ैयाहाट प्रखंड में जमीन तथा सुन्दरपहाड़ी प्रखंड में स्थित जीतपुर काल ब्लाक आवंटित किया है। पावर प्रोजेक्ट स्थापित करने के लिए गोड्डा प्रखंड के मोतिया, पटवा एवं गंगटा तथा पोड़ैयाहाट प्रखंड के गायघाट, सोनडीहा एवं माली गांव के कुल 917.21 एकड़ रैयती जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। इसी तरह जीतपुर काल ब्लाक के अन्तर्गत सुंन्दरपहाड़ी प्रखंड के तेलमीठा, डुमरपालम, डाहुबेड़ा, पकेड़ी एवं जीतपुर गांव के 338.78 एकड़ रैयती जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव है। रैयती जमीन का अधिग्रहण करने से हजारों रैयत उजड़ जायेंगे इसलिए वे इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। 

इस परियोजना को लेकर कई सवाल है। इस परियोजना के समझौता-पत्र में कहा गया है कि यह परियोजना जनहित एवं लोक कल्याणकारी है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह परियोजना कैसे जनहित एवं लोक कल्याणकारी है जबकि अडानी पावर लिमिटेड एक निजी कंपनी है, जिसका सरोकार सिर्फ मुनाफा कमाने से है। यदि यह परियोजना जनहित एवं लोक कल्याणकारी है तो 1600 मेगावट बिजली में से 1200 मेगावट बिजली बंगलादेश को बेचने का समझौता क्यों किया गया है? इससे किसको लाभ होगा? झारखंड में बिजली की भारी कमी होने के बावजूद इस परियोजना का 75 प्रतिशत बिजली बंगलादेश को क्यों बेचा जायेगा? यह कैसा जनहित एवं लोक कल्याणकारी कदम है? हकीकत यह है कि यदि अडानी कंपनी झारखंड में बिजली बेचती तो उसे कम मुनाफा होता। चूंकि कंपनी का मुख्य उद्देश्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना इसलिए कंपनी 1200 मेगावट बिजली बंगलादेश को बेचकर उसे ज्यादा कीमत वसूलेगी। यह परियोजना जनहित एवं लोक कल्याणकारी बिल्कुल नहीं है बल्कि अडानी कंपनी के लिए मुनाफा केन्द्रित है। झारखंड सरकार लोगों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है। 

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण करने की प्रक्रिया में ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यावस्थपन कानून 2013 का उल्लंघन किया गया है? इस कानून के अनुसार एक एक्सपर्ट ग्रुप को सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन करना, जिसमें ग्रामसभा के दो सदस्य का होना जरूरी है। लेकिन सरकार ने मुंबई की एक कंपनी ए.एफ.सी. इंडिया लिमिटेड से सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन कराया है, जिसने सिफाशि किया है कि इस परियोजना का सकारात्मक प्रभाव नकारात्मक से ज्यादा लाभकारी है। सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन प्रतिवेदन में कहा गया है कि 70.3 प्रतिशत कृषि भूमि है। आंदोलनकारी रैयत कहते हैं कि अडानी कंपनी के लिए 80 प्रतिशत कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। ये जमीन सिंचित हैं। यहां नहर है तथा आस-पास छोटी-छोटी नदियां, तालाब एवं कुआं हैं। इसके अलावा यहां डीप बोरिंग से भी सिंचाई की जाती है। जमीन काफी उपजाउ है एवं बहुफसलीय है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यावस्थपन कानून 2013 के धारा - 10 के तहत बहुफसलीय कृषि भूमि का अधिग्रहण पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद झारखंड सरकार इस जमीन को अडानी कंपनी के लिए अधिग्रहण कर रही है। इस परियोजना का जो रैयत विरोध कर रहे हैं उनके उपर पुलिसिया जुल्म किया जा रहा है, फर्जी मुकदमा दर्ज किया गया है तथा कुछ लोगों को जेल में डाला गया था। इस परियोजना को स्थापित करने के लिए कानून का घोर उल्लंघन किया गया है। 

झारखंड सरकार विकास को लेकर जितना भी शोरगुल कर ले लेकिन आज के विकास की यही हकीकत है। अडानी पावर लिमिटेड का पावर प्रोजेक्ट के लिए जमीन, पानी और कोयला झारखंड से लिया जायेगा। कोयला निकालने के लिए जंगल काटा जायेगा और बड़े पैमाने पर यहां पर्यावरणीय क्षति होगी। यहां के लोग विस्थापित होंगे। लेकिन बिजली बंगलादेश को दिया जायेगा। इस परियोजना का एकमात्र उद्देश्य है अडानी कंपनी को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पहंचाना क्योंकि कंपनी के मालिक गौतम अडानी भारतीय लोकतंत्र को खरीदने की ताकत रखते है। आज के विकास का अर्थ है पूजीपतियों को फायदा पहुंचाना, प्राकृतिक संसाधनों को औद्योगिक घरानों को सौपना और आदिवासी इलाके में उनका साम्राज्य स्थापित करना। अब लोगों को तय करना है कि वे इस विकास प्रक्रिया का हिस्सेदार बनना चाहते हैं या नहीं। 

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

आदिवासियों के लिए विनाश है औद्योगिक विकास

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

झारखंड की राजधानी रांची स्थित ‘खेलगांव’ में 16-17 फरवरी, 2017 को ‘मोमेंटम झारखंड’ के अन्तर्गत आयोजित ‘ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट’ के मद्देनजर राज्य में एक बार फिर से ‘औद्योगिक विकास’ का तूफान आ खड़ा हुआ था। राज्य के चारों तरफ ‘औद्योगिक विकास’ पर चर्चाओं का बाजार गर्म था। कोई बोलता, ‘‘झारखंड बदल रहा है’’ तो कोई कहता, ’‘देश बदल रहा है’’। ‘विकास’ के इस शोरगुल के बीच हमलोग भी ‘विकास’ देखना चाहते थे। लेकिन रांची में नहीं जहां सरकारी खजाना में जमा आम-जनता के टैक्स का 300 करोड़ रूपये को देश-विदेश से आये 11,000 पूंजीपतियों के आगवानी और उनको विकास दिखाने के लिए पानी की तरह बहाया गया। बल्कि हमलोग सिंहभूम में विकास देखना चाहते थे जहां देश के औद्योगिक विकास की नीव पड़ी थी। यह वही इलाका है जहां ‘हो’, ‘भूमिज’ और ‘मुंडा’ आदिवासी लोग रहते हैं तथा लौह-अयस्क का आकूत भंडार है। विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर एशिया का सबसे बड़ा सखुआ के जंगला को उजाड़कर और पहाड़ों को खोदकर यहां प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रूपये मूल्य का लौह-अयस्क का उत्खनन किया जाता है। लेकिन यहां रहने वाले आदिवासी लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जुझ रहे हैं। मन में कई सवाल उठता है। यह कैसा विकास है? किसके लिए विकास? और विकास की कीमत कौन चुका रहा है?  

28 मार्च 2017 को इंग्लैड के ससेक्स विश्वविद्यालय के पर्यावरण इतिहासकार प्रोफेसर विनिता दामोदरण, जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर रोहन डिसूजा और मैं ‘विकास’ की खोज में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले स्थित सारंडा जंगल की ओर निकल पड़े। पोड़ाहाट से लेकर सारंडा तक पूरे जंगल में आग लगा हुआ था। लेकिन इस आग को बुझाने वाला कोई नहीं दिखा क्योंकि शायद यह आग वन विभाग के पदाधिकारियों ने ही लगाया था। अब वन विभाग प्राकृतिक जंगलों को नष्ट कर सागवान का जंगल लगा रहा है, जिससे आदिवासी, वन्यजीवन और जैवविविधता तबाह हो जायेंगे। कम्पा कानून 2016 के तहत वृक्षारोपन के लिए केन्द्र सरकार ने झारखंड सरकार को 399 करोड़ रूपये दिया है। वन विभाग ने प्राकृतिक जंगलों को जलाकर नष्ट करने के बाद इस पैसे से सागवान का जंगल लगाने का काम भी कहीं-कहीं शुरू किया गया है। आदिवासी, जैवविविधता और पर्यावरण से सारोकार रखने वालों के लिए यह दर्दनाक खबर है। लेकिन यही आधुनिक विकास है, जहां आदिवासी, वन्यजीवन, पर्यावरण, जैवविविधता और प्राकृतिक जंगलों के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि ये पिछड़ेपन के द्योतक माने जाते हैं। आजकल आक्सीजन पार्क में टहलना, बोतल में बंद पानी खरीदकर पीना और चौमिन खाना विकास है। क्या हमलोग कभी यह सोचते हैं कि कैसे खुबसूरत प्रकृति को हम अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए बर्बाद कर रहे हैं? 

एक लंबा सफर तय करने के बाद हमलोग नोवामुंडी पहुंचे जहां झारखंड आंदोलन के एक क्रांतिकारी युवा नेता मंगल सिंह बोबोंगा, गितिलोर के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम एवं मेरालगड़ा के मुंडा जयराम बारजो हमारा इंतिजार कर रहे थे। स्वागत-परिचय का रस्म पूरा करने के बाद हम लोगों ने मिलकर सारंडा जंगल, आदिवासी और सिंहभूम में औद्योगिक विकास का इतिहास छानने की कोशिश की। आदिवासी समाज के पारंपरिक नेतृत्वकर्ता - मुंडा, मानकी या पाहन स्वंय में इतिहास की पोथी हैं। उनके पास कलम, कापी और पोथी शायद ही होता हैं लेकिन जब वे बोलना शुरू कर देते हैं तो उस क्षेत्र का सम्पूर्ण इतिहास को सामने लाकर रख देते हैं। इन लोगों ने भी हमें यहां के इतिहास से रू-ब-रू करवाया। सारंडा का अर्थ है ‘सात सौ पहाड़ों का जंगल’ जो 860 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एशिया का सबसे बड़ा सखुआ का जंगल है। नोवामुंडी का अर्थ भी पहाड़ है जो सारंडा जंगल के सात सौ पहाड़ों में से एक था, लेकिन लौह-अयस्क उत्खनन के कारण अब यह एक छोटा शहर में तब्दील हो चुका है। यहीं से देश में खनन और औद्योगिक विकास की शुरूआत हुई थी। 

ऐसा माना जाता है कि ‘हो’, मुंडा और ‘भूमिज’ लोग एक ही समूह से आते हैं जो सिंहभूम के प्रथम निवासी हैं। सारंडा वनक्षेत्र सिंहभूम का ही एक हिस्सा है जहां मूलतः ‘हो’ और ‘मुंडा’ आदिवासी लोग रहते हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 125,000 है। ये लोग इन पहाड़ों के बीच-बीच में समतल जगहों पर खेती करते है और गांव बसाकर सदियों से रह रहे हैं। लौह-अयस्क की खोज में इस इलाके का भ्रमण करते समय ‘हो’ आदिवासियों को लोहा से बना कुल्हाड़ी का उपयोग करते हुए देखकर भूगर्भ-वैज्ञानिक आश्चर्य चकित थे। उन्होंने इन आदिवासियों से पूछा कि यह लोहा उन्हें कहां से मिला? जवाब में आदिवासियों ने नोवामुंडी पहाड़ की ओर इशारा किया। और जब ये भूगर्भ-वैज्ञानिक नोवामुंडी पहाड़ पर गये तो उन्हें लौह-अयस्क का आकूत भंडार मिल गया जिसकी वे खोज में थे। लेकिन आदिवासियों का यह इशारा उनके लिए ही विनाश का कारण बन गया। टिस्को कंपनी जो अब टाटा स्टील लिमिटेड के रूप में जाना जाता है यहां लौह-अयस्क का उत्खनन शुरू किया, जिसके लिए कंपनी ने आदिवासियों को मुआवजा दिये बगैर ही उनकी जमीन और घर-बारी से बेदखल कर दिया। 

उद्योगपति जमशेद नासरवान टाटा ने कई देशों के अपने व्यापारिक भ्रमण के दौरान भारत में एक अत्याधुनिक ‘आयरन एवं स्टील’ कंपनी बनाने का सपना संजोया। भारत लौटने के बाद उन्होंने वर्तमान झारखंड राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले स्थित कालीमाटी नामक गांव में इंटिग्रेटेड स्टील प्लांट लगाने की योजना बनायी। इसी बीच जर्मनी यात्रा के दौरान 19 मार्च 1904 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनके सपने को पूरा करने के लिए उनके बेटे दोराबजी टाटा ने 26 अगस्त, 1907 को इंडियन कंपनी एक्ट 1882 के तहत ‘टाटा आयरन एवं स्टील कंपनी लिमिटेड’ (टिस्को) की स्थापना की। इस तरह से टिस्को ने 1907 में टाटा स्टील एवं 1911 में टाटा पावर की स्थापना की। कंपनी ने इसके लिए कालीमाटी और साकची के आप-पास के आदिवासियों का 24 गांवों को कब्जा किया, जहां भूमिज, हो एवं संताल आदिवासी निवास करते थे। आदिवासियों को अपनी जमीन, घर और बारी से बेदखल होना पड़ा लेकिन उन्हें मुआवजा के रूप में कुछ नहीं दिया गया। बल्कि उल्टे टिस्को जमींदार बनकर इन आदिवासियों से उनकी बची-खुची खेती की जमीन का लगान वसूलता था। 

इसी बीच 1925 में टिस्को ने नोवामुंडी में लौह-अयस्क का उत्खनन कार्य शुरू करने की प्रक्रिया प्रारंभ किया। गितिलोर के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम बताते हैं कि 1927 में टिस्को कंपनी ने लौह-अयस्क उत्खनन के लिए तीन गांवों - चिरूबेड़ा, बालीजोर एवं कोड़ता के आदिवासियों को विस्थापित करते हुए उनकी खेती की जमीन, घर और बारी को कब्जा कर लिया लेकिन उन्हें एक पैसा भी नहीं दिया। वे लोग आज भी मुआवजा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये विस्थापित आदिवासी लोग अपने गोत्र के मुंडाओं एवं संबंधियों के सहयोग से गितिलोर, डुकासाई, मसरीबेड़ा, मुर्गा एवं मेरालगड़ा में बस गये। इन विस्थापितों में से कोड़ता गांव के 10 परिवारों को ‘हेम्ब्रम’ गोत्र के होने के कारण गुंडीजोड़ा गांव के मुंडा रोबड़ो हेम्ब्रम ने गितिलोर में बसाया। ये लोग आज 10 परिवार से बढ़कर 60 परिवार हो गये हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 250 है। वर्तमान में टाटा कंपनी को नोवामुंडी में 1160.06 हेक्टेअर क्षेत्र का खनन लीज मिला है, जिसका कीमत चुकाये बगैर ही कंपनी अरबों रूपये कमा रहा है और आदिवासी लोग विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं। 

मंगल सिंह बोबोंगा बताते है कि टाटा कंपनी के द्वारा कोड़ता गांव में किये गये अधिगृहित जमीन पर ‘हो’ आदिवासियों का पूजास्थल ‘देशाउली’ है। ऐसा माना जाता है कि ‘देशाउली’ में ‘मरांग बुरू’ यानी हो आदिवासियों के भगवान रहते हैं इसलिए किसी भी व्यक्ति को ‘देशाउली’ से एक पत्ता भी लेने की इजाजत नहीं दी जाती है। लेकिन टाटा कंपनी ने ‘देशाउली’ को भी कब्जा कर लिया है, जिसके खिलाफ 2012 में आदिवासियों ने आंदोलन किया। फलस्वरूप, ‘देशाउली’ में पूजा करने हेतु आदिवासियों को घुसने के लिए टाटा कंपनी को गेट खोलना पड़ा। लेकिन टाटा कंपनी आज भी आदिवासियों को ‘देशाउली’ में पूजा करने के लिए वर्ष में सिर्फ एक ही बार घुसने की इजाजत देता है। क्या विकास का माडल कहलाने वाला टाटा कंपनी दूसरे धर्मावलंबियों के साथ भी ऐसा ही सुलूक करता? क्या यह आदिवासियों के धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या टाटा कंपनी आदिवासियों के भगवान के घर को भी कब्जा करने की ताकत रखता है? टाटा कंपनी को किसने यह अधिकार दिया है? क्या टाटा कंपनी को आदिवासियों से माफी नहीं मांगनी चाहिए? 
  
नोवामुंडी में औद्योगिक विकास और आदिवासियों के विनाश का इतिहास से रू-ब-रू होने के बाद हमलोग गितिलोर गांव की ओर चल पड़े क्योंकि हम विकास में उन आदिवासियों की भागीदारी देखना चाहते थे जिन्होंने अपनी खेती की जमीन, घर-बारी और सबकुछ देश के विकास के लिए टिस्को यानी टाटा कंपनी को सौंप दिया था। दिन के लगभग एक बज रहे थे। चाईबासा-नोवामुंडी मुख्यसड़क को छोड़ते ही हमारी गाड़ी गड्ढ़ों से भरे कच्ची सड़क पर हिचगोले खाने लगी। इसी से गांव के विकास की परिकल्पा की जा सकती थी। आजादी के सात दशक और टाटा कंपनी द्वारा इस क्षेत्र में विकास के नाम पर लौह-अयस्क का उत्खनन करते हुए नौ दशक बीत चुके हैं लेकिन जिन आदिवासियों की जमीन पर लौह-अयस्क का उत्खनन हो रहा है उनके गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए एक पक्का सड़क तक नसीब नहीं हुआ है। यह कैसा विकास है? लौह-अयस्क का उत्खनन किसके लिये? क्या विकास का अर्थ सिर्फ पूंजीपतियों को मुनाफा पहुंचाना है?

इसी बीच हम लोग गितिलोर पहुंचे। गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था मानो किसी का देहांत हो गया हो। गांव के एक हिस्से में आम के पेड़ों के नीचे ससानदिरी के पत्थरों पर गांव के कुछ लोग बैठे हुए थे। ऐसा नजारा था जैसे ये आदिवासी लोग अपने पूर्वजों के साथ ही रहते हैं। गांव में अधिकांश घर टूटा-फूटा था। केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा आवास योजना के तहत बनाये जाने वाले इंदिरा आवास या बिरसा आवास इनके लिये नहीं है शायद? झारखंड सरकार ने गांव में एक काम तो जरूर किया है। यहां प्रत्येक परिवार के लिए एक शौचालय की व्यवस्था है लेकिन 60 परिवारों में से कोई भी शौचालय का उपयोग नहीं करता है क्योंकि यहां पानी की किल्लत है। आधे से ज्यादा चपाकल बंद पड़े हैं। यहां के आदिवासियों के पास न तो रोजगार की व्यवस्था है और न ही रहने के लिए ठीक से घर लेकिन सरकार ने शौचालय बनवाया है। ये शौचालय बंद पड़े है या गांव वाले उसका उपयोग सामान रखने के लिए करते है। दरअसल सरकारी योजना ऐसा ही होता है। बस किसी तरह खानापूर्ति।

गांव में विकास देखते समय अचानक मेरी नजर गांव के उपर से गुजरने वाली बिजली तार पर पड़ी। मैंने गांव के मुंडा से पूछा, ‘‘क्या गांव में बिजली है?’’ बिजली तार को निराशा भाव से निहारते हुए मुंडा ने जवाब दिया, ‘‘बिजली नहीं है और हमें नहीं मालूम कि इस गांव में कभी बिजली भी आयेगी या नहीं?’’ टाटा कंपनी के नोवामुंडी स्थित प्लाट में बिजली पहुंचाने के लिए बोकारों के डिविसी से बिजली का तार खींचा गया है जो गितिलोर गांव से होकर गुजरती है। यह कितना दुःख है कि टाटा कंपनी के लिए बोकारो से बिजली सप्लाई किया जाता है लेकिन उन आदिवासियों के घरों में अबतक बिजली नहीं पहुंचायी गयी है जिनके जमीन से लौह-अयस्क निकालकर टाटा दुनियां में अपना व्यापार चला रहा है और देश में आधुनिक विकास का माडल बना हुआ है। गांव के आदिवासी प्रतिदिन सिर्फ बिजली तार को देखते रहते हैं। इन आदिवासियों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार करने के लिए क्या रतन टाटा को देश के सामने शर्म से अपना सिर नहीं झुका लेना चाहिए? 

गितिलोर गांव में एक सरकारी विद्यालय है, जहां बच्चों को दोपहर में प्रतिदिन खिचड़ी मिलता है लेकिन यहां मौलिक शिक्षा गायब है इसलिए माॅं-बाप अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के प्रति बहुत उत्साहित नहीं दिखे। विद्यालय चल रहा था लेकिन बहुत सारे बच्चे अपने मां-बाप के साथ महुआ चुन रहे थे या हवा के झोंके से गिरा हुआ छोटे-छोटे आम को चुन-चुनकर खा रहे थे। गांव में पांच लड़के इंटर पास हैं लेकिन एक भी लड़की ने आजतक यहां मैट्रिक पास नहीं किया है। इंटर पास युवा टाटा कंपनी से नौकरी मांगते हैं तो कंपनी के पदाधिकारी इन्हें आई.टी.आई. का प्रशिक्षण प्राप्त कर आने की सलाह देते हैं। युवा सवाल उठाते हैं कि हमारे पास आई.टी.आई. का ट्रेनिंग करने के लिए पैसा कहां है? यदि हमारे पास पैसा होता तो हम आगे नहीं पढ़ते? टाटा कंपनी के नोवामुंडी परियोजना में बाहर के लगभग 1600 लोग नौकरी कर रहे हैं लेकिन कंपनी इन आदिवासियों को काम नहीं देती है, जिनकी जमीन पर लौह-अयस्क का उत्खनन कार्य चल रहा है। झारखंड सरकार कहती है कि देशी-विदेशी कंपनियों के द्वारा राज्य में पूंजीनिवेश करने से लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। लेकिन हकीकत देखिये कि पूंजीनिवेश किसके जमीन पर हो रहा है और नौकरी किसको मिला है? क्या यह आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं है? जब स्थिति ऐसी है तो लोग कंपनियों को अपनी जमीन क्यों देंगे?  

गितिलोर गांव के आस-पास एक भी स्वस्थ्य केन्द्र नहीं है इसलिए बीमार पड़ने पर गांव के आदिवासी लोग जड़ी-बूटी से अपना इलाज करते हैं और गंभीर अवस्था में नोवामुंडी स्थित टाटा कंपनी द्वारा स्थापित अस्पाताल में जाते हैं। लेकिन टाटा कंपनी के व्यवहार से गांव के सुखराम हेम्ब्रम बहुत गुस्से में हैं। वे कहते हैं, ‘‘टाटा कंपनी हमारे जमीन पर खनन कार्य कर रहा है लेकिन जब हम गांव के बीमार लोगों को लेकर कंपनी के हास्पिटल में जाते हैं तो दवा खरीदने के लिए भी पैसा देना पड़ता है। क्या हमें दवा मुफ्त में नहीं मिलना चाहिए?’’ इन लोगों के साथ विकास की बात आप कैसे करेंगे जो पिछले नौ दशकों से अपनी खेती की जमीन, घर-बारी के साथ सबकुछ खोकर टाटा कंपनी को फूलते-फलते देख रहे हैं? क्या सरकार को इनकी सुधी नहीं लेनी चाहिए? विकास पर भाषण किसके लिये?

गांव के एक छोर पर कटहल पेड़ के नीचे बैठे बूजुर्ग इस बात से चिंतित दिखे कि मौसम बदलने से गांव में खेती और वनोपज दोनों पर जबर्दास्त प्रभाव पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों से एक तरफ जहां खेती ठीक से नहीं हो रही है तो वहीं वनोपज में भी भारी कमी आयी है। गांव की अर्थव्यवस्था खेती, वनोपज और पशुपालन पर ही किसी तरह टिका हुआ है। गांव के लोग मुश्किल से दो शांम खाना खाते हैं। खाने में मूलतः भात और जंगल से मिलने वाला साग। मंहगाई के कारण गांव में दाल और मांस तो पर्व-त्योहार और शादी को छोड़कर कभी किसी को नसीब ही नहीं होता है। मेरालगड़ा के मुंडा जयराम बारजो कहते हैं, ‘‘गांव के लोगों को दाल नसीब नहीं होता है क्योंकि उनके पास दाल खरीदने के लिए पैसा नहीं है। लोग किसी तरह जिन्दा हैं वही काफी है।’’ महिलाएं और बच्चे खून की कमी और कुपोषण से जुझ रहे हैं। गांव में कुपोषित बच्चों की भरमार है। गांव में नजर डालते ही चारों तरफ अर्द्धनग्न कुपोषित बच्चे दिखाई पड़ते हैं। इनके भविष्य के बारे में सोचकर डर लगने लगता है। क्या ये देश के बच्चे और भविष्य हैं भी जिनका वर्तमान ही अंधेरा है?   

गांव के दूसरे छोर पर कुसुम पेड़ के नीचे कुछ आदिवासी महिलाएं अपने कुपोषित बच्चों के साथ भात में पानी डालकर, नमक और प्याज के साथ खा रही थीं। ये महिलाएं महुआ के फूलों के गिरने का बेसब्री से इंतिजार कर रही थी, जो सूर्य की तपती धूप से एक-एक कर पेड़ से टपक रही थीं। ग्रीष्मकाल में महुआ इन आदिवासियों के आजीविका का एक बहुत बड़ा स्रोत है। वे प्रतिदिन महुआ के फूलों को चुनते हैं और उसे धूप में सुखाने के बाद स्थानीय बाजार में बेचते हैं। इसके अलावा महुआ से कई तरह का व्यंजन बनाकर खाते हैं। लेकिन झारखंड सरकार ने फरमान जारी किया है कि एक परिवार सिर्फ 15 किलो महुआ रख सकता है, जिससे लोग चिंतित हैं। यह कैसा फरमान है? आप व्यापारियों को बेहिस्साब समान इक्ट्ठा करने देंगे, अमीर लोग करोड़ों रूपये रख सकते हैं और पूंजीपतियों को आकूत सम्पति रखने की इजाजत है। लेकिन आदिवासी लोग 15 किलो से ज्यादा महुआ नहीं रख सकते हैं। यह कहां का न्याय है? सरकार आदिवासियों को क्यों सताना चाहती है? 

गांव के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम बताते हैं कि टाटा कंपनी के द्वारा अधिगृहित जमीन का मुआवजा के लिए चिरूबेड़ा, बालीजोर एवं कोड़ता के विस्थापित आदिवासियों ने 1996 में एस.डी.ओ. कोर्ट, चाईबासा में एक मुकदमा दायर किया, जिसकी सुनवाई दो दशक तक चली, जिसके लिए इन विस्थापितों ने बेहिस्साब पैसा खर्च किया। लेकिन 28 जनवरी, 2017 को न्यायालय ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि यह बहुत पुराना मामला है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि न्यायालय को इस मामले को सिर्फ पुराना मामला बताकर खारिज करने के लिए बीस साल का समय क्यों लगा? क्या इन आदिवासियों के साथ टाटा कंपनी के द्वारा किये गये ऐतिहासिक अन्याय में न्यायालय ने स्वयं को भी भागीदार नहीं बना लिया? ये आदिवासी लोग कहां न्याय मांगने जायेंगे?  

देश के विकास के लिए गितिलोर में बसे कोड़ता गांव के विस्थापित आदिवासियों के साथ किया गया अन्याय और उनका विनाश देखने के बाद हमलोग टाटानगर जमशेपुर गये, जहां देश के औद्योगिक विकास का इमारत खड़ा है लेकिन आदिवासी गायब हैं। जमशेदपुर और नोवामुंडा के विकास की कहानी बताती है कि औद्योगिक विकास में आदिवासियों का अस्तित्व मिटना निश्चित है। टाटा कंपनी के 100 साल के सफर में कंपनी देश में विकास का माडल बन गया, आदिवसियों का गांव कालीमाटी टाटानगर जमशेदपुर में तब्दील हो गया तथा जमशेदपुर में आदिवासियों की जनसंख्या 95 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसी तरह नोवामुंडी एक पहाड़ से तब्दील होकर छोटा शहर बन गया और इस इलाके से आदिवासी गायब हो गये। जमशेदपुर और नोवामंडी में आदिवासियों को उनकी जमीन, घर और बारी से विकास के नाम पर बेदखल करने के बाद बिहार, बंगाल, ओड़िसा एवं अन्य राज्यों से नौकरी करने आये गैर-आदिवासी यहां स्थापित हो चुके हैं। यहां की व्यापारिक गतिविधि, राजनीति और अर्थव्यवस्था अब इनके नियंत्रण में है। यही है औद्योगिक विकास ही हकीकत, जिसको आदिवासियों को समझना होगा।  

भारत के आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने रूस से आधुनिक विकास माडल लाकर देश में औद्योगिक विकास को गति प्रदान की। उनका मानना था कि औद्योगिकरण से गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी दूर होगी और देश का सरकारी खजारी भी दुरूस्त होगा। लेकिन नेहरू का सपना आदिवासी समाज के बर्बादी का मूल कारण बना। औद्योगिक विकास ने खेती, वनोपज और पशुपालन पर आधारित आदिवासी समाज के अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ दिया क्योंकि उद्योग लगाने, डैम बनाने और खनन कार्यों के लिए आदिवासियों को उनकी खेती की जमीन, जंगलों, पहाड़ों, जलस्रोतों और खनिज से भरे इलाकों से बेदखकर कर दिया गया। इन विकास परियोजनाओं का लाभ सिर्फ पूंजीपतियों, जमींदारों, परियोजना पदाधिकारियों, इंजीनियरों, ठेकेदारों, राजनेताओं तथा बाहरी गैर-आदिवासियों को मिला। 

आज देश में औद्योगिक विकास आदिवासियों के लिए दानव बन चुका है। सिर्फ आदिवासी समाज ही विकास की कीमत चुका रहा है। इसके बावजूद झारखंड सरकार ने पिछले दिनों कारपोरेट घरानों के साथ 210 नये एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किया है। इसलिए आने वाले समय में ये कंपनियां जहां-जहां स्थापित होंगे आदिवासी वहां-वहां विस्थापित होंगे। ऐसी स्थिति में यदि आदिवासी समाज को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो उसे अपनी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को बचाने के लिए संघर्ष करना होगा क्योंकि औद्योगिक विकास आदिवासियों के विनाश का सबसे बड़ा कारण है। 

- लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं।