शनिवार, 28 दिसंबर 2019

आदिवासी हितों का संरक्षण हो सर्वोपरि

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 में से 25 सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली महागठबंधन को जीताकर राज्य के आदिवासियों ने नयी सरकार को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि उनकी संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करना ही इस सरकारी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि यह सरकार भी पिछली भाजपा सरकार की तरह ही कारपोरेट और व्यापारियों के हितों को साधने की कोशिश करती है तो उसे भी इसका खमियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। झारखंड के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए काम करना आसान नहीं होगा फिर भी उन्हें आदिवासियों के इन मौलिक हितों को अपनी प्राथमिक सूची में रखना होगा।    
1. झारखंड की भाजपा सरकार ने सीएनटी एक्ट 1908 एवं एसपीटी एक्ट 1949 में संशोधन करते हुए आदिवासियों की कृषि जमीन को गैर-कृषि घोषित कर उसे कारपोरेट एवं व्यापारियों को सौपने की कोशिश की, जिससे आदिवासियों के बीच भय का महौल बना गया था। आदिवासी हर कीमत पर अपनी जमीन की रक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं क्योंकि जमीन उनके लिए सम्पति न होकर उनकी पहचान, संस्कृति, इतिहास, विरासत और अस्तित्व है। इसलिए नयी सरकार को सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों को सख्ती से लागू करते हुए उनकी जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी एवं गैर-आदिवासियों के द्वारा अवैध तरीके से लिये गये आदिवासियों की जमीन को मूल रैयतों को वापस करना होगा। 

2. झारखंड के पांचवीं अनुसूची इलाका की सुरक्षा यहां के आदिवासियों के लिए बहुत बड़ा मसला बन चुका है क्योंकि अब यहां बाहरी गैर-आदिवासियों की जनसंख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। पत्थलगड़ी आंदोलन उसी का एक प्रतिकार था और आगे भी ऐसा महौल देखने को मिल सकता है। इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के उप-अनुच्छेद 5 एवं 6 का उपयोग करते हुए सरकार को इस क्षेत्र की सुरक्षा हेतु कानून बनाकर बाहरी आबादी को यहां बसने, नौकरी-पेशा एवं व्यवसाय करने पर प्रतिबंध लगाना होगा, जिससे आदिवासी जमीन, पहचान, रोजगार, भाषा और संस्कृति का संरक्षण होगा। इस क्षेत्र में बेहतर शिक्षा की व्यवस्था विद्यालयों में आदिवासी भाषाओं में करना होगा।   

3. भाजपा सरकार के द्वारा लागू किये गये स्थानीय नीति 2016 को खारिज करते हुए झारखंडी हित में नयी स्थानीय नीति बनाकर यहां के युवाओं को सरकारी नियोजनों में नियुक्ति देना होगा। राज्य सरकार के अन्दर खाली पड़े पदों को जल्द से जल्द भरना होगा तथा जेपीएससी का सफल परीक्षा सम्पन्न करते हुए यहां के यवक-युवतियों के द्वारा निचले स्तर के नौकरशाही के रिक्त पदों को भरना होगा। राज्य में विगत वर्षों हुई नियुक्तियों में लगभग 80 प्रतिशत बाहरी लोगों को नौकरी मिली है, जिसे यहां के युवाओं में आक्रोश है, जिसे सरकार को समझना होगा।  

4. भाजपा सरकार के द्वारा राज्य में लागू किये गये गो हत्या निरोधक कानून 2005 एवं झारखंड धर्मस्वतंत्र कानून 2017 को खारिज करते हुए लोगों के भोजन का अधिकार, जीवन जीने का अधिकार और धार्मिक आजादी के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना होगा क्योंकि इन दोनों कानूनों की आड़ में लाखों लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया है। खान-पान और आस्था हर व्यक्ति का निजी मसला है, जिसकी सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक जिम्मेवारी है। 

5. भाजपा सरकार ने विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन, जंगल और खनिज सम्पदाओं को लूटकर यहां भय का महौल बना दिया था। झारखंड राज्य के गठन के बाद से ही अलग-अलग समय पर बने भाजपा सरकारों के द्वारा कारपोरेट घरानों के साथ एमओयू करने का सिलसिला चल पड़ा था जो पिछले पाॅच वर्षों में चरमसीमा पर पहुंच गया था, जिसे आदिवासी रैयत भयभीत हो चुके थे। यही कारण है कि भाजपा को सत्ता गवांना पड़ा है। इसलिए इस सरकार को भाजपा सरकार के द्वारा लागू किये गये औद्योगिक एवं पूंजीनिवेश बढ़ावा नीति 2016, भूमि बैंक में सूचिबद्ध 21 लाख एकड़ सामाजिक, धार्मिक एवं वनभूमि और कारपोरेट घरानों के साथ अबतक किये गये सभी एमओयू को रद्द करना होगा।

6. आदिवासियों के भारी विरोध के कारण सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों का संशोधन नहीं कर पाने के बाद भाजपा सरकार ने आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना कानून 2013 का संशोधन किया था, जिसका चुनाव में असर पड़ा। इसलिए नयी सरकार को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना संशोधन कानून 2017 को खारिज करते हुए मूल कानून को सख्ती से लागू करना होगा। इसके अलावा रैयतों और ग्रामसभाओं की सहमति के बगैर अधिगृहित किये गये जमीन को मूल रैयतों को वापस करना होगा, जिसमें गोड्डा में अडानी एवं मनोहरपुर में वेदांता कंपनी की जमीन शामिल है।   

7. केन्द्र की यूपीए सरकार ने 1 जनवरी 2008 को आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वनभूमि एवं जंगलों पर व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकार देने के लिए वन अधिकार कानून 2006 लागू किया था। लेकिन भाजपा सरकार ने कारपोरेट घरानों को खनन पट्टा देने के लिए वनाधिकार के दावेदारों के साथ जानबूझकर अन्याय किया है। इसलिए वन अधिकार कानून को लागू करते हुए दावेदारों को जल्द से जल्द वनभूमि और जंगलों पर मालिकाना हक दिया जाना चाहिए।  

8. पेसा कानून 1996 एवं सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट एवं नियमगिरी जजमेंट को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। ग्रामसभाओं की सहम्मति के बगैर गांव के किसी भी तरह की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत एवं खनिज सम्पदा का दोहन नहीं किया जाना चाहिए। पेसा कानून के विरूद्ध भाजपा सरकार के द्वारा गठित कमल कलब, ग्रामीण विकास समिति एवं भूमि बैंक को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। ग्रामसभाओं की सहमति के बगैर गांवों में किसी भी तरह का कार्य नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा पांचवीं अनुसची क्षेत्र के अन्तर्गत गठित नगर निगम एवं नगर पालिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।  

9. आदिवासियों की धार्मिक पहचान को सुनिश्चित करने के लिए राज्य में यथाशीघ्र ‘‘सरना कोड’’ लागू करना ताकि संघ परिवार के द्वारा आदिवासियों का बड़े पैमाने पर किया जा रहा हिन्दूकरण को रोका जा सकेगा। इसके लिए नयी सरकार को जल्द से जल्द विधानसभा में ‘‘सरना कोड बिल’’ पारित किया जाना चाहिए।  

10. ‘‘अबुआ दिसुम, अबुआ राज्य’’ एवं ’’अबुआ हातु रे अबुआ राज’’ यानी स्वायत्तता की मांग को लेकर चले पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े 11,200 आदिवासियों के उपर किये गये देशद्रोह का मुकदमा तत्काल खारिज किया जाना चाहिए। इसके अलावा भारतीय संविधान, कानून एवं पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण हेतु कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं आंदोलनकारियों पर किये गये मुकदमां को खारिज करते हुए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। 
झारखंड विधानसभा चुनाव ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि यदि नयी सरकार आदिवासी और झारखंडी हितों की संरक्षण नहीं कर पाती है तो आगामी चुनाव में इस सरकार को भी सत्ता गवांना पड़ेगा। अब आदिवासियों को धर्म, समुदाय या पार्टियों में बांटकर उनके हितों को चोट नहीं पहुंचाया जा सकता है। हेमंत सोरेन के लिए झारखंड में लंबे समय तक शासन करने का यह शानदार अवसर हो सकता है। अब सत्ता उनके पास है इसलिए उन्हं तय करना है कि वे लंबे रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं या क्षणिक सत्ता सुख भोगना।