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बुधवार, 6 नवंबर 2019

आदिवासी समाज की चुनौतियां

ग्लैडसन डुंगडुंग

आज हमारा आदिवासी समाज चैराहे पर खड़ा दिखाई पड़ता है। एक तरफ जहां संघ परिवार और सरकार हम आदिवासियों की पहचान, धर्म और संस्कृति को तय कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ हमारी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को हमसे छीनकर कारपोरेट को देने का काम भी जारी है। आज की विकट परिस्थिति में हमारी पहली चुनौती है आदिवासी पहचान, भाषा और संस्कृति को बरकरार रखना। हम अपनी आदिवासी पहचान, भाषा एवं संस्कृति से निरंतर बेदखल किये जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2011 को ‘कैलाश एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र सरकार’ के मसले पर फैसला देते समय आदिवासियों की मूल पहचान को स्थापित करते हुए स्पष्ट कहा कि 8 प्रतिशत आदिवासी ही भारत देश के प्रथम निवासी और मालिक हैं तथा शेष 92 प्रतिशत लोग आक्रमणकारी या व्यापारियों के संतान हैं। लेकिन संघ परिवार से संचालित सरकार आदिवासियों की मूल पहचान को खत्म करते हुए उन्हें सिर्फ वनवासी बनाकर वर्ण एवं जाति व्यवस्था के अंदर घुसाने का प्रयास कर रही है। 

एक तरफ जहां हम आदिवासियों के उपर वर्ण एवं जाति व्यवस्था को थोपकर हमारा हिन्दूकरण करने का निरंतर प्रयास हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ हम आदिवासियों की पहचान को धर्म के आधार पर तय करने की भी कोशिश की जा रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि सिर्फ सरना धर्म मानने वाले लोग ही आदिवासी है। यहां प्रश्न उठता है कि संघ परिवार और सरकार हम आदिवासियों की पहचान, धर्म और संस्कृति को कैसे तय कर सकती है? कौन आदिवासी हैं और कौन नहीं हैं यह सरकार या संघ परिवार कैसे तय कर सकते हैं? क्या यदि गैर-आदिवासी सरना धर्म को मानेंगे तो वे भी आदिवासी हो जायेंगे? हमारे पूर्वज हमारी आदिवासियत तय कर चुके हैं। यदि देश में सही एनआसी हो जाये तो हम आदिवासियों को छोड़कर बाकी सभी लोगों को देश छोड़कर जाना पड़ेगा। हमें मजबूती के साथ सरकार को बताना होगा कि हम पहले आदिवासी हैं, बाद में भी आदिवासी हैं और आखिरी में भी आदिवासी हैं। हम आदिवासी ही भारत देश के प्रथम निवासी और संरक्षक हैं। हमें अपनी आदिवासी पहचान की मजबूत दावेदारी करने के साथ-साथ अपनी भाषा एवं संस्कृति को भी बचाना होगा।  

हमारी दूसरी चुनौती है आदिवासी स्वायत्तता को बरकरा रखना। झारखंड अलग राज्य आंदोलन के जनक मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने नारा दिया था - ‘‘अबुआ दिसुम, अबुआ राईज’’ यानी हमारे राज्य में हमारा शासन। झारखंड अलग राज्य बना लेकिन आज यहां बाहरी लोग शासन कर रहे हैं। यहां की विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और व्यवसाय में बाहरी लोगों का ही बोल-बाला है। यदि हम इसे नारा के रूप में कहें तो आज का झारखंड ‘‘अबुआ दिसुम, दिकूआ राईज’’ बन गया है। दिकुओं के राज में हम आदिवासियों को कभी न्याय नहीं मिल सकता है। झारखंड सरकार ग्रामसभाओं के निर्णय को नहीं मानती है। स्वायत्तता आंदोलनों को आज सरकार विरोधी, राष्ट्रविरोधी एवं देशद्रोही कहा जाता है। गांवों की स्वायत्तता की मांग करने वाले आदिवासियों के उपर द्रेशद्रोही का मुकदमा किया गया है। ऐसी परिस्थिति में ’अबुआ दिसुम, अबुआ राज’ का सपना साकार करना बड़ी चुनौती है। क्या हम आदिवासी अपनी स्वायत्तता की दावेदारी करना छोड़ देंगे? 

तीसरी चुनौती है जमीन की सुरक्षा। जमीन ही आदिवासी समाज का मूल आधार है। जमीन हम आदिवासियों के लिए सम्पति नहीं है बल्कि यह हमारी पहचान, अस्मिता, संस्कृति, विरासत और अस्तित्व है। हमारे पूर्वजों ने जंगल-झाड़ को साफ कर तथा उंचा-नीचा स्थल को कोड़कर खेती योग्य जमीन बनाया। उन्होंने जमीन को हमारे लिए सुरक्षित रखने हेतु अपना खून बहाया और कुर्बानी दी। फलस्वरूप, ब्रिटिश हुकूमत को हमारी जमीन बचाने के लिए विशेष कानून - छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 बनाना पड़ा, जिसमें प्रावधान किया गया कि आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं। लेकिन कानून का उल्लंघन करते हुए लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों से लूट लिया गया। इसके बावजूद आज भी हमारे पास काफी जमीन है। हम आदिवासियों को समझना होगा कि यदि जमीन चला गया तो हमारा अस्तित्व भी मटियामेट हो जायेगा। 

चैथी चुनौती है प्राकृतिक संसाधनों को बचाना। झारखंड सरकार ने कारपोरेट के साथ अबतक लगभग 250 एमओयू किया है। वह हर कीमत पर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को कारपोरेट को देने पर तुली हुई है क्योंकि यही कापोरेट घरानों ने इन्हें चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाकर सत्ता सौपा है। जंगलों को उजाड़कर एवं पहाड़ों को खोदकर वहां से खनिज सम्पदा निकाला जा रहा है। इसके अलावा कम्पा कानून 2016 एवं राष्ट्रीय वन नीति 2018 के द्वारा जंगलों को कारपोरेट को सौपने की कोशिश चल रही है तथा आदिवासियों से जंगल छीनने के लिए भारतीय वन संशोधन अधिनियम 2019 लाने का भी प्रयास हो रहा है। इस कानून के द्वारा सरकार कोई भी जंगल को आरक्षित जंगल घोषित करते हुए आदिवासियों से छीनना सकती है। कानून में आरक्षित जंगलों में प्रवेश करने वालों पर गोली चलाने का प्रावधान, बिना वारंट की गिरफ्तारी एवं छापामारी का प्रावधान किया गया है। क्या जंगल के बगैर आदिवासी अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है? जमीन और जंगल आदिवासी अस्तित्व के लिए सबसे जरूरी है। इसके बगैर आदिवासी सभ्यता का अंत हो जायेगा। इसलिए जंगल की सुरक्षा एवं संरक्षण अतिआवश्यक है। 

पांचवीं चुनौती है अनुसूचित क्षेत्र यानी आदिवासी इलाके में बड़े पैमाने पर हो रही गैर-आदिवासियों की घुसपैठी को रोकना। संवैधानिक रूप से राज्य के राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास की जिम्मेवारी दी गई है। इस क्षेत्र के लिए नीति निर्धारण को लेकर ट्राईब एडवाईजरी काउंसिल की भी बड़ी भूमिका है। इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद अनुच्छेद 46 के तहत स्टेट यानी विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को आदिवासियों के उपर होने वाले हर तरह के शोषण एवं अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करना है तथा अनुच्छेद 19 उप-अनुच्छेद 5 एवं 6 का उपयोग करते हुए इनके लिए सुरक्षा घेरा बनाना है। इतने मजबूत प्रावधान होने के बावजूद आदिवासी इलाके में गैर-आदिवासियों की घुसपैठी हो रही है और आदिवासियों की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोज और खनिज सम्पदा को लूटकर बाजार भाव से बेचा जा रहा है। आज इस घुसपैठी, जमीन लूट के अलावा आदिवासियों पर होने वाले शोषण, दमन एवं अत्याचार को रोकना जरूरी है।

हमारी छठवीं चुनौती है आर्थिक संकट से निपटना। अगले 30 वर्षों के अंदर आदिवासी समाज में गंभीर आर्थिक संकट आने की संभावना है क्योंकि सरकारी नौकरी में अवसर न के बराबर होगा। केन्द्र एवं राज्य सरकारें आरक्षण को खत्म करने के लिए सरकारी संस्थानों का निजीकरण कर रही हैं। इसके अलावा आने वाले समय में बड़े पैमाने पर रोबोट का उपयोग होगा, जो लोगों का नौकरी निगल लेगा। जब आदिवासी युवक-युवतियों को नौकरी नहीं मिलेगा तब शहरों में निवास करने वाले आदिवासी अपनी आजीविका कैसे चलायेंगे? इसी तरह जलवायु परिवर्तन ने वनोपज और खेती को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है जो आने वाले समय में गांवों में रहने वाले आदिवासियों के लिए आर्थिक चुनौती खड़ा करेगा। इस चुनौती से निपटने के लिए हम आदिवासियों को अभी से व्यवसाय को अपनाना होगा। हमारें पूर्व बाजार पर निर्भर नहीं थे। उन्होंने अपने लिए बहुत कुछ उत्पादन किया। हमें भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए आदिवासी इलाके का बाजार को अपने कब्जा में करना होगा। यही रास्ता हमें आर्थिक संकट से निपटने में मद्दगार होगा।  

सातवीं चुनौती है आदिवासी एकता के द्वारा राजनीतिक शक्ति हासिल करना। हम आदिवासी राजनीतिकरूप से निरंतर पीछे कमजोर हो रहे हैं क्योंकि हमलोग बंटे हुए हैं। हम लोग कई राजीतिक पार्टी, धर्म एवं समुदायों में विभाजित है, जिसका फायदा उठाकर हमारे दुश्मन हमारी राजनीतिक शक्ति छीनकर हमारे खिलाफ कानून एवं नीतियां बनाते हैं। ये लोग कारपोरेट, व्यापारी एवं बाहरी लोगों के हितों को साधने के लिए हमारे हित में बने कानूनों को संशोधन करते हैं। यही लोग खान-पान, धर्म, संस्कृति, भाषा जैसे हमारे मौलिक अधिकारों को खत्म करने के लिए कानून एवं नीतियां तय करते हैं। ऐसी परिस्थिति में यदि हमलोग एकजुट नहीं हुए तो हम अपना अस्तित्व नहीं बचा पायेंगे। आदिवासी एकजुटता समय की मांग है क्योंकि राजनीति पार्टी, धर्म और समुदाय के नामपर आपस में लड़ते रहने से हम अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति, स्वायत्तता और जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों को नहीं बचा पायेंगे।

रविवार, 27 अक्टूबर 2019

ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर संगठित हमला

ग्लैडसन डुंगडुंग
भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार और इनके संहयोगी संगठन चुनाव के समय राजनीतिक लाभ लेने के लिए एक रणनीति के तहत ईसाई मिशनरी एवं ईसाई आदिवासी धर्मावलंबियों पर संगठित हमला करते हैं। ईसाई मिशनरियों के द्वारा झारखंड में कानूनी रूप से हासिल की गई जमीन को लेकर जांच एवं कानूनी कार्रवाई के नाम पर झारखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, नौकरशाह, भाजपा एवं इनके सहायोगी संगठनों के द्वारा किया जा रहा हमला इसका सटीक उदाहरण है। 

यह गौरतलब है कि जो राजनीतिक पार्टी छोटानागपुर, कोल्हान और संताल परगना के विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करेगा, झारखंड का सत्ता उसी को मिलेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ईसाई मिशनरियों और ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर हमलावर है क्यांकि इन क्षेत्रों में कुछ सीटों को छोड़कर सरना एवं हिन्दू आदिवासियों का बोल-बाला है। इसलिए इन आदिवासियों का भावनात्मक शोषण कर भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव जीतना चाहती है।

2017 में भाजपा सरकार के द्वारा धर्मांतरण के खिलाफ राज्य में कानून लागू करने के बावजूद सरना कोड पर सरकार की चुप्पी और सीएनटी एवं एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन को आदिवासी नहीं भूले हैं। जमीन आदिवासियों का सबसे बड़ा मुद्दा है इसलिए आगामी विधानसभा चुनाव में सीएनटी एवं एसपीटी संशोधन का मुद्दा प्रभावी रहेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए एक रणनीति के तहत सरना एवं हिन्दू आदिवासियों को गुमराह करते हुए उन्हें खुश करने हेतु संघ परिवार, भाजपा एवं इनके सहयोगी संगठनों ने एक बार फिर से ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबियों पर हमला बोलना शुरू किया है। 

इसके लिए सबसे पहले भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा, झारखंड के द्वारा विधायक रामकुमार पाहन की अगुआई में 23 जून 2019 को झारखंड के राज्यपाल को एक स्मार-पत्र देते हुए ईसाई मिशनरियों पर आरोप लगाया गया कि वे राज्य में बड़े पैमाने पर जनजातियों की भूमि एवं गैर-मजरूआ भूमि दोनों पर अवैध दखल कब्जा एवं बन्दोबस्त कर राष्ट्र विरोधी गतिविधि चला रहे हैं। इसलिए इसकी जांच एवं इनके खिलाफ कार्रवाई की जाये। अगले दिन राज्यपाल को स्मार-पत्र सौपने वाली तस्वीर के साथ अखबारों में बड़ी खबर छपी, जिसे भाजपा के हित में राजनीतिक महौल बनना शुरू हो गया। 

इसी बीच उक्त स्मार-पत्र पर कार्रवाई करते हुए राज्यपाल के प्रधान सचिव ने 5 जुलाई 2019 को झारखंड के मुख्य सचिव को ईसाई मिशनरियों के द्वारा आदिवासियों की जमीन हड़पने के मसले पर जांच एवं कानूनी कार्रवाई करने का अनुरोध करते हुए पत्र लिखा। राजभवन के द्वारा ऐसी त्वरित कार्रवाई नहीं देखी गई है। संविधान के पांचवीं अनुसूची में किये गये प्रावधान के अनुसार राज्यपाल को आदिवासियों के विकास एवं काल्याण से संबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रतिवर्ष भेजना है लेकिन राजभवन इस कार्य में शिथिल है। झारखंड के जनसंगठन, आदिवासी संगठन एवं जनांदोलनों ने राज्यपाल को सैकड़ों स्मार-पत्र सौपें लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। तत्कालीन राज्यपाल को मैंने ‘‘लैंड बैंक’’ और ‘‘वाईल्ड लाईफ कारिडोर परियोजना’’ रद्द करने का अनुरोध करते हुए स्मार-पत्र सौंपा लेकिन अबतक राजभवन से कोई जवाब नहीं आया। लेकिन भाजपा नेताओं के स्मार-पत्र पर त्वरित कार्रवाई संदेह में डालता है।  

संघ परिवार और भाजपा ने पूरा सरकारी महकमा को ही अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया हैं। ईसाई मिशनरियों की जमीन जांच संबंधी राजभवन से पत्र मिलते ही झारखंड सरकार के संयुक्त सचिव कमलेश्वर प्रसाद सिंह ने 12 जुलाई 2019 को सभी जिले के उपायुक्तों को उक्त मामले पर जांच एवं कानूनी कार्रवाई करने हेतु पत्र जारी किया। 24 जुलाई 2019 को उन्होंने फिर से पत्र लिखकर उपायुक्तों को याद दिलवाया कि उन्होंने क्या कार्रवाई की उसके बारे में जवाब दें। इसी बीच जिलें के उपायुक्तों ने भी अपने अधीनस्त पदाधिकारियों को पत्र जारी कर कार्रवाई करने का आदेश दिया। सरकारी दफ्तरों से पत्र जारी होता रहा और मीडिया में खबरें छपती रही कि भाजपा सरकार ईसाई मिशनरियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है। इस संदेश को संघ परिवार, भाजपा और उनके सहयोगी संगठन सरना एवं हिन्दू आदिवासियों के बीच जमकर संचार करते रहे। 

लेकिन इतना में बात नहीं बना। भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा ने 19 अगस्त 2019 को एक साथ सभी जिलों के उपायुक्तों के पास प्रदर्शन करते हुए उन्हें स्मार-पत्र सौप कर ईसाई मिशनरियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। यह मसला फिर से अखबारों में छाया रहा। यहां सवाल उठता है कि जब राजभवन, राज्य सरकार और जिले के उपायुक्त ईसाई मिशनरियों की जमीन के मसले पर जांच और काईवाई में जुटे हुए है तो फिर से प्रदर्शन करने की क्या जरूरत पड़ी? जाहिर सी बात है कि राज्य में भाजपा के पक्ष में राजनीतिक महौल बनाने के लिए ऐसा किया गया।

इसके अलावा 15 सितंबर 2019 को संघ परिवार का सहमना संगठन ‘‘जनजाति सुरक्षा मंच, झारखंड’’ ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास से मिलकर ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति के अधिकार से बेदखल करने की मांग करते हुए एक स्मार-पत्र सौंपा। फिर 23 अक्टूबर 2019 को मंच ने दुमका में सम्मेलन का आयोजन किया और अंत में एक स्मार-पत्र उपायुक्त को सौपते हुए मांग किया कि धर्मांतरित ईसाई आदिवासियों को एसटी के अधिकार से वंचित किया जाये।  

भाजपा, संघ परिवार एवं इनके सहयोगी संगठनों के द्वारा ऐसा करने के पीछे ऐहितासिक कारण हैं। इसका मूल कारण यह है कि अलग-अलग धर्म मानने वाले आदिवासी पहले कांग्रेस के वोट बैंक हुआ करते थे। लेकिन 1950 एवं 60 के दशक में झारखंड पार्टी की सफलता को देखकर कांग्रेस घबरा गई। कांग्रेस ने इसके लिए दो रास्ता अपनाया - झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करना और आदिवासियों को धर्म के आधार पर बांटना। 

ईसाई और गैर-ईसाई आदिवासी का विवाद सबसे पहले जेना उरांव ने उठाया, जिसे कांगेरस नेता ठेबले उरांव के द्वारा कांग्रेस आगे बढ़ाती रही। 1970 के दशक में कांग्रेस नेता कार्तिक उरांव ने इसे सरना बनाम ईसाई बना दिया। कार्तिक उरांव ने ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को एसटी का आरक्षण से वंचित करने का मांग की।  इसका परिणाम यह हुआ कि सरना आदिवासी फिर से कांग्रेस के वोट बैंक बन गये। 

संघ परिवार ने 1952 में ही आदिवासी इलाकों में अपना पैठ जमाने के लिए जशपुर में ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम’’ की स्थापना की थी, जिसके पीछे भी कांग्रेस का हाथ था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रवि चन्द्र शुक्ला आदिवासी इलाकों से मिशनरियों को खत्म करना चाहते थे क्योंकि झारखंड आंदोलनकारियों ने उन्हें काला झंडा दिखाया था। उन्हें लगा कि यह काम ईसाई मिशनरियों के इशारे पर ही किया गया है। 

इसका परिणाम यह हुआ कि ‘‘वनवासी कल्याण आश्रम’’ के द्वारा संघ परिवार आदिवासी इलाकों में घुस गया। जब 1980 में भाजपा का जन्म हुआ तबतक संघ परिवार ने आदिवासी इलाकों में अपना पैठ बना लिया था। संघ परिवार और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के द्वारा आदिवासियों को धर्म के आधार पर बांटे गये मसले को गहराई से समझ और उसे एक हथियार के रूप में उपयोग करना शुरू किया। इन्होंने धर्मांतरण और ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को आरक्षण से वंचित करने को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया। 

इन्होंने सरना एवं हिन्दू धर्मालंबी आदिवासियों के दिमाग में यह बात डाल दिया कि ईसाई मिशनरी उनके दुश्मन है, जो उनको उनकी संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ियों से बेदखल कर धर्मांतरण कराते हैं तथा ईसाई धर्म में धर्मांतरित आदिवासी उनके आरक्षण के अधिकार को छीन रहे हैं। वे ईसाई धर्म मानते हैं इसलिए ईसाई मिशनरियों के शिक्षण संस्थानों में उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता है और एसटी आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी हासिल कर लेते हैं। इस तरह से वे दोहरा लाभ लेते हुए समृद्ध हो रहे हैं। ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों के पास नौकरी है इसलिए वे अच्छा घर बनाकर रहते हैं, उनके पास गाड़ी और पैसा भी है। इसलिए वे शान से जीते हैं। 

संघी नेताओं ने उन्हें समझाया कि यदि ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को एसटी का आरक्षण मिलना बंद हो जायेगा तो वे खत्म हो जायेंगे और सरना आदिवासियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा। संघ परिवार और भाजपा ने ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों को सरना एवं हिन्दू आदिवासियों के बीच विलेन के रूप में स्थापित कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने कांग्रेस पार्टी को भी ईसाई आदिवासियों का हितैशी तथा सरना एवं हिन्दू आदिवासियों का विरोधी के रूप में स्थापित कर दिया। फलस्वरूप, अधिकांश सरना एवं हिन्दू आदिवासी कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा का वोट बैंक बन गये। 

झारखंड राज्य के गठन के बाद संघ परिवार और भाजपा के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे बड़ा राजनीतिक चुनौती बना क्योंकि इस पार्टी के पीछे झारखंड आंदोलन का एक बड़ा विरासत था। भाजपा ने जेएमएम को अपने साथ खड़ा करने की कोशिश की और साथ में सरकार भी बनाया। लेकिन जब साथ नहीं चल सके तब संघ परिवार और भाजपा ने जेएमएम को भ्रष्ट, वंशवाद और ईसाई समुदाय का मुखौटा के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। छोटानागपुर को कब्जा करने के बाद भाजपा ने संताल परगना और कोल्हान का रूख किया। विगत कुछ वर्षों से पार्टी अपना पूरा ताकत इन्हीं क्षेत्रों में लगा रहा है। 

संघ परिवार और भाजपा ने एक रणनीति के तहत सरना एवं हिन्दू धर्मावलंबी आदिवासियों को अपना मुखौटा बनाया, जिसके लिए धर्मांतरण, ईसाई धर्मावलंबियों के आरक्षण खारिज करने की मांग और ईसाई मिशनरियों के खिलाफ आग उगलने वाले व्यक्तियों को चुना। भाजपा के अंदर अनुसूचित जनजाति मोर्चा का भी गठन किया गया, जिसके नेता ईसाई मिशनरियों के खलाफ आग उगलते हैं। इसके बाद अनुसूचित जनजाति मोर्चा और सरना जागरण मंच जैसे कई संगठनों का गठन कर अपने कैडरों को के द्वारा ईसाई समुदाय के खिलाफ आग उगलवाते हैं। 

इसके अलावा सरना आदिवासियों की सामाजिक एवं धार्मिक संगठन जैसे केन्द्रीय सरना समिति, आदिवासी हो महासभा, सपाहोड़, इत्यादि को अपना सहयोगी संगठन के रूप में रखा। ये संगठन संघ परिवार के एजंडा को आगे बढ़ाने का काम करते हैं और भाजपा को वोट दिलाते हैं। इन संगठनों को संघ परिवार एवं भाजपा के कैडर ही चलाते हैं। इन्हें संघ परिवार और भाजपा का बी टीम कहा जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि जो आदिवासी ईसाई मिशनरियों के खिलाफ जितना ज्यादा जहर उगलता है उसे उतना ही जल्दी भाजपा चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती है। इसलिए संघ परिवार, भाजपा और इनके सहयोगी संगठनों में कार्यरत आदिवासियों के बीच मिशनरियों के खिलाफ जहर उगलने का प्रतिस्पर्धा है।  

झारखंड बनने के बाद से लगभग एक दशक तक संघ परिवार, भाजपा और इनके सहयोगी संगठनों ने मिलकर धर्मांतरण, नेम्हा बाईबल, लालपाड़ साड़ी और ईसाई धर्मावलंबियों को एसटी के आरक्षण से वंचित करने जैसे मुद्दों पर हंगामा खड़ा करके रखा था। विगत कुछ वर्षों से इन्होंने ईसाई संस्थानों को मिलने वाले विदेशी फंड का दुरूपयोग, सिस्टरां के द्वारा बच्चा बेचने एवं आदिवासियों की जमीन को कब्जा करके चर्च एवं अन्य संस्थान बनाने का झूठा आरोप लगाकर ईसाई मिशनरियों को बदनाम करने हेतु अभियान चलाया है। इस अभियान को न सिर्फ सरकार का सहयोग है बल्कि राजभवन भी इसमें शामिल है क्योंकि इसके पीछे संघ परिवार खड़ा है। ईसाई मिशनरी एवं ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों पर संगठित हमला सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। 

शनिवार, 27 जुलाई 2019

जमीन के लिए जनसंहार

ग्लैडसन डुंगडुंग

17 जुलाई 2019। आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में किये गये जनसंहारों के इतिहास में और एक भयावह अध्याय। यह अध्याय जुड़ा है उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिलान्तर्गत मूर्तियां पंचायत के उम्भा और सपही गांव के गोड़ आदिवासियों की जनसंहार का। यह जनसंहार प्रायोजित था। सत्ता चलाने वाले सवर्णों के द्वारा। 32 ट्रैक्टर, दो दर्जन हथियार बंद सहित 300 हमलावर, 10 लोगों की निर्मम हत्या, 4 लोग गंभीररूप से घायल एवं सैकड़ों लोग चोटिल। बिहार से बंदूकधारी मंगवाकर हमला किया गया। क्या यह सब अचानक हो गया? क्या सत्ता को इसकी भनक तक नहीं थी? क्या जिला प्रशासन कुछ नहीं जानता था? निश्चित तौर पर इसके बारे में सबलोग जानते थे। यह जमीन के लिए जनसंहार है। इसका सबूत भी है। यूपी के उप-मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा ने इस जनसंहार को मामूली घटना करार दिया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आदिवासी कब से जमीन के मालिक हो गए? प्राचीनकाल से इनका काम मल-मूत्र उठाने और बेगार करने का रहा है। फिर इनके पास कहां से जमीन आया और वे कैसे मालिक बन गए? इनका काम केवल खेतों में मजदूरी करने का रहा है। 

यह सवर्णों के द्वारा प्रायोजित जनसंहार है। गोड़ आदिवासियों की 638 बीघा जमीन को लूटने के लिए। गोड़ आदिवासी उक्त जमीन पर सदियों से जोत-कोड़ रहे हैं। यह इलाका जंगल का इलाका है, जहां वे रहते हैं। उनके पूवर्जों ने जंगलों को साफकर खेती योग्य जमीन बनाया। यहां अब जंगल न के बराबर है इसलिए उनकी आजीविकास पूर्णरूप से खेती पर निर्भर है। आदिवासी उक्त जमीन का पट्टा भी मांगते रहे हैं लेकिन उन्हें पट्टा नहीं दिया गया। बल्कि सरकार के नौकरशाहों के द्वारा बड़ी चलाकी से उक्त जमीन को कानूनी जामा पहनाकर गोड़ आदिवासियों से छीनने की पूरी कोशिश की गई। इसके लिए सबसे पहले ‘आदर्श कापरेटिव सोसाईटी’ का गठन किया गया। इसके बाद 17 दिसंबर 1955 को राबर्ट्गंज के तहसीलदार के द्वारा उक्त जमीन को उक्त सोसाईटी के नाम पर लिखा लिया गया। लेकिन 1966 में उत्तर प्रदेश में सहकारिता समिति अधिनियम खत्म हो गया। इस तरह से जमीन सोसाईटी से मुक्त हो गया। आदिवासी लोग जमीन पर जोतते-कोड़ते रहे और उसका मालिकाना हक के लिए सरकारी बाबुओं के दफ्तरों का चक्कर काटते रहे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा।  

इसी बीच पटना निवासी आईएएस अफसर प्रभात कुमार मिश्रा मीरजापुर के जिलाधिकारी बनाये गये।  तब सोनभद्र अलग जिला नहीं था बल्कि मीरजापुर के अन्तर्गत आता था। प्रभात कुमार मिश्रा ने अपने पद और रूतवा का गलत इस्तेमाल करते हुए 6 सितंबर 1989 को उक्त जमीन को अपने, पत्नी आशा मिश्रा, विनीत शर्मा और भानु शर्मा के नाम पर लिखवा लिया। लेकिन आदिवासियों की एकजुटता के कारण वे जमीन कब्जा नहीं कर सके। जब आदिवासियों को पता चला कि जमीन किसी और के नाम पर लिखवा लिया गया है तक उन्होंने इस मामले को अंचल, जिलाधिकारी एवं आयुक्त के पास दर्ज कराया। लेकिन सभी जगहों पर उनके दावों को खारिज कर दिया गया। फिर आदिवासियों ने न्यायालय का शरण लिया। जमीन को हथियाने के लिए प्रभात कुमार मिश्रा ने अपने ताकत और पहुंच का खूब इस्तेमाल किया। फिर भी आदिवासियों के विरोध के कारण जमीन को कब्जा नहीं कर सका तब उन्होंने एक नयी रणनीति अपनायी, जिसके तहत जमीन के एक हिस्से को स्थानीय दबंगों को बेचकर जमीन पर कब्जा शुरू करने की मुहिम छेड़ी। 

17 अक्टूबर 2017 को प्रभात कुमार मिश्रा ने 140 बीघा जमीन को गांव के दबंग ग्रामप्रधान यज्ञदत्त गुजर को बेच दिया। 6 फरवरी 2019 को उक्त जमीन की दखिल खारिज कर दी गई। गुजर यहां पलायन करके आया था, जो अपने दबंगई के कारण गांव की जमीन कब्जाकर स्थानीय निवासी बन गया। लेकिन मिश्रा से खरीदने के बाद भी उक्त जमीन पर गुजर कब्जा नहीं कर पाया। जमीन को आदिवासी ही जोत-आबाद करते रहे। गुजर ने आदिवासियों से जमीन खाली करवाले के लिए प्रशासन का सहारा लिया लेकिन आदिवासियों की एकजुटता एवं प्रतिकार के सामने प्रशासन घूटने टेक दिया। अंत में गुजर और मिश्रा ने मिलकर जनसंहार का खूनी खेल खेला। 

जनसंहार के बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इसके लिए पूर्व के कांग्रेस सरकार को जिम्मेवार ठहराया है ठीक उसी तरह जैसे देश के प्रत्येक समस्या के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, कांग्रेस और नेहरू को जिम्मेवार ठहराते हैं। अब यह फिक्स मैच बन चुका है। सत्ताधीश जिम्मेवारी से बचना चाहते हैं। यूपी में कांग्रेस के अलावा भाजपा, बसपा और सपा भी सत्ता में रह चुके हैं लेकिन जनसंहार की जिम्मेवारी सिर्फ कांग्रेस पर। यह अद्भूत है! इतना बड़ा जनसंहार होने के बाद भी अब यूपी में जंगल राज नहीं है। मैं हैरान हॅं। यूपी में सपा और बसपा, बिहार में आरजेडी और झारखंड में जेएमएम व उसके सहयोगी दलों के शासनकाल में ऐसी घटना घटने पर उक्त शासन को जंगल राज बताने में एक संकेड का देरी नहीं करने वाली मीडिया कहां गुम हो गई है? 

इस जनसंहार के लिए मूलरूप से प्रभात कुमार मिश्रा, अन्य नौकरशाह और स्थानीय पुलिस जिम्मेवार हैं, जिन्होंने जमीन पर वर्षों से काबिज आदिवासियों को उसका पट्टा निर्गत करने के बजाय अपने पदों का दुरूपयोग करते हुए आदिवासियों से उनकी जमीन छीनने की कोशिश की और उनका जनसंहार करवाया। घटना के दिन पुलिस ने सुबह में आदिवासियों को थाना बुलाया था और थाना नहीं जाने की स्थिति में कोई बड़ी घटना की ओर इशारा किया था। इसका क्या अर्थ है? पुलिस, प्रशासन और जमीन माफिया   के बीच बने मजबूत गांठजोड़ ही इस जनसंहार को अंजाम दिया है। इसलिए इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। इसकी से स्पष्ट होगा कि गोड़ आदिवासियों के जनसंहार का असली दोषी कौन-कौन हैं। गोड़ आदिवासियों को हिन्दू बनाने वाला संघ परिवार कहां है? क्या संघी इन्हें न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे? क्या संघियों के गोद में बैठे आदिवासियों को अब अपनी आंखें नहीं खोलनी चाहिए? 

शनिवार, 16 मार्च 2019

कोचांग का दर्द

कोचांग का दर्द   

- ग्लैडसन डुंगडुंग

कोचांग जाने का विचार आते ही मन में उमंग और भय का तरंग बराबर उमड़ने लगा। एक तरफ जहां पहली बार कोचांग जाने का उमंग था तो वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा बलों और नक्सलियों के अमानवीय व्यवहार के शिकार होने का भय मन को सताता रहा। लेकिन खतरा का परवाह किये बगैर मसीह प्रकाश सोय, जेवियर टोपनो, विपिन कुजूर और मैं खूंटी से दिन के दो बजे निकल पड़े। लगभग आधा घंटे में बंदगांव घाटी पार करते हुए बाजार टांड पहुंचे। इस घाटी में शांम छः बजे के बाद जाना मना था पर अब वह खौफ न के बराबर है। लेकिन मोबाईल का नेटवर्क अब भी काम नहीं करता है। कोचांग के लिए बंदगांव बाजार से पूरब दिशा की ओर जाना पड़ता है। कई गाड़ियां कोचांग की ओर जाने के लिए तैयार दिखे। हमे वहां कुछ परिचित भी मिले, जो ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ियों से कोचांग जा रहे थे। मुलाकात की औपचारिकता पूरी करने के बाद हमलोग कोचांग की ओर कुच किये। 

पतझड़ होने से जंगल का रंग हरा-पीला दिखाई देने लगा। जंगल के बीच-बीच में लाल रंग से सराबोर पलास के फूल दिखाई देने लगे जो हमें नई उम्मीद दे रहे थे। चिड़ियों की कोलाहल भी सुनाई देने लगा और महुआ का गंध गाड़ी से टकराती हवा के साथ खिड़कियों के रास्ते हमारे नाकों तक पहुचने लगा। मैंने ‘जरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी का नाम पहली बार सुना था इसलिए साथियों से पूछा कि क्या मुंडारी में यात्री गाड़ियों को ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी कहा जाता है? मसीह प्रकाश सोय ने मेरे सवाल का तुरंत जवाब देते हुए कहा कि अभी कुछ ही देर के बाद आपको ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ दिखाई देगा। मैं उत्साहित हो गया कि कोई नया चीज देखने को मिलेगा। कुदाडिह गांव पहुंचते ही सड़क के दोनों तरफ खेतों में सफेद एवं लाल रंग के खुबशूरत फूल दिखाई देने लगे और साथ में पौधों से लगा हुआ हरे रंग का छोटा-छोटा फल भी। ऐसा लगा मानो जंगल में किसी ने फूलों की खेती की हो। ये पोस्ता के पौधे थे। मसीह प्रकाश सोय ने अपने दाहीने हाथ के उंगली से इशारा करते हुए कहा कि देखिये वो हैं ‘जेरे’ और ‘सोसोय’। पोस्ता के फलों से निकलने वाला गोंद, जिससे आफिम तैयार किया जाता है उसे मुंडारी में ‘जेरे’ या ‘सोसोय’ कहते हैं।

इस इलाके में भारी पैमाने पर पोस्ता की खेती की जाती है। पोस्ता की खेती से मिले पैसे से मोटरसाईकल, यात्री गाड़ी एवं अन्य चार पहिया वाहन खरीदा जाता है। इसलिए वैसे गड़ियों को ‘जेरे’ या ‘सोसोय’ गाड़ी यानी आफिम की गाड़ी कहा जाता है। प्रत्येक गांव में ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी मिलेगा। सबसे हैरत की बात यह है कि कोचांग गांव में पुलिस कैप है और जवान प्रतिदिन पेट्रालिंग के लिए जाते हैं। फिर भी इस इलाके में आफिम की खेती लहलहा रही है। सुखराम मुंडा बताते हैं कि उन्होंने कई बार पुलिस पदाधिकारियों से आफिम का फसल नष्ट करने को कहा है लेकिन वे कुछ नहीं करते हैं। मेरे मन में सवाल उठा कि गांव के लोग कैसे निडर होकर आफिम की खेती करते हैं? क्या यह पुलिस और राजनीतिज्ञों के सहयोग के बगैर संभव है? मसीह प्रकाश सोय ने फिर से मेरे सवालों का जवाब दिया। उन्होंने रोचक बात बतायी कि चुनावी साल में आफिम की सबसे ज्यादा खेती होती है क्योंकि जिन सत्ताधारी नेताओं को चुनाव लड़ना है वे पुलिस को आदेश दे देते हैं कि जिन-जिन गांवों से उन्हें वोट मिलता है उन गांवों का आफिम नष्ट नहीं करना है। इसलिए जब मीडिया में आफिम खेती की खबरें आने लगती है तब पुलिस उन गांवों का पोस्ता के पौधों को नष्ट करती है, जिन गावों से सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को वोट नहीं मिलता है। इसमें पुलिस का भी एक बड़ा हिस्सा है। प्रत्येक गांव से स्थानीय थाना को एक लाख रूपये मिलता है यानी पोस्ता खेती के क्षेत्र में पड़ने वाले थाना को प्रत्येक वर्ष 25 से 30 लाख रूपये मिलता। पोस्ता के फसल की खुल्लेआम खेती होने का मूल कारण यही है।

लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद हमलोग कोचांग गांव पहुंचे। बाजार का दिन होने के कारण लोग खरीद-बिक्री में लगे हुए थे। गांव के मुहाने पर हरा रंग से रंगा हुआ एक छः फीट का पत्थर गड़ा हुआ मिला, जिसपर भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद लिखे हुए थे। यह पत्थर कोचांग गांव जाने वालों को सावधान करता है कि यह ग्रामसभा का शासन क्षेत्र है। यहां ग्रामसभा की अनुमति के बगैर कोई काम नहीं कर सकते हैं। इससलिए हमलोग सीधे ग्रामप्रधान सुखराम मुंडा के घर पहुंचे। बगल में ही पुलिस कैंप है। हमारे पहुंचने से पुलिस कैंप में हलचल दिखाई पड़ा। कुछ जवान कैप से बाहर हमारे गाड़ी के आस-पास मंडराने लगे। बाघ से अचानक मुठभेड़ होने पर झूठा साहस दिखने वाले गीदड़ की तरह हम अपना मनोबल उंचा करते हुए आपस में जोर-जोर से बातें करने लगे। फलस्वरूप, जवानों ने हमसे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की। अब हमलोग साहस के साथ सुखराम मुंडा के कैंपस में घुस गये। 

आंगन में सरसों के पोधौं को सुखया गया था। लीची पेड़ के नीचे मुर्गी अपने बच्चों को दाना चुगना सिखा रही थी। घर का पहरेदार भी मुस्तैद था। हमें आंगन में बैठने के लिए प्लास्टिक की कुर्सी दी गई और साथ में पीने के लिए पानी भी। थोड़ी देर में सुखराम मुंडा आये। वे दीवाल के किनारे मिट्टी से बने पींडा पर बैठ जाते हैं। वे अपना और कोचांग का दर्द बयान करते हैं। वे अपनी और गांव की जमीन बचाने के लिए लड़ रहे हैं। वे बताते हैं कि इस इलाके में पत्थलगड़ी आंदोलन बहुत बाद में शुरू हुआ। जब उन्हांने पत्थलगड़ी के बारे में सुना तो गांव के कई लोगों के साथ पत्थलगड़ी आंदोलन के कई बैठक और सभाओं में शामिल होकर उसे समझने की कोशिश की। जब उन्हें लगा कि गांव की जमीन और जंगल को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जरूरी है तब उन्होंने गांव में ग्रामसभा की बैठक बुलायी, जिसमें पत्थलगड़ी चर्चा की गई और निर्णय लिया गया कि गांव में पत्थलगड़ी करना जरूरी है। इसके बाद गांव में चंदा किया गया। इस तरह से 25 फरवरी 2018 को पारंपरिक तरीके से पत्थलगड़ी की गई। फिर भी कोचांग गांव चर्चा में कहीं नहीं था। 

कोचांग गांव चर्चा में तब आया जब 19 जून 2018 को यहां सामूहिक बलात्कार कांड हुआ, जिसमें पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं को इसका मास्टरमाईंड बताया गया। सुखराम मुंडा बताते हैं कि इस घटना के बाद एक रात अचानक सुरक्षा बलो की एक टुकड़ी गांव पहुंची और मध्य विद्यालय भवन में डेरा डाल दिया। अगले दिन शिक्षकों को कहा गया कि कोचांग के मध्य विद्यालय को रूगूड़डिह मध्य विद्यालय में मिला दिया गया है। इसलिए वे बच्चों को लेकर वहां जायें। अपनी नौकरी बचाने के लिए शिक्षक तो रूगूड़डिह चले गये लेकिन गांव के 35-36 बच्चों ने विद्यालय जाना छोड़ दिया। सरकार ने इन आदिवासी बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार को एक झटके में छीन लिया। सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून 2009 का खुला उल्लंघन किया है। यदि यही काम ग्रामसभा या नक्सली करते तो यह देश की मीडिया में बड़ी खबर बनता। इसी बीच सुरक्षा बलों ने अपने लिए शौचालय बनाने के लिए बिना पूर्व सूचना और अनुमति के सुखराम मुंडा की 14 डिसमिल जमीन को कब्जा कर लिया जबकि उन्होंने पहले ही विद्यालय बनाने के लिए मुफ्त में अपनी जमीन दान दी थी। सरकार ने ग्रामसभा के अधिकारों को कुचल डाला। इतना ही नहीं सरकार अब गांव की 2.47 एकड़ जमीन पर स्थायी पुलिस कैंप बनाना चाहती है, जिसके लिए पिछले दरवाजे से काम किया जा रहा है। 

सुखराम मुंडा बताते हैं कि 23 अक्टूबर 2018 को अड़की के अंचलाधिकारी ने कोचंग में ग्रामसभा आयोजन करने का फरमान जारी किया था। आदेश-पत्र में लिखा था कि कोचंग गांव में सामुदायिक भवन निर्माण हेतु पुलिस अधीक्षक, खूंटी से अधियाचना प्राप्त हुआ है, जिसके लिए 2.47 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसलिए उक्त योजना हेतु आगामी 30 अक्टूबर 2018 को गांव में ग्रामसभा आयोजित है, जिसमें सभी सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। गांव के आदिवासियों को पता है कि यह आदेश पेसा कानून 1996 के खिलाफ है क्योंकि ग्रामसभा बुलाने का अधिकार सिर्फ ग्रामप्रधान को है। सरकार कोचांग गांव में स्थायी पुलिस कैप बनाना चाहता है, जिसके लिए गांव में जमीन चाहिए। आदिवासी नहीं चाहते हैं कि उनके गांव में पुलिस कैंप बने इसलिए वे जमीन नहीं देना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि यह पुलिस कैंप उनके सुरक्षा के लिए नहीं है और न ही इसे यहां शांति स्थापना होगी। 

कोचांग गांव की जमीन लेने के लिए सरकार ने कानून, बंदूक और जेल के नामपर ग्रामप्रधान को भयभीत करना शुरू किया। 29 अक्टूबर 2018 को सुखराम मुंडा एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए रांची गये थे, जिन्हें लौटते समय खूंटी पुलिस ने खूंटी बाजार से उठा लिया और थाना में कई घंटो तक रखा, जहां खूंटी थाना एवं अड़की थाना के प्रभारियों ने उन्हें धमकाया कि यदि वे जमीन अधिग्रहण वाले दस्तावेज में दस्तखत नहीं करते हैं तब उसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। ‘पत्थलगड़ी’ के मामले में उनके खिलाफ चार केस दर्ज हैं इसलिए वे उन्हें किसी भी समय जेल भेजकर सड़ा सकते हैं। वे एक बार जेल गये तो वहां से निकलना मश्किल हो जायेगा। उन्होंने डरा-धमकाकर भूमि अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज में दस्तखत करवा लिया उसके बाद रात के 11 बजे उन्हें छोड़ा गया।  

पुलिस की लाठी, बंदूक और जेल के भय से कोचंग गांव के मुंडा आदिवासी अंचलाधिकारी के आदेशानुसार तय तिथि को धान काटना छोड़कार ग्रामसभा में बैठ गये। लेकिन कोई भी सरकारी अधिकारी अंचल, प्रखंड या थाना से नहीं पहुंचा। इस तरह से गांव वालों को एक दिन बर्बाद हो गया। 1 नवंबर 2018 को अचानक अड़की थाना के प्रभारी तीन गाड़ियों के साथ गांव के पास स्थित दैनिक बाजार में पहुंचे। दो गड़ियों में धोती-साड़ी था और एक गाड़ी में पुलिस के जवान थे। थाना प्रभारी ने बाजार में उपस्थित आदिवासियों के बीच साड़ी और धोती बांटते हुए सादा कागज पर उनका हस्ताक्षर एवं अंगूठे का निशान ले लिया। जब लोगों ने सवाल पूछा कि क्यों धोती-साड़ी बांटा जा रहा है तब उन्होंने कहा कि सोहराई परब के लिए उन्हें सरकार की ओर से दिया जा रहा है। परब का नाम सुनकर लोगों ने धोती-साड़ी ले ली। लेकिन थानाप्रभारी ने चालाकी करते हुए उक्त दस्तावेज को ग्रामसभा बैठक की कार्यवाही बनाकर लिख दिया कि कोचांग के ग्रामीण सामुदायिक भवन के लिए 2.47 एकड़ जमीन देना चाहते हैं। अंततः यह कागज आंचलाधिकारी के द्वारा जिला भू-अर्जन पदाधिकारी के पास पहुंच गया। इसमें सबसे रोचक बात यह है कि जिन लोगों ने सादा कागज पर हस्ताक्षर एवं अंगूठे का निशान लगाकर साड़ी-धोती लिया है उनमें से अधिकांश व्यक्ति कोचांग गांव का नहीं है। 

कोचांग गांव के आदिवासी भूमि अधिग्रहण को लेकर सवाल उठा रहे हैं कि ग्रामसभा के आयोजन का आदेश अंचलाधिकारी कैसे दे सकते हैं? कौन से कानून के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है? गांवों के विकास का काम कब से पुलिस अधीक्षक के हाथों में सौपा गया है? कोचंग के आदिवासी कह रहे हैं कि जब गांव में सामुदायिक भवन पहले से मौजूद हैं तो फिर एक और सामुदायिक भवन किसके लिए बनाना है? 2.47 एकड़ जमीन में किस तरह का सामुदायिक भवन बनेगा क्योंकि गांव का सामुदायिक भवन के लिए 10 से 15 डीसमील जमीन काफी है? आदिवासी हकीकत जानते हैं। हकीकत यह है कि सामुदायिक भवन के नामपर जमीन का अधिग्रहण कर वहां स्थायी पुलिस कैंप बनाने की योजना है इसलिए पुलिस अधीक्षक ने अंचलाधिकारी को अधिसूचना भेजा था। पुलिस कैंप बनाने के लिए सरकार को जमीन नहीं मिल सकता है इसलिए आदिवासियों को अंधेरा में रखकर जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है। 

सरकार की गैर-कानूनी एवं अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण की कोशिश के खिलाफ कोचांग ग्रामसभा ने जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, खूंटी को आपति-पत्र दिया है। लेकिन वे कहते हैं कि उन्हें ग्रामसभा की सहमति-पत्र प्राप्त हो चुकी हैं। सुखराम मुंडा बताते हैं कि खूंटी प्रशासन उनसे थाना में लिया गया हस्ताक्षर एवं गांव में धोती-साड़ी बांटते समय लिया गया दस्तखत एवं अगूंठे के निशान को ग्रामसभा का सहमति-पत्र के रूप में उपयोग कर रहा है। वे कहते हैं कि इस अन्याय के खिलाफ कोचांग के आदिवासी अंतिम दम तक लड़ेंगे। उन्हें पुलिस कैंप की भी जरूरत नहीं है इसलिए विद्यालय से कैंप हटाकर विद्यालय को पुनः चालू किया जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के अधिकार का उल्लंघन हैं। कोचांग गांव के आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय और उनकी पीड़ा से रू-ब-रू होने के बाद हमलोग खूंटी लौट गये। मन में अनुतरित सवाल अब भी है कि आखिर कब तक आदिवासियों के साथ इस तरह का अन्याय होता रहेगा? कोचांग के आदिवासियों के दर्द को कौन सुनेगा? क्या इनके साथ न्याय होगा? 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

क्या अर्जुन मुंडा अब क्रांतिकारी बन गये हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड सरकार के द्वारा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अनुपूरक अधिनियम 1949 में किये गये संशोधनों के खिलाफ उठे जनाक्रोश में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी शामिल होते हुए दिखाई पड़े थे। उन्होंने भारत मुंडा समाज के कई आयोजनों में अपनी ही सरकार के मंशा पर सवाल उठाया। इतनी ही नहीं उन्होंने सीएनटी/एसपीटी संशोधन को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को सात पेज का एक लंबा पत्र लिखकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया। उनके द्वारा कई मंचों पर उठाये गये प्रश्नों एवं इस पत्र को पढ़ने से ऐसा लगता है कि अब वे क्रांतिकारी हो गये हैं। उन्हें आदिवासियों की चिंता है। वे आदिवासियों की जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना चाहते हैं। वे आदिवासी समाज की सुरक्षा चाहते हैं। लेकिन क्या यह बदलाव स्थायी या सिर्फ दिखावा है? क्या यह बदलाव पिछले चुनाव में हार की वजह से हुई है? क्या आदिवासी समाज का भावनात्मक उपयोग कर राजसत्ता हासिल करने के लिए यह बदलाव है? 

ऐसे प्रश्न उठना लाजमी है क्योंकि झारखंड के मुंख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में अर्जुन मुंडा ने जो आदिवासी विरोधी काम किया है उसे उनपर इतना जल्दी विश्वास नहीं किया जा सकता है। इसे गंभीरता से समझने के लिए 2 दिसंबर 2016 को उनके द्वारा झारखंड के मुंख्यमंत्री रघुवर दास को लिखे गये पत्र के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गौर करना होगा। वे लिखते हैं कि ‘आज आदिवासियों के मन में कई सवाल कौंध रहे हैं। क्या भगवान बिरसा के अलगुलान के बाद आजादी पूर्व अंग्रेजों द्वारा बनाये सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर मिले अधिकारों व संरक्षण को अपने देश की सरकार ही उनसे छीन लेगी?’’ उन्होंने अपनी बातों पर वजन डालने के लिए धरती आबा बिरसा मुंडा का सहारा लिया। लेकिन उन्होंने अपने शासन काल में उलगुलान की धरती को ही मित्तल कंपनी के पास गिरवी रखने की पूरी कोशिश की थी। क्या अर्जुन मुंडा यह भूल गये कि कैसे उन्होंने मुंडा दिसुम को मितल नगर बनाने के लिए लंदन गये थे? मितल कंपनी के जिस 12 मिलियन टन स्टील उत्पादन करने के लिए लगभग 1000 एकड़ जमीन की जरूरत थी लेकिन अर्जुन मुंडा ने 25,000 एकड़ जमीन और 20,000 क्यूबिक पानी प्रतिदिन देने के लिए एम.ओ.यू. किया था और उस एम.ओ.यू. को अपने एक वर्ष के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बतायी थी। क्या अर्जुन मुंडा को तब बिरसा भगवान याद नहीं आये थे?      

अर्जुन मुंडा ने अपने पत्र में सबसे बड़ा सवाल उठाते हुए लिखा है, ‘‘क्या सरकार आदिवासियों की जमीन छीनना चाहती है? यह सवाल अर्जुन मुंडा को खूद अपने घेरे में लेने के लिए काफी है क्योंकि जब उन्होंने मितल कंपनी के साथ एमओयू किया तब उस मुंडा दिसुम के लोग गोलबंद होकर निरंतर प्रतिरोध करते रहे। लेकिन उन्होंने आदिवासियों की आवाज को कभी सुनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने आंदोलनकारियों के साथ एक बार भी वार्ता नहीं किया बल्कि मितल कंपनी के लिए आदिवासियों की 25,000 एकड़ जमीन छीनने के लिए पुलिस एवं प्रशासन को लगा दिया। आज अर्जुन मुंडा किस मुंह से बोल रहे हैं कि झारखंड सरकार आदिवासियों की जमीन छीनना चाहती है? 

उन्होने अपने पत्र में संविधान की पांचवीं अनुसूची का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘पांचवीं अनुसूची में ‘‘राज्यपाल होता है न कि मंत्री-परिषद्। इतना ही नहीं उन्होंने आदिवासी सलाहकार परिष्द, पेसा कानून 1996, समता जजमेंट 2007 एवं भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थान कानून 2013 का जिक्र किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उन्होंने अपने कार्यकाल के समय मितल कंपनी से एमओयू करने से पहले राज्यपाल, आदिवासी सलाहकार परिषद् और ग्रामसभाओं से सलाह-मशविरा किया था? जब ग्रामसभाओं ने मितल कंपनी के प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया तब उन्होंने ग्रामसभाओं की बात क्यों नहीं माना? 

अर्जुन मुंडा अपने पत्र के अंत में लिखते हैं कि ‘नए संशोधनों से आदिवासियों के शोषण और विस्थापन मे अप्रत्याशित बढ़ोतरी की प्रबल आशंका बनती है। यदि ऐसा हुआ तो वे अपने अधिकारों से वंचित हो कर जीवनयापन के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो जाएंगे। यह न केवल आपका नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है बल्कि आपकी व्यक्तिगत जिम्मवारी भी है कि आप आदिवासियों के पहली पंक्ति के संरक्षक बनकर उनके साथ खड़े रहें और यह सुनिश्चित करें कि झारखंड सरकार की नीतियां और कार्य संविधान सम्मत हो।’’ उपरोक्त पक्तियों को पढ़ने से कोई भी क्या अर्जुन मुंडा आदिवासियों के अंतिम पंक्ति के संरक्षक बने थे इसलिए मुंडा दिसुम को मितल कंपनी के हवाले कर दिया था? क्या आदिवासियों की 25,000 एकड़ जमीन मितल कंपनी को देकर अर्जुन मुंडा किस तरह से आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण कर रहे थे? क्या मितल के परियोजना से आदिवासी शोषित और विस्थापित नहीं होते? क्या मितल कपनी के परियोजना से विस्थापित होने वाले लाखों आदिवासी पलाचन करने को मजबूर नहीं होते? किस नैतिक एवं संवैधानिक जिम्मेवारी के तहत अर्जुन मुंडा ने आदिवासियों को विस्थापित करने वाली इतनी बड़ी परियोजना को स्वीकृति प्रदान की थी? क्या यह अर्जुन मंडा का संवैधानिक सम्मत कार्य था?

अर्जुन मुंडा न कभी क्रांतिकारी थे और न ही वे कभी क्रांतिकारी हो सकते हैं। अर्जुन मुंडा के क्रांतिकारी बनने के पीछे असली मकसद है आदिवासियों को एक सीढ़ी की तरह उपयोग कर सत्ता हासिल करना। झारखंड में देश का 40 प्रतिशत खनिज सम्पदा होने एवं औद्योगिक घरानों के साथ सैकड़ों एमओयू करने के बावजूद राज्य के पिछले एक दशक से कोई बड़ा कंपनी का परियोजना स्थापित नहीं हो पाया था। इसी को मद्देनजर रखते हुए कारपोरेट जगत एवं भाजपा ने राज्य में गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक षड्यंत्र रचा था। अर्जुन मुंडा एक कदावर नेता हैं, जिनके रहते भाजपा एक गैर-आदिवासी को मुंख्यमंत्री बनाने की हिम्मत नहीं कर सकती थी। इसलिए पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें एक षड्यंत्र के तहत हराया गया। मोदी लहर में भाजपा के अधिकांश नेता चुनाव जीत गये लेकिन अर्जुन मुंडा चुनाव हार गये क्योंकि भाजपा के लोगों ने विपक्ष के उम्मीदवार को वोट दिया। जब यह बात अर्जुन मुंडा को पता चला तब उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। अब उनको एहसास हो चुका है कि यदि उन्हें सत्ता तक पहुंचना है सिर्फ आदिवासियों पर भरोसा करना होगा। सीएनटी/एसपीटी संशोधन का मामला उन्हें आदिवासियों के करीब लायेगा और वे इसी का फायदा उठाने के लिए क्रांतिकारी बनने की कोशिश में जुटे हुए हैं।     

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

क्या सरकार सरना धर्म का संरक्षण चाहती है?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

विगत दिनों उरांव आदिवासियों का सबसे बड़ा त्योहार ‘सरहुल’ के मौके पर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड के सरना धर्मावलंबियों को ‘सरना मंदिर’ का तोहफा दिया। ऐसा कहा गया कि यह दुनियां का एकमात्र ‘सरना मंदिर’ है। ऐसे ऐतिहासिक कार्यों के बारे में सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन मन में एक साथ कई प्रश्न उठते हैं कि क्या धर्मेश, सिंगबोंगा और मरांगबुरू अब सीमेंट, इंट और लोहे के बने संरचना में निवास करना पसंद करेंगे? क्या वे जंगलों और पहाड़ों में स्थित पवित्र ‘सरना स्थल‘, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ को त्याग देंगे? मेरालगड़ा के मुंडा जयराम बारजो इन प्रश्नों का जवाब देते हुए कहते हैं, ‘‘धर्मेश, सिंगबोंगा और मरांगबुरू कभी भी सीमेंट, इंट और लोहे से बने ‘सरना मंदिर’ में नहीं रहेंगे, उनका घर तो पवित्र ‘सरना स्थल‘, ‘जाहेरथान’ और ‘देशाउली’ है। वे प्रकृति की गोद में रहते हैं।‘‘ यहां मौलिक सवाल यह भी है कि क्या प्रकृति के बगैर ‘सरना’ धर्म का अस्तित्व है? क्या झारखंड सरकार के द्वारा ‘सरना मंदिर’ की स्थापना करना ‘सरना धर्म’ के संरक्षण एवं संवर्धन से ज्यादा राजनीति स्वार्थ की पूर्ति करना नहीं है? क्या ‘सरना धर्म’ के नाम पर राजनीति करने वाले लोग ‘सरना’ की मौलिक अवधारणा के बारे में जानते भी हैं?  

ऐसा माना जाता है कि आदिवासी लोग मूलतः प्राकृतिक पूजक हैं। वे प्रकृति की शक्ति पर विश्वास करते हैं इसलिए उसकी पूजा करते हैं। आज भी बहुसंख्य आदिवासी आध्यात्मिक रूप से प्रकृति को ही सर्वोपरि मानते हैं। आदिवासी अपने समुदाय और भाषा के आधार पर अपने सृष्टिकर्ता को अलग-अलग नाम से पुकारते हैं जैसे संताल लोग उन्हें ‘मरांगबुरू’ कहते हैं, हो एवं मुंडा आदिवासियों के लिए वे ‘सिंगबोंगा’ हैं, उरांव लोग उन्हें ‘धर्मेश’ कहते हैं तथा खड़िया लोग ‘परोमोसोर’। मौलिक तौर पर ये भगवान जंगल के अंदर कुछ खास जगहों पर वास करते हैं। उनका निवास स्थल मौलिकरूप से सखुआ पेड़ों से घिरा होता है, जिसको अंग्रेजी में ‘sacred grove’ यानी पवित्र पेड़ों का एक समूह कहा जाता है। इसे संताल आदिवासी ‘जहेरथान’ बोलते हैं, हो आदिवासी लोग ‘देशाउली’ कहते हैं तथा मुंडा, उरांव एवं खड़िया आदिवासी उसे ‘सरना’ के नाम से पुकारते हैं। 

संताल मिथक के अनुसार जहेरथान की खोज शिकार करते समय की गई। संताल लोग जब शिकार पर गये हुए थे उसी समय जब उन्हें आराम करने का समय मिला तो एक पेड़ के नीचे बैठकर वे इस बात पर चर्चा करने लगे कि आखिर उनका भगवान कौन है? सूर्य, हवा या बादल? अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे आकाश में एक तीर छोड़ेंगे और वह भगवान के घर पर ही जाकर गिरेगा। उन्होंने तीर छोड़ा और वह तीर एक सखुआ पेड़ के नीचे गिरा। इस तरह से वे सखुआ पेड़ की पूजा करने लगे। उन्होंने इस स्थान को ‘जाहेरथान’ का नाम दिया। देश में लगभग 700 अलग-अलग आदिवासी समूह हैं, जिनका अलग-अलग मिथक है लेकिन मौलिक तौर पर वे प्रकृति को ही अपना सबकुछ मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं।   

लेकिन देश के आदिवासी बहुल इलाकों में विगत सात दशकों से बड़े पैमाने पर हो रहे औद्योगिकरण, शहरीकरण एवं संस्कृतिकरण ने आदिवासियों के ‘आस्था’ पर विपरीत असर डाला है। फलस्वरूप, रांची, जमशेदपुर, बोकारो जैसे शहरों के ‘सरना स्थलों’ से सखुआ के पेड़ गायब हो चुके हैं। अब इन पवित्र ‘सरना स्थलों’ का प्रकृति से कोई सरोकार नहीं दिखता है। ये अब धीरे-धीरे सीमेंट, इंट और लोहे से बने संरचना में तब्दील हो रहे हैं और ‘सरना मंदिर’ इसी का एक उदाहरण है। क्या इसे विकास कहा जाना चाहिए या विकास का कुप्रभाव? क्या यह आदिवासियों को प्रकृति से अलग-थलग करने का अंतिम प्रयास नहीं है? इसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरना धर्मावलंबी इसे किस नजरिया से देख रहे हैं क्योंकि यह ‘सरना’ के मूलरूप को बदलने का मामला है? 

यद्यपि भाजपा के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने ‘सरना मंदिर’ निर्माण लिए जमीन दिया है और पैसा भी, लेकिन सरना धर्मावलंबियों के द्वारा सरना कोड लागू करने की मांग पर सरकार कोई बात नहीं कर रही है। यहां यह भी समझना बहुत जरूरी है कि जहां एक तरफ झारखंड सरकार सरना धर्मावलंबियों के लिए रांची के कांके में ‘सरना मंदिर’ का निर्माण कर रही है वहीं दूसरे तरफ राज्यभर के हजारों ‘सरना‘, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ की जमीन को ‘लैंड बैंक’ में डालकर उसे सरकारी जमीन के तौर पर दिखाया जा रहा है ताकि उसे पूंजीपतियों को दिया जा सकें। इसके अलावा भाजपा और आर.एस.एस. के नेता कहते रहते हैं कि ‘सरना’ और ‘सनातन’ यानी ‘हिन्दु’ धर्म एक ही है और आदिवासी लोग भी हिन्दु हैं। इसलिए यहां सवाल उठाना जायज है कि क्या सचमुच में झारखंड सरकार ‘सरना धर्म’ का संरक्षण एवं संवर्धन करना चाहती है या ‘सरना मंदिर’ के बहाने सरकार का निशाना कहीं और है? 

झारखंड के इतिहास को देखने से पता चलता है कि राज्य में विगत तीन-चार दशकों से विस्थापन और कारपोरेट जमीन लूट के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों के कारण यहां पूंजीपतियों को जमीन मिलना कठिन हो गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए झारखंड सरकार ने 2015 में बड़े पैमाने पर ‘लैंड बैंक’ यानी ‘जमीन का बैंक’ बनाने का काम शुरू किया, जिसके तहत राज्यभर के अंचलाधिकारियों को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के पास गैर-मजरूआ जमीन का आंकड़ा जमा करने को कहा गया। सरकारी आॅंकड़ा के अनुसार अभी ‘लैंड बैंक’ में 20,94,297 एकड़ जमीन उपलब्ध है। झारखंड सरकार ने कैसे चालाकी से राज्यभर के ‘सरना स्थल’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ की जमीन को ‘लैंड बैंक’ में डाला है इसको समझने के लिए खूंटी जिला इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 

झारखंड के गठन के बाद खूंटी को रांची जिले से अलग किया गया है, जिसमें कुल छः प्रखंड हैं। यह जिला पांचवी अनुसूचीक्षेत्र के तहत आता है, जिसमें मुंडा आदिवासियों की बहुलता है। यह बिरसा मुंडा की धरती भी है। लेकिन यहां पिछले दो-तीन दशकों से कई कंपनियां अपना परियोजना स्थापित करने के लिए अपनी एड़ी-चोटी एक किये हुए हैं लेकिन जनप्रतिरोध की वजह से उन्हें जमीन नहीं मिल पा रहा है। इसी को मद्देनजर रखते हुए झारखंड सरकार ने ‘लैंड बैंक’ बनाया है, जिसमें परती जमीन बताकर जिले के 541 सरना स्थलों के कुल 488.82 एकड़ जमीन को भी ‘लैंड बैंक’ में डाल दिया गया है। इसमें अड़की प्रखंड के 9 सरना स्थलों का 12.33 एकड़ जमीन, खूंटी प्रखंड के 134 सरना स्थलों का 64.26 एकड़ जमीन, मुरहू प्रखंड के 47 सरना स्थलों का 7.96 एकड़ जमीन, तोरपा प्रखंड के 14 सरना स्थलों का 30.36 एकड़ जमीन, रनिया प्रखंड के 40 सरना स्थलों का 79.06 एकड़ जमीन, कर्रा प्रखंड के 297 सरना स्थलों का 294.85 एकड़ जमीन शामिल है। इससे यह साबित होता है कि भाजपा सरकार सरना धर्मावलंबियों का जितना भी हितैशी बनने का दिखावा करे लेकिन हकीकत में उनके धर्मस्थलों को पूंजीपतियों को सौपने में उसे किसी तरह की संकोच नहीं है क्योंकि भाजपा नेताओं को सरना धर्म से कुछ लेना देना ही नहीं है।  

यहां हमें राज्य में ‘सरना धर्म’ के नाम पर विगत कई वर्षों से हो रहे राजनीति को भी समझना चाहिए क्योंकि राज्य में ‘सरना धर्म’ के नाम पर कई सामाजिक संगठनों का गठन किया गया है लेकिन ये संगठन सामाजिक और धार्मिक कम, राजनीतिक ज्यादा दिखते हैं। यद्यपि ये संगठन ‘सरना धमर्’ के नाम पर राजनीति तो करते हैं लेकिन झारखंड सरकार के द्वारा राज्य के सैकड़ों ‘सरना स्थलों’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ की हजारों एकड़ जमीन को भूमि बैंक में डालने के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। इसके अलावा वे न ‘सरना’ स्थलों पर सखुआ का पेड़ लगा रहे हैं और न ही ‘सरना’ स्थलों का संरक्षण कर पा रहे हैं। रांची स्थित पहाड़ी मंदिर और तमाड़ का देवड़ी मंदिर इसके दो बड़े उदाहरण हैं, जिसपर दूसरे लोगों ने कब्जा जमा रखा है और सरना समितियां कुछ नहीं कर पा रही हैं। 

इतना ही नहीं कई जंगलों और पहाड़ों में स्थित ‘सरना स्थल’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ को झारखंड सरकार ने खनन कंपनियों को खनिज उत्खनन के लिए लीज में दे दिया है। उदाहरण के तौर पर सारंडा जंगल के अंदर झारबेड़ा गांव के पास पहाड़ में स्थिति ‘देशाउली’ को सरकार ने लंदन स्थित दुनियां का सबसे बड़ा स्टील कंपनी ‘अर्सेलर मित्तल’ को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए लीज में दे दिया है। झारबेड़ा के आदिवासी सवाल उठा रहे हैं कि क्या मित्तल कंपनी उनके भगवान से भी ज्यादा शक्तिशाली है, जिसने उनके भगवान के निवास स्थल को सरकार से खरीद लिया है? लेकिन झारखंड सरकार के ऐसे असंवैधानिक कार्यों का सरना समितियां विरोध नहीं करती हैं, यह हमारे समझ से परे है। क्या वे अपने अस्तित्व के बारे में सजग नहीं हैं या सरकार के एहसान तले दबे हुए हैं?     

असल में झारखंड सरकार ने ‘सरना मंदिर’ का निर्माण कर बड़ी चालाकी से भावनात्मक खेल खेला है क्योंकि विगत 16-17 फरवरी 2017 को रांची के खेलगांव में आयोजित ‘ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट’ के दौरान सरकार एवं पूंजीपतियों के बीच राज्य के विभिन्न इलाकों में तथाकथित विकास परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए 210 समझौतों पर हस्ताक्षर हुआ है, जिसके लिए लाखों एकड़ जमीन, जंगल, पानी, पहाड़ और खनिज की जरूरत होगी। इसमें राज्यभर के हजारों ‘सरना स्थल‘, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ विलुप्त कर दिये जायेंगे। सरकार को पता है कि ओडिसा के नियमगिरि की तरह ही झारखंड के आदिवासी भी इसका घोर विरोध कर सकते हैं। इसलिए उन्हें ऐसा दिखाया जाना चाहिए कि सरकार उनके धार्मिक स्थलों का संरक्षण एवं संवर्धन करने के लिए तत्पर है। लेकिन हकीकत में झारखंड सरकार आदिवासियों के बीच हड्डी का एक छोटा सा टुकड़ा फेंक कर उनसे सारा प्राकृतिक संसाधन छीन लेना चाहती है।   

‘ओडिसा माईनिंग कारपोरेशन बनाम वन व पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य (सी) सं. 180 आफ 2011’’ में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए फैसला सुनाया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 आदिवासियों के धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं, जो उन्हें न सिर्फ अपने धर्म को मानने एवं उसका प्रचार-प्रसार करने का अधिकार देते हैं अपितु उनके धार्मिक विधि या रीति-रिवाज जो उनके धर्म का हिस्स है उसपर पूर्ण अधिकार प्रदान करते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार झारखंड सरकार आदिवासियों के कोई भी धार्मिक स्थल को पूंजीपतियां को नहीं दे सकती है। इसलिए सरकार की यह कोशिश है कि आदिवासियों का ‘सरना स्थल’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ को शहरों में एक सरंचना के रूप में स्थापित कर दिया जाये ताकि सरना धर्म मानने वाले आदिवासी लोग जंगल और पहाड़ों पर धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित ‘सरना स्थल’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ पर अपना दावा छोड़ देंगे, जिससे उन्हें पूंजीपतियों को देने में आसान हो जायेगा। ओडिसा के नियमगिरि पहाड़ को वेदांता कंपनी सिर्फ इसलिए कब्जा नहीं कर पाया क्योंकि वहां के डोंगरी-कोंध आदिवासियों ने कहा कि वहां उनका भगवान रहता है, जिसकी वे पूजा करते हैं इसलिए नियमगिरि पहाड़ को वे वेदांता कंपनी को किसी भी कीमत पर नहीं देंगे।   

यह सभी जानते हैं कि भाजपा की राजनीति का आधार ही धर्म है। ‘सरना मंदिर’ स्थापित कर सरकार एक तीर से दो शिकार करना चाहती है। एक तो स्वंय को सरना आदिवासियों की हितैशी के रूप में पेश करते हुए सीएनटी/एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन के खिलाफ आदिवासी जनाक्रोश को धर्म के आधार पर दो हिस्सों में बांटकर इसे ठंढ़ा करना पूंजीपतियों के लिए जमीन सुनिश्चित करना तथा दूसरा, आदिवासियों को स्थायी रूप से प्राकृतिक संसाधनों से अलग करना ताकि जंगलों और पहाड़ों को खनिज उत्खनन के लिए पूंजीपतियों को बेचा जा सके क्योंकि आज भी बहुसंख्य आदिवासियों का प्रकृति के साथ आध्यात्मिक रूप से जुड़ाव है। इसलिए वे जंगलों और पहाड़ों में स्थिति ‘सरना स्थल‘, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ को पूंजीपतियां को सौपने के खिलाफ संघर्षरत हैं। 

लेकिन झारखंड सरकार के द्वारा चालाकी से ‘सरना स्थल’, ‘जाहेरथान’ एवं ‘देशाउली’ की जमीन को ‘लैंड बैंक’ में डालना न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है बल्कि यह पेसा कानून 1996 का भी उल्लंघन है जो ‘ग्रामसभा’ को गांव के प्राकृतिक संसाधनों, धार्मिक एवं संस्कृतिक अधिकार को संरक्षित रखने का अधिकार देता है। अभी मूल प्रश्न यही है कि सरना धर्म का असली संरक्षक कौन है?      

- लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं।   

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

झारखंडी राजनीति का पुनरूथान?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

13 अप्रैल 2017 को सुबह जैसे ही लिट्टीपाड़ा विधानसभा उप-चुनाव की मतगणना शुरू हुई, पत्रकारों का एक वाट्सप ग्रुप में संदेश भेजने का काम भी शुरू हो गया। लेकिन जैसे ही चैथे राउंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार साईमन मरांडी 4100 वोटों से आगे निकले, इस ग्रुप में मतगणना से संबंधित संदेश आना बंद हो गया। शांम को चुनाव परिणाम आया, जिसमें साईमन मरांडी 12,900 वोट से विजयी घोषित किये गये। इसके बाद वाट्सप पर एक अंतिम संदेश आया, जिसमें लिखा था ‘‘रघुवर हटाओ, भाजपा बचाओ’’। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि लिट्टीपाड़ा उपचुनाव जीतना भाजपा के लिए कितना जरूरी था। अब यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि सीएनटी/एसपीटी के मसले पर रघुवर दास की हठधर्मिता से झारखंड में भाजपा के लिए उल्टी हवा बहना शुरू हो गई है और झारखंडी राजनीति का पुनरूथान भी। निश्चित तौर पर यह उप-चुनाव जीतना भाजपा के लिये जितना जरूरी था उतना ही जरूरी झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंडियों के लिए भी था। यदि इस उप-चुनाव में भाजपा जीत जाती तो सरकार और भाजपा नेता यह प्रचार करते कि सीएनटी/एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन से आदिवासी लोग खुश है लेकिन विपक्षी पार्टियां एवं जनसंगठन सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही रघुवर दास सरकार और बेलागाम हो जाती। अब यहां से झारखंडी राजनीति की एक नयी शुरूआत होगी, जिसके केन्द्र में झारखंड की माटी और आदिवासी होंगे।  

लिट्टीपाड़ा विधानसभा उप-चुनाव जीतना भाजपा के लिए बहुत बड़ी परीक्षा थी जिसके लिए भाजपा ने अपना सबकुछ झोंक दिया था। चुनाव से ठीक तीन दिन पहले अधूरा पूल का उद्घाटन करने के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें मोदी ने संताल आदिवासियों को भाजपा की ओर आकार्षित करने के लिए अपने भाषण की शुरूआत हिन्दी में लिखा हुआ ‘संताली भाषा’ से किया, चुनाव आचार संहिता के खिलाफ आदिवासी महिलाओं के बीच मोबाईल बांटा, ड्यूटी पर तैनात किये गये जवानों के बीच अस्तित्वविहीन ‘पहाड़िया बटालियन’ का नियुक्त पत्र बंटा तथा क्षेत्र के विकास की बड़ी-बड़ी बातें की और साथ में रघुवर दास की तारीफ भी। इसके अलावा मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ उनके पांच कैबिनेट मंत्री और भाजपा का पूरा कूनबा विधानसभा क्षेत्र में कैम्प किये हुए था। भाजपा ने स्व0 अनिल मुर्मू की पत्नी और बेटी को भी पार्टी में शामिल करते हुए उनके घर में पार्टी का झंडा लहरा दिया था, चुनाव के लिए सरकारीतंत्र का उपयोग किया तथा जनता के पैसे पर भाजपा को चुनाव जीताने के लिए अभियान चलाया। लेकिन यह सब कोई काम का नहीं रहा। 

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि आखिर भाजपा से कहां चुक हुई है? भाजपा क्यों यह उप-चुनाव हार गया? क्या भाजपा ने संताल वोटरों को समझने में भूल की? भाजपा नेताओं की सबसे बड़ी भूल यह है कि वे न आदिवासी समाज को समझते हैं और न हीं उनके इतिहास और जीवन-दर्शन को। इन्हें लगता है कि आदिवासियों को धर्म (सरना-ईसाई) के नाम पर आपस में लड़ा दो, भौंकता हुआ कुत्ता के सामने हड्डी फेंकने जैसे ही इन्हें छोटा-मोटा कुछ दे दो या एक आदिवासी समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके वोट बटोर लो। भाजपा ने लिट्टीपाड़ा में संताल होड़ बनाम संताल ईसाई तथा पहाड़िया बनाम संताल का कार्ड खेलने की कोशिश की। लेकिन भाजपा नेताओं को यह समझ में नहीं आया कि आदिवासियों के लिए जमीन सर्वोंपरि है। उन्होंने संतालों को पहले ही गंभीर चोट दिया था जिसपर मलहम-पट्टी करने के बजाये वे भावनाओं से खेलकर वोट बटोरने की कोशिश में जुट गये।

यदि आप संतालों से उनकी जमीन, पहचान, संस्कृति, परंपरा और विरासत छीनने की कोशिश करते हुए उनके अस्तित्व पर हमला करेंगे तो क्या वे आपको वोट देंगे? 1855 का संताल हुल झारखंड के इतिहास में सबसे बड़ा क्रांति था, जिसमें 20,000 संताल मारे गये थे एवं सिदो-कान्हू को अंग्रेजो ने फांसी पर लटका दिया था। इसलिए संताल लोग सिदो-कान्हू को भगवान की तरह मानते हैं। तीर-धनुष उनका पारंपरिक हथियार है, जिसके बदौलत उनके पूर्वज अंग्रेजों से मुकबला किये और उन्हें अपनी जमीन, स्वायत्तता, परंपरा और संस्कृति को बचाने के लिए कानून बनाने के लिए मजबूर कर दिया था। इस क्रांति के मूल में जमीन था। लेकिन भाजपा नेताओं ने संतालों से सबकुछ लूट लेना चाहा। संताल परगना काश्तकारी (अनुपूरक अनुबंध) अधिनियम 1949 का संशोधन बिना उनकी सहमति से किया। सिदो-कान्हो की मूर्ति तोड़ी गई, जिसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई तथा प्रधानमंत्री मोदी, राज्यपाल मुर्मू एवं मुख्यमंत्री दास ग्रुप फोटो खिचवाने के चक्र में सिदो-कान्हू की प्रतिमा स्थल पर जूता-चप्पल पहनकर चढ़ा गये, जिससे संताल लोग बहुत नाराज हुए। इससे उनके बीच सीधा संदेश गया कि भाजपा नेताओं के लिए आदिवासी शहीदों की कोई कद्र नहीं है। इसके अलावा सीएनटी/एसपीटी आंदोलन के समय दुमका के कॉलेज हॉस्टल से जिला प्रशासन के द्वारा तीर-धनुष को कब्जा कर इसे प्रतिबंधित किया गया और अपनी जमीन बचाने के लिए आंदोलन कर रहे संतालों को फर्जी मामलों में फंसा कर पुलिस के द्वार प्रताड़ित किया गया। क्या संताल लोग इतना अन्याय स्वीकार कर सकते थे? उन्होंने इसी अन्याय का जवाब भाजपा को उप-चुनाव में दिया। 

भाजपा की दूसरी बड़ी भूल थी संतालपरगना और संताल आदिवासियों की स्थिति के लिए जेएमएम नेता गुरूजी शिबू सोरेन एवं हेमंत सोरेन को जिम्मेवार बताकर शोरगुल मचाना। भाजपा नेताओं को लगा कि जिस तरह से झूठ के बुनियाद पर कांग्रेस को देशभर में बदनाम कर एक भ्रष्ट पार्टी के रूप में स्थापित करने में उन्हें कामयाबी मिली और इसके लिए उन्होंने एक ही जुमला का इस्तेमाल बार-बार किया कि पिछले 70 सालों में देश में विकास का कोई काम नहीं हुआ क्योंकि कांग्रेस के नेता सिर्फ देश को लूटने में लगे रहे, ठीक वैसे ही भाजपा नेताओं ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और उनके नेताओं के बारे में भी जुमलेबाजी शुरू किया। लेकिन उन्हें यह मालूम होना चाहिए था कि संताल लोग संतालपरगना के विकास की स्थिति एवं संतालों की दयनीय स्थिति के लिए गुरूजी को दोषी नहीं मानते हैं बल्कि वे उनके लिए आज भी भगवान हैं। इसलिए भाजपा नेताओं के द्वारा गुरूजी के ऊपर आरोप लगाना उनके लिए ही भारी पड़ गया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि नरेन्द्र मोदी और शिबू सोरेन को एक साथ खड़ा किया जाये तो संताल लोग मोदी के बजाये गुरूजी के साथ जायेंगे।  

भाजपा की तीसरी बड़ी भूल थी जनता को गुरूजी और हेमंत सोरेन के बीच मतभेद दिखाना। भाजपा ने जिस तरह से उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच मतभेद को वोटरों के बीच भुनाया था ठीक उसी को दोहराने के लिए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने लिट्टीपाड़ा के वोटरों के बीच यह बात फैलाने की कोशिश की कि गुरूजी और हेमंत सोरेन के बीच साईमन मरांडी को टिकट देने को लेकर मतभेद है इसलिए गुरूजी चुनाव प्रचार के लिए नहीं निकल रहे हैं। जब यह बात फैली तो रघुवर दास को मुंह से जवाब देने के बजाये हेमंत सोरेन स्वयं गुरूजी को लेकर मैदान में उतर गये और रघुवर दास का मुंह चुप करा दिया। अब भाजपा नेताओं के बीच गुरूजी के काट के लिए कुछ भी नहीं बचा था। मोदी भी उनके काम नहीं आये। गुरूजी का चुनाव अभियान में शामिल होना भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत बन गया।  

भाजपा की चैथी बड़ी भूल थी वोटरों को भविष्य का सब्जबाग दिखाना। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बार-बार कहा कि आने वाले तीन साल में वे संताल परगना को विकसित कर देंगे। लेकिन पिछले दो सालों में उन्होंने क्या किया यह बताने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था। वोटरों को रघुवर दास के वादा पर विश्वास नहीं करने का बहुत कारण मौजूद है। पिछले विधानसभा चुनाव के समय नरेन्द्र मोदी ने दुमका में कहा था कि उनके रहते कोई माई का लाल आदिवासियों की जमीन नहीं छीन सकता है। लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्थानीय नीति बनायी गई और सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन किया गया। इतना ही नहीं रघुवर दास ने अगस्त 2016 तक 3.5 लाख लोगों को वनाधिकार कानून 2006 के तहत वनपट्टा देने का वादा किया था लेकिन 50 हजार लोगों को भी नहीं दे सके। उन्होंने 31 मार्च, 2017 तक झारखंड को कैशलेश बनाने का वादा किया था लेकिन अबतक एक भी पंचायत कैशलेश नहीं हो पाया। इसी तरह उन्होंने झारखंड को स्वीटजरलैंड बनाने की बात कही थी लेकिन वन विभाग के अधिकारी सागवान लगाने के लिए प्राकृतिक जंगलों को जलकर नष्ट कर रहे हैं और रघुवर दास खामोश हैं। आजतक उन्होंने एक भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसपर जनता विश्वास कर सकती है। इसलिए उनके वादों को वोटर सिर्फ जुमला समझ बैठे।  

भाजपा की पांचवीं सबसे बड़ी भूल थी तानाशाही रवैया अपनाना। रघुवर दास ने शुरू से ही ऐसा दिखाया कि राज्य और आदिवासियों के विकास का ठेका सिर्फ भाजपा ने ले रखा है। सिर्फ वे ही जानते हैं कि आदिवासियों के लिए सही और गलत क्या है। सड़क से लेकर सदन तक भारी विरोध के बावजूद सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन करने के बाद रांची में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट का आयोजन किया तथा राज्यभर के गैर-मजरूआ जमीन को भी भूमि बैंक में डाल दिया। इससे आदिवासियों के बीच यह स्पष्ट संदेश गया कि रघुवर दास आदिवासी एवं राज्य के विकास के नाम पर यहां के प्राकृतिक संसाधनों - जमीन, जंगल, पहाड़ जलस्रोत और खनिज को पूंजीपतियों को सौंपना चाहते हैं। इस दौरान उनकी सरकार ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया, जिससे जनता को लगे कि सरकार उनके विकास लिए प्रतिबद्ध है। बल्कि सरकार ने सीएनटी/एसपीटी कानूनों का संशोधन का विरोध करने वालों के लिए बंदुक और कानून का धौंस दिखाना शुरू कर दिया। फलस्वरूप, रघुवर दास का सारा कार्य उनको एक तानाशाह के रूप में स्थापित किया। 

लेकिन ठीक उसके विपरीत, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने हेमंत सोरेन के नेतृत्व में स्थानीय नीति से विरोध शुरू किया जो सीएनटी/एसपीटी के मसले पर उनको जुझारू नेता बना दिया। उन्होंने सीएनटी/एसपीटी के मसले पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को भी अपने साथ लिया। वे इस संघर्ष को गांव-गांव से लेकर विधानसभा, राजभवन और राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा दिया। फलस्वरूप, राष्ट्रपति ने सीएनटी/एसपीटी संशोधन आर्डिनेंश को वापस लौटा दिया। इसके बाद जब झारखंड सरकार ने विधानसभा में सीएनटी/एसपीटी संशोधन विधेयकों को पेश किया तो झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायकों ने सदन के अंदर और बाहर भारी विरोध किया। इसके बाद उन्होंने इस संघर्ष को फिर से दिल्ली तक पहुंचा दिया। इतना ही नहीं जेएमएम विधायक अनिल मुर्मू जब जिन्दा थे तब उन्होंने लिट्टीपाड़ा इलाके में सीएनटी/एसपीटी मसले पर जनता के बीच आक्रोश पैदा किया था। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि यदि इन कानूनों में संशोधन किया गया तो सड़कों पर खून की नदी बहेगी। इसीलिए अनिल मुर्मू की एक पत्नी का भाजपा में शामिल होने के बाद भी पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला क्योंकि मुर्मू जनता के बीच यह स्थापित कर चुके थे कि भाजपा आदिवासियों का दुश्मन है।    

लिट्टीपाड़ा चुनाव परिणाम का सरकार के सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा लेकिन निश्चित तौर पर इसके दुर्गामी परिणाम होंगे। इस उप-चुनाव ने हेमंत सोरेन और झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए संजीवनी प्रदान किया है। ऐसा प्रश्न उठने लगा था कि गुरूजी के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा का क्या होगा? क्या यह पार्टी भी कांग्रेस की राह पर जायेगा? हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री और जेएमएम के केन्द्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के बाद कई वरिष्ठ नेताओं के अंदर असंतोष फैल गया था। साईमन मरांडी ने इसी कारण पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। लेकिन इस जीत के बाद हेमंत सोरेन का कद और बढ़ेगा और वे पार्टी में सर्वमन्य नेता हो जायेंगे। यह इसलिए भी क्योंकि पार्टी ने उनके नेतृत्व में सीएनटी/एसपीटी और स्थानीय नीति के खिलाफ संघर्ष का बिंगुल फूका है और यह जीत उसी का नतीजा है। अब झारखंड में जेएमएम के इर्द-गिर्द एक महागठबंधन बनेगा, जिसमें कांग्रेस, राजद, जेडीयू जैसे पार्टियां होंगी। और यदि महागठबंधन नहीं भी बनता है तो जेएमएम और कांग्रेस के बीच गठबंधन होगा। अगले चुनाव में सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों का समर्थन भी इसी गठबंधन को मिलेगा। 

इस राजनीतिक समीकरण में आजसू, जेडीपी और जेवीएम के लिए एक तरफ कुआं और दूसरे तरफ खाई वाली बात होगी। अब आजसू को अपना वजूद बचाना है तो हर हाल में एनडीए गठबंधन छोड़ना होगा या अपना वजूद गवांने के लिए तैयार रहना होगा। सालखन मुर्मू वाली जेडीपी के लिए अपने बलबूते पर शायद एक सीट भी जीतना मुश्किल होगा। फलस्वरूप, उसपर झारखंडी वोट काटवा पार्टी होने का कलंक लेगा। जेवीएम पर भी बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जो पार्टी अपने आठ विधायकों को एक साथ नहीं रख सकता है वह झारखंड का भविष्य कैसे तय करेगा? ऐसा दिखाई पड़ता है कि आजसू, जेवीएम और जेडीपी के गतिविधियों से भाजपा को ही फायदा पहुंच रहा है। इसलिए इन पार्टियों को भाजपा का हमसफर बन जाना चाहिए वरना इनकी वजूद नहीं बचेगा। 

लिट्टीपाड़ा विधानसभा उप-चुनाव में आदिवासियों ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को जीताकर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि जमीन उनके लिए सम्पति नहीं है बल्कि यह उनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा, विरासत और अस्तित्व है। इसलिए जो भी उनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश करेगा वे उसे मिटा देंगे। आदिवासी लोग जमीन को अपनी जान से भी ज्यादा महत्व देते हैं इसलिए उनका नारा ही है ‘‘जान देंगे, जमीन नहीं देंगे’’। यह कोई मामूली नारा नहीं है। जबकि गैर-आदिवासी लोग जमीन को मात्र सम्पति समझते हैं इसलिए अपनी जान बचाने के लिए जमीन बेचकर भाग जाते हैं । 

झारखंड में पिछले चार-पांच दशकों तक भारी जनांदोलन के बावजूद आदिवासी लोग अपनी जमीन और जान दोनों इसलिए गवां रहे थे क्योंकि उन्होंने अबतक इसे राजनीति से अलग रखा था। लेकिन लिट्टीपाड़ा उप-चुनाव में यह नया बदलाव देखने को मिला है जो आदिवासियों को सकारात्मक राजनीतिक दिशा दे सकता है। इस चुनाव में उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे जान देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे और अपना बहुमूल्य वोट उसी पार्टी को देंगे जो उनकी जमीन बचाने के लिए संघर्ष करेगा। इसलिए अब झारखंड सरकार को सीएनटी/एसपीटी संशोधन विधेयक वापस ले लेना चाहिए उसी में उनकी भलाई है क्योंकि इस चुनाव परिणाम के बाद सीएनटी/एसपीटी संशोधन के खिलाफ जनांदोलन और तीखा होगा, जिसका फायदा 2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा। लिट्टीपाड़ा उप-चुनाव ने झारखंडी राजनीति का पुनरूथान कर दिया है। 

- लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं। 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन क्यों?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

झारखंड के भूमि सुरक्षा कानूनों - छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी (अनुपूरक अनुबंध) अधिनियम 1949 में झारखंड सरकार के द्वारा किये जा रहे संशोधन के खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक भारी विरोध के बावजूद सरकार ने झारखंडी जनभावना को दरकिनार करते हुए 23 नवंबर, 2016 को झारखंड विधानसभा में बहस कराये बगैर ही 100 सालों से ज्यादा पुराने कानूनों को छेड़छाड़ करते हुए मात्र तीन मिनटों में सीएनटी/एसपीटी संशोधन कानूनों को पारित कर दिया। 

राजसत्ता पर बैठे लोगों को समझना चाहिए कि सीएनटी/एसपीटी कानून आदिवासियों के लिए सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह शहीदों के खून से लिखा हुआ कानूनी दस्तावेज है। इतिहास गवाह है कि 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भू-राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त किया तथा 1771 में कंपनी ने झारखंड इलाके का पूर्ण शासकीय अधिकार प्राप्त कर लिया। कंपनी सरकार के द्वारा जमीन का लगान वसूली के खिलाफ बाबा तिलका मांझी के नेतृत्व में 1774 में आदिवासियों का संघर्ष शुरू हुआ, जो बाद में संताल हुल, कोल विद्रोह तथा बिरसा उलगुलान का रूप लिया। इन संघर्षों में हजारों आदिवासी शहीद हुए। फलस्वरूप, ब्रिटिश हुकूमत को आदिवासियों की जमीन, स्वायत्तता, संस्कृति एवं परंपरा को बचाने के लिए कई कानून बनाने पर मजबूर होना पड़ा। सीएनटी/एसपीटी कानून इन्हीं संघर्षों का परिणाम है। क्या इस विरासत को खत्म करने का किसी को हक है?

संशोधन का मूल उद्देश्य
सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन करने का मूल उद्देश्य राज्य के कृषि भूमि को गैर-कृषि घोषित कर राज्य के विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों की कृषि जमीन को कारपोरेट घराना, व्यापारी एवं पूंजीपतियों को सौपना तथा गैर-कृषि घोषित जमीन से एक प्रतिशत लगान वसूलना है। देश की बढ़ती जनसंख्या और घटती कृषि भूमि को ध्यान में रखते हुए लोगों के खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना कानून 2013’ के द्वारा कृषि जमीन को विकास कार्यों के लिए अधिगृहित करने पर प्रतिबंध लगाया है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना कानून 2013 के धारा- 10 में किये गये प्रावधान के अनुसार कोई भी विकास कार्य के लिए सिंचित कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है और यदि उक्त जमीन का अधिग्रहण करना अनिवार्य होने की स्थिति में रैयत को जमीन का मुआवजा और पुनर्वास के साथ अधिगृहित कृषि भूमि के बराबर दूसरे जगह पर खेती की जमीन उपलब्ध करानी होगी। 

झारखंड सरकार ने जानबूझकर भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना कानून 2013 को राज्य में अबतक लागू नहीं किया है तथा इस कानून से बचने के लिए कृषि भूमि की प्रकृति को ही गैर-कृषि में बदल देना चाहती है ताकि कोई भी विकास परियोजना के लिए रैयतों के कृषि जमीन का अधिग्रहण किया जा सकेगा और यदि रैयतों के कृषि जमीन का जबर्दस्ती अधिग्रहण करते समय वे न्यायालय का शरण लेते हैं तो सरकार कृषि जमीन को गैर-कृषि बताकर कानूनी दावपेंच में बच निकलेगी। यहां मौलिक प्रश्न यह है कि राज्य में सिर्फ 18 प्रतिशत सिंचित जमीन है ऐसी स्थिति में यदि कृषि जमीन पर उद्योग लगाया जायेगा तो क्या सरकार लोगों को अनाज के बदले लोहा और स्टील खिलायेगी?

मौलिक संशोधन
झारखंड सरकार ने सीएनटी एक्ट की धारा-21, 49 एवं 71 तथा एसपीटी एक्ट की धारा-13 में संशोधन किया है। सीएनटी एक्ट की धारा-21 में संशोधन कर कृषि भूमि को गैर-कृषि घोषित करने तथा जमीन का बाजार मूल्य के आधार पर 1 प्रतिशत गैर-कृषि लगान वसूलने का प्रावधान जोड़ा गया है। इसी तरह धारा-49 में कोई भी जनहित कार्य के लिए किसी भी तरह की जमीन का अधिग्रहण करने का प्रावधान जोड़ा गया है। मौजूदा कानून के अनुसार सिर्फ खनन या उधोग के लिए जमीन अधिग्रहण करने का प्रावधान है। इसके अलावा धारा-71 में गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किये गये आदिवासी जमीन को मुआवजा देकर नियमित करने का प्रावधान एवं विशेष न्यायालय (एसएआर) को समाप्त किया गया है।

एसपीटी एक्ट की धारा-13 में संशोधन कर उप-धारा (क) ‘‘गैर-कृषि उपयोग को विनियमित करने की शक्ति’’ जोड़ा गया है। इसके तहत तीन प्रमुख बदलाव किये गये हैं - 1) राज्य सरकार किसी भी समय रैयत के कृषि भूमि को अधिसूचना के द्वारा गैर-कृषि घोषित कर उसका अधिग्रहण कर सकती है, 2) राज्य सरकार गैर-कृषि जमीन का बाजार मूल्य के आधार पर एक प्रतिशत गैर-कृषि लगान वसूलेगी, जो प्रति पांच वर्षों के लिए होगा एवं 3) कृषि भूमि पर गैर-कानूनी तरीके से निर्मित अपार्टमेंट, होटल, विद्यालय भवन, अस्पाताल, शापिंग माल, मैरिज हाल या अन्य तरह के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को तीन महिने के अंदर एक प्रतिशत गैर-कृषि लगान देकर नियमित किया जायेगा यानी गैर-कानूनी कार्य कानूनी हो जायेगा।

संशोधन का प्रभाव
1. मूलभावना और मालिकाना हक खत्मः सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट को आदिवासियों का सुरक्षा कवच कहा जाता है क्योंकि इन कानूनों की मूल भावना है कि रैयत का जमीन रैयत के पास रहे और उक्त जमीन पर सिर्फ रैयत का ही मालिकाना हक हो। लेकिन इन कानूनों में संशोधन कर कृषि जमीन को गैर-कृषि करने से इन कानूनों की मूल भावना और रैयत का मालिकाना हक खत्म हो जायेगा क्योंकि जमीन की प्रकृति बदलते ही वह सीएनटी/एसपीटी कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेगा। इस तरह के मामले  में ‘कमल खेस बनाम स्टेट आफ झारखंड एवं अन्य’, जून 2011, सीडब्ल्यूजेसी सं. 43 आफ 1999 में झारखंड उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि जमीन की प्रकृति बदलने से उस पर सीएनटी एक्ट लागू नहीं होगा। 

2. मुआवजा से बर्बादी: यह कहा जा रहा है कि अधिगृहित जमीन का कीमत रैयतों को बाजार मूल्य से चार गुणा ज्यादा मिलेगा और दो महिने के अंदर ही मुआवजा देने का काम निपटा लिया जायेगा। लेकिन क्या आदिवासी लोग मुआवजा लेकर बच पायेंगे? हेवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन, बोकारो स्टील लिमिटेड, तेनुघाट बिजली परियोजना, मयूराक्षी जलाशय परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, इत्यादि का उदाहरण बताता है कि इन परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण करने के बाद किये गये वादे के अनुसार विस्थापितों को न तो नौकरी मिली और न ही मुआवजा, और जिन परिवारों को मुआवजा और नौकरी मिली उनकी चैथी पीढ़ी के लोग आज रिक्शा चला रहे हैं, मजदूरी करने को मजबूर है या दूसरों के घरों में जूठा बर्तन धोकर अपना गुजारा कर रहे हैं। आदिवासी लोग मुआवजा से नहीं बचेंगे क्योंकि उनके खून में बेईमानी नहीं है। सरकार को यह भी समझना चाहिए कि हर कोई व्यापारी नहीं हो सकता है जो पैसा से पैसा बना सके। 

3. अनुपयोगी भूमि वापसी के नाम पर जमीन लूटः कहा जा रहा है कि यदि किसी परियोजना के लिए अधिगृहित जमीन का उपयोग पांच वर्षों के अंदर नहीं किया गया तो उक्त जमीन को रैयतों को लौटा दिया जायेगा और भुगतान किया हुआ मुआवजा की राशि भी वापस नहीं ली जायेगी। एच.ई.सी., टाटा कंपनी एवं बोकारो स्टील लिमिटेड के लिए अधिगृहित जमीन पिछले 60 वर्षों से बेकार पड़ा हुआ है लेकिन रैयतों को वापस नहीं किया गया है। क्या जो कंपनी जमीन लेगी वह उससे कब्जा करने के बाद रैयतों को वापस करेगी? यह जमीन लूटने का एक हथकंडा है। 

4. विकास के नाम पर विस्थापन: सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन करने के बाद रांची में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट का आयोजन किया गया, जिसमें 210 एमओयू पर हस्ताक्षर हुआ है। इन एमओयू को जमीन पर उतरने के लिए लाखों एकड़ जमीन की जरूरत है। फलस्वरूप, राज्य में फिर से बड़े पैमाने पर आदिवासी-मूलवासियों का विस्थापन होगा। झारखंड में विकास के नाम पर अब तक लगभग 65 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। ये विस्थापित लोग आज दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं।  

5. आजीविका पर प्रभाव: सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन के बाद बड़े पैमाने पर कृषि जमीन का अधिग्रहण किया जायेगा, जिससे आदिवासियों के आजीविका पर खतरा पैदा हो जायेगा क्योंकि झारखंड में मात्र 18 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि है तथा 91 प्रतिशत आदिवासी लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं जिनकी आजीविका कृषि, वनोपज एवं पशुपालन पर निर्भर करता है। यदि कृषि जमीन पर खेती कार्य के बदले उद्योग लगाया जायेगा तो लोग क्या खायेंगे? क्या दूसरे देशों से अनाज मंगाया जायेगा? 

6. आदिवासी अस्तित्व पर संकट: जमीन आदिवासियों के लिए सम्पति नहीं है बल्कि उनकी विरासत, पहचान, संस्कृति, रीति-रीवाज, परंपरा और अस्तित्व जमीन पर निर्भर है। आदिवासी लोग खेतों में एक साथ काम करते हैं, एक साथ जंगल जाते हैं, अखड़ा में एक साथ नाचते-गाते हैं, गांवों में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था कायम है, वे अपनी परंपरा और रीति-रीवाज में जीते हैं। लेकिन यदि आदिवासी लोग जमीन से बेदखल हुए तो उनका अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। क्या हम आदिवासी अस्तित्व को खत्म होने देंगे? 

7. विरासत की समप्ति: जमीन आदिवासियों का विरासत है। झारखंड में जितने खेत बने हुए हैं वे सब पूर्वजों की देन है। पूर्वजों की आत्मा गांवों में बसती है। क्या हम इन खेतों को बेचकर अपने पूर्वजों की आत्माओं को ठेस पहुंचा सकते हैं? आदिवासी इलाके का प्रत्येक गांव में शहीदों का कब्र है। क्या हम अपने शहीदों का सौदा कर सकते हैं? क्या हमें अपने विरासत को लूटने देना चाहिए?

8. धार्मिक आस्था पर चोट: झारखंड में विकास के नाम पर हजारों सरना स्थल, जाहेर थान और देशाउली को खत्म कर दिया गया है तथा विकास के नाम पर फिर से आदिवासियों के धार्मिक स्थलों को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। सारंडा जंगल में मित्तल कंपनी को लौह-अयस्क उत्खनन करने के लिए झारबेड़ा गांव के देशउली में खनन लीज दिया गया है। क्या मित्तल कंपनी आदिवासियों के भगवान से भी ज्यादा शक्तिशाली है? सुप्रीम कोर्ट ने ‘‘ओड़िसा माईनिंग कारपोरेशन बनाम वन व पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य (सी) सं. 180 आफ 2011’’ में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 आदिवासियों के धार्मिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं। इसलिए उनके धर्मास्थलों का संरक्षण जरूरी है। झारखंड सरकार रांची में एक सरना मंदिर बना रही है लेकिन झारखंड के हजारों सरना स्थलों को खनन कंपनियों को सौप रही है। क्या यह विरोधाभाष नहीं है? क्या सरकार आदिवासियों के आस्था पर गंभीर चोट नहीं पहुंचा रही है?      

9. जनसंख्या पर प्रतिकूल असर: झारखंड देश में एक आदिवासी राज्य के रूप में स्थापित है। लेकिन औद्योगिकरण की वजह से आदिवासियों की जनसंख्या लगातार घट रही है। जमशेदपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1907 में सिंहभूम जिले के कालीकाटी और साकची के आसपास 24 आदिवासी गांवों को मिलाकर टाटा कंपनी की स्थापना की गई, जहां आदिवासियों की जनसंख्या 95 प्रतिशत थी। बिहार, बंगाल, ओड़िसा एवं अन्य राज्यों से बड़े पैमाने पर गैर-आदिवासी लोग टाटा कंपनी में नौकरी करने के लिए आये और वहीं बस गये। फलस्वरूप, टाटा कंपनी के 100 साल के सफर में कंपनी देश के विकास का माडल बन गया, आदिवासी गांव कालीमाटी और साकची टाटा नगर जमशेदपुर में तब्दील हो गये तथा आदिवासियों की जनसंख्या 95 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत पर पहुंच गया। झारखंड सरकार ने कारपोरेट घरानों के साथ 210 नये एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किया है। इसलिए आने वाले समय में ये कंपनियां जहां-जहां स्थापित होंगे आदिवासी वहां-वहां विस्थापित होंगे और उनकी जनसंख्या घटेगी क्योंकि इन कंपनियों में काम करने के लिए लोग बाहर से आयेंगे और उनकी जनसंख्या बढ़ेगी।  

10. राजनीतिक शक्ति का ह्रास: लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व हमारा राजनीतिक अधिकार है और कमजोर तबके के लोगों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसी के तहत झारखंड में आदिवासियों के लिए 28 सीट विधानसभा में एवं 4 सीट लोकसभा में  आरक्षित किया गया है। लेकिन आदिवासियों की जनसंख्या में भारी बदलाव होने के कारण आने वाले समय में विधानसभा एवं लोकसभा के लिए आरक्षित सीट कम होता जायेगा, जिससे आदिवासियों की राजनीतिक ताकत भी खत्म होगी और वे झारखंड के राजनीति में निर्णयक भूमिका में नहीं रहेंगे। आज आदिवासियों के पास राजनीतिक ताकत होने के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी आदिवासी समाज के मुद्दों को नाकारने की स्थिति में नहीं है। इसलिए उन्हें धर्म के नामपर बांटकर उनकी राजनीतिक शक्ति को बिखरने की कोशिश की जाती है लेकिन जिस दिन उनकी यह राजनीति शक्ति चली गयी उस दिन आदिवासी समाज को कोई नहीं पूछेगा।

11. बाहरी लोगों को नौकरीः यह कहा जा रहा है कि राज्य में हो रहे पूंजीनिवेश से 6 लाख लोगों को नौकरी मिलेगा। लेकिन झारखंड सरकार ने स्थानीय नीति बनायी है, जिसमें दूसरे राज्यों से झारखंड में आये सभी लोगों को राज्य का निवासी घोषित किया गया है। इसलिए राज्य में लगे उद्योगों एवं सरकारी नौकरी में उन्हें ही फायदा मिलेगा। जनसंख्या कम होने सरकारी नौकरी में भी आरक्षित सीट कम हो जायेगा। इतना ही नहीं झारखंड सरकार सभी विभागों में स्थायी नौकरियों को खत्म करते हुए आउटसोर्सिंग कर रही है। झारखंड के विश्वविद्यालयों, सचिवालय और प्रखंडों में नौकरी करने वाले कौन लोग है? कितने आदिवासी और मूलवासियों को नौकरी मिला है? रिम्स रांची में अनुबंध पर नियुक्त नर्सों को हटाकर आउटसोर्स किया जाना क्या संकेत देता है? इसलिए राज्य में लगने वाले उद्योगों में बाहरी लोगों को ही अधिकांश नौकरी मिलेगा।

12. अभिव्यक्ति के आजादी पर हमलाः अभिव्यक्ति की आजादी हमारा मौलिक अधिकार है लेकिन जो लोग सीएनटी/एसपीटी कानूनों के संशोधन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उन्हें विकास विरोधी, आदिवासी विरोधी या सरकार विरोधी बताकर उनके कार्यक्रमों को रोकने के लिए धारा-144 लगाया जाता है। भविष्य में जमीन अधिग्रहण करने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल एवं कानून का सहारा लेकर ऐसे लोगों को राष्ट्रद्रोही कहते हुए उनके आवाज को दबाने की कोशिश भी की जायेगी। 

13. ग्रामसभा के अधिकार पर चोटः सुप्रीम कोर्ट ने ‘‘ओड़िसा माईनिंग कारपोरेशन बनाम वन व पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य (सी) सं. 180 आफ 2011’’ में फैसला दिया है कि आदिवासियों के निजी एवं सामुदायिक अधिकार, धार्मिक एवं संस्कृतिक अधिकार एवं गांव के संसाधनों को लेकर निर्णय लेने के लिए सक्षम है। लेकिन क्या विकास के नाम पर ग्रासभा के अधिकार को छीना जा सकता है? 

14. प्राकृतिक संसाधनों की लूट: झारखंड में देश का 40 प्रतिशत खनिज सम्पदा हैं यहां 1925 से विकास के नाम पर खनन कार्य किया जा रहा है, जिससे प्रतिवर्ष 15,000 करोड़ मूल्य का खनिज सम्पदा का उत्खनन किया जा रहा है। लेकिन राज्य में 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन-बसर करने को मजबूर हैं। ऐसा स्थिति इसलिए है क्योंकि सत्ता में बैठे लोगा यहां के आदिवासी और मूलवासियों के जीवन में बलाव लाना नहीं चाहते हैं बल्कि विकास का सब्जबाग दिखाकर खनिज सम्पदा को लूटना इनका मूल मकसद है। 

15. पर्यावरण पर प्रभाव: झारखंड का अर्थ झाड़-जंगल का इलाका लेकिन यहां बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास होने के कारण राज्य में जंगल मात्र 29 प्रतिशत बचा हुआ है जो पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी 33 प्रतिशत से कम है। झारखंड गठन के समय यहां का अधिकतम तापमान 32 डिग्री संल्सियस था जो बढ़कर 2016 में 48.6 पर पहुंच चुका है। राज्य की छोटी-बड़ी 141 नदियों प्रकृतिक बहाव खो चुकी हैं। मौसम बदलने के कारण ठीक से खेती नहीं हो रहा है। बावजूद इसके झारखंड सरकार ने 210 एमओयू किया है। राज्य में इतने उद्योग लगाने के लिए जंगलों को उजाड़ा जायेगा, नदियों में उद्योगों का कचड़ा डाला जायेगा और वायु प्रदूषण बढ़ेगा। इसका असर पर्यावरण पर होगा। चीन के 74 शहरों में से 71 शहरों में आक्सीजन खरीदना पड़ रहा है। कनाडा की एक कंपनी ने भारत में भी आक्सीजन बेचने का प्रस्ताव रखा है, जिसके लिए एक बार सांस लेने का कीमत 12.50 रूपये होगा। आने वाले समय में पानी की तरह ही बोतलों में बंद आक्सीजन भी खरीदना होगा। क्या पूंजीपतियों को हम झारखंड को बर्बाद करने दे सकते है? 

झारखंड संघर्ष की धरती है इसलिए यहां के राजसत्ता पर बैठे लोगों को जमीन की अवधारणा को समझना होगा। जमीन आदिवासियों के लिए सम्पति नहीं है बल्कि यह उनकी विरासत, पहचान, संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट को आदिवासियों का सुरक्षा कवच कहा जाता है क्योंकि इन कानूनों का मूल भावना है रैयत की जमीन रैयत के पास रहे या यूं कहें कि आदिवासी की जमीन आदिवासी के पास ही रहना चाहिए। इसलिए यह सोचने का समय है। सरकार के द्वारा आदिवासियत पर जो ठेस पहुंचाया जा रहा है इसे गहराई से प्रत्येक आदिवासी और मूलवासी को दिल से एहसास करना और सही कदम उठाने का वक्त है। यदि नहीं तो हम अपने पूर्वजों का अनादर कर रहे हैं और आनेवाली भावी पीढ़ी को जवाब नहीं दे सकेंगे। क्या हमलोग अपने सुन्दर झारखंड को लूटने देंगे?

- लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं। 

आदिवासी एकता का बुद्धिजीवी संकट?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

‘रघुवर दास झारखंड छोड़ो’, ‘रघुवर दास छत्तीसगढ़ वापस जाओ’, ‘सीएनटी/एसपीटी एक्टस में छेड़छाड़ करना बंद करो’, ‘जल-जंगल-जमीन हमारा है’ एवं ‘कारपोरेट के दलाल सरकार होश में आओ’ जैसे नारे आजकल झारखंड के कोने-कोने में गुंज रहे हैं। झारखंड सरकार के द्वारा राज्य के भूमि रक्षा कानूनों में संशोधन के खिलाफ यहां के आदिवासियों में आक्रोश है। राज्य के चारों तरफ जनाक्रोश कार्यक्रम लगातार आयोजित किये जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में आम आदिवासियों की एकता और सरकार के खिलाफ गुस्सा स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कई इलाकों में अबतक धर्म (सरना-ईसाई) के नाम पर एक-दूसरे के खिलाफ आग उगलने वाले आदिवासी लोग अपनी जमीन बचाने के लिए एकजुट होकर नारा लगा रहे हैं - ‘‘हम सब एक हैं’’। इतना ही नहीं भाजपा को वोट देने वाले आदिवासी लोग भी आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर बांटने के लिए पार्टी और आर.एस.एस. को खुल्लेआम कोश रहे हैं। ऐसा दिखाई पड़ता है मानो सचमुच आदिवासी समाज एकजुट हो चुका है। 

लेकिन इन आयोजनों से एक दूसरी तस्वीर भी उभर कर सामने आयी है। इन कार्यक्रमों का आयोजन कई अलग-अलग संगठन कर रहे हैं और मंचों पर भाषण देने वाले बुद्धिजीवी भी अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं। वे आदिवासी एकता की बात करते नहीं थकते हैं लेकिन एक मंच पर आने से कतराते हैं, एक-दूसरे के खिलाफ बोलने से भी नहीं हिचकते हैं और वे नये-नये मंचों का निर्माण भी कर रहे हैं। जबकि सबका एक ही मांग है कि सीएनटी/एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन वापस होना चाहिए। क्या ये आदिवासी बुद्धिजीवी आदिवासी समाज को एक होने नहीं दे रहे हैं? क्या ये लोग आदिवासी समाज का अगुआ बनने के चक्र में समाज को ही गर्त में नहीं डाल रहे हैं? क्यों ये बुद्धिजीवी एक साथ नहीं बैठते हैं? क्यों इतना संगठन बन रहा है, जिनके बीच कोई समन्वय नहीं है? कौन हैं ये बुद्धिजीवी? ये क्यों समाज को हराना चाहते हैं? इन प्रश्नों का जवाब ढूढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखना होगा।    

जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोज, खनिज सम्पदा, आदिवासी पहचान, भाषा, संस्कृति और अपना अस्तित्व को बचाने के लिए देश के विभिन्न इलाकों में आदिवासियों का संघर्ष पिछले तीन सौ सालों से चल रहा है। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां आदिवासियों ने एकजुटता और संघर्ष के बल पर ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। फलस्वरूप, अंग्रेजों ने आदिवासियों की जमीन, संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए कई कानून बनाये। लेकिन आजादी के बाद आदिवासी समाज में एक शिक्षित मध्यवर्ग पैदा हुआ, जिसने आरक्षण का लाभ लेकर गैर-आदिवासी समाज की व्यक्तिवादी जीवनशैली को अपना लिया। फलस्वरूप, शहरों में रहने वाले आदिवासी मध्यवर्गीय परिवारों में सबकुछ व्यक्ति और परिवार के इर्द-गिर्द घुमने लगा तथा आदिवासी समाज पीछे छुट गया। इन लोगों ने अपने निजी स्वार्थ को साधने के लिए आदिवासी पहचान, भाषा, संस्कृति, परंपरा और समाज के अस्तित्व को ही कब्र में दफन कर दिया। आदिवासी समाज अब धीरे-धीरे बिना जड़ का पेड़ बनता जा रहा है।   

आज इसी मध्यवर्ग से पैदा हुआ आदिवासी बुद्धिजीवी चाहे वह राजनीतिज्ञा, नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, लेखक, कवि, धर्मगुरू या किसी अन्य रूप में हो सिर्फ अपने निजी स्वार्थ के लिए आदिवासी समाज को गर्त में धकेल रहा है। ये बुद्धिजीवी लोग भी गैर-आदिवासियों के जैसा ही समाज का मसीहा बनना चाहते हैं। इनमें भी नाम, पैसा और शोहरत पाने की लालसा जाग चुकी है। और इसी लालसा को मिटाने के लिए वे एक-दूसरे का जानी-दुश्मन बन बैठे हैं और आदिवासी समाज को हारने पर मजबूर कर रहे हैं। सामाजिक आयोजनों में स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि कई बुद्धिजीवी एक मंच पर बैठने को तैयार नहीं दिखते और कई दफा एक-दूसरे को इस तरह के आयोजनों में जाने से भी रोकने का प्रयास करते हैं। क्या आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर लड़ाने वाले यही आदिवासी बुद्धिजीवी नहीं हैं जो अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए भाजपा और आर.एस.एस. के एजेंडा पर काम करते हैं? 

क्या यह विरोधाभाष नहीं है कि जहां एक तरफ आदिवासी बुद्धिजीवी विभिन्न मंचों और सोशल मीडिया में आदिवासी एकता की गुहार लगाते नहीं थकते हैं लेकिन वहीं आम आदिवासियों की भीड़ देखते ही स्वंय को समाज का अगुआ बनाने के चक्कर में आदिवासी एकता को तोड़ने में थोड़ा भी वक्त नहीं लगाते हैं? क्या पिछले एक दशक के अंदर एक भी ऐसा कार्यक्रम का आयोजन हुआ है जहां सभी बुद्धिजीवी एक साथ बैठकर आदिवासी समाज को बचाने के लिए चर्चा किये हों? क्या इनके पास एक साथ बैठने के लिए समय या संसाधन का अभाव है? जब आदिवासी समाज को एकजुट करने वाले बुद्धिजीवी ही एकजुट नहीं हैं तो समाज कैसे एकजुट होगा? ये बुद्धिजीवी समाज को कैसे दिशा देंगे? 

आदिवासी बुद्धिजीवियों की व्यक्तिगत महत्वाकांछा को समझने के लिए यहां कुछ घटनाओं का चर्चा करना जरूरी होगा। विस्थापन झारखंड के आदिवासियों का सबसे बड़ा मुद्दा है और राज्य में विस्थापन के खिलाफ पिछले तीन-चार दशकों से लंबा संघर्ष चल रहा है। आदिवासियों ने अपने एकता और संगठनिक ताकत के बदौलत सरकार और देशी-विदेशी कंपनियों के खिलाफ विस्थापन का लड़ाई जीता है। इस दौरान राज्य में विस्थापन के खिलाफ अनगिनत जनसंगठन बने लेकिन आजतक एक भी ऐसा मंच नहीं बना जहां सभी लोग एक स्वर में आवाज उठा सके। विस्थापन विरोधी जनसंगठनों, जनांदोलनों और सामाजिक संगठनों को एक मंच पर लाने हेतु कई प्रयास हुआ लेकिन यह सिर्फ एक कारण से संभव नहीं हो सका क्योंकि जो बुद्धिजीवी इन संगठनों का नेतृत्व करते हैं उनमें से अधिकांश लोग किसी एक व्यक्ति को राज्य स्तर पर नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते हैं। इसका मूल वजह है कि नेतृत्वकर्त्ता लोग समूह का विचार सुनने के बजाये स्वयं का विचार समूह पर थोपने लगते हैं क्योंकि वे यह मान लेता हैं कि वे ही सर्वश्रेष्ठ है। ये बुद्धिजीवी सामुदायिकता की बात करते हैं लेकिन उनके जीवन में इसका घोर अभाव है। क्या बुद्धिजीवियों को आत्म मंथन नहीं करना चाहिए? 

राज्य में सीएनटी/एसपीटी कानूनों को लेकर चल रहे जनांदोलनों में भी यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि समाज का मसीहा बनने और आंदोलन का श्रेय लेने के होड़ ने इस आंदोलन को भी कई स्तर पर कमजोर किया गया। 15 सितंबर, 2016 को रांची में आदिवासी बुद्धिजीवी मंच एवं अन्य संगठनों के द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित रैली एवं सभा में भी यह स्पष्ट दिखाई दिया। आदिवासी एकता दिखाकर राजसत्ता को अपनी ताकत का एहसास कराने के बजाये आंदोलन का श्रेय लेने के होड़ में बुद्धिजीवियों ने झारखंड की ‘आयरन लेडी‘ कहलाने वाली आंदोलनकारी दयामनी बारला से मैक छीन लिया और कुछ नेताओं को मंच से नीचे उतारकर आदिवासी एकता को तार-तार कर दिया। इतना ही नहीं कार्यक्रम की सफलता को देखकर आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने 22 अक्टूबर, 2016 को ‘आदिवासी संघर्ष मोर्चा’ द्वारा रांची में आयोजित जनाक्रोश रैली को राजनीतिक कार्यक्रम बताते हुए इसे समर्थन देने से इनकार कर दिया। क्या दिखाता है? क्या आदिवासी बुद्धिजीवी राजनीति से घृणा करते है? राजनीति से घृणा कर आप लोकतंत्र से कैसे प्यार कर सकते है? बुद्धिजीवी इतना स्वार्थी क्यों हैं? 

इसी तरह भाजपा के पूर्व सांसद व बुद्धिमान आदिवासी नेता सालखन मुर्मू ने सीएनटी/एसपीटी मामले में जनाक्रोश को देखकर ‘आदिवासी संगेल अभियान’ के अन्तर्गत समाधान रैली का आयोजन करना शुरू किया। लेकिन वे भी स्वयं को स्थापित करने और अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए झारखंडी पार्टी और जनसंगठनों पर आरोप लगाते रहते हैं। वे कहते हैं कि झारखंड में नेता, पार्टी, जनसंगठन, मंच-मोर्चा अनेक हैं मगर वे केवल विरोध का खानापूरी कर रहे हैं जबकि आदिवासी सेंगेल अभियान जमीनी स्तर पर स्पष्ट नेता, नीति, रणनीति के तहत युद्ध स्तर पर काम कर रही है। सालखन मुर्मू के इस स्वार्थी राजनीति को देखकर कई बुद्धिजीवियों ने उन्हें भाजपा का दलाल कहा तथा उनपर आरोप लगाया कि वे 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए पार्टी से पैसा लेकर आदिवासी एकता को तोड़ने का काम कर रहे हैं। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम आदिवासी किस बुद्धिजीवी पर विश्वास करें? क्या आदिवासी बुद्धिजीवियों के पास स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा है? विस्थापन जनांदोलन का गढ़ माने जाने वाले नेतरहाट, खूंटी एवं जमशेदपुर इलाके में आंदोलनकारी लोग नारा लगाते हैं - ‘जान देंगे, जमीन नहीं’ लेकिन अपना बहुमूल्य वोट उसी पार्टी को देते हैं, जिसने झारखंड में सबसे ज्यादा एम.ओ.यू. किया और आंदोलनकारियों के ऊपर गोली चलवाया है। क्या यह आदिवासी बुद्धिजीवियों के राजनीतिक नसमझी और अदूरदर्शिता का परिणाम नहीं है?

आज प्रखंड एवं जिला स्तर पर हो रहे जनाक्रोश रैली एवं सभाओं में भीड़ तो दिखती है लेकिन जिस राज्य में 80 लाख से ज्यादा आदिवासी हैं वहां राज्य की राजधानी रांची में 1 लाख लोग भी एक साथ क्यों नहीं जुट पा रहे हैं? निश्चित तौर पर झारखंड सरकार ने जनांदोलन को कुचलने के लिए पुलिस, प्रशासन एवं अर्द्धसैनिक बलों का उपयोग किया है बावजूद इसके कहीं न कहीं आदिवासी एकता के रास्ते पर आदिवासी बुद्धिजीवी आड़े आ रहे हैं। सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन के लिए आदिवासी विधायकों को जिम्मेवार ठहराने वाला यह आदिवासी बुद्धिजीवी वर्ग आज आदिवासी समाज को एकजुट होने नहीं दे रहा है। इसलिए यदि आदिवासी समाज लूट जाता है तो इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी इसी बुद्धिजीवी वर्ग को माना जाना चाहिए क्यों यह वर्ग अपने निजी स्वार्थ, घमंड और महŸवकांक्षा को बरकरार रखने के लिए कभी भी एकजुट नहीं हो सकता है। बुद्धिजीवियों का काम समाज को सही दिशा देना है स्वार्थी बनना नहीं। ऐसी स्थिति में आम आदिवासियों को ही समाज का नेतृत्व करना चाहिए तथा बुद्धिजीवियों को कम से कम अपना महत्वाकांछा छोड़कर अपनी भूमिका स्पष्ट तय करनी चाहिए तभी लूटते हुए आदिवासी समाज का भला होगा। 

 - लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं।