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शनिवार, 16 मार्च 2019

कोचांग का दर्द

कोचांग का दर्द   

- ग्लैडसन डुंगडुंग

कोचांग जाने का विचार आते ही मन में उमंग और भय का तरंग बराबर उमड़ने लगा। एक तरफ जहां पहली बार कोचांग जाने का उमंग था तो वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा बलों और नक्सलियों के अमानवीय व्यवहार के शिकार होने का भय मन को सताता रहा। लेकिन खतरा का परवाह किये बगैर मसीह प्रकाश सोय, जेवियर टोपनो, विपिन कुजूर और मैं खूंटी से दिन के दो बजे निकल पड़े। लगभग आधा घंटे में बंदगांव घाटी पार करते हुए बाजार टांड पहुंचे। इस घाटी में शांम छः बजे के बाद जाना मना था पर अब वह खौफ न के बराबर है। लेकिन मोबाईल का नेटवर्क अब भी काम नहीं करता है। कोचांग के लिए बंदगांव बाजार से पूरब दिशा की ओर जाना पड़ता है। कई गाड़ियां कोचांग की ओर जाने के लिए तैयार दिखे। हमे वहां कुछ परिचित भी मिले, जो ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ियों से कोचांग जा रहे थे। मुलाकात की औपचारिकता पूरी करने के बाद हमलोग कोचांग की ओर कुच किये। 

पतझड़ होने से जंगल का रंग हरा-पीला दिखाई देने लगा। जंगल के बीच-बीच में लाल रंग से सराबोर पलास के फूल दिखाई देने लगे जो हमें नई उम्मीद दे रहे थे। चिड़ियों की कोलाहल भी सुनाई देने लगा और महुआ का गंध गाड़ी से टकराती हवा के साथ खिड़कियों के रास्ते हमारे नाकों तक पहुचने लगा। मैंने ‘जरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी का नाम पहली बार सुना था इसलिए साथियों से पूछा कि क्या मुंडारी में यात्री गाड़ियों को ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी कहा जाता है? मसीह प्रकाश सोय ने मेरे सवाल का तुरंत जवाब देते हुए कहा कि अभी कुछ ही देर के बाद आपको ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ दिखाई देगा। मैं उत्साहित हो गया कि कोई नया चीज देखने को मिलेगा। कुदाडिह गांव पहुंचते ही सड़क के दोनों तरफ खेतों में सफेद एवं लाल रंग के खुबशूरत फूल दिखाई देने लगे और साथ में पौधों से लगा हुआ हरे रंग का छोटा-छोटा फल भी। ऐसा लगा मानो जंगल में किसी ने फूलों की खेती की हो। ये पोस्ता के पौधे थे। मसीह प्रकाश सोय ने अपने दाहीने हाथ के उंगली से इशारा करते हुए कहा कि देखिये वो हैं ‘जेरे’ और ‘सोसोय’। पोस्ता के फलों से निकलने वाला गोंद, जिससे आफिम तैयार किया जाता है उसे मुंडारी में ‘जेरे’ या ‘सोसोय’ कहते हैं।

इस इलाके में भारी पैमाने पर पोस्ता की खेती की जाती है। पोस्ता की खेती से मिले पैसे से मोटरसाईकल, यात्री गाड़ी एवं अन्य चार पहिया वाहन खरीदा जाता है। इसलिए वैसे गड़ियों को ‘जेरे’ या ‘सोसोय’ गाड़ी यानी आफिम की गाड़ी कहा जाता है। प्रत्येक गांव में ‘जेरे’ और ‘सोसोय’ गाड़ी मिलेगा। सबसे हैरत की बात यह है कि कोचांग गांव में पुलिस कैप है और जवान प्रतिदिन पेट्रालिंग के लिए जाते हैं। फिर भी इस इलाके में आफिम की खेती लहलहा रही है। सुखराम मुंडा बताते हैं कि उन्होंने कई बार पुलिस पदाधिकारियों से आफिम का फसल नष्ट करने को कहा है लेकिन वे कुछ नहीं करते हैं। मेरे मन में सवाल उठा कि गांव के लोग कैसे निडर होकर आफिम की खेती करते हैं? क्या यह पुलिस और राजनीतिज्ञों के सहयोग के बगैर संभव है? मसीह प्रकाश सोय ने फिर से मेरे सवालों का जवाब दिया। उन्होंने रोचक बात बतायी कि चुनावी साल में आफिम की सबसे ज्यादा खेती होती है क्योंकि जिन सत्ताधारी नेताओं को चुनाव लड़ना है वे पुलिस को आदेश दे देते हैं कि जिन-जिन गांवों से उन्हें वोट मिलता है उन गांवों का आफिम नष्ट नहीं करना है। इसलिए जब मीडिया में आफिम खेती की खबरें आने लगती है तब पुलिस उन गांवों का पोस्ता के पौधों को नष्ट करती है, जिन गावों से सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को वोट नहीं मिलता है। इसमें पुलिस का भी एक बड़ा हिस्सा है। प्रत्येक गांव से स्थानीय थाना को एक लाख रूपये मिलता है यानी पोस्ता खेती के क्षेत्र में पड़ने वाले थाना को प्रत्येक वर्ष 25 से 30 लाख रूपये मिलता। पोस्ता के फसल की खुल्लेआम खेती होने का मूल कारण यही है।

लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद हमलोग कोचांग गांव पहुंचे। बाजार का दिन होने के कारण लोग खरीद-बिक्री में लगे हुए थे। गांव के मुहाने पर हरा रंग से रंगा हुआ एक छः फीट का पत्थर गड़ा हुआ मिला, जिसपर भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद लिखे हुए थे। यह पत्थर कोचांग गांव जाने वालों को सावधान करता है कि यह ग्रामसभा का शासन क्षेत्र है। यहां ग्रामसभा की अनुमति के बगैर कोई काम नहीं कर सकते हैं। इससलिए हमलोग सीधे ग्रामप्रधान सुखराम मुंडा के घर पहुंचे। बगल में ही पुलिस कैंप है। हमारे पहुंचने से पुलिस कैंप में हलचल दिखाई पड़ा। कुछ जवान कैप से बाहर हमारे गाड़ी के आस-पास मंडराने लगे। बाघ से अचानक मुठभेड़ होने पर झूठा साहस दिखने वाले गीदड़ की तरह हम अपना मनोबल उंचा करते हुए आपस में जोर-जोर से बातें करने लगे। फलस्वरूप, जवानों ने हमसे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की। अब हमलोग साहस के साथ सुखराम मुंडा के कैंपस में घुस गये। 

आंगन में सरसों के पोधौं को सुखया गया था। लीची पेड़ के नीचे मुर्गी अपने बच्चों को दाना चुगना सिखा रही थी। घर का पहरेदार भी मुस्तैद था। हमें आंगन में बैठने के लिए प्लास्टिक की कुर्सी दी गई और साथ में पीने के लिए पानी भी। थोड़ी देर में सुखराम मुंडा आये। वे दीवाल के किनारे मिट्टी से बने पींडा पर बैठ जाते हैं। वे अपना और कोचांग का दर्द बयान करते हैं। वे अपनी और गांव की जमीन बचाने के लिए लड़ रहे हैं। वे बताते हैं कि इस इलाके में पत्थलगड़ी आंदोलन बहुत बाद में शुरू हुआ। जब उन्हांने पत्थलगड़ी के बारे में सुना तो गांव के कई लोगों के साथ पत्थलगड़ी आंदोलन के कई बैठक और सभाओं में शामिल होकर उसे समझने की कोशिश की। जब उन्हें लगा कि गांव की जमीन और जंगल को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जरूरी है तब उन्होंने गांव में ग्रामसभा की बैठक बुलायी, जिसमें पत्थलगड़ी चर्चा की गई और निर्णय लिया गया कि गांव में पत्थलगड़ी करना जरूरी है। इसके बाद गांव में चंदा किया गया। इस तरह से 25 फरवरी 2018 को पारंपरिक तरीके से पत्थलगड़ी की गई। फिर भी कोचांग गांव चर्चा में कहीं नहीं था। 

कोचांग गांव चर्चा में तब आया जब 19 जून 2018 को यहां सामूहिक बलात्कार कांड हुआ, जिसमें पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं को इसका मास्टरमाईंड बताया गया। सुखराम मुंडा बताते हैं कि इस घटना के बाद एक रात अचानक सुरक्षा बलो की एक टुकड़ी गांव पहुंची और मध्य विद्यालय भवन में डेरा डाल दिया। अगले दिन शिक्षकों को कहा गया कि कोचांग के मध्य विद्यालय को रूगूड़डिह मध्य विद्यालय में मिला दिया गया है। इसलिए वे बच्चों को लेकर वहां जायें। अपनी नौकरी बचाने के लिए शिक्षक तो रूगूड़डिह चले गये लेकिन गांव के 35-36 बच्चों ने विद्यालय जाना छोड़ दिया। सरकार ने इन आदिवासी बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार को एक झटके में छीन लिया। सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून 2009 का खुला उल्लंघन किया है। यदि यही काम ग्रामसभा या नक्सली करते तो यह देश की मीडिया में बड़ी खबर बनता। इसी बीच सुरक्षा बलों ने अपने लिए शौचालय बनाने के लिए बिना पूर्व सूचना और अनुमति के सुखराम मुंडा की 14 डिसमिल जमीन को कब्जा कर लिया जबकि उन्होंने पहले ही विद्यालय बनाने के लिए मुफ्त में अपनी जमीन दान दी थी। सरकार ने ग्रामसभा के अधिकारों को कुचल डाला। इतना ही नहीं सरकार अब गांव की 2.47 एकड़ जमीन पर स्थायी पुलिस कैंप बनाना चाहती है, जिसके लिए पिछले दरवाजे से काम किया जा रहा है। 

सुखराम मुंडा बताते हैं कि 23 अक्टूबर 2018 को अड़की के अंचलाधिकारी ने कोचंग में ग्रामसभा आयोजन करने का फरमान जारी किया था। आदेश-पत्र में लिखा था कि कोचंग गांव में सामुदायिक भवन निर्माण हेतु पुलिस अधीक्षक, खूंटी से अधियाचना प्राप्त हुआ है, जिसके लिए 2.47 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसलिए उक्त योजना हेतु आगामी 30 अक्टूबर 2018 को गांव में ग्रामसभा आयोजित है, जिसमें सभी सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। गांव के आदिवासियों को पता है कि यह आदेश पेसा कानून 1996 के खिलाफ है क्योंकि ग्रामसभा बुलाने का अधिकार सिर्फ ग्रामप्रधान को है। सरकार कोचांग गांव में स्थायी पुलिस कैप बनाना चाहता है, जिसके लिए गांव में जमीन चाहिए। आदिवासी नहीं चाहते हैं कि उनके गांव में पुलिस कैंप बने इसलिए वे जमीन नहीं देना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि यह पुलिस कैंप उनके सुरक्षा के लिए नहीं है और न ही इसे यहां शांति स्थापना होगी। 

कोचांग गांव की जमीन लेने के लिए सरकार ने कानून, बंदूक और जेल के नामपर ग्रामप्रधान को भयभीत करना शुरू किया। 29 अक्टूबर 2018 को सुखराम मुंडा एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए रांची गये थे, जिन्हें लौटते समय खूंटी पुलिस ने खूंटी बाजार से उठा लिया और थाना में कई घंटो तक रखा, जहां खूंटी थाना एवं अड़की थाना के प्रभारियों ने उन्हें धमकाया कि यदि वे जमीन अधिग्रहण वाले दस्तावेज में दस्तखत नहीं करते हैं तब उसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। ‘पत्थलगड़ी’ के मामले में उनके खिलाफ चार केस दर्ज हैं इसलिए वे उन्हें किसी भी समय जेल भेजकर सड़ा सकते हैं। वे एक बार जेल गये तो वहां से निकलना मश्किल हो जायेगा। उन्होंने डरा-धमकाकर भूमि अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज में दस्तखत करवा लिया उसके बाद रात के 11 बजे उन्हें छोड़ा गया।  

पुलिस की लाठी, बंदूक और जेल के भय से कोचंग गांव के मुंडा आदिवासी अंचलाधिकारी के आदेशानुसार तय तिथि को धान काटना छोड़कार ग्रामसभा में बैठ गये। लेकिन कोई भी सरकारी अधिकारी अंचल, प्रखंड या थाना से नहीं पहुंचा। इस तरह से गांव वालों को एक दिन बर्बाद हो गया। 1 नवंबर 2018 को अचानक अड़की थाना के प्रभारी तीन गाड़ियों के साथ गांव के पास स्थित दैनिक बाजार में पहुंचे। दो गड़ियों में धोती-साड़ी था और एक गाड़ी में पुलिस के जवान थे। थाना प्रभारी ने बाजार में उपस्थित आदिवासियों के बीच साड़ी और धोती बांटते हुए सादा कागज पर उनका हस्ताक्षर एवं अंगूठे का निशान ले लिया। जब लोगों ने सवाल पूछा कि क्यों धोती-साड़ी बांटा जा रहा है तब उन्होंने कहा कि सोहराई परब के लिए उन्हें सरकार की ओर से दिया जा रहा है। परब का नाम सुनकर लोगों ने धोती-साड़ी ले ली। लेकिन थानाप्रभारी ने चालाकी करते हुए उक्त दस्तावेज को ग्रामसभा बैठक की कार्यवाही बनाकर लिख दिया कि कोचांग के ग्रामीण सामुदायिक भवन के लिए 2.47 एकड़ जमीन देना चाहते हैं। अंततः यह कागज आंचलाधिकारी के द्वारा जिला भू-अर्जन पदाधिकारी के पास पहुंच गया। इसमें सबसे रोचक बात यह है कि जिन लोगों ने सादा कागज पर हस्ताक्षर एवं अंगूठे का निशान लगाकर साड़ी-धोती लिया है उनमें से अधिकांश व्यक्ति कोचांग गांव का नहीं है। 

कोचांग गांव के आदिवासी भूमि अधिग्रहण को लेकर सवाल उठा रहे हैं कि ग्रामसभा के आयोजन का आदेश अंचलाधिकारी कैसे दे सकते हैं? कौन से कानून के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है? गांवों के विकास का काम कब से पुलिस अधीक्षक के हाथों में सौपा गया है? कोचंग के आदिवासी कह रहे हैं कि जब गांव में सामुदायिक भवन पहले से मौजूद हैं तो फिर एक और सामुदायिक भवन किसके लिए बनाना है? 2.47 एकड़ जमीन में किस तरह का सामुदायिक भवन बनेगा क्योंकि गांव का सामुदायिक भवन के लिए 10 से 15 डीसमील जमीन काफी है? आदिवासी हकीकत जानते हैं। हकीकत यह है कि सामुदायिक भवन के नामपर जमीन का अधिग्रहण कर वहां स्थायी पुलिस कैंप बनाने की योजना है इसलिए पुलिस अधीक्षक ने अंचलाधिकारी को अधिसूचना भेजा था। पुलिस कैंप बनाने के लिए सरकार को जमीन नहीं मिल सकता है इसलिए आदिवासियों को अंधेरा में रखकर जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है। 

सरकार की गैर-कानूनी एवं अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण की कोशिश के खिलाफ कोचांग ग्रामसभा ने जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, खूंटी को आपति-पत्र दिया है। लेकिन वे कहते हैं कि उन्हें ग्रामसभा की सहमति-पत्र प्राप्त हो चुकी हैं। सुखराम मुंडा बताते हैं कि खूंटी प्रशासन उनसे थाना में लिया गया हस्ताक्षर एवं गांव में धोती-साड़ी बांटते समय लिया गया दस्तखत एवं अगूंठे के निशान को ग्रामसभा का सहमति-पत्र के रूप में उपयोग कर रहा है। वे कहते हैं कि इस अन्याय के खिलाफ कोचांग के आदिवासी अंतिम दम तक लड़ेंगे। उन्हें पुलिस कैंप की भी जरूरत नहीं है इसलिए विद्यालय से कैंप हटाकर विद्यालय को पुनः चालू किया जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के अधिकार का उल्लंघन हैं। कोचांग गांव के आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय और उनकी पीड़ा से रू-ब-रू होने के बाद हमलोग खूंटी लौट गये। मन में अनुतरित सवाल अब भी है कि आखिर कब तक आदिवासियों के साथ इस तरह का अन्याय होता रहेगा? कोचांग के आदिवासियों के दर्द को कौन सुनेगा? क्या इनके साथ न्याय होगा? 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

झारखंड का किंगमेकर कौन?

 ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होना है जो अप्रैल में लोकसभा चुनाव के साथ भी हो सकता है, लेकिन यह केन्द्र सरकार के इच्छा पर निर्भर करता है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव परिणाम तथा आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बढ़ती ठंढ के बीच चैक-चैराहे, चाय-पकौड़े की दुकान और सामाजिक-राजनीतिक गलियारों का चुनावी हवा धीरे-धीरे गर्म हो रही है। तीन राज्यों के विधासभा चुनाव परिणाम से विपक्षी खेमें की उम्मीदों को पंख लग चुका है और भाजपा के अंदर खलबली मच गई है। यही कारण है कि झारखंड में भी नेतृत्व परिवर्तन को लेकर दिल्ली में मंथन का दौर चला पड़ है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों ने भाजपा को नाकारा दिया है और यदि झारखंड के आदिवासी भी उसी रास्ते पर चलते हैं तो भाजपा को सत्ता गवांना पड़ेगा। हालांकि राज्य में कोई भी पार्टी अपने दम पर चुनाव जीतकर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है तथा महागठबंधन के रास्ते पर जेएमएम रोड़ा बना हुआ है। इसलिए अभी सबकुछ धुंधला सा दिखाई देते हैं। जेएमएम के नेता दूध भी पीना चाहते हैं और दही भी खाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में मौलिक प्रश्न यह है कि आगामी चुनाव में झारखंड का किंगमेकर कौन होगा? क्या कांग्रेस, जेवीएम या आजसू में किंगमेकर बनने की ताकत है?  

झारखंड के किंगमेकर को जानने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम और राज्य के राजनीतिक परिस्थितियों का आंकलन करना होगा। झारखंड में विधानसभा के कुल 81 सीटें हैं, जिनमें 44 सामान्य एवं 37 आरक्षित सीटें हैं। आरक्षित सीटों में आदिवासियों के लिए 28 एवं दलितों के लिए 9 सीटें हैं। झारखंड विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 41 है। राज्य में सामान्य वर्ग के लिए 44 सीटें हैं जो बहुमत का आंकड़ा से 3 ज्यादा है लेकिन चूंकि गैर-आदिवासी समाज का आधार व्यक्तिवादी है इसलिए वे एकजुट होंगे ऐसा नहीं लगता है। वहीं आदिवासी और दलित के लिए 37 आरक्षित सीटें हैं जो विधानसभा मं बहुमत से मात्र 4 सीटें कम हैं। ये दोनों ही समुदायों के लोग शोषित और पीड़ित हैं इसलिए यदि वे एकजुट हो जाते हैं तो राज्य की राजनीतिक स्थिति अलग हो जायेगी। लेकिन वे एकजुट न भी हो तब भी यदि वे किसी एक पार्टी या गठबंधन की ओर रूख करते हैं तो सत्ता उनको मिलना तय है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका आदिवासी समुदाय की है, जिनके लिए 28 सीटें आरक्षित है। यदि एक पार्टी या गठबंधन इनमें से 20 से 25 सीट जीतता है तो राज्य में उनका सरकार बनना तय है। चूंकि आदिवासी समुदाय का आधार समुदायिकता है इसलिए आदिवासियों को एकजुट करना ज्यादा आसान है।  

झारखंड की राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए राज्य को पांच क्षेत्रों में बांटकर देखना होगा। राज्य में सबसे ज्यादा 12 आरक्षित सीट दक्षिणी छोटानागपुर में हैं, जिसमें से आदिवासियों के लिए 11 एवं दलितो के लिए 1 सीट आरक्षित है। इसके बाद कोल्हान क्षेत्र आता है जहां 10 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें आदिवासियों के लिए 9 तथा दलितों के लिए 1 सीट शामिल है। इसी तरह संताल परगना क्षेत्र है जहां कुल 8 आरक्षित सीटे हैं, जिनमें आदिवासियों के लिए 7 एवं दलितों के लिए 1 सीट आरक्षित है। उत्तरी छोटानागपुर और पलामू क्षेत्र में दलितों के लिए क्रमशः 4 एवं 2 सीटें आरक्षित है तथा आदिवासियों के लिए दोनों ही क्षेत्रों में 1-1 सीट आरक्षित है। इससे स्पष्ट है कि झारखंड में सत्ता हासिल करने के लिए दक्षिणी छोटानागपुर, कोल्हान और संताल परगना में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों को हासिल करना पड़ेगा। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इन तीनों क्षेत्रों में आदिवासियों का साथ मिलने वाला राजनीतिक दल को झारखंड का सत्ता मिलता तय है क्योंकि यहीं पर आदिवासियों के लिए 27 आरक्षित सीटें देखें सारणी-1 हैं।       

 सारणी-1. झारखंड विधानसभा सीटों की क्षेत्रवार स्थिति
क्र.सं. क्षेत्र विधानसभा सामान्य आरक्षित सीटों की स्थिति
कुल सीटें सीटें एसटी एससी कुल
1. संताल परगना 18 10 07 01 08
2. उŸरी छोटानागपुर 25 21 00 04 04
3. दक्षिणी छोटानागपुर 15 03 11 01 12
4. कोल्हान 14 04 09 01 10
5. पलामू 09 06 01 02 03
  कुल 81 44 28 09 37

राज्य के वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखें तो कोई भी राजनीतिक पार्टी का पकड़ आदिवासी बहुल तीनों क्षेत्रों में नहीं है। 2014 के विधानसभा चुनाव परिणाम से स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी पार्टी के पास इसलिए बहमत नहीं आया क्योंकि कोई भी पार्टी इन क्षेत्रों के अधिकांश आरक्षित सीट नहीं जीत पाये। भाजपा ने कुल 16 आरक्षित सीटें जीती, जिनमें से 11 आदिवासी एवं 5 दलित आरक्षित सीटें शामिल हैं। इनमें से सबसे ज्यादा 6 आदिवासी सीटें दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र की हैं, 2 संताल परगना, 2 कोल्हान एवं 1 सीट पलामू क्षेत्र का शामिल है। इसी तरह जेएमएम ने कुल 13 आरक्षित सीटें देखें सारणी-2 जीती, जिनमें से कोल्हान की 6 सीटें, सताल परगना की 5 सीटें तथा दक्षिणी छोटानागपुर की 2 सीटें शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट है कि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटें सबसे ज्यादा इन्हीं दो पार्टियों ने जीता है क्योंकि संताल परगना, कोल्हान और दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र इनका गढ़ है। 

भाजपा ने आरएसएस संचालित एनजीओ वनवासी कल्याण आश्रम, वनवासी सेवा आश्रम, विकास भारती इत्यादि के द्वारा दक्षिणी छोटानागपुर के उरांव आदिवासी बहुल क्षेत्रों घुसकर सरना आदिवासियों के बीच काम करते हुए सरना-ईसाई विवाद, आरक्षण, धर्मांतरण, जैसे मुद्दों को हवा देते हुए यहां कब्जा जमा लिया है। लेकिन संताल परगना और कोल्हान में भाजपा कमजोर है, जहां पकड़ मजबूत बनाने के लिए संताल-सनातन और सरना-सनातन एक हैं और धर्मांतरण एवं आरक्षण के विवाद को हवा दिया जा रहा है। चूंकि आदिवासी और दलित धर्म का आफिम खाने में सबसे आगे रहते हैं इसलिए भाजपा को काफी हद तक सफलता मिलती है। आदिवासी और दलित जितना भी मार खाये लेकिन ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद से चिपके रहते हैं क्योंकि उनके पास राजनीतिक विचारधारा का घोर अभाव है। भाजपा नेताओं को पता है कि सरना-ईसाई विवाद ही उन्हें सत्ता में बरकरार रखेगा और यदि यह विवाद थाम जाता है तो सत्ता उनके हाथ से निकल जायेगा। 

झारखंड आंदोलन में दिसोम गुरू सिबू सोरेन और जेएमएम की प्रमुख भूमिका होने के कारण पार्टी का संतालपरगना और कोल्हान में पकड़ स्पष्ट दिखाई पड़ती है, जिसे भाजपा तोड़ने की कोशिश में जुटा हुआ है। यदि जेएमएम छोटानागपुर में भी अपनी पकड़ मजबूत कर ले तो राज्य का सत्ता उसी के पास होगा। लेकिन अभी उसे अपना गढ़ बचाने के लिए रात-दिन एक करना पड़ रहा है। दक्षिणी छोटानागपुर में पार्टी का विस्तार नहीं हो पा रहा है क्योंकि पार्टी प्रमुख यहां के स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से नहीं उठा पा रहे हैं। पार्टी के पास बड़े दलित नेताओं का अभाव होने के कारण पार्टी एक भी दलित सीट जीतने में नाकामयाब है। यदि जेएमएम को लंबी राजनीति करनी है तो उसे आदिवासी और दलित दोनों समुदायों के बीच पकड़ मजबूत करना होगा। यदि जेएमएम सही रणनीति और दिशा के साथ युवाओं को ज्यादा से ज्यादा जगह देगी तो हो सकता है कि पार्टी सत्ता तक पहुंच सकती है। लेकिन फिलहल उसे यदि महागठबंधन में नहीं जाना है तो जेवीएम जैसी पार्टी के साथ गठबंधन बना लेना चाहिए क्योंकि भाजपा के साथ जाने की जेएमएम की स्थिति छत्तीसगढ़ के अजीत जोगी की पार्टी जैसी हो जायेगी।  

झारखंड में कांग्रेस पार्टी का सूर्य अस्त होता दिखाई पड़ता है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी एक भी आरक्षित सीट नहीं जीत सकी। हालांकि उप-चुनाव में लोहारदगा और कोलेबिरा विधानसभा सीटें उसके हाथ लगा। गीता कोड़ा का कांग्रेस में शामिल होने से कोल्हान में अगले चुनाव में खाता खुलने की संभावना भी बढ़ गई है। इसी तरह जेवीएम के पास भी आदिवासी सीट नहीं है। हालांकि पार्टी ने दलितों के लिए आरक्षित तीन सीट जीता था। ऐसी स्थिति में यदि जेएमएम और जेवीएम एक साथ आ जाते हैं तो आदिवासी, दलित एवं सामान्य सीटों की तीकड़ी बन जायेगा और सत्ता उनके पास आ जायेगा। इसके अलावा आजसू, झारखंड पार्टी, जेडीयू, आरजेडी इत्यादि भी राज्य में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। शायद अगले चुनाव में गठबंधन से अलग इनकी कोई भूमिका नहीं होगी, जिसके बारे में इनके नेता भी बखूबी जानते हैं।              

सारणी-2. झारखंड विधानसभा के आरक्षित सीटों की पार्टीवर स्थिति 2014
राजनीति संताल परगना उ. छोटानागपुर द.छोटानागपुर कोल्हान पलामू कुल सीट
पार्टी एसटी एससी एसटी एससी एसटी एससी एसटी एससी एसटी एससी एसटी एससी कुल
भाजपा 02 01 00 02 06 01 02 00 01 01 11 05 16
जेएमएम 05 00 00 00 02 00 06 00 00 00 13 00 13
कंग्रेस 00 00 00 00 00 00 00 00 00 00 00 00 00
जेवीएम 00 00 00 02 00 00 00 00 00 01 00 03 03
आजसू 00 00 00 00 02 00 00 01 00 00 02 01 03
झा.पा. 00 00 00 00 01 00 00 00 00 00 01 00 01
निर्दलीय 00 00 00 00 00 00 01 00 00 00 01 00 01
कुल 07 01 00 04 11 01 09 01 01 02 28 09 37

झारखंड में राजनीतिक हालात ठीक नहीं है। झारखंड सरकार के द्वारा सीएनटी/एसपीटी कानूनों एवं भूमि अधिग्रहण कानून में किये गये संशोधन, ग्रामसभाओं की 21 लाख एकड़ जमीन को परती बताकर भूमि बैंक में डालना तथा गोड्डा में अडानी कंपनी के लिए धान की फसल पर बुलडोजर चलाकर आदिवासियों की जमीन को कब्जा करने के मामले ने आदिवासियों को भाजपा के विरोध में खड़ा कर दिया है। आजकल आदिवासियों के बीच आयोजित बैठक, सभा और सम्मेलनों में ये मुद्दे छाये हुए हैं। हालांकि तथाकथित धर्मांतरण के खिलाफ धर्म स्वतंत्रता कानून 2017, सरना-ईसाई विवाद और ईसाई मिशनरियों के 88 संस्थानों पर जांच-जांच के खेल से राज्य सरकार ने सरना आदिवासियों को खुश करने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन सरकार को इसमें मनचाहा सफलता हासिल नहीं हो पाया है क्योंकि अधिकांश आदिवासियों के लिए उनकी ‘‘जमीन’’ उनका ‘‘धर्म’’ से बड़ा है। 

आदिवासियों के मन में यह बैठ गया है कि झारखंड सरकार उनकी बची-खुची जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को लूटकर पूंजीपतियों को देना चाहती है तथा उनकी एकजुटता को तोड़ने के लिए उन्हें धर्म के नाम पर लड़वाया जा रहा है ताकि वे अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए चल रहे संघर्ष में कमजोर पड़ जायं। आदिवासियों के बीच यह भी संदेश गया है कि आदिवासियों को सरना-ईसाई के नामपर लड़वाने वाले अधिकांश राजधानीवासी आदिवासी नेता जमीन दलाल हैं, जिन्होंने सरना आदिवासियों की जमीन को बेचवाकर खूब पैसा कमाया है। इसलिए उनके बातों में नहीं आना है। भाजपा नेताओं को पता है कि आदिवासियों का यह विचार आगामी चुनाव में उनसे सत्ता छीन सकता है। इसलिए अंतिम वर्ष में राज्य का नेतृत्व आदिवासी नेता के हाथ में सौपना चाहते हैं, जिसे आदिवासियों की नाराजगी दूर हो सके। लेकिन क्या यह इतना सरल नहीं है? अभी राज्य का राजनीतिक हवा विपक्षी पार्टियों के पक्ष में बह रही है। यदि समय रहते वे इसे समझ गये तो राज्य का सत्ता उनके हाथों में आ जायेगा क्योंकि भाजपा का जहाज बीच समुद्र में डगमगा रहा है।   

लेकिन यहां मूल बात यह है कि झारखंड राज्य की मांग को लेकर सबसे पहले आंदोलन छेड़ने वाले आदिवासी ही राज्य में किंगमेकर की भूमिका में हं। इसलिए आगामी विधानसभा चुनाव में आदिवासी जिनकी ओर झुकेंगे, राज्य का सत्ता उन्हं ही मिलेगा। राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए दक्षिणी छोटानागपुर, कोल्हान और संताल परगना के आदिवासियों का दिल जीतना होगा, जो इस बार बहुत आसान नहीं होगा क्योंकि वे यह जान चुके हैं कि अगला चुनाव सिर्फ किसी पार्टी के हार-जीत का प्रश्न नहीं है बल्कि यह चुनाव आदिवासी समुदाय के अस्तित्व को तय करेगा। इसी से तय होगा कि आदिवासियों की जमीन, उनका इलाका और प्राकृतिक संसाधन बचेगा या इन्हें कारपोरेट घराने बेच खायेंगे। आदिवासी अपना अस्तित्व को दांव पर नहीं लगायेंगे। जो भी हो फैसला उन्हें ही करना है क्योंकि वे ही झारखंड के किंगमेकर हैं.

कोलेबिरा उप-चुनाव परिणाम के मायने

ग्लैडसन डुंगडुंग

आजकल फेसबुक ने लाखों की संख्या में राजनीतिक विश्लेषकां को पैदा किया है। चुनाव परिणाम की घोषणा होने से पहले ही ये लोग हार और जीत के कारणों का विश्लेषण फेसबुक में भर देते हैं। इनमें से कुछ विश्लेषण अच्छे भी होते हैं लेकिन अधिकांश का कोई सिर-पैर नहीं होता है। जिनको जो मन में आया अपने वाल पर लिख दिया। ऐसे राजनीतिक विश्लेषण सिर्फ भ्रम पैदा करते हैं जानकारी और ज्ञान नहीं। हालांकि कोलेबिरा उप-चुनाव परिणाम को लेकर कई जानकारों का विश्लेषण भी हकीकत के बहुत करीब नहीं है। चुनाव परिणाम इतना कैसे बदल गया? क्या यह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों का प्रभाव है? क्या यह चुनाव परिणाम 2019 के चुनाव पर प्रभाव डालेगा? कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि यह पार्टी की जीत है और जेवीएम के नेता दावा कर रहे हैं कि यह गठबंधन की जीत है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोलेबिरा उप-चुनाव कांग्रेस-जेवीएम गठबांधन की जीत है या यह कांग्रेस पार्टी की जीत है? 

जमीनी हकीकत बताता है कि यह न तो कांगेरस-जेवीएम गठबंधन और न ही कांग्रेस पार्टी की जीत है बल्कि यह विक्सल कोंगाड़ी की जीत है। यदि इस उप-चुनाव में विक्सल कोंगाड़ी के जगह पर कांग्रेस पार्टी के टिकट से बंजामिन लकड़ा, नियेल तिर्की या थेओदोर किड़ो चुनाव लड़ते तो कांग्रेस पार्टी शायद तीसरा या चैथा स्थान पर होता। विक्सल कोंगाड़ी को अपने काम के बदौलत जीत मिली है। विक्सल कोंगाड़ी ने झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के माध्यम से कोलेबिरा विधानसभा क्षेत्र के मुंडा बहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर वन अधिकार अभियान चलाया। ग्रामसभाओं को मजबूत किया और गांव-गांव में जंगलों पर आदिवासियों के दावे से संबंधित साईबोर्ड गड़वाया। जिला प्रशासन ने उनके खिलाफ मुकदमा भी किया और कई साईनबोर्ड भी उखड़वाये। लेकिन यह अभियान इतना सशक्त था कि विक्सल को एक जुझारू नेता बना दिया। विक्सल ने इस अभियान के द्वारा स्वयं को स्थापित करने के लिए मीडिया का भी बखूबी इस्तेमाल किया। इसी अभियान के बदौलत ही उसे कांग्रेस पार्टी का टिकट भी मिला। 

कोलेबिरा विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन पिछले दो चुनावां में बहुत बुरा रहा था। पार्टी को 2009 में 13,499 वोट और 2014 में 10,709 वोट मिले थे जबकि उक्त चुनावों में बंजामिन लकड़ा और थेओदोर किड़ो को पार्टी ने चुनाव में उतारा था। सिमडेगा जिले में कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंटा हुआ है। एक गुट बंजामिन लकड़ा के दिशा-निर्देश पर चलता है और दूसरे गुट पर नियेल तिर्की कब्जा जमाये हुए है। इस उप-चुनाव में भी दोनों गुट अपना-अपना उम्मीदवार को टिकट दिलवाने में लगे रहे। हालांकि इसमें बंजामिन गुट ने बाजी मार ली और विक्सल को टिकट मिला। लेकिन यह चुनाव परिणाम शायद कांग्रेस को सिमडेगा में एकजुट कर सकता है। यदि दोनों गुट मिल जाते हैं तो आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिमडेगा और कोलेबिरा दोनों सीट जीत सकती है। लेकिन इसके कोलेबिरा की तरह ही सिमडेगा में भी वंशवाद को छोड़कर सही उम्मीदवार का चयन करना होगा जो शायद कठिन होगा क्योंकि सिमडेगा विधानसभा के लिए नियेल तिर्की अपने सुपुत्र को टिकट दिलवाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देंगे।  
यहां मौलिक प्रश्न यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन के बावजूद झारखंड पार्टी चैथा स्थान पर क्यों खिसक गया? इसके कुछ मौलिक कारण स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। झारखंड पार्टी को समर्थन देने के कारण झामुमो का पूरा जिला ईकाई ही पार्टी से अलग होकर बसंत डुंगडुंग को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतारा था। इसलिए गुरूजी का आर्शीवाद और हेमंत सोरेन का चुनाव प्रचार से मेनन एक्का को कोई लाभ नहीं हुआ। इसके अलावा राष्ट्रीय सेंगेल पार्टी का चुनाव लड़ने से झारखांड पार्टी को सबसे ज्यादा नुकशान हुआ। सेंगेल पार्टी को 23,799 वोट मिला, जो मूलतः झापा का वोट था। इसके अलावा झापा का खड़िया वोट संगेल पार्टी और भाजपा के पास चला गया। झामुमो अपनी रणनीतिक चुक के कारण सिमडेगा जिले में अपना अस्तित्व ही गवां बैठा जबकि पार्टी को पिछले चुनाव में कोलेबिरा विधानसभा में 17,055 वोट मिले थे। यदि आगामी चुनाव में महागठबंधन बनाता है तब ये दोनो सीट कांग्रेस के खाते में जायेगा जबकि झामुमो कोलेबिरा सीट पर दावा कर रहा था। अब झामुमो के पास दक्षिण छोटानागपुर में तोरपा, बिशुनपुर और गुमला सीट आयेगा।  

कोलेबिरा उप-चुनाव में भाजपा अपने बुने जाल में ही फांस गई। भाजपा पिछले दो वर्षों से धर्मांतरण, ईसाई मिशनरी और ईसाई आदिवासियों को आरक्षण से बेदखल करने की करती रही। लेकिन खड़िया वोट बैंक को हासिल करने के लिए ईसाई धर्मांवलंबी खड़िया आदिवासी बसंत सोरेंग को अपना प्रत्याशी बनाया। इससे गांड़ एवं नगेसिया आदिवासी बिदक गए। शायद भाजपा नेता यह मान चुके थे कि गोंड़ और नगेसिया भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक है जो कहीं नहीं जायेगा। हालांकि वोट के गणित में कोई खास अंतर नहीं आया। 2014 में भाजपा के मनोज नगेसिया को 31,332 वोट मिले थे और इस बार बसंत सोरेंग को 30,685 वोट मिले। लेकिन हकीकत में भाजपा का पारंपरिक वोट कांग्रेस को मिला है। इसके अलावा 3694 लोगों ने नोटा का बटन दबाया जो निश्चितरूप से गोंड़, नगेसिया और आरक्षण विरोधियों का वोट है, जिन्होंने भाजपा को अपना संदेश देने के लिए ऐसा किया है। इसके अलावा सीएनटी/एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन के खिलाफ उठा जनाक्रोश का असर भी स्पष्ट दिखाई देता है। भाजपा के लिए राहत की खबर बस इतना है कि खड़िया आदिवासियों ने पहली बार बड़े पैमाने पर पार्टी के पक्ष में वोट दिया है लेकिन यह वोट स्थायी नहीं रहेगा क्योंकि खड़िया आदिवासी भाजपा के पारंपरिक वोट कभी नहीं बनेंगे। 

कोलेबिरा उप-चुनाव में सबसे बड़ा झटका सेंगेल पार्टी को लगा है क्योंकि इनके नेताओं को ऐसा लगता था कि सीएनटी/एसपीटी कानूनों में किये गये संशोधन उनके आंदोलन के बदौलत है इसलिए जनता उनको वोट देगी ही। आम तौर पर ऐसा माना जा रहा था कि सेंगेल पार्टी 2019 में महागठबांधन के वोट पर सेंधमारी करेगी। लेकिन कोलेबिरा उप-चुनाव में सेंगेल पार्टी के खड़े होने से कांग्रेस को फायदा हुआ। यदि सेंगेल पार्टी खड़ी नहीं होती तो इसका सबसे ज्यादा फायदा झापा को होता और कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ सकता था। संगेल पार्टी के नेताओं को भी यह पता चल गया कि वे कितना पानी में हैं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रत्याशी अच्छा होने से कांगेरसे पार्टी अपने बलबुते पर चुनाव जीत सकती है। 

कोलेबिरा उप-चुनाव को कई लोग जेवीएम की जीत भी बता रहे हैं जबकि सिमडेगा जिले में पार्टी का कोई बड़ा आधार नहीं है। असल में जेवीएम आदिवासियों के गढ़ में कहीं है ही नहीं। जेवीएम के पास एक भी आदिवासी सीट नहीं है और यही वजह है, जिसे झामुमो किनारा करना चाहती है। जेवीएम को पिछले चुनाव में कोलेबिरा विधानसभा में 1509 वोट मिला था। चूंकि कांग्रेस के विक्सल कोंगाड़ी ने 9658 वोंटों से जीत हासिल की है इसलिए इसमें न ही नोटा का और न ही जेवीएम की कोई भूमिका है। लेकिन इस चुनाव परिणाम से झामुमो नैतिकरूप से कमजोर होगा इसलिए जेवीएम को महागठबंधन से बाहर करना उसके बस की बात नहीं होगी। 

कोलेबिरा उप-चुनाव में पहली बार आदिवासी वोट को सामुदायिक स्तर पर धुर्वीकरण करने की कोशिश भी की गई। चूंकि यह खड़िया और मुंडा आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां इन दोनों समुदायों के मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है। लेकिन एनोस एक्का ने चर्च की सहायता से इन दोनों समुदायों के मतदाताओं को अपने पक्ष में करते हुए लगातर तीन बार जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार खड़िया समुदाय के आदिवासियों ने यहां से अपना प्रतिनिधि भेजने का मन बना लिया था। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने खड़िया आदिवासी को टिकट दिया। इसके विपरीत कांग्रेस ने मुंडा आदिवासी को टिकट दिया। कांगेरस के वोट बैंक को काटने के लिए सेंगेल पार्टी ने भी मुंडा आदिवासी को ही अपना प्रत्यासी बनाया था। खड़िया महासभा ने भी झामुमो के बागी उम्मीदवार को अपना समर्थन दिया था लेकिन खड़िया वोट भाजपा, कांग्रेस, संगेल, निर्दलीय के बीच बांट गया जबकि मुंडा वोट थोक के भाव से विक्सल कोंगाड़ी को मिला। 

कोलेबिरा उप-चुनाव के परिणाम का प्रभाव 2019 के चुनाव में जरूर दिखाई देगा। झारखंड में लगातार तीन उप-चुनाव जीतने के बाद झामुमो को लग रहा था कि वहीं किंग है और किंगमेकर भी। लेकिन अब हवा का रूख बदल गया है। अगामी चुनाव में किंग कौन होगा कहना अभी मुश्किल है लेकिन निश्चित रूप कांगेरस ही किंगमेकर की भूमिका में होगी। 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पास एक भी आदिवासी विधायक नहीं थे, लेकिन दो उप-चुनावों में जीत और गीता कोड़ा का पार्टी में शामिल होने से कांग्रेस काफी मजबूत हुई है। अब यह भी स्पष्ट हो चुका है कि राज्य में महागठबंधन बने या नहीं लेकिन भाजपा की विदाई तय है और यदि महागठबंधन बन जाता है तब झारखंड भी छत्तीसगढ़ के रास्ते पर जायेगा।     

सोमवार, 14 अगस्त 2017

आज कहां हैं हम?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारत अपने आजादी की 71वां सालगिरह मना रहा है। यह हमारे लिये निश्चित तौर पर गर्व करने का विषय है। लेकिन हमें आजादी का जश्न मनाने के साथ-साथ आजादी का मूल्यांकन भी करना चाहिए। क्या आजादी के आंदोलन के समय लोगों से किया गया रोटी, कपड़ा और मकान तथा भूमि सुधार का वादा पूरा हुआ है? क्या भारत के संविधान में सभी व्यक्तियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने तथा समानता, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने का वादा पूरा हुआ है? क्या देश की धर्मनिरपेक्षता, एकता और अखंडता को बरकरार रखने में हम सफल हुए हैं? हमें इन प्रश्नों पर गंभीरता से चर्चा करते हुए भविष्य का रास्ता अख्तियार करना होगा।

आज देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल पर रही है तथा उनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं और उन्हें रहने के लिए घर नसीब नहीं हुआ है। देश में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास पैर रखने के लिए एक इंच भी जमीन नहीं है। देश का 70 प्रतिशत सम्पति सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास केन्द्रित को गया है। क्या ऐसे में कभी आर्थिक समानता आयेगी?

देश में दोहरी शिक्षा व्यवस्था होने के कारण असमानता असमान छू रही है। एक तरफ जहां सरकारी शिक्षा व्यवस्था खिचड़ी शिक्षा व्यवस्था मे तब्दील हो चुकी हैं वहीं सम्पन्न परिवारों के बच्चों के लिए ‘एप्पल स्कूल’ मौजूद हैं। फलस्वरूप, देश में अमीरों की संख्या बढ़ रही है तो गरीबों की संख्या में भी बहुत ज्यादा इजाफा हो रहा है। आज शिक्षा एक व्यवसाय का रूप ले लिया है और यह गरीबों से लगातार दूर होता जा रहा है। इसलिए जबतक शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता नहीं आयेगी देश में समानता नहीं आ सकता है। स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी कमोबेश ऐसे ही है। आज गरीबों के लिए उचित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पायी हैं जबकि सम्पन्न परिवारों के लिए अलग से स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। क्या सभी लोगों को मौलिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं होनी चाहिए?

भारत के संविधान निर्माण के समय ही छुआछूत और जातीय भेदभाव जैसे भयंकर सामाजिक बुराईयों को खत्म कर दिया गया था। लेकिन वास्ताव में हमारे समाज में छुआछूत, जातीय एवं लिंग आधारित भेदभाव आज भी मौजूद हैं, जो सामाजिक न्याय के रास्ता पर रोड़ा अटकाये हुए हैं। आज भी दलित, आदिवासी और महिलाओं के साथ समाज में दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार होता है। इसी तरह देश में धर्म, भाषा एवं क्षेत्रीय आधारित भेदभाव भी मौजूद है। देश के बहुसंख्यक लोग आधुनिक संचार मध्यमों का उपयोग कर रहे हैं लेकिन उनकी मानसिकता में बदलान नहीं होना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। हमारे दिलो-दिमाग में भेदभाव क्यों भरा पड़ा है? क्या जातीय, धार्मिक, लिंग, भाषा और क्षेत्रीय आधारित भेदभाव को खत्म किये बगैर भारत एक सशक्त देश बन सकता है? 

आज हिंसा विशेषकर धर्म आधारित हिंसा ने देश की धर्मनिरपेक्षता छवि को धूमिल करते हुए देश की एकता और अखंडता पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। विभिन्न धर्मों के सम्प्रदायिक समूह देशभर मं धर्म आधारित नफरत फैला रहे हैं, हिंसा कर रहे हैं और एक दूसरे की हत्या करने में तुले हुए हैं। भारत को अनेक धर्म, संस्कृति विभिन्नता और भाषाओं के विविधता के लिए जाना जाता है। लेकिन आज यह अनेकता में एकता, विभिन्नता और विविधता के अस्तित्व पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या हमारा देश एक भाषा, एक धर्म और एक नस्ल पर आधारित राष्ट्रवाद को अपना सकता है? क्या ऐसे सिद्धांत को अपनाने से देश का मूल अस्तित्व खत्म नहीं हो जायेगा?    

यदि हम ईमानदारी से आजादी का मूल्यांकन करें तो पिछले सात दशकों में आजादी आंदोलन के समय और भारत के संविधान में किया गया वादा को जमीन पर नहीं उतारा जा सका है। आज भी देश के बहुसंख्यक लोग को रोटी, कपड़ा और मकान जैसे बुनियादी जरूरते नहीं मिल पायी है, देश में भूमि सुधार का मसला अटका हुआ है तथा देश में मौजूद छुआछूत, जातीय भेदभाव, बाल मजदूरी, मानव व्यापार और पलायन जैसे गंभीर समस्या हमें याद दिलाने के लिए काफी हैं कि आज भी देश के कमजोर तबके के लोगों के लिए समानता, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन एक सपना ही है। देश में घटित धर्म आधारित विवाद, संघर्ष और दंगों ने देश की धर्मनिरपेक्षता, एकता और अखंडता वाली छवि को चकनाचुकर करके रख दिया है। देश के 125 करोड़ लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी मिले बगैर देश के आजादी का असली संकल्प पूरा नहीं हो सकता है। इसलिए आज जरूरत है कि हमसब मिलकर इन वादों को पूरा करते हुए भारत देश को एक सशक्त राष्ट्र बनाने का संकल्प लें।

रविवार, 28 जून 2015

योग की राजनीति

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

‘‘क्या नरेन्द्र मोदी योग करते हैं?’’ यह सवाल कोई और नहीं बल्कि रूस के राष्ट्रपति वलादिमिर पुतिन  ने उस वक्त पूछा जब उन्हें यह बताया गया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘आयुष मंत्रालय’’ की शुरूआत की है। इसके जवाब में उन्हें यह बताया गया कि मोदी प्रतिदिन 1 घंटा योग करते हैं। लेकिन 21 जून, 2015 को ‘विश्व योग दिवस’ के अवसर पर दिल्ली के राजपथ पर आयोजित भव्य योग शिविर में मोदी को गलत पद्यासन करते देखा गया, जिसकी तस्वीर सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर प्रसारित की गयी और मोदी का मजाक भी उड़ाया गया। एक फेसबुक यूजर ने लिखा - ‘‘जो लोग योग कभी नहीं करते और फोटो खिंचवाने के लिए नाटक करते हैं, वे सबसे आसान आसन, यानी पद्यासन भी गलत करते हैं।‘‘ इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में कई मंत्री, नेता और आॅफसर योग करते समय सोते पाये गये तो कई को योग करने का नाटक करते भी देखा गया। वहीं उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को मुस्लिम होने के कारण भाजपा नेता राम माधवन से बेवजह हमला झेलना पड़ा जबकि उन्हें योग दिवस पर आमंत्रित ही नहीं किया गया था। वहीं विश्व हिन्दू परिष्द की नेता साध्वी प्राची ने यहां तक कह दिया कि जो योग का विरोध करते हैं वे पाकिस्तान चले जाये। यहां प्रश्न यह है कि क्या योग दिवस के आयोजन के पीछे कोई राजनीतिक स्वार्थ थी?

इधर सोशल मीडिया पर गरमा-गरम चर्चा जारी था। मैंने प्रश्न उठाया कि मोदी के साथ राजपथ पर कितने गरीब लोगों ने योगा किया? क्या भारत देश सिर्फ अमीर और काला चश्में के साथ चमकने वाले चहरों के लिए है, जिनके पास ड्यूटी करने, खेलने, सोने और हर गतिविधि के लिए अलग-अलग पहनावा उपलब्ध है? सबका साथ और सबका विकास का नारा देने वाली एनडीए की सरकार दुनियां के सामने कैसी तस्वीर पेश कर रही है? इसके जवाब में एक मोदी भक्त ने राजस्थान के सुदूर इलाकों में साड़ी से पूरा शरीर ढांककर योग करने वाली गरीब महिलाओं की तस्वीर पेश की। अगला प्रश्न मैंने पूछा कि यह बताया जाये कि अमीर लोग तो अपनी चर्बी घटाने के लिए योग कर रहे हैं लेकिन ये गरीब महिलाएं जो खून की कमी से जूझ रही हैं उन्हें योग से क्या फायदा होगा? क्या योग करने से उनका पेट भर जायेगा? गरीबों को योग से क्या फायदा होगा क्योंकि उनके बीमारी का मुख्य कारण पौष्टिक आहार की कमी है? क्या योग करने से उनके शरीर में पौष्टिक आहार की पूर्ति होगी? इन प्रश्नों का जवाब न उस मोदी भक्त के पास था और न ही मोदी के पास है। 

इसी बीच शिक्षा से संबंधित दो खबरें आयी। एक यह कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने योग को केन्द्र सरकार द्वारा संचालित सभी सरकारी विद्यालयों में कक्षा 8 से 10 तक तक अनिवार्य विषय बनाने की घोषणा की और दूसरी खबर यह थी कि भाजपा सरकार ने छत्तीसगढ़ में 3000 सरकारी विद्यालयों को बंद कर दिया, जिनमें आदिवासी बच्चे पढ़ते थे। ये खबरें एक ऐसी तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि केन्द्र और राज्य की भाजपा सरकारें आदिवासी, दलित और गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। सरकारी विद्यालय बच्चों को खिचड़ी खिलाने वाले विद्यालय बन चुके हैं, जहां 7वां वर्ग के बच्चे 5वां वर्ग का हिन्दी नहीं पढ़ पाते हैं और 5वां क्लास के बच्चे तीसरा क्लास का गणित नहीं बना पाते। लेकिन प्राथमिक शिक्षा में व्यापक सुधार लाने के बजाये भारत सरकार योग शिक्षा को ज्यादा महत्व दे रही है। सोचने की बात है कि जो बच्चे प्रतिदिन 10 से 15 किलो मीटर साईकिल चलाकर विद्यालय जाते-आते हैं उन्हें योग की क्या जरूरत है? योग शिक्षा को बढ़ावा देने से प्राथमिक शिक्षा की गुणवता में क्या सुधार होगा? क्या योग सभी बच्चों के लिए अनिवार्य इसलिए किया जा रहा क्योंकि बच्चों के दिमाग का भगवाकरण करना है?

योग के बारे में यह भी कहा गया कि योग करने से भेदभाव मिटता है क्योंकि सभी लोग एक साथ योग करते हैं। लेकिन यह बयान हकीकत से कोशों दूर है। राजपथ की बात ही कर लीजिये। कितने आदिवासी, दलित और गरीबों ने प्रधानमंत्री के साथ योग किया। वहां दिखाई देने वाले चेहरे क्या काला चश्मा लगाने वाले चमकते चेहरे नहीं थे? जो लोग योग से भेदभाव मिटाने की बात करने हैं उन्हें अपने अंदर झांक कर देखने चाहिए कि क्या उनके दिलों में आदिवासी, दलित और गरीबों के लिए जगह है? जब दिल में ही जाति, सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर नफरत भरा पड़ा है तो एक साथ योग करने से भी क्या फर्क पड़ता है? यह भी तर्क संगत हैं कि भेदभाव का सबसे ज्यादा पीड़ा झेलने वाले दलित खेतिहार मजदूरों के पास योग करने का समय और जरूरत भी क्या है? योग उनके लिए है, जिन्हें दो वक्त के रोटी की चिंता नहीं है अपितु अपनी चर्बी खटाने की चिंता है। मतलब साफ है कि योग की लकीर समाज में "हैव और हैव नाॅट" के बीच स्पष्ट खींची हुई है इसलिए योग से समाज में भेदभाव दूर कर समानता लाने की बात करना कोरी बकवास है। 

योग गलत नहीं है लेकिन इसके सम्प्रदायिकरण का परिणाम भयावह हो सकता है। यहां बहुसंख्यकों द्वारा स्वीकृत धर्म और संस्कृति को सभी लोगों पर राजसत्ता द्वारा जबरदस्ती थोपने की कोशिश की जा रही है जो न सिर्फ आलोकतंत्रिक गतिविधि है बल्कि संविधान के खिलाफ भी है। यह न सिर्फ लोकतंत्रिक मूल्यों पर हमला करना है बल्कि संविधान का मजाक उड़ाना है। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ बहुसंख्यकों के भावनाओं का कद्र करना नहीं होता बल्कि जिस तरह से लोकतंत्र स्थापित करने के लिए एक-एक वोट का मूल्य होता है उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति के भावनाओं का कद्र करना ही लोकतंत्र का सही मतलब है। इसलिए सत्तीधीशों को इसका ख्याल रखना चाहिए।  

निश्चित तौर पर विश्व योग दिवस का भव्य आयोजन न तो 125 करोड़ जनता को निरोग करने और न ही उनके बीच भेदभाव को समाप्त कर देश में एकता कायम करने के उद्देश्य से की गयी थी। बल्कि इसके पीछे एक विशुद्ध राजनीति छुपी हुई है। पहली बात तो यह है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी दिलाने में योग गुरू बाबा रामदेव की बहुत बड़ी भूमिका रही है, जिसके बदले में उन्हें कुछ हासिल नहीं हुई थी। फलस्वरूप, वे कुछ दिनों तक गुमनाम हो गये थे और जब वे गुमनामी से बाहर आये तो उन्होंने राहुल गांधी की जमकर तारीफ की। ऐसी परिस्थिति में नरेन्द्र मोदी बाबा रामदेव को और ज्यादा नाराज नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने विश्व योग दिवस के अवसर पर उन्हें वैश्विक मंच उपलब्ध कराकर अपना कर्ज अदा कर दिया। 

दूसरी बात यह है कि संघ और भाजपा देश में एक लम्बी राजनीतिक पारी खेलने के फिराक में लगे हुए हैं। इसलिए वे हिन्दु धर्म से संबंधित प्रत्येक त्योहार एवं राष्ट्रीय त्योहारों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश में जुटे हुए हैं, जिससे बहुसंख्यक आम हिन्दुओं को कट्टरता का पाठ पढ़ाकर वोट बैंक में तब्दील किया जा सके। विश्व योग दिवस के भव्य आयोजन द्वारा भाजपा हिन्दु वोट बैंक को अपने हित में सुरक्षित करना चाहती थी वरना भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिल्ली या गुजरात के बजाये बिहार मेें योग करने की क्या जरूरत थी जहां आने वाले दिनों में विधानसभा चुनाव होना है? मोदी प्रत्येक भावनात्मक मुद्दा को उठाकर आम हिन्दुओं को वोट बैंक में तब्दील करना चाहते हैं और प्रत्येक हिन्दु त्योहार का सरकारीकरण और सरकार का भागवाकर करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

तीसरी बात यह है कि विश्व योग दिवस के अवसर पर भाजपा नेता राम माधवन और विहिप नेता साध्वी प्राची के विवादस्पद बयानों से स्पष्ट हैं कि आने वालें दिनों में प्रत्येक आयोजन द्वारा देश के अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा जायेगा और आम हिन्दुओं को कट्टर हिन्दु बनाने की पूरी कोशिश की जायेगी। राष्ट््रीय स्वयं सेवक संघ, विहिप और भाजपा नेता यही कहते रहेंगे कि जिनको हिन्दु धर्म के पर्व-त्योहार पसंद है वे हिन्दुस्तानी नहीं है इसलिए उन्हें पाकिस्तान चला जाना चाहिए। ये नेता संविधान के खिलाफ लगातार हमला करेंगे लेकिन नरेन्द्र मोदी ‘मन की बात’ में बड़ी-बड़ी बातें करने के अलावा उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगें क्योंकि पूरी फिल्म की स्क्रीप्ट ऐसी ही लिखी गयी है, जिसका मूल मकसद बहुसंख्यक हिन्दुओं को एकजुट कर देश में मनुवाद की स्थापना करना। 

योग दिवस के भव्य आयोजन के पीछे तर्क यह हैं कि चूंकि ‘संयुक्त राष्ट्र’ द्वारा 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया गया इसलिए सरकार ने योग दिवस का भव्य आयोजन किया। लेकिन अगर यह तर्क सही है तो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, विश्व आदिवासी दिवस और विश्व पर्यावरण दिवस भी तो ‘संयुक्त राष्ट्र' ने ही घोषित किया है? क्या सरकार सभी अंतरराष्ट्रीय दिवसों का आयोजन भी इसी तरह से करेगी? बल्कि देश में पर्यावरण की स्थिति देखा जाये तो विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व योग दिवस से भी ज्यादा है फिर विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर अपने सरकारी आवास में एक कदम्ब का पेड़ रोपने के अवाला मोदी ने क्या किया? क्या योग दिवस का भव्य आयोजन सिर्फ इसलिए किया गया ताकि इसके द्वारा समाज में कट्टरता फैलाकर भाजपा हमेशा सत्ता में बनी रहे? हकीकत यह है कि आम जनता को महंगाई, भ्रष्टाचार और कुशासन से मुक्ति दिलाने का वादा कर दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाले नरेन्द्र मोदी ने अभी तक ऐसा खास कुछ नहीं किया है इसलिए मीडिया मैंनेजमेंट द्वारा आम जनता को असली मुद्दों से भटकाकर भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घुमाते हुए सत्ता में बने रहने का रास्ता तलाशने की कोशिश में जुटे हैं। 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

केजरीवाल को ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ का सर्टिफिकेट

   - ग्लैडसन डुंगडुंग -

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के लाखों हाॅर्डिंग, पोस्टर और पर्चा में लिखे गए सैंकड़ों नारों के बीच दो नारे कुछ अलग दिखे - ‘दिल्ली चुनेगी ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ को’ एवं ‘ईमानदारी को ईनाम‘। इन नारों के साथ नरेन्द्र मोदी और किरण बेदी की तस्वीर के द्वारा भाजपा ने दिल्ली के मतदाताओं से अपील की थी कि ‘ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ’ नेता को ही दिल्ली का सत्ता सौपें। शायद जनता ने उनकी सुनी ली और अरविन्द केजरीवाल को ज्यादा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ मानते हुए अपना फैसला सुना दिया। यह इसलिए क्योंकि नरेन्द्र मोदी के विगत 8 महिनों का शासन काल सिर्फ बड़े-बड़े भाषणों को सुनकर ही बीत गया। वे विदेशों का दौरा, देश में बड़े-बड़े कार्यक्रमों भाषण देने और चुनाव प्रचार में ही लगे रहे। विदेशों से कालाधन वापस लाने, भ्रष्टाचार खत्म करने, महंगाई पर लगाम लगाने जैसे किये गये बड़े वादों में से एक पर भी वे खरा नहीं उतरे। 

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब मोदी और भाजपा अरविंद केजरीवाल को ईमानदार और कर्तव्यनिष्ट होने का सर्टिफिकेट देंगे? क्या मोदी भ्रष्ट, बेईमान और नालायक लोगों के झुंड का नेतृत्व कर रहे हैं? मोदी के चुनावी भाषणों और वादों को देखें तो इसका सार यही निकलता है। मोदी देश को यह बताने की कोशिश में लगे हुए थे कि उनके जैसा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेता और कोई नहीं है, लेकिन दिल्ली के मतदाताओं ने यह बता दिया कि कौन ज्यादा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ है वह जनता तय करेगी नेता स्वयं नहीं तय कर सकते। हमें विश्लेषण करना चाहिए कि देशभर के 120 सांसद, 4 मुख्यमंत्री, मोदी सरकार की पूरी कैबिनेट, संघ परिवार के 16 संगठन, बाबा रामरहीम, रामदेव, अडानी, अंबानी, मीडिया, किरण बेदी, गुटका और दारू का सहारा लेने के बावजूद भाजपा दो वर्ष पुरानी ‘आप’ जैसी पार्टी से क्यों हारी? लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत एवं तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम ने भाजपा को उदंड बना दिया था, जिससे वह एक के बाद एक गलती करती चल गयी, जो शर्मनाक हार का कारण बना।  

भाजपा की पहली बड़ी गलती यह थी कि पार्टी को लगता था कि दिल्ली जीतने के लिए सम्प्रदायिक राजनीति और मोदी लहर काफी है। इसलिए उन्होंने दिल्ली विधानसभा भंग होने के बाद भी चुनाव तैयारी को गंभीरता से नहीं लिया जबकि ‘आप’ ने अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया था। इसी बीच भाजपा नेता एक के बाद एक सम्प्रदायिक भाषण देते रहे, घर वापसी अभियान चलाया, हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात की और दिल्ली में चर्च पर हमला होता रहा। बावजूद इसके सबका साथ, सबका विकास जैसा नारा देने वाले मोदी ने अपना मुंह तक नहीं खोला। हवाई फायर की चुनावी रणनीति के तहत उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति बाराक ओबामा को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनाया। लेकिन अंतिम समय में ओबामा ने सम्प्रदायिकता पर जर्बदस्त चोट देने वाला भाषण देकर भाजपा की सम्प्रदायिक राजनीति पर प्रहार कर दिया। इतना ही नहीं ओबामा अमेरिका वापस लौटने के बाद भी सम्प्रदायिकता के मुद्दे पर बोलते रहे और अखबरों में सम्पादकीय तक लिखा जाने लगा। इससे जनता के बीच साफ संदेश यह गया कि भाजपा के हिन्दुत्व राजनीति की वजह से दुनियां भर में भारत की बदनामी हो रही है। 

भाजपा की दूसरी बड़ी गलती थी किरण बेदी को चुनाव में उतरना। भाजपा दिल्ली चुनाव उसी दिन हार चुकी थी जब उसने किरण बेदी को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की थी। हालांकि कुछ विद्वान लोगों का कहना था कि भाजपा ने बेदी को उतार कर केजरीवाल के खिलाफ मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है। लेकिन आम मतदाताओं के बीच इसका संदेश मोदी लहर के समाप्ति की घोषणा के रूप में गई क्योंकि भाजपा ने मुख्यमंत्री उम्मीदवारों की घोषणा किये बगैर तीन राज्यों - महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में चुनाव जीता था। किरण बेदी की वजह से पार्टी के कैडर बिखर गये, जिसका परिणाम यह निकला का भाजपा के सबसे सुरक्षित सीट कृष्णानगर भी गवांना पड़ा क्योंकि प्रदेश भाजपा किरण बेदी के खिलाफ था। इसके साथ दिल्ली भाजपा के नेताओं ने केन्द्रीय नेतृत्व को भी यह बता दिया कि केन्द्रीय नेतृत्व की मानमानी से पार्टी को कितना भयानक नुकशान हो सकता है। 

भाजपा की तीसरी गलती यह थी कि पार्टी ने किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल के साथ आमने-सामने बहस करने एवं टीवी चैलनों को सामना करने के लिए तैयार नहीं किया। फलस्वरूप, वह केजरीवाल से बहस के लिए तैयार होने के बजाये विधानसभा में ही उनसे बहस करने की बात कहती रही जबकि लोकसभा चुनाव में वह स्वयं कांग्रेस एवं भाजपा अध्यक्षों को आमने-सामने बहस करने के लिए कहती रही। इतना ही नहीं देश के दो राष्ट्रीय टीवी न्यूज चैनलों में साक्षात्कार ने बेदी के राजनीतिक नासमझी को देश के सामने खोलकर रख दिया था। अंग्रेजी टीवी न्यूज चैनल टाईम्स नाउ के प्रमुख आॅर्नव गोस्वामी के प्रश्नों का वह जवाब नहीं दे पायी और बीच में ही कार्यक्रम छोड़कर भाग गयी तथा एनडीटीवी के रवीश कुमार के शो में वह एक थानेदार के अलावा लोगों को नेता होने का एहसास नही करा सकी। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अंगे्रजी न्यूज चैनल टाईम्स नाउ के साक्षात्कार के बाद राहुल गांधी की लोेप्रियता खत्म हो गई थी और किरण बेदी के साथ भी यही हुआ। ये दो चैनलों के साक्षात्कार के बाद भाजपा नेताओं को एहसास हो चुका था कि किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की लेकिन तबतक चिड़िया खेत चुग चुकी थी। किरण बेदी भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गयी, जिसे न निगलते और न ही उगलते बना।  

भाजपा की चैथी बड़ी भूल यह थी कि जब किरण बेदी का प्रभाव नहीं दिखने लगा तो चुनाव का प्रभार भाजपा के बड़े रणनीतिकार अरूण जेटली को सौंप दिया। इसके साथ देशभर के 120 सांसदों को चुनाव प्रचार में लगा दिया गया, नरेन्द्र मोदी काफी आक्रमक हो गए, कैबिनेट मंत्री चुनाव मंे कूद गए और 4 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी चुनाव अभियान में लगा दिया गया। स्थिति ऐसी हो गयी थी जैसे यह लोकसभा चुनाव हो रहा हो। भाजपा के इस कदम ने पार्टी के नेताओं के हताशा को सामने ला दिया। यह साफ दिखने लगा था कि अरविंद केजरीवाल ने एक राष्ट्रीय पार्टी को डरा कर रख दिया है। इसमें सबसे ज्यादा मोदी लहर पर सवाल खड़ा हो गया था क्योंकि जो नेता मोदी लहर की वजह से चुनाव जीते थे वे अब मोदी की इज्जत बचाने के लिए दिल्ली पहुंच गये थे।  
भाजपा की पांचवीं बड़ी गलती थी नाकारात्मक राजनीति। नरेन्द्र मोदी ने अपने राजनीतिक भाषण में वजन डालने के लिए ऐसे राजनीतिक जुमले का उपयोग किया, जो देश के प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता है। उन्होंने केजरीवाल को नक्सली और भागोड़ा तक कहा। इतना ही नहीं मोदी ने स्वयं को देश के लिए भाग्यशाली और दूसरे पार्टी के नेताओं को अभाग्यशाली का जामा तक पहना दिया। इसके साथ वे विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे। भाजपा ने दिल्ली के विजन दस्तावेज में पूर्वोतर भारत के लोगों को प्रवासी बता दिया, जो भाजपा की नाकारात्मक राजनीति थी। जबकि वहीं केजरीवाल शांत भाव से सड़क, बिजली, पानी जैसे लोगों के बुनियादी मुद्दों को लेकर अपना अभियान चलाते रहे। 

अंततः चुनाव के ठीक दो दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी वादों को राजनीतिक जुमला बताते हुए पार्टी की बच्ची-खुच्ची उम्मीद पर पानी फेर दिया। एबीपी न्यूज चैनल के साक्षात्कार में उन्होंने यह कह दिया कि काला धन को विदेशों से लाकर प्रत्येक परिवार के बैंक खाते में 15-15 लाख रूपये देने वाली बात सिर्फ राजनीतिक जुमला था, जो चुनावी भाषण में वजन देने के लिएकहा गया था। भाजपा अध्यक्ष के स्वीकारोक्ति बयान से लोगों में यह संदेश गया कि मोदी का वादा सिर्फ लोगों को रिझाकर वोट लेने के लिए है। यह इसलिए भी क्योंकि भाजपा ने कोई भी चुनावी वादा पूरा नहीं किया इसलिए मोदी के हर वादा को लोग उनका चुनावी जुमला ही मानने लगे और सोशल मीडिया में यह मामला जंगल में आग की तरह छा गया। 

मोदी और बेदी को मिलाकर ‘दिल्ली लहर’ बनाने की कोशिश ने भाजपा के लिए तुफान खड़ा कर दिया, जिसमें वह स्वंय बह गई। चुनाव सर्वेक्षणों के परिणाम आते ही भाजपा के नेता मोदी को बचाने में जुट गए थे। लेकिन भाजपा नेता शत्रुधन सिन्हा ने साफ कह दिया था कि जीत और हार दोनो मोदी की होगी क्योंकि जीत-और हार का श्रेय कप्तान को जाता है। चुनाव परिणाम आने के बाद अन्ना हजारे ने भी कह दिया कि यह मोदी की हार है क्योंकि मोदी ने देश के लिए कुछ काम नहीं किया। वहीं महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड की जीत का श्रेय मोदी को देने वाले भाजपा नेता दिल्ली की हार का ठिकरा दिल्ली भाजपा और किरण बेदी पर फोड़ रहे हैं और यही भाजपा का दोहरा चरित्र है, जिसका परिणाम दिल्ली है। भाजपा नेता जो भी बोलें लेकिन हकीकत यही है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव मोदी, भाजपा और संघ परिवार का संगठित एक शर्मनाक हार है। इसलिए नरेन्द्र मोदी को इससे सबक लेना चाहिए कि चुनावी भाषणों में वजन देने के लिए उपयोग किया गया राजनीतिक जुमला बार-बार चुनाव नहीं जीता सकते हैं। बल्कि चुनाव अगर जीतना है तो भाषण के बजाये काम पर वजन देना होगा।

सवाल यह भी है कि क्या मोदी को दिल्ली हारने का डर था? ऐसा नहीं है उनका असली डर केजरीवाल से है, जो आज लोकतंत्र के महानायक हैं क्योंकि केजरीवाल वो शक्स है जो मोदी को अपने काम और रणनीति से मजबूर कर सकता है, जिसकी शुरूआत उसने चुनाव परिणाम आने के बाद यह कहते हुए कर दिया कि दिल्ली में भाजपा अगर 7 सीट भी नहीं जीतती है फिर भी वे विपक्ष के नेता पद उनको देंगे। केजरीवाल के इस कदम से भाजपा को लोकसभा में कांग्रेस को विपक्ष की कुर्सी देने पर मजबूर होना पड़ेगा वरना भाजपा की छवि लोकतंत्र विरोधी बनेगी। दिल्ली चुनाव ने यह भी साफ कर दिया है कि कांग्रेस के पास प्रियंका गांधी को लाने के अलावा और कोई चारा नहीं है वरना अगले लोकसभा चुनाव भाजपा बनाम आम आदमी पार्टी होगी। दिल्ली चुनाव ने देश की राजनीति और राजनीतिक चर्चा दोनों की दिशा बदल दी है। लोगों का मूल मुद्दा आज भी रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य ही है। इसलिए अब आने वाले चुनावों में ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और वादे का पक्का नेता को ही देश का सत्ता मिलेगा। दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम भारतीय लोकतंत्र के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जो यह संदेश देता है कि आम आदमी के वोट की ताकत सम्प्रदायिक राजनीति, सत्ता का घमंड और पैसे की ताकत को कभी भी चकनाचून कर सकता है। 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

तेल का खेल और मोदी की राजनीति

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’। पिछले लोकसभा चुनाव में यह भाजपा का एक प्रमुख नारा था। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए महंगाई के मुद्दे पर शेर की तरह गरजते रहे, जिससे लोगों को उनमें उम्मीद दिखी और अंततः भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला। इस तरह 26 मई, 2014 को वे देश के प्रधानमंत्री बन गए। इधर दिसंबर पहुंचते-पहुंचते देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत कम हो गई और महंगाई पर लगाम लग गया। लोगों को लगने लगा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही मोदी ने अपना करिश्मा दिखा दिया। अब लोगों में यह संदेश फैलने लगा था कि जहां मनमोहन सरकार प्रतिमाह पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा रही थी वहीं मोदी सरकार ने इसमें कमी कर दी, जिससे महंगाई अपने आप कम हो गई। भाजपा के स्थानीय नेता भी इसे मोदी का करिश्मा बताकर इसका राजनीतिक लाभ उठाने लगे, जिसका फायदा भाजपा को तीन राज्यों - महाराष्ट्र, हरियाण और झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों में मिला। अब दिल्ली के चुनावी सभाओं में नरेन्द्र मोदी ने स्वयं भी कहा है कि वे भाग्यशाली हैं इसलिए तेल की कीमत घटी है और देश की जनता को इसका लाभ मिला है। लेकिन मौलिक प्रश्न यह है कि क्या पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी और महंगाई पर लगाम मोदी सरकार का करिश्मा है? क्या यह मोदी के भाग्य का प्रतिफल या कुछ और ही है?

मुझे कभी-कभी हमारे देश के वैसे पढ़े-लिखे लोगों पर तरस आता है, जो निरक्षरों की तरह निराधार बहस करते हैं। सचमुच, अनपढ़ों की बात तो छोड़िये यहां बहुसंख्यक पढ़े-लिखे लोगों के पास भी ज्ञान का घोर अभाव है, जिसका फायदा हमारे राजनीतिज्ञा उठाते हैं। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी और महंगाई पर लगाम लगाने में नरेन्द्र मोदी का न तो कोई करिश्मा है और न ही यह उनके भाग्य की देन। बल्कि उन्होंने तो पेट्रोल और डीजल पर तीन बार टैक्स बढ़ा दिया, रेलवे भाड़ा में वृद्धि किया एवं दवा की कीमत भी बढ़ायी। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी तथा महंगाई पर लगाम शुद्धरूप से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही कमी का परिणाम है। इसे जरूर मोदी के अच्छे दिन और मनमोहन सिंह के बुरे दिनों के रूप में याद किया जा सकता है क्योंकि यूपीए-2 के समय तेल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ती गयी लेकिन मोदी के आते ही यह कीमत कई कारणों से घटती जा रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमत में गिरावट आने से रोजमर्रा की जरूरतों के समानों की कीमत में भी कमी आना स्वभाविक था क्योंकि महंगाई का बढ़ना पूर्णरूप से कच्चे तेल की कीमत और खाद्यान के उत्पादन पर निर्भर करता है। इसलिए इसका विश्लेषण किये बगैर तेल का खेल और मोदी की राजनीति नहीं समझी जा सकती है।  

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत जून, 2014 में 115 डाॅलर प्रति बैरल था जो घटकर 3 फरवरी, 2015 को 45 डाॅलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जिससे तेल निर्यातक देशों में खलबली मच गयी है क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था मूलतः इसी पर टिकी हुई है। तेल का खेल भी राजनीति की तरह है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बढ़ने पर तेल उत्पादक एवं निर्यातक देश खुशी मनाते हैं और तेल का आयात करने वाले देशों की जनता को महंगाई मार देती है. लेकिन वहीं कच्चे तेल की कीमत घटने की स्थिति में राजा रंक हो जाता है और महंगाई की मार झेलती जनता खुशियां मनाने लगती है। लेकिन यहां सबसे महत्वूपर्ण सवाल यह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत इतनी तेजी से क्यों घटती-बढ़ती रहती है? क्या भारत में मोदी सरकार आने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में कमी आ गयी है? क्या अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में भारत की कोई भूमिका है? देश के पढ़े-लिखे अज्ञानी लोगों को यह बताना बहुत जरूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घट रही तेल की कीमतों में ‘मोदी करिश्मा’ या उनके भाग्य का दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं है और न ही हमारे देश का इसमें कोई खास भूमिका है।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि एवं गिरावट के कई कारण हैं, जिसको समझने के लिए पिछले डेढ दशकों की वैश्विक गतिविधियों को समझना होगा। वर्ष 2000 के मध्य में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होने लगी थी और बढ़ते-बढ़ते 2010 में यह लगभग 100 डाॅलर प्रति बैरल पर पहुंच गया था। इसका मुख्य कारण विश्व में कच्चे तेल की मांग बढ़ गयी थी क्योंकि दुनियां की दूसरी आर्थिक महाशक्ति चीन की अर्थव्यवस्था में उछाल आने से वहां तेल का सबसे ज्यादा खपत हो रहा था। वहीं दूसरी ओर कच्चे तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश इराक में युद्ध चल रहा था, जहां अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन ‘आई.एस.आई.एस. से तेल कारखानों में हमले करने की धमकी मिल रही थी, जिससे तेल उत्पादन में प्रतिदिन 3 मिलियन बैरल की कमी हो गयी थी। इसी तरह तेल उत्पादक देश लिबिया में ‘सिविल वार’ चल रहा थ। फलस्वरूप, तेल उत्पादन में भारी कमी हो गयी थी जबकि इसकी मांग बढ़ गयी थी इसलिए तेल की कीमत में बढ़ोतरी स्वभाविक था क्योंकि बाजार में तेल की कीमत में कमी या बढ़ोतरी मूलतः अर्थशास्त्र के सिद्धांत ‘मांग और पूर्ति’ पर आधारित होता है।  
इस तरह से जून, 2014 तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 115 डाॅलर प्रति बैरल था लेकिन यह अचानक घटकर नवंबर, 2014 में 80 डाॅलर प्रति बैरल हो गया और इसमें लगातार गिरावट जारी है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पिछले दशक में तेल की कीमत में बढ़ोतरी को देखते हुए कच्चे तेल निकालने वाली कंपनियों को लगा कि तेल के व्यापार में उन्हें लाभ ही लाभ है इसलिए बहुत मुश्किल जगहों जैसे अमेरिका के दक्षिण दाकोट एवं टेक्सेस में इन कंपनियों ने ड्रिलिंग मशीनों का उपयोग करते हुए तेल निकालना शुरू किया। इसी तरह कनाडा के अल्बर्टाज में बालू के अंदर से तेल निकालने का काम शुरू हुआ। इस तरह से अमेरिका और कनाडा भी दुनियां के तेल उत्पादक देशों में शामिल हो गए। अमेरिका जो एक समय कच्चे तेल का सबसे ज्यादा आयात करने वाला देश था, वर्ष 2008 से 4 मिलियन बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भेजने लगा, जो काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिदिन कच्चे तेल का उत्पादन 75 मिलियन बैरल है। इतना ही नहीं अमेरिका ने कच्चे तेल के आयात में 50 प्रतिशत की कमी कर दी एवं नाईजीनिया से तेल खरीदना बंद कर दिया।  

इधर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ते कच्चे तेल की वृद्धि को देखते हुए नई-नई तकनीक का अविष्कार किया गया, जिसके तहत ‘फ्यूल इफिशियेंशी’ यानी कम तेल से ज्यादा दूरी तय करने वाली कारों का निर्माण अमेरिका जैसे देशों में किया गया तो वहीं एशिया महाद्वीप के कई देश अपना उर्जा सब्सिडी में कटौती कर रहे हैं। इसमें इंडोनेशिया ने 3 प्रतिशत, थाईलैंड ने 2.6 प्रतिशत, वियातनाम ने 2.5 प्रतिशत, मलेशिया ने 2.3 प्रतिशत एवं भारत ने 2.3 प्रतिशत की कटौती की है, जिसका परिणाम यह हुआ कि इन देशों में कच्चे तेल की खपत में कमी आयी है। इसी तरह आर्थिक मंदी की वजह से यूरोप, एशिया और अमेरिका ने तेल आयात में कमी कर दी है। वहीं इराक में विवाद थामने से कच्चे तेल के उत्पादन में 3 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई है एवं सिविल वार की समाप्ति के बाद लिबिया भी 1 मिलियन बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है।  

फलस्वरूप, वर्ष 2014 समाप्त होते-होते तेल की मांग में कमी आ गयी लेकिन उत्पादन जारी रहा। तेल उत्पादक देश - इराक, इरान, लिबिया, रूस, वेनेजुएला, सौदी-अरब, इत्यादि देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर ही टिकी हुई है इसलिए तेल उत्पादन करना उनकी मजबूरी है क्योंकि इसके बगैर उनकी अर्थव्यवस्था नहीं चल सकती है। लेकिन तेल की कीमत में कमी होने से तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था में तबाही आ गयी है। इसलिए दुनियां की नजर तेल उत्पादक एवं निर्यातक देशों के गठबंधन ‘आॅयल प्रोड्यूसिंग एंड एक्पोर्टिंग कन्ट्रीज, "आॅपेक" के निर्णय का इंतिजार कर रहा था। ये देश लगभग 40 प्रतिशत कच्च तेल का उत्पादन करते हैं। इसमें सौदी-अरब और इरान को अपने अर्थव्यवस्था को सही पटरी पर चलाने के लिए तेल की उंची कीमत चाहिए। 

इसी को ध्यान में रखते हुए 27 नवंबर, 2014 को ‘आॅपेक’ की वियाना में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई लेकिन इसमें गरमा-गरम बहस के अलावा और कुछ भी नहीं हुआ। ये देश कुछ ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच सके। रूस और वेनेजुएला चाहते थे की सौदी-अरब तेल उत्पादन में कमी करे ताकि तेल की कीमत में वृद्धि हो सके। लेकिन सौदी-अरब तेल उत्पादन को कम करने पर राजी नहीं हुआ क्योंकि उसे 1980 में इसी तरह के निर्णय को अमल करने का खमियाजा भुगतना पड़ा था। उसने तेल का उत्पादन कम कर दिया था लेकिन तेल की कीमत लगातार घटती गयी और अंत में उसे शेयर बाजार में अपना शेयर गवांना पड़ा था। तेल की कीमत में कमी आने से तेल आयातक देश जैसे चीन, भारत, अमेरिका, जापान, पाकिस्तान इत्यादि के लिए तो बहुत अच्छा है लेकिन रूस, वेनेजुएला, इरान, इराक एवं लिबिया जैसे देशों के लिए आत्म-हत्या करने जैसा स्थिति पैदा कर सकता हैं। तेल ने दुनियां में जहां एक तरफ खुशी दी है तो दूसरे तरफ गम भी। लेकिन हमारे देश में हमलोग अब भी खुशी और गम के बीच में ही लटका दिये गए हैं। 

हकीकत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में पिछले वर्ष के प्रथम तिमाही के मुकबले लगभग 55 प्रतिशत की भारी कमी होने के बावजूद हमारे देश में पेट्रोल एवं डीजल काफी महंगा बिक रहा है। यह इसलिए क्योंकि इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकारें कई तरह के टैक्स जोड़ते हैं जो कुल मिलाकर पेट्रोल एवं डीजल की कीमत का 50 प्रतिशत है। इसमें 24 से 26 प्रतिशत केन्द्र सरकार का टैक्स एवं 20 से 30 प्रतिशत राज्य सरकार का टैक्स तथा 1 से 2 प्रतिशत तेल कंपनियों का विक्री कर जुड़ा हुआ है। आज हमारे देश में पेट्रोल और डीजल की असली कीमत क्रमशः 35 एवं 25  रूपये प्रति लीटर होना चाहिए था। केन्द्र सरकार अगर चाहे तो आज पेट्रोल और डीजल की कीमत सरकारी खजाने को भरते हुए 15 से 20 रूपये तक कम कर सकती है, जिससे खाद्य एंव अन्य जरूरत की चीजें और ज्यादा सस्ती हो सकती है। लेकिन मोदी सरकार ने आॅकड़ों की बाजीगरी एवं राष्ट्रवादी भाषण पिलाने के अलावा आम जनता को उचित फायदा पहुंचाने के लिए अबतक ज्यादा कुछ नहीं किया है। बल्कि वे कच्चे तेल के प्रभाव का राजनीति लाभ जमकर लेते रहे क्योंकि अभी तक उनके  भाषण में लोगों को उम्मीद दिखती हैं लेकिन यह ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रहेगा क्योंकि लोग अब उनका काम देखना चाहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में उलटफेर होते ही देशवाशियों को यह पता चल जायेगा की मोदी देश के लिए कितना भाग्यशाली हैं।  

‘आॅपेक’ के सेक्रेटरी जेनेरल अब्दुल्ला अल-बादरी ने कहा है कि कच्चे तेल की कीमत अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी है इसलिए अब संभावना है कि भविष्य में यह 200 डाॅलर प्रति बैरल तक छलांग लगा सकता है। अगर ऐसी स्थिति आयी तो हमारे देश में पेट्रोल और डीजल क्रमशः 100 एवं 90 रूपये प्रति लीटर बिकेगा। क्या ऐसी स्थिति होने पर मोदी स्वंय को अभाग्यशाली घोषित करेंगे या भाग्यशाली बने रहेंगे ? हालांकि ऐसी स्थिति आने के लिए कुछ जरूरी शर्तें भी हैं जैसे इराक या लिबिया में युद्ध छिड़ जाये, चीन की अर्थव्यवस्था में तेजी से उछाल आ जाये एवं यूरोप में मंदी खत्म हो जाये या अमेरिका और कनाडा के तेल उत्पादन में रूकावट आ जाय। तत्काल ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है लेकिन यह संभावना है. इसलिए नरेन्द्र मोदी को समय रहते आॅकड़ों की बाजीगरी और भाषणबाजी छोड़कर देश के विकास एवं अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के काम पर लग जाना चाहिए, वरना अगला लोकसभा चुनाव आते-आते उनकी हालत भी यूपीए-2 जैसी हो सकती है क्योंकि तेल का खेल बहुत नुकशानदेह है, जिसका खामियाजा मनमोहन सिंह भुगत चुके हैं। 

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मोदीतंत्र के चक्रव्यू में फंसे झारखंडी

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

भाजपा ने झारखंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा से काफी पहले ही आदिवासी मुख्यमंत्री, आदिवासी हकों की रक्षा हेतु बने कानून और पांचवी अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधानों को खारिज कर दिया था। लेकिन पूंजीवाद, ब्राह्मणवाद और फासीवाद के बेजोड़ गांठजोड़ से उत्पन्न 56 इंच का सीना, जिन्हें कुछ लोग शेर भी कहा करते हैं, ने संताल दिशुम में गरजते हुए कहा था कि उनके राजगद्दी पर रहते कोई माई का लाल पैदा नहीं होगा जो आदिवासियों को लूटेगा। उनके गर्जन को सुनते ही ‘धर्म का आफिम’ खाकर बैठे आदिवासी-मूलवासियों का दिल पिघल गया। फलस्वरूप, उन्होंने 16 आरक्षित एवं 21 गैर-आरक्षित सीट उनके नाम कर दी। वैसे मोदी लहर भी गजब का लहर है, जो एक दिशा में नहीं चलती। इस बार यह लहर भाजपा के सबसे कदावर आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा और आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो के खिलाफ चली। ठीक एकलब्य की तरह वे द्रोणाचार्य के शिकार हुए। इस तरह से झारखंड में बाहरी गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता साफ हो गया। अंततः भाजपा ने झारखंड में छत्तीसगढ़ सरकार चलाने की घोषणा कर दी। और जब इधर आफिम खाये झारखंडियों का नशा टूटा तो फिर क्या था? रांची बंद, झारखंड बंद और बिरसा उलगुलान। उलगुलान का अंत कभी नहीं हो सकता झारखंड में। यह झारखंड की खासियत भी है। मोदी लहर भी इस उलगुलान को नहीं रोक सकती है। 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मैं भी देश का नेता होता

ग्लैडसन डुंगडुंग














मैं भी देश का नेता होता
ताकत अगर होती मुझमें
खरीदने की फ्रोंटपेज अखबारों का
सारे टीवी चैनलों में
न्यूज, व्यूज और सीरियल मैं ही होता
और मीडिया का अदृश्य एडिटर भी।

सने होते हाथ मेरे
हजारों निर्दोषों के खून से लतपथ
कातिल होने की कलंक होती माथे पर मेरी
कहलाता निर्दोष फिर भी
लेकर अंधा कानून का सहारा
हरकतो से अपने बाज न आता
दुनियां को पाठ मानवता की मैं पढ़ाता ।

जनता से करता वादा खिलाफी बार-बार
महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बढ़ाता हर बार
खाने के लाले पड़ते उनके
पर होती जय-जयकार मेरी
सबका मैं होता मसीहा
पूजा होती मेरी दिन और रात।

जूझती खून की कमी से मां-बहनें
बच्चों के पेट ब्लाडर जैसे होते
शिक्षा का हाल बेहाल होता
सड़कें गडढ़ों से भरी होती
फिर भी कहलाता विकास पुरूष मैं
देश को दिखाता माॅडल विकास का।

संघर्ष में आजादी का हिस्सा न कभी होता मेरा
लड़ाता आपस में सबको
हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर- मस्जिद के नाम पर
देश में कराकर धर्मयुद्ध
होता मैं सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त ।

करके वादा अंशू पोछने का
रूलाता मैं सबको
खाना-पानी क्या
पेट भरता दिन-रात
भाषण से मैं उनका

सफाई कर्मचारी मरते भूखे
पसीना बहा-बहाकर भी
लगाता झाड़ू मंगवाकर कूड़ा मैं
देता भाषण स्वच्छ भारत का
और फ्रोंटपेज में होती तस्वीर मेरी।

गांधी-नेहरू को देकर भी गाली
खूब बटोरता मैं ताली
चढ़ाता लोगों को झाड़ में चने के
मुस्कुरा-मुस्कुरा कर देखता गिरते उनको
दिन में दिखाता सपने बड़े-बड़े
देर भी न करता तोड़ने में इन्हें खड़े-खड़े।

पूँजीपतियों की मौज होती
रखकर ताक पर
संविधान, कानून और नीति
सब देता मैं उनको
जंगल, जमीन, पहाड़, नदी और खनिज
करता दौरा विदेशों का मैं
बटोरकर लाता धन
अदानी, अंबानी और टाटा के वास्ते।

चलते पीछे मेरे उद्योगपति
आंख मिचैली खेलता मैं
जीवन-संगनियों के साथ उनके
फेसबुक पर होती रोज सेल्फी मेरी
लाईक और काॅमेंट करते-करते
होती जनता मंतरमुग्ध
चारो तरफ होती जयघोष मेरी
मैं भी देश का नेता होता। 

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

महान लोकतंत्र में कहां है हमारा हक?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

हम आदिवासियों ने जब से अपनी जुबान खोली है, अपनी कलम की धार तेज की है और अपने समाज के साथ हुए अन्याय की कड़वी सच्चाई को दुनियां के सामने लाना शुरू किया है, कुछ नकली देशभक्तों को मिर्ची लगने लगा है। वे हम पर आरोप लगा रहे है कि अब हमें धरती के महान भारतीय लोकतंत्र पर भरोसा ही नही रहा इसलिए हम अपने नौजवानों को बंदूक उठाने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे लोगों पर तरह आता है। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब ऐसे लोग हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना शुरू कर देते हैं, जो इस देश के संविधान, कानून और नियमों को तोड़ते हुए हमारी जमीन, जंगल, नदी, पहाड़ और खनिजों को लूट कर मौज कर रहे हैं। वे सवाल करते हैं कि क्या आदिवासियों को लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है? आदिवासी लोग लोकतंत्रिक तरीक से संघर्ष क्यों नहीं करते? और वे हथियार क्यों उठा रहे हैं? ऐसा लगता है कि मानो सभी आदिवासियों ने सरकार पर बंदूक ताने रखा है। लेकिन क्या कोई हमें यह बतायेगा कि इस लोकतंत्र में हमारा हक कहां है? इस लोकतंत्र ने हमारी समस्याओं का समाधन करने के बजाये समस्याओं का अंबार नहीं लगा दिया है? आप किस लोकतंत्र की बात करते हैं? क्या यह लोकतंत्र आदिवासियों के मामले में स्लेक्टिव नहीं है? किसने हमारे नौजवानों को हथियार उठाने पर मजबूर किया है?

हम अपनी बात देश के संविधान में आदिवासियों के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधानों से शुरू करते हैं। संवैधानिक प्रावधानों की मूल आत्मा को समझा जाये तो हम आदिवासियों की भूमि, भू-भाग और संसाधनों की सुरक्षा के लिए पांचवीं एवं छठवीं अनुसूची का प्रावधान किया गया है। लेकिन इन प्रावधानों को लागू करने के बजाये इन पर हमला जारी है। पांचवीं अनुसूची को हटाने के लिए झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर किया गया है, जिसमें दलील दी गयी है कि जिन इलाकों में आदिवासियों की संख्या 50 प्रतिशत से कम है उन इलाकों को अनुसूचित क्षेत्रों से बाहर कर दिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ इलाके जहां आदिवासियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत से उपर है वे इलाके भी अनुसूचित क्षेत्रों से बाहर है इसके बारे में चर्चा क्यों नहीं होती है? तामिलनाडु, केरल और उतर भारत के कई आदिवासी बहुल इलाके अनुसूचित क्षेत्र से बाहर हैं। क्या यह हम आदिवासियों के अधिकार, अस्मिता एवं अस्तित्व पर एकतरफा हमला नहीं है? हमारे अधिकारों की कद्र क्यों नहीं होती?

जब आदिवासी इलाकों में गैर-आदिवासियों की घुसपैठी को लेकर शोर-शराबा होता हैं तो बहुसंख्यक गैर-आदिवासी लोग संविधान के अनुच्छेद 19 का खंड (1) उपखंड (घ), (ड़) एवं (छ) का संदर्भ देकर तर्क देते हैं कि भारत के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में स्वंत्रतपूर्वक घुमने, आजीविका चलाने, नौकरी करने, व्यापार करने, निवास करने और बसने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन वही लोग संविधान के अनुच्छेद 19 का उपबंध (5) एवं (6) को क्यों भूल जाते हैं जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सामान्य जनता या आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी रोक हेतु बनाये गये कानून पर संविधान का अनुच्छेद 19 का खंड (1) उपखंड (घ), (ड़) एवं (छ) प्रभावी नहीं होगा। इसका अर्थ यह है कि आदिवासी इलाकों में गैर-आदिवासियों के स्वंत्रतपूर्वक घुमने, आजीविका चलाने, नौकरी करने, व्यापार करने, निवास करने, स्थायी रूप से बसने और जमीन खीदने पर रोक हेतु बनाये गये पांचवीं एवं छठवीं अनुसूची तथा भूमि रक्षा कानूनों के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसकी खुल्लेआम धज्जियां उड़ायी जा रही है और देश के संसद में चर्चा तक नहीं होती?

यह सभी जानते हैं कि अंग्रेजों ने 1765 में बंगाल, बिहार और ओडि़सा की दीवानी ले ली और इन क्षेत्रों में जमीनदारी प्रथा लागू किया तब आदिवासियों ने उनके शासन को नाकारते हुए कह दिया था कि जमीन तो भागवान ने उन्हें दिया है फिर वे सरकार को लगान क्यों देंगे? इस तरह से बाबा तिलका मांझी के नेतृत्व में संघर्ष शुरू हुआ जो लगातार चलता रहा। 1793 में जमीन पर पूर्ण कब्जा हेतु स्थायी बंदोबस्ती कानून लागू कर दी गई लेकिन संघर्ष भी नहीं रूका। पहाडि़या विद्रोह, कोल्ह विद्रोह, संताल हुल, चेरो-खरवार विद्रोह एवं बिरसा उलगुलान जैसे सैंकड़ों आंदोलनों ने अंग्रेजी हुकूमत को आदिवासियों की भूमि, परंपरा एवं संस्कृति की रक्षा हेतु कानून बनाने पर मजबूर कर दिया, जिसमें संताल परगना एवं छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम तथा विलकिल्संस रूल्स प्रमुख हैं। लेकिन आजादी के बाद इन कानूनों की धज्जियां उड़ायी गयी और जब जमीन लूटने में ये कानून आड़े आने लगे तो इन्हें विकास विरोधी कानून बताकर इनके अस्तित्व को ही समाप्त करने की कोशिश जारी है।

इसी तरह अंगे्रजी हुकूमत ने देश में ‘भूमि अधिग्रहण कानून 1894’ लागू किया और सरकार को देश की जमीन पर प्रभुसत्ता हासिल हो गयी। अब सरकार विकास के नाम पर जब और जहां चाहा जमीन अधिग्रहण कर ली। इस तरह से रैयतों से भूमि हाथिया कर उन्हें संसाधानहीन बना दिया गया। यह कानून आजादी के बाद भी इसी तरह प्रभावी रहा। फलस्वरूप, विकास परियोजनाओं से देश में 6 करोड़ लोग विस्थापित और प्रभावित हुए हैं, जिसमें सबसे ज्यादा तबाही आदिवासियों की हुई है। पुनर्वास के नाम पर मात्र 25 प्रतिशत विस्थापितों को ही कुछ हासिल हुआ और शेष 75 प्रतिशत विस्थापित व प्रभावित लोग भूखों मरने पर विवश हो गए। जब अपने लोगों के साथ हुए अन्याय को देखते हुए आदिवासियों ने ‘‘जान देंगे पर जमीन नहीं देंगे’’ का नारा दिया तो केन्द्र की यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 लाकर यह कहा दिया कि अब विकास परियोजना लगाने के लिए 80 प्रतिशत प्रभावितों की स्वीकृति जरूरी है। आदिवासी लोग खुश हो गए लेकिन अब केन्द्र की एनडीए सरकार इस कानून को भी पूंजीपतियों के रास्ते का रूकावट बताते हुए संशोधन का प्रयास कर रही है।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के द्वारा 24 दिसंबर, 1993 को देश में पंचायत राज लागू किया गया लेकिन देश के आदिवासी इलाकों में इस कानून का घोर विरोध हुआ क्योंकि आदिवासियों की अपनी शासन व्यवस्था थी। फलस्वरूप, भारत सरकार ने 1994 में भूरिया समिति का गठन किया और समिति के सिफारिश के आधार पर सरकार ने अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम 1996 लागू किया। इस कानून का मूल प्रावधान प्रकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभा को अधिकार प्रदान करना है। लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों में आने वाले देश के 9 राज्यों में से किसी भी राज्य ने इस कानून को मूलरूप से लागू ही नहीं किया। इतना ही नहीं इस कानून को झारखंड उच्च न्यायालय में यह तर्क देते हुए चुनौती दी गयी कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन है और न्यायालय ने भी इसे असंवैधानिक करार दे दिया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पुनः संवैधानिक करार देते हुए बहाल किया। यह क्या दर्शाता है? ओडिसा के नियमगिरि वाले मसले पर सर्वोच्च न्यायलय ने यहां तक कह दिया है कि गांव के संसाधनों के मामले में ग्रामसभा ही सर्वोपरि है। ऐसी स्थिति में कोई भी औद्योगिक घराना या सरकार आदिवासियों से उनका संसाधन नहीं छिन सकती है। लेकिन अब केन्द्र की मोदी सरकार इस कानून की मूल आत्मा को ही खत्म करने का प्रयास कर रही है। आदिवासियों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

यह कौन नहीं जानता है कि ‘स्टेट’ नाम की चीज आने से पहले जंगल पर आदिवासियों का सम्पूर्ण हक था। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उनका हक छिन लिया फिर आजादी के बाद तो उनको जंगल और जंगली जानवरों का दुश्मन ही मान लिया गया। 1976 में  राष्ट्रीय कृषि आयोग ने जंगल के विनाश का जवाबदेही आदिवासियों पर ही डाल दिया और उन्हें जंगलों से बाहर निकाल फेंकने की सिफारिश कर दी। और इसी आधार पर 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बनाकर रिजर्व जंगल का पत्ता तोड़ने को भी आपराध की श्रेणी में रख दिया गया। अंततः 2002 में आदिवासियों को वनों से खदेड़ना शुरू किया गया, जिसमें 25 हजार आदिवासियों का जीवन तबाह हो गया। लेकिन आंदोलन के बदौलत सरकार ने यह माना कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्याय हुआ है और अब उसे न्याय देने की जरूरत है। इस तरह से वन अधिकार कानून 2006 बना। बावजूद इसके बाघ बचाने वालों की लाॅबी ने वन अधिकार कानून को दो वर्षों तक रोक कर रखा। अंततः 1 जनवरी, 2008 को वन अधिकार कानून पूरे देश में लागू हो गया, लेकिन अब यह कानून भी पूंजीपतियों के रास्ते पर एक कांटे की तरह दिखाई पड़ रहा है और सरकार उसमें भी संसोधन करने की कोशिश में जुटी हुई हैं। 

आदिवासियों के हकों की रक्षा हेतु बनाये गये संवैधानिक प्रावधान, कानून एवं नियमों पर चारों तरफ से हमला जारी है। और ये सारे हमले विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों, व्यापारियों एवं गैर-आदिवासियों को आदिवासियों की भूमि, भू-भाग और संसाधनों पर कब्जा दिलाने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में आदिवासी लोग महान लोकतंत्र पर कैसे विश्वास कर सकते हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम आदिवासियों के भूमि, भू-भाग, संसाधन, संस्कृति एवं परंपरा की रक्षा के लिए बनाये गये कानून एवं संवैधानिक प्रावधान हमारे संघर्षों के परिणाम हैं इसलिए ये हमारा विरासत भी है, जिसपर हमला करना महंगा पड़ सकता है। सवाल यह है कि हमारे इलाकों की हिफाजत के लिए किया गया संवैधानिक प्रावधान एवं भूमि रक्षा हेतु बनाये गये कानून विकास विरोधी कैसे हो जाते हैं? हमें जंगल पर हक दिलाने वाले कानून आर्थिक तरक्की के लिए बाधक क्यों बन जाते? खनिज सम्पदा से भरी पड़ी जमीन और जंगल के मालिक आज फटेहाल क्यों हैं? पिछले छः दशकों का आकलन करने से भी स्पष्ट है कि हमारे लिए किस-किस तरह की नीतियां बनायी गयी। क्या हमें लाचार बनाने वाले योजना नहीं लागू किये गये? हमारे हिस्से का पैसा भी गटक लिया गया। क्यों? किसने हमारा हक मारा?

लोकतंत्र, देशहित, आर्थिक तरक्की, देश का विकास और राष्ट्र निर्माण के नाम पर हमारे आजीविका के संसाधनों को लूटा गया। और वे लोग हमें विकास का पाठ पढ़ाते रहे जो 365 दिनों में दो दिन अपने दफतरों में तिरंगा झंडा फहराकर देशभक्त बनते हैं और शेष 363 दिनों तक अपने ही देश को लूटते रहते हैं। यह लोकतंत्र हमें क्यों नहीं बचा पा रहा है? हमारे 47 सांसदों का मुंह किसने बंद किया है? इन सांसदों के लिए आदिवासी मुद्दों से पार्टी लाईन बड़ा क्यों है? क्या देश का लोकतंत्रिक व्यवस्था हमें बंदूक उठाने पर मजबूर नहीं कर रहा है? जब हम लोग संविधान के अनुच्छेद 19 जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है का उपयोग करते हुए जमीन, जंगल, नदी, पहाड़ और खनिजों की रक्षा की मांग करते हैं तो विकास विरोधी, राष्ट्र विरोधी और अलगावादी कैसे हो जाते हैं? जब पुलिस हम पर गोली चलाती है, फर्जी मुकदमें में फंसाती है और हमारी महिलाओं का बलात्कार करती है, जिसका हम विरोध करते हैं तो नक्सली बना दिये जाते हैं? क्या कोई हमें यह बता सकता है कि हमारी बची-खुची जमीन, जंगल, पहाड़, नदी और खनिज को बचाने के लिए हमारे देश में कौन सा लोकतंत्र है? क्या हम सिर्फ वोट देने और लूटाने के लिए ही हमारे महान लोकतंत्र पर गर्व करें? क्या धरती के महान लोकतंत्र के पास हमारे सवालों का जवाब है?