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सोमवार, 22 जुलाई 2019

साहब का फैसला

ग्लैडसन डुंगडुंग










साहब आप ने हमें
जंगलों से अलग
करने का फैसला
कैसे कर दिया 
वातानुकूलित कमरे में
बैठकर?
क्या जंगल में
सखुआ के पेड़ों से टकराने वाले
हवा के झोंके से कभी
टकराये हैं आप?
क्या जंगल में
सीना तान के खड़े
पेड़ों के नाम
जानते है आप?
क्या जिनहोर के फूलों की खुशबू
कभी आपके नाक तक पहुंची है?
क्या गेठी, पुटू और करील का स्वाद
कभी चखा है आप ने?
क्या महुआ की महक
के बारे में जानते हैं आप?
फिर जंगलों से हमें
खदेड़ने का फैसला
कैसे कर दिया साहब आप ने?
जंगल में हमारे
न होने का मतलब
जानते हैं आप?
आपके फैसले से
भयभीत हैं जंगल
थरथरा रहे हैं पेड़
कंप उठे हैं भय से
छोटे-छोटे पौधे भी
बंद कर दिया है
चिड़ियों ने चहचहाना
खामोश हैं
बाघ, भालू और बंदर
झींगुरों ने शोरगुल
बंद कर दिया है
वे जान गये हैं
पूंजीपतियों के पंजों से
उन्हें बचानेवाला
अब कोई नहीं बचेगा
जंगलों में। 

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

हम आदिवासी

ग्लैडसन डुंगडुंग










हम आदिवासी
भारत के हैं
प्रथम निवासी
प्रकृति के साथ
जीते हैं हम
सहजीवन की बगिया
है जंगल हमारा
सामूहिकता है
हमारे जीवन का आधार
न नामदार है
न है कोई गुमनाम यहां
समानता बसा है
रगरग में हमारा
सबको करते मान-सम्मान
न लड़का-लड़की में है विभेद
न मादा भ्रूण हत्या होता
न ही मारी जाती कोई महिला
दहेज के लिए यहां
गजब का अर्थव्यवस्था है हमारा
प्रकृति से हम उतना ही लेते
जितना जरूरत है हमारा
न पूंजी है
न है पूंजीपति यहां
अद्भूत है संस्कृति हमारा
हम सब मिलकर नाचते-गाते
न नायक-नायिका है
न है कोई दर्शक यहां
एक घाट पर
पीते पानी
न सभ्य है
न है कोई जंगली यहां
मिलकर उगाते
खेतों में अनाज
न अमीर है
न है कोई गरीब यहां
सामूदाय में रहते हैं हम
सबसे करते मेल-मिलाप
न उंच-नीच है
न काला-गोरा
न है कोई जात-पात का भेद यहां
अखड़ा में सीखते हम
जीवन जीने की कला
न परीक्षा है
न है कोई प्रतिस्पर्धा यहां
न्याय है
जीवन मूल्य हमारा
मिलकर देते सबको न्याय
न वकील है
न है कोई जज यहां
लोकतंत्र है
खून में हमारा
चुनते मिलकर नेता अपना
न होता है वोट
न है कोई नोट की मांग यहां
हम आदिवासी
भारत के हैं
प्रथम निवासी

रविवार, 17 मार्च 2019

जंगल से प्यार

ग्लैडसन डुंगडुंग













जंगल से प्यार है
साहब तुम्हें?
बता सकते हो
कितने हरे पेड़ हैं
तुम्हारे काक्रीट के जंगल में?
नकली प्यार दिखाना
बंद करो साहब
हमारे साथ
हम जानते हैं
कटवाकर पेड़ तुमने
सजाया है महल अपना
आंगन में तुम्हारा
पेड़ कहां है साहब?
आकर देखो
घर हमारा
हरे पेड़-पौधों से
कैसे सजाया है हमने
आंगन अपना
बंद करों साहब
हमें अतिक्रमणकारी बताकर
बेदखल करना जंगलों से
याद रखना साहब
हम बेदखल हो गये
तो जंगल खत्म हो जायेगा
और तुम भी। 

रविवार, 10 मार्च 2019

बाघ बचाने के नामपर

ग्लैडसन डुंगडुंग











जब तुम छीन न सके
जंगल हमारा
वन सुरक्षा के नामपर
तब हड़पने लगे हो उन्हें
बाघ बचाने के नामपर
हमें बता सकते हो साहब
कितने बाघ बचाने हैं तुमने
बाघ देखा है कभी
जंगल में तुमने
मत करो कैद उन्हें
लोहे के पिंजड़े में
जीने दो साहब उन्हें
सह-जीवन की बगिया में
हमारे साथ।
 

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

विचारों के युद्ध में

- ग्लैडसन डुंगडुंग -














विचारों के युद्ध में
तुम कहां हो मंगरा
क्यों ढ़ो रहे हो
दुश्मनों का हथियार
क्यों हो गये हो गुलाम
उनके विचारों का
क्या तुम जानते हो
किसने किया
आदिवासियत का जमींदोज
क्या ब्राहमणवाद ने
इंसान माना तुम्हें
क्या संघवाद
नहीं मिला रहा मिट्टी में
पहचान, भाषा और संस्कृति तुम्हारी
क्या गांधीवाद ने
पहचान दिया तुम्हें
क्या अम्बेदकरवाद ने
सभ्य माना तुम्हें
क्या माक्र्सवाद ने
अगुआ स्वीकारा तुम्हें
क्या माओवाद ने
तबाह नहीं किया
घर-संसार तुम्हारा
क्या पूंजीवाद
नहीं निगल रहा
प्राकृतिक संसाधनों को तुम्हारा
अनाकोंडा की तरह
क्या तुम बता सकते हो
कौन सा दिकु विचार
खड़ा है तम्हारे साथ
कौन बचायेगा तुम्हें
विचारों के युद्ध में
यह जान लो तुम अब
आदिवासियत ही है
हथियार तुम्हारा
दिकुओं का हथियार
फेंक दो मंगरा
और उठा लो
आदिवासियत का हथियार
यही बचायेगा तुम्हें
विचारों के युद्ध में 

शनिवार, 22 जुलाई 2017

आदिवासियों की चिंता क्यों है तुम्हें?



- ग्लैडसन डुंगडुंग -
















आदिवासियों की चिंता क्यों करते हो तुम?
क्या उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति से प्यार है तुम्हें?
बाजार में नहीं बिक रही जमीन उनकी
यह बात तुम्हें क्यों सताती है दिन-रात?
क्या उन्हें समृद्ध बनाना चाहते हो तुम?
उनकी गरीबी क्यों दिखती है तुम्हें?
क्या उनका खजाना भरना चाहते हो तुम?
उनका टूटा घर क्यों दिखता है तुम्हें?
क्या उनके लिये महल बनाना चाहते हो तुम?
ब्लाडर जैसे पेट लिये बच्चे क्यों दिखाई पड़ते हैं तुम्हें?
क्या उनका कुपोषण दूर करना चाहते हो तुम?
आदिवासी महिलाओं के बदन का
फटा कपड़ा क्यों दिखता है तुम्हें?
क्या नये कपड़े उन्हें पहनाना चाहते हो तुम?
धर्मांतरण-धर्मांतरण क्यों चिल्लाते हो तुम?
क्या उनके धर्म की रक्षा करनी है तुम्हें?
उनका हरा जंगल लाल क्यों दिखाई देता है तुम्हें?
क्या शांति, विकास और सुशासन लाना चाहते हो तुम वहां?
विकास का पाठ उन्हें क्यों पढ़ाते हो तुम?
उनका विकास करने का इरादा है क्या?
उन्हें बेवकूफ मत समझना तुम
कुदृष्टि को जानते हैं वे
तुम्हारे आंखों की
लालसा को पहचानते हैं वे
तुम्हारे मन की
फरेबी से परिचित हैं वे
तुम्हारे दिमाग की
सिर्फ बेवसी, लाचारी और पिछड़ेपन
दिखाई देता है तुम्हें उनकी
क्योंकि गटकना चाहते हो तुम
सरकारी खजाने को
उनके विकास और कल्याण के नाम पर
मिटटी में मिलाना चाहते हो तुम
आदिवासियत को
उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर
बलात्कार करना चाहते हो तुम
आदिवासी महिलाओं का
उन्हें नक्सली का जामा पहनाकर
तोड़ना चाहते हो तुम
उनकी एकता को
सरना-ईसाई के नाम पर
उन्हें आपस में लड़ाकर
खाली कराना चाहते हो तुम
उनके इलाके को
माओवाद उन्मूल के नाम पर
हड़पना चाहते हो तुम
उनकी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज
विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित के नाम पर

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

हमने कलम पकड़ ली है

ग्लैडसन डुंगडुंग












हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम
हमारे कलम के प्रहार से
बच सकोगे क्या तुम?
हमारे शब्द बाण को
झेल पाओगे क्या तुम?
हमारे तर्क और सवालों से
निपट सकोगे क्या तुम?
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम

सनसनाती तीर के खौफ से
काटवाया था अंगूठा एकलब्य का 
तुमने छलकपट से
फिर भी छिन सके थे क्या?
काबीलियत उसकी तुम
आरक्षण को बनाकर हाथियार
तुम नाकारते रहे काबीलियत हमारी
आरक्षण भी नहीं रहा
अब सहारा तुम्हारा
बचने का कोई नया तरीका
ढ़ूढ़ लो फिर से
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम

असूर, शैतान और राक्षस कहा है हमें
तुमने अपने धर्म ग्रांथों में
जंगली, आदिम और असभ्य बताया है हमें
तुमने अपने विकासवादी सिद्धांतों में
पिछड़, कमजोर और अनपढ़ लिखा है हमारे बारे
तुमने अपने सरकारी दस्तावेजों में
नक्सली, देशद्रोही और विकास विरोधी बताया है हमें
तुमने अपने कानून की किताबों में
खिलाया है चिंटी और पिलाया है शराब हमें
तुमने अपने कहानी और कविताओं में
नाकार दिया है बलिदान हमारा
तुमने अपने इतिहास में
अब बचा क्या है तुम्हारे पास?
लिखने को हमारे खिलाफ
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम

देश का इतिहास
अब लिखेंगे हम
ईमानदारी के साथ
लिखेंगे कहानी, कविता और वीर गाथा अपनी
और देंगे दुनियां को
तुम्हारे बेईमान होने का प्रमाण
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मैं भी देश का नेता होता

ग्लैडसन डुंगडुंग














मैं भी देश का नेता होता
ताकत अगर होती मुझमें
खरीदने की फ्रोंटपेज अखबारों का
सारे टीवी चैनलों में
न्यूज, व्यूज और सीरियल मैं ही होता
और मीडिया का अदृश्य एडिटर भी।

सने होते हाथ मेरे
हजारों निर्दोषों के खून से लतपथ
कातिल होने की कलंक होती माथे पर मेरी
कहलाता निर्दोष फिर भी
लेकर अंधा कानून का सहारा
हरकतो से अपने बाज न आता
दुनियां को पाठ मानवता की मैं पढ़ाता ।

जनता से करता वादा खिलाफी बार-बार
महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बढ़ाता हर बार
खाने के लाले पड़ते उनके
पर होती जय-जयकार मेरी
सबका मैं होता मसीहा
पूजा होती मेरी दिन और रात।

जूझती खून की कमी से मां-बहनें
बच्चों के पेट ब्लाडर जैसे होते
शिक्षा का हाल बेहाल होता
सड़कें गडढ़ों से भरी होती
फिर भी कहलाता विकास पुरूष मैं
देश को दिखाता माॅडल विकास का।

संघर्ष में आजादी का हिस्सा न कभी होता मेरा
लड़ाता आपस में सबको
हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर- मस्जिद के नाम पर
देश में कराकर धर्मयुद्ध
होता मैं सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त ।

करके वादा अंशू पोछने का
रूलाता मैं सबको
खाना-पानी क्या
पेट भरता दिन-रात
भाषण से मैं उनका

सफाई कर्मचारी मरते भूखे
पसीना बहा-बहाकर भी
लगाता झाड़ू मंगवाकर कूड़ा मैं
देता भाषण स्वच्छ भारत का
और फ्रोंटपेज में होती तस्वीर मेरी।

गांधी-नेहरू को देकर भी गाली
खूब बटोरता मैं ताली
चढ़ाता लोगों को झाड़ में चने के
मुस्कुरा-मुस्कुरा कर देखता गिरते उनको
दिन में दिखाता सपने बड़े-बड़े
देर भी न करता तोड़ने में इन्हें खड़े-खड़े।

पूँजीपतियों की मौज होती
रखकर ताक पर
संविधान, कानून और नीति
सब देता मैं उनको
जंगल, जमीन, पहाड़, नदी और खनिज
करता दौरा विदेशों का मैं
बटोरकर लाता धन
अदानी, अंबानी और टाटा के वास्ते।

चलते पीछे मेरे उद्योगपति
आंख मिचैली खेलता मैं
जीवन-संगनियों के साथ उनके
फेसबुक पर होती रोज सेल्फी मेरी
लाईक और काॅमेंट करते-करते
होती जनता मंतरमुग्ध
चारो तरफ होती जयघोष मेरी
मैं भी देश का नेता होता। 

सोमवार, 17 नवंबर 2014

चंचल परी थी वो

- ग्लैडसन डुंगडुंग -












चंचल परी थी वो
अपने स्वतंत्र दुनियां की
उसे बांधने की मेरी कोशिश ने
वक्त से पहले 
उड़ने को कर दिया मजबूर उसे। 

अंशू, दर्द और तड़पन
शेष थे मेरे हिस्से में
बेवशी, खामोशी और लाचारी
शेष थे मेरे किस्से में
अब खोने को कुछ रहा नहीं
और पाने की चाहत भी नहीं है मेरी।

गम, दुःख और पीड़ा 
जीवन के साथी बने रहेंगे
कागज, कलम और शब्द
बने हैं जीवन यात्रा के हमसफर। 

किस-किस को साझा करूं
अंशू अपनी 
किस-किस को सुनाऊं 
गाथा जीवन की
अब तो सुनाने की ताकत भी नहीं है मेरी। 

सवेरे होने की परिकल्पना कर
मुस्कुराने की कोशिश में जुट जाता हूँ 
अंधेरा होने का भय 
मुस्कुराहट छीन लेता है। 

एक उम्मीद लिये फिर
बिस्तर से उठ खड़ा हो जाता हूँ 
उसे खोने का गम
नींद की आगोश में ढकेल देता है।
पर सोचकर यह 
दिल को तसल्ली देता हूँ 
चंचल परी थी वो
अपने स्वतंत्र दुनियां की।  

शनिवार, 15 नवंबर 2014

उलगुलान का मशाल

- ग्लैडसन डुंगडुंग - 













उलगुलान का मशाल 
तूफानी हवा के झोंके से
बुझ गया क्या?
बिरसा का आह्वान
कंक्रीट के जंगल में
समा गया क्या?
पुरखों का सपना 
टूटकर शीशे की तरह
चकनाचूर हो गया क्या?

गये कहां वंशज बिरसा के?
चले थे जो लेकर मशाल उलगुलान की
सो गये हैं क्या योद्धा उलगुलान के?
अंग्रेजों को नाको चने चबवाये थे जिन्होंने 
हैं कहां सिपाही उलगुलान के?
खदेड़ा था जिन्होंने असूर दिशुम से
जिंदल, मित्तल और टाटा को।

शिकार की तलाश में फिर से 
मंडराने लगे हैं वो खुले आसमान के नीचे
बाज जैसे झपटने को हैं बेचैन
दबोच लेना चाहते एक झटके में शिकार को
निगल जाना चाहते प्रकृतिक संपदा
भयावह अनाकोंडा की तरह।

क्या है हमारा? कौन है हमारा?
सबकुछ बड़ा ही धूमिल है
पहरेदार भी दगा दे गये
पूर्वजों का घेरा तोड़कर 
पुटूस को भी नहीं छोड़ा
जंगली झाड़ी बताकर
लूट रहे दिखाकर सब्जबाग
समृद्ध होने का
शिकारियों की तरह। 

अब तो जागो बिरसा के वंशज
आ रही सुनामी पार से सात समुद्र
तोड़ा गया है बांध 
लुढ़काया गया है पत्थर
झाड़ियां भी सब कट चुकी हैं
हो चुका है सूर्य अस्त
चीर दो घने बादलों को अब
उठा लोे मशाल उलगुलान का
करेगा वही बेड़ा पार तुम्हारा 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

लालगलियारे के सन्नाटे में

ग्लैडसन डुंगडुंग












लालगलियारे के सन्नाटे में
घुन की तरह पीस रहा आदमी
भूत का यहां पता नहीं
दुःख, दर्द और पीड़ा से है भरा वर्तमान,
उम्मीद की कोई किरण नहीं यहां
भविष्य में अंधेरा छाया है।

आतंक है लाल और खाकी का 
बच न पाया कोई भी अबतक यहां
हत्या, बलात्कार और यातना
रोजमर्रा की मर्म है
निर्दोष तड़प रहे जेल में
प्रफुल्लित हैं दोषी खाकी संग यहां।

विद्यालय में बच्चे नहीं
कोबरा का तांडव है
गुरूजी पड़े हैं जेल में
माओवादियों का मोहरा बनकर
बारह खाड़ी जानते नहीं बच्चे
एस.एल.आर. और ए.के. 47 के बने हैं ज्ञाता।

पड़े हैं बीमार स्वास्थ्य केन्द्र भी
मरीजों का ख्याल रहा नहीं किसी को
डाॅक्टर और नर्सों की मौज है
बैठे बिठाए मिल रहा वेतन उनको
बेच रहे सरकारी दवा भी 
माओवादियों के नाम पर।

जंगल के पहरूए रहे सदियों से जो
उसके ही दुश्मन बनाये गये हैं आज वो
तड़प रहे काल-कोठरी में
पेड़ काटने के इल्जाम में।

माओवादी, पूंजीपति और ठेकेदारों का है
बेजोड़ गांठजोड़, जंगल के अंदर
खजाना विकास का 
निगल रहे वो अनाकोंडा की तरह। 

ब्लाडर जैसे पेट लिए
जंगल के बीच सन्नाटे में
कांच की गोली खेलते बच्चे
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बन गए हैं खतरे।

चल रहा युद्ध लालगलियारे में
सरकार और लोहा-लक्कड़ वालों के बीच
शांति और न्याय के नाम पर
जंगल भी है हैरान
एक-दूसरे का देखकर कत्लेआम।

पूंजीपतियों की मौज है
लूट रहे प्रकृतिक सम्पदा
विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर  
और दम तोड़ रहा 
देश का अंतिम आदमी
लालगलियारे के संन्नाटे में
तड़प-तड़प कर। 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

विस्थापन के दर्द से तड़प-तड़पकर

- ग्लैडसन डुंगडुंग -







विस्थापन के दर्द से तड़प-तड़पकर,
जीना पड़ेगा तुम्हें,  
और विकास के नाम पर,
लूट कर तुम्हारी,
जमीन, जंगल, पहाड़, नदी और खनिज,
सुशिक्षित, सभ्य और विकसित,
होने की तिलक लगेगी,
माथे पर हमारी,
बिजली बनेगी डैम में तुम्हारी,
लेकिन जगमगायेगा रोशनी से घर हमारा,
बनेगा लोहा खनिज से तुम्हारा,
और मजबूत होगा उससे घर हमारा,
उद्योग लगेगा खेतों में तुम्हारा,  
पर मिलेगी नौकरी उसमें बच्चों को हमारा,
जंगल, जमीन, पहाड़, नदी और खनिज बचाने की,
कोशिश मत करना कभी,
भाषा, संस्कृति और अस्तित्व रक्षा की,  
हिम्मत मत जुटाना कभी
नमक से भी कम है,
हमारे समाज में कीमत तुम्हारी,
लूटने दो तुम हमें,
जमीन, जंगल, पहाड़, नदी और खनिज अपनी,
वरना बना देंगे तुम्हें हम,
विकास विरोधी, नक्सली और देशद्रोही,
अपने पूर्वजों की कभी दुहाई मत देना,
विकास की इमारतें बनेगी,
कब्रगह पर तुम्हारी,
और तुम्हारे हिस्से का मुआवजा भी,
लूटने से खूद को रोक न पायेंगे हम,
याद दिलाना मत कानून की हमें कभी,
देश का संविधान भी,
कब जो काम आया है तुम्हारा,
जनहित के नाम पर,
विकास का आतंकवाद,
कर देगा तुम्हें बर्बाद,
और बर्बादी को भी तुम्हारी,
परोशकर रूपहले परदे पर,
किस्मत चमकायेंगे हम अपनी ही,  
विस्थापन के दर्द से तड़प-तड़पकर,
जीना पड़ेगा तुम्हें ही. 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

तुम बेईमान हो आर्य

- ग्लैडसन डुंगडुंग  -










तुम बेईमान हो आर्य,
तुमने हमारे दिशुम में आक्रमण कर हमें लूटा,
और बन गये सर्वश्रेष्ठ,
तुम्हारे इतिहासकारों ने भी की है बेईमानी हमारे साथ,
आजादी की पहली लड़ाई हमने तुमसे 100 साल पहले लड़ी,
अंग्रेजी के फंसी पर सबसे पहले हम झूले,
लेकिन हमारे संघर्ष को नाकारते हुए,
तुमने स्वंय को आजादी का योद्या घोषित किया,
तुम्हारे कवियो ने हमें,
असूर, सैतान, दानव और न जाने क्या-क्या बनाया,
अपनी कविताओं में,
तुम्हारे सहित्यकारो ने हमें,
बंदर, भालू और सुअर बनाया,
अपनी रचनाओं में,
और तुम्हारे लेखकों ने हमें,
जंगली, असभ्य और आदिम बनाकर रखा है,
अपनी किताबों में,
तुमने राष्ट्रहित के नाम पर हमारी,
जमीन, जंगल, पहाड़, नदी और खनिज लूटी,
और अब तुम हमारा बचाखूचा संसाधन लूटने के लिए हमें,
नक्सली, माओवादी और विकास विरोधी बताते हो,
तुम यह जानते हो आर्य,
हम आदिवासी हैं,
इस देश के असली मालिक,
लेकिन पहचान हमारी मिट्टी में मिलाने के लिए तुमने,
हमें वनवासी, गिरिजन और अनुसूचित जनजाति बनाया, 
तुम बेईमान हो आर्य,
तुम्हारी बेईमानी अब नही चलेगी। 

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

मुझे माफ करना मेरे दोस्त

- ग्लैडसन डुंगडुंग -










मुझे माफ करना मेरे दोस्त,
अब मुख्यधारा में समाहित हो गए हो तुम,
गांव की तुम्हारी बहनें,
जिनके साथ गाय-बकरी चरायी थी तुमने,
पड़ोस की आदिवासी लड़कियां,
जिनके साथ अखड़ा में रात-रात भर नाचे थे तुम,
तुम्हारी बहन की सहेलियां,
जिनके साथ बाजार में गुलगुल्ल खाये थे तुम,
शहर पहुंचते ही अब वे,  
बाॅल्ड, हाॅट और सेक्सी दिखने लगी हैं तुम्हें,
बलात्कार जैसे शब्द भी सुने थे तुमने पहले कभी?
क्या तुम यह भी नहीं जानते हो?
बलात्कार शब्द तो डिक्सनरी में,   
तुम्हारा था ही नहीं अबतक,
लेकिन मुख्यधारा में आने को,
तड़प रहे थे जो तुम,
जानते हो किसकी संस्कृति में है बलात्कार?
शिक्षित, सभ्य और विकसित समाज की,
लेकिन कौन यह समझाता तुम्हें?
टेलिविजन, मोबाईल और लैपटाॅप के बगैर,
असूर बने रहने का डर सता रहा था जो तुम्हें,
मंगरा चाचा की बेटी भी तो तुम्हारे साथ,
बाजार जाने से डरने लगी है अब,
बुधवा की बहन भी तो,
पिटो, बिति और लुकाछिपी खेलने,
नहीं आती है अब तुम्हारे साथ,
पड़ोस की लड़कियां भी अब,
गाय-बकरी चराने से कतराती हैं तुम्हारे साथ,
बलात्कार करो अपनी बेटी-बहनों के साथ,
मुख्यधारा में जो आ गये हो तुम अब,
पिटो, बिति और लुकाछिपी की जगह,
बाॅल्ड-बाॅल्ड, हाॅट-हाॅट और सेक्सी-सेक्सी,
खेलो तुम अपनी बहनो के साथ,
मुझे माफ करना मेरे दोस्त,
रहने दो आदिम जमाने में मुझे अब,
तुम्हारा मुख्यधारा नहीं चाहिए मुझे,
बलात्कार नहीं कर सकता मैं,
अपनी बेटी-बहनों के साथ।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

कसम खायी है हमने

- ग्लैडसन डुंगडुंग -









कसम खायी है हमने,
आदिमानव बनाकर रखने का तुम्हें,
कलम, तलवार और बंदूक,
तीनों ही है मुट्ठी में हमारी,  
तीर से क्या खाक मार लोग,
वह भी चंद दिनों बाद,
गुलाम होगा हमारा ही,
प्रतियोगिता में प्रथम आने की,
कभी कोशिश मत करना,
अंतिम पायदान पर ही रखेंगे तुम्हें हम,
डाॅक्टर, इंजिनियर और आॅफिसर बनोग,
तो बता देंगे दुनियां को हम,
मेरिट तुम में है कहां,
आरक्षण ही तो है सहारा तुम्हारा,
क्या तुम नहीं जानते,   
एकलब्य का अंगूठा कटवाया था हमने,
और बनाया जंगली, राक्षस और असूर तुम्हें,
यूरेनियम का जहर पिलाकर भी,
कर दी हमने,
जादुगोड़ा में नीलकंठ तुम्हारी,
तुम पीढ़ी दर पीढ़ी कराहते रहोगे,
और गढ़कर साहित्य तुम्हारा,
दुनियां में बटोरते रहेंगे ताल्लियां हम,
सिर्फ चीटियां खिलाकर ही,
जिन्दा रखा कहानियों में तुम्हें हमने,
और बदलने के लिए अपनी तकदीर,
दीमक खिलाने से भी नहीं चूके तुम्हें हम,
लैपटाप, कैमरा या स्क्रीनटच मोबाईल रख लो,
होन्डा सिटी, क्वालिस या सफारी की सवारी कर लो,
पोश बिल्डिंग, अपार्टमेंट या बंगला बना लो,
पर बनाकर रखेंगे आदि मानव ही,
अपने शब्द-संसार में तुम्हें हम,
कसम खायी है हमने,
बनने देंगे नहीं,
इस संसार में मानव तुम्हें हम।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

युवा तुम्हें क्या चाहिए ?

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

















युवा तुम्हें क्या चाहिए?
बेईमानी से बनाया गया,
27 मंजिल्ला चमचमती इमारत,
या ईमानदारी से बनाया गया,
लाल रंग का खपड़ैला मकान,
जिसे मिला नहीं अबतक दर्जा,
घर होने का,
देशज लोग रहते हैं जो उसमें,
क्या यह जानते हो तुम?
विकास का माॅडल ही,
बेईमानी से भरा पड़ा है तुम्हारा,
क्या नहीं हैं टाटा कंपनी?
तुम्हारे विकास का माॅडल,
टाटा के पूर्वजों ने बेचकर चीन में आॅफिम,
और कालीमाटी में आदिवासियों की लूटकर जमीन,
विकास का खड़ा किया इमारत,
बिजनेश टैकून अंबानी के बारे,
क्या ख्याल हैं तुम्हारे,
मंत्री-नेताओं के सहारे,
देश को लूटकर सारे,
धनी लोगों की सूची में,
काबिज है वो सबसे उपर,
ईर्द-गिर्द तुम्हारे घर के,
बनते बहुमंजिल्ला इमारतें,
क्या ईमानदारी के परिणाम है?
संविधान, कानून और नीतियों को,
रखकर ताक पर,
बनाये गये ये इमारतें,
क्या तुम्हारे विकास माॅडल हैं?
या सारंडा जंगल के प्रकृति की छटा में जीता,
एक ईमानदार इंसान,
नहीं मिलता शरीर में जिसका,
एक बूंद भी खून बेईमानी का,
युवा तुम्हें क्या चाहिए?
ईमानदारी से खड़ा किया गया इमारत,
या बेईमानी से गढ़ा जा रहा तुम्हारा भविष्य।