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बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

क्या हम जंगल उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

अपने घर के पास साग-सब्जी उगाने हेतु बारी बनाने के लिए पलामू टाईगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित पुटूस की झाड़ी काटने के कारण परहिया आदिवासी समुदाय के अगुआ खरिदन परहिया को 55 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। वन विभाग ने उनके उपर जंगल को बर्बाद करने का आरोप लगाकर उसे जेल भेज दिया था। जेल से बाहर आने के बाद वे न्यायालय में मुकदमा लड़ते रहे। अंततः न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। लेकिन वह दर्द आज भी उनके दिल में बरकरार है। जब से उन्होंने यह खबर सुना है कि मंडल डैम के निर्माण हेतु पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र के 3.5 लाख पेड़ काटे जायेंगे, उनका गुस्सा उफान पर है। वे कहते हैं कि वन विभाग कहां चला गया, जिसने हमें सिर्फ पुटूस की झाड़ी काटने के लिए जेल भेज दिया था? हम जंगल बचाने के लिए लड़ेंगे। रैली करेंगे, धरना करेंगे और चक्का जाम करेंगे। 

यहां मसला सिर्फ यह नहीं है कि अपनी आजीविका के लिए वन संपदा का उपयोग करने वाले आदिवासियों पर वन विभाग लगातार अत्याचार एवं कानूनी कार्रवाई करती है लेकिन विकास के नाम पर वह स्वयं जगलों को उजाड़ती है। असली मसला यह है कि क्या हमलोग देश के जंगलों को विकास, आर्थिक तरक्की, देशहित या कोई और टैग लगाकर उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं? क्या विश्व में हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को हम अपनी आंखें मूंदकर नकार सकते हैं? हम लोग विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित के नामपर कब तक केन्द्र और राज्य सरकारों को बचा-खुचा जंगलों को उजाड़ने देंगे? क्या हमें खरिदन परहिया जैसे जंगलों को बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासियों के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए? क्या देशभर में जंगल बचाने के लिए लड़ रहे आदिवासी सिर्फ अपनी आजीविका के लिए लड़ रहे हैं? क्या आदिवासियों के संघर्ष में धरती और हमारा भविष्य छिपा हुआ नहीं है?    

हम सबसे पहले यह समझ लें कि खरिदन परहिया क्यों गुस्से में है? 5 जनवरी 2019 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंडल डैम से संबंधित पाईपलाईन योजना की आधारशिला रखी। इसके बाद केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। काटे जाने वाले पेड़ों में ज्यादातर साल के पेड़ हैं। हास्यास्पद बात यह है कि वन विभाग ने सिर्फ बड़े पेड़ों को गिना है जबकि यह प्राकृतिक जंगल का इलाका है, जिसमें हजारों किस्म की वनस्पितियां मौजूद हैं, जो डैम के निर्माण से स्वतः ही डूबकर समाप्त हो जायेंगे। 

हैरान करने वाली बात यह है कि इसी डैम के लिए वन विभाग ने 1981-82 में लगभग 3.5 लाख पेड़ों को काट दिया था, जिसके एवज में अबतक एक पौधा भी नहीं लगाया है। अब वन विभाग कह रही है कि मंडल डैम के डूब क्षेत्र में काटे जाने वाले पेड़ों के एवज में पलामू, गढ़वा एवं लातेहात जिले में दो हजार हेक्टेयर में पौधरोपन करेगा, जिसके लिए जलसंसाधन विभाग ने उसे 461 करोड़ रूपये भी दे दिया है। मंडल डैम के डूब क्षेत्र में 2266.72 एकड़ वनभूमि हैं। इसलिए अब एक बार फिर से वन विभाग ने भारत सरकार के ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन’’ मंत्रालय से पेड़ काटने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। काटे जाने वाले पेड़ों में सैकड़ों पेड़ 40-50 फुट उंचे तथा 1-1.5 व्यास की मोटाई के हैं। सवाल उठता है कि क्या वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जंगल बचाने के लिए बनाया गया है या पेड़ काटने और जंगल बर्बाद करने हेतु आदेश पारित करने के लिए? 

ज्ञात हो कि 1970 के दशक में उतरी कोयल जलाशय परियोजना के तहत मंडल डैम निर्माण की योजना बनायी गयी थी, जिसकी लागत 300 करोड़ रूपये थी, जो झारखंड गठन के उपरांत 1622 करोड़ रूपये हो गई थी। अब यह राशि बढ़कर 2391 करोड़ रूपये हो गयी है। डैम के निर्माण में अभी तक 792 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। 1990 के दशक में उग्रवादी हिंसा में एक इंजीनियर के मारे जाने के बाद कार्य बंद कर दिया गया था। अब एक बार फिर से मंडल डैम का निर्माण कार्य शुरू हो रहा है, जिसके लिए 2855 वर्ग किलोमीटर जमीन का अधिग्रहण होगा, जिसमें 15 गांव के 1600 परिवार विस्थापित होंगे। इस परियोजना से 111,521 हेक्टेयर जमीन सिंचित होगा, जिसमें झारखंड का मात्र 19,604 और बिहार का 91,917 हैक्टेयर भूमि शामिल है। यहां किस राज्य के किसानों को कितना फायदा मिलेगा यह मुद्दा नहीं है बल्कि मूल मुद्दा यह है कि क्या हम जंगलों को उजाड़ने की हिम्मत कर सकते हैं?
हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगल को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है। 

इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौपने के लिए निरंतर प्रयासरत है। छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है, जिसके खिलाफ आदिवासी संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर नो गो एरिया वाले जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। हमें मालूम होना चाहिए कि पर्यावरण संतुलन के लिए देश के कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत हिस्सा में जंगल होना अनिवार्य है। फोरेस्ट सर्वें रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 21.6 प्रतिशत वनक्षेत्र है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास के नाम पर डैम में डुबोना और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने 8 अक्टूबर 2018 को जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया है कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए पर्यावरण से 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके यानी ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर, जंगल बचाकर एवं वनक्षेत्र को विस्तार करके ही हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती नहीं बचा सकते हैं। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी।

2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमें समझना होगा कि चुनावी वादा खोखला हो सकता है लेकिन यदि हम पेरिस समझौता को भी चुनावी वादा समझने की भूल की तो आगामी एक दशक के बाद धरती पर कयामत आ जायेगा। हम लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे। यदि हम अपना अच्छा भविष्य चाहते हैं तो पेड़ काटने तथा जंगलों और पहाड़ों को उजाड़ने से बचाना होगा।  हमें केन्द्र एवं राज्य सरकारों को जिम्मवार बनाना होगा। इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है।   

स्वीडेन की 16 वर्षी क्लाईमेट एक्टिविस्ट ग्रेटा थन्बर्ग, जिन्होंने धरती को बचाने के लिए स्कूल जाना बंद करते हुए संयुक्त राष्ट्र पहुंची और दुनिया के नेताओं को यह सवाल पूछते हुए स्तब्ध कर दिया था कि आप ने अपने खोखले शब्दों से मेरा भविष्य छीन लिया है। आपकी हिम्मत कैसे हुए? क्या भारत के 130 करोड़ लोगों के बीच कोई है जो हमारे देश के जंगलों को उजाड़ने वाली केन्द्र एवं राज्य सरकारों से सवाल पूछ सके कि जंगलों को उजड़ने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? हमारे भविष्य को दांव पर लगाने की हिम्मत आपको कहां से आयी? आप कब विकास, आर्थिक तरक्की और राष्ट्रहित की ढकोसला बंद करेंगे? हमें हर हाल में पेड़ काटना और जंगलों को उजाड़ना बंद करना होगा। यदि हम आज जंगल को बचाने के लिए उठ खड़े नहीं हुए तो समझ लीजिये आने वाली पीढ़ी का कोई भविष्य नहीं है।   

बुधवार, 12 जून 2019

जंगलों को निगलता विकास का दानव

ग्लैडसन डुंगडुंग

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग अंतर्गत दंतेवाड़ा जिले में स्थित बैलाडीला पहाड़ को बचाने के लिए 200 गांवों के लगभग 25,000 आदिवासियों का संघर्ष ने छत्तीसगढ़ सरकार को बैलाडीला पहाड़ में लौह-अयस्क उत्खनन कार्य रोकने के लिए मजबूर कर दिया है। अब सरकार कह रही है कि पिछली सरकार के समय में लौह-अयस्क हासिल करने के लिए किये गये फर्जी ग्रामसभा और खनन कंपनी के द्वारा 2,000 पेड़ों को काटकर जलाने वाली घटना की जांच की जायेगी। बैलाडीला आंदोलन ने देश में एक बार फिर यह बहस छेड़ दिया है कि क्या विकास के नामपर जंगलों और पहाड़ों को उजाड़ना सही है? क्या विकास के नामपर कारपोरेट जगत को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बेहिस्साब दोहन उचित है? देश में जलवायु परिवर्तन के असर को देखते हुए क्या हमलोग बचे-खुचे जंगल और पहाड़ों को उजाड़ने की इजाजत दे सकते हैं? 

यह हैरान करने वाली बात है कि बैलाडीला में ‘पृथ्वी पुरूष’ के मित्र गौतम अडानी की कंपनी ‘अडानी इंटरप्राईजेज प्रा. लि. के द्वारा लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए 2,000 हजार पेड़ों को काटकर, जलाते हुए राख में तब्दील कर दिया गया। अडानी कंपनी ने 25,000 पेड़ों को काटने के लिए सरकार से अनुमति हासिल कर ली है। यह संख्या सिर्फ बड़े पेड़ों की है। छोटे-छोटे पेड़ और पौधों को नहीं गिना गया है। इन्हें कौन गिनेगा? क्या इनके अस्तित्व को नकारना सही है? यदि सभी पेड़-पौधों को गिना जायेगा तब यह संख्या लाखों में होगी। यह सोचनीय बात है कि जब खनन कार्यों के लिए सरकार हजारों पेड़ों को कटवाती है और कारपोरेट घरानों को जंगल उजाड़ने की अनुमति देती है तब उसे वैध कहा जाता है। लेकिन जब जंगलों की रक्षा करने वाले आदिवासी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेड़ काटते हैं तब सरकार उसे अवैध करार देती है और पेड़ काटने वाले आदिवासियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में डाल देती है। ऐसी दोहरी मापदंड क्यों है? जबकि हकीकत यह है कि जिन इलाकों में आदिवासी रहते हैं वहीं जंगल बचा हुआ है।        

विकास के नामपर पेड़ों को काटने, जंगलों को उजाड़ने और पहाड़ों को बेचकर पूंजीपति, सत्ताधीश और नौकशाहों का खजाना भरने के लिए हमारे दिमाग में यह डाल दिया गया है कि विकास करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जरूरी है। देश में ऐसा मान्यता स्थापित कर दिया गया है कि विकास करने के लिए पेड़ों को काटना, जंगलों को उजाड़ना और पहाड़ों को बर्बाद करना जरूरी है। इतना ही नहीं प्रकृति के साथ जीने वाले आदिवासियों को असभ्य, जंगली और पिछड़ा कहा जाता है तथा जो लोग कांक्रीट के जंगलों में रहते हैं उन्हें सभ्य, शिक्षित और विकसित। इसलिए बहुसंख्य लोग पेड़ काटने, जंगल उजाड़ने और पहाड़ों को तोड़ने पर सवाल नहीं उठाते हैं और पर्यावरण पर होने वाले असर के बारे में भी बात नहीं करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विकास के नामपर प्राकृतिक संसाधनों का बेहिस्साब दोहन हो रहा है। देश के जिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों से अरबों रूपये का लौह-अयस्क, बाक्साईट, कोयला, इत्यादि निकाला जा रहा है उन क्षेत्र के लोगों को अपनी आजीविका के लिए संषर्घ करना पड़ रहा है और जंगल भी खत्म हो रहा है। 

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और विकास की हकीकत को समझने के लिए झारखंड का सारंडा जंगल सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां विकास के नामपर 1925 से लौह-अयस्क का उत्खनन किया जा रहा है। सारंडा जंगल से प्रतिवर्ष लगभग 3,000 करोड़ रूपये का लौह-अयस्क का उत्खनन किया जाता है। लेकिन जंगल के अंदर गांवों को जोड़ने के लिए 2012 से पहले एक सड़क तक नहीं थी। आज भी सारंडा जंगल के अंदर रहने वाले 80 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषित हैं और 70 प्रतिशत आदिवासी महिलाएं खून की कमी से जुझ रहीं हैं। वे अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं जबकि खनन कार्य से जुड़े बाहरी लोग मलामाल हैं। सारंडा जंगल में किसके विकास के लिए लौह-अयस्क का उत्खनन किया जा रहा है? सारंडा जंगल एशिया का सबसे बड़ा सखुआ का जंगल है, जिसे विकास के नामपर उजाड़ा जा रहा है। सारंडा जंगल में सरकार ने 22 नया खनन लीज दिया है। इससे किसका विकास होगा? हकीकत यह है कि विकास के नामपर प्राकृतिक संसाधनों का बेहिस्साब दोहन कर सिर्फ मुट्ठीभर पूंजीपतियों, सत्ताधीशों और नौकरशाहों का खजाना भरा जा रहा है। 
विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगलों  को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगलों को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगलों को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है एवं अभी और कई जंगलों और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौपने के लिए निरंतर प्रयासरत है। 

देश के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। लोग भीषण गर्मी से तबाही झेल रहे हैं और सत्ताधीश विकास के नामपर जंगलों को पूंजीपतियों को सौपते जा रहे हैं। इसी सच्चाई को छुपा कर रखने के लिए गोदी और मोदी मीडिया के द्वारा यह अफवाह फैलाया जा रहा है कि देश में गर्मी का कारण पाकिस्तान के द्वारा भेजा गया गर्म हवा है। ऐसी स्थिति में यदि लोग अभी भी सच्चाई से मुंह मोड़ते रहेंगे, भाजपा-कांग्रेस करते रहेंगे और सत्ताधीशों को तथाकथित विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने देते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब तापमान 50-55 डिग्री के पार चला जायेगा और हमारे पास तड़प-तड़पकर करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा।

हमारे देश में जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को बचाने के लिए संघर्षरत आदिवासियों को विकास विरोधी कहा जाता है। लेकिन अभी यह समझने की जरूरत है कि यदि आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्षरत है तो वे न सिर्फ आदिवासी समुदाय और प्रकृति को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि धरती और जीवन का भविष्य उनके संघर्ष पर टिका हुआ है। इसलिए अब उन्हें विकास विरोधी बोलने के बजाय हमें उनके संघर्ष का हिस्सा बनना चाहिए। प्रकृति और जीवन विरोधी विकास को न कहने का सही समय यही है। यदि हम आज भी नहीं चेते तो निश्चितरूप से कल हमारा नहीं होगा। 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

असूर आदिवासियों को चिढ़ाता विकास

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड के नेतरहाट की वादियों में स्थित टुटवापानी विस्थापन विरोधी जनांदोलन का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। इस क्षेत्र के आदिवासियों ने पिछले तीन दशक से भारतीय सेना के लिए प्रस्तावित ‘नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज’ परियोजना को रोक कर रखा है। ’’जान देंगे, जमीन नहीं देंगे’’। यही वह नारा है, जिसने सेना के आफसरों और जवानों को भयभीत कर रखा है। लेकिन विडंबना यह है कि बाक्साइट पत्थरों से भरे सैकड़ों ट्रक प्रतिदिन इसी टुटवापानी मोड़ से गुजरते हुए शहर की ओर जाते हैं। इस क्षेत्र में उरांव, मुंडा, बिरजिया, नगेशिया और असूर आदिवासी रहते हैं लेकिन ट्रकों से ढोये जा रहे बाक्साइट के अधिकांश पहाड़ असूरों के हैं। बाक्साइट के पहाड़ों को तोड़-तोड़कर और जमीन के अंदर पड़े बाक्साइट के पत्थरों को कोड़-कोड़कर बेचा जा रहा है विकास के नाम पर। टुटवापानी मोड़ से असूरों की दुनिया शुरू होती है। असूर आदिवासी यहां पठारों के उपर निवास करते हैं। 

ऐतिहासिक रूप से असूरों को यहां का प्रथम निवासी माना जाता है, जिन्होंने सबसे पहले लोहे की खोज की थी। असूरों के वंशज बताते हैं कि असूर दंपति सुकरा और सुकरी जब पत्थरों से बनाये गये चुल्हे पर खाना पकाने लगे तब आग की गर्मी से पत्थर पिघलकर लोहा बन गया। उन्होंने उस लोहा से तीर और कुल्हाड़ी बनाया। धीरे-धीरे यह पेशा का रूप लिया और असूरों की निर्भरता औजार बनाकर बेचने पर हुई। लेकिन जब टाटा जैसे कंपनी कृषि औजार बनाकर बेचने लगे तब असूरों के द्वारा बनाये गये औजारों की मांग खत्म हो गई। इसके बाद इन्होंने अपनी आजीविका को पूर्णरूप से खेती पर निर्भर बना दिया। लेकिन आज भी वे  हथौड़ा को भगवान मानकर उसकी पूजा करते हैं। पूंजीवाद के समर्थक कहते हैं कि बड़े उद्योग रोजगार देते हैं लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। कड़वा सच्च यह है कि बड़े उद्योग आदिवासियों से न सिर्फ उनकी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधन छीनते हैं लेकिन उनका पारंपरिक रोजगार भी खत्म कर देते हैं। इस तरह से आदिवासियों को संसाधनविहीन किया जाता है।

28 दिसंबर 2018 को हम 21 लोगों का एक समूह, जिसमें शोधकर्ता, लेखक एवं एक्टिविस्ट थे, आदिवासियत को समझने के लिए जंगलों की ओर निकल पड़े थे। जब हमलोग टुटवापानी पहुंचे तब शांम के लगभग सात बज रहे थे। लेकिन इलाका में शनाटा पसरा हुआ था। यहां का तापमान रात में काफी नीचे गिर जाता है। इसलिए लोग काम का निपटाकर शांम को जल्दी ही अपना-अपना बिस्तर पकड़ लेते हैं। हमारी गाड़ी जैसे ही मुख्यसड़क को छोड़कर असूरों की दुनिया में प्रवेश करने वाली कच्ची सड़क पर उतरी, गाड़ी की लाल-पीली रोशनी में बाक्साइट के धुलकण तैरने लगे। सड़क और गड्डढ़े सामानांतर चल पड़े। सड़क पर पत्थर भी दिखाई देने लगे। ये बाक्साइट के पत्थर हैं। जब ट्रक चलते-चलते सड़कों को गडढ़ों में तब्दील कर देते हैं तब बाक्साइट के कम अंश वाले पत्थरों को इन गड्डढ़ों में डालकर सड़क बनाया जाता है। यहां प्रतिदिन सुबह चार बजे से लेकर रात दस बजे तक बाक्साइट की ढुलाई होती है। इसी से आप समझ सकते हैं कि पहाड़ों को बेचने की कितनी जल्दबाजी है। जंगल के बीच रात के अंधेरे को चीरते हुए अलग-अलग हिस्से से चार स्थानों से निकलने वाले प्रकाश और बीच में रंगबिरंगी छोटी-छोटी बल्ब की खुबशुरत प्रकाश थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दिखाई पड़ते हैं। ये असल में बाक्साइट के पहाड़ों को ढोकर जंगल से शहर की ओर जा रहे ट्रक हैं। हर शांम ऐसे ही रोशन होता है जंगल लेकिन यह असूरों को थोड़ी सी भी खुशी नहीं दे पाता।  

असूरों की दुनिया में बाक्साइट खनिज की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता उनके लिए कलंक बन गया है। उनको अपने पूर्वजों की जमीन से बेदखल होना पड़ रहा है। सरकारी दस्तावेज में असूर समुदाय को आदिम जनजाति का दर्जा दिया गया है। केन्द्र और राज्य सरकारें दावा करते हैं कि वे इनके कल्याण के लिए लगे हुए है लेकिन पिछले सात दशकों में इनका कल्याण नहीं हो पाया है बल्कि इनकी जनसंख्या निरंतर घटती जा रही है। वे अब सिमटकर सिर्फ 7783 जन बचे हुए हैं। असूरों का इलाका मूलतः गुमला, लोहरदगा, लातेहार और पलामू जिले तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र उंचाई पर मौजूद समतल स्थल है इसलिए इसे पाट कहा जाता है। यहां अधिकांश गांवों के नाम के साथ पाट शब्द जोड़ा गया है। चारों तरफ बाक्साइट ही बाक्साइट है। लेकिन बाक्साइट खनन से उन्हें काफी नुक्शान हुआ है। सरकार, खनन कंपनियां और खनन माफिया यहां देश के संविधान और कानूनों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन करते हैं।  

रात के अंधेरे में प्रमुख कच्ची सड़क से जुड़े प्रत्येक गांव का सड़क एक ही तरह के दिखाई पड़ते हैं क्योंकि इनमें ट्रक, ट्रैक्टर और धरती कोड़ मशीनों के अवागमन के निशान हैं। गांव का रास्ता दिखाने के लिए असूर दंपति हमारे साथ हैं लेकिन हमलोग जंगल में दिशाहीन होकर एक घाटी पर पहुंच जाते हैं। हमें भटकाने के जिम्मेवार ट्रक और धरती कोड़ मशीन हैं असूर दंपति नहीं। ये असूर दंपति यहां आखिरी बार कुछ एक साल पहले आये थे तब स्थिति कुछ अलग थी। बाक्साइट उत्खनन के कारण आज उन्हें भी अपना इलाका पहचानने में काफी कठिनाई हो रही है। अंततः आठ बजे रात को हमलोग चैरापाट पहुंचते हैं। यह असूरों का गांव था लेकिन अब यह मुंडा बहुल हैं। लोहे की खोज में अधिकांश असूर परिवार यहां से कहीं और चले गये। हालांकि विद्यालय में काफी संख्या में असूर बच्चियां अब भी शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, जो आस-पास के गांवों के हैं। लंबी यात्रा के कारण सभी लोग थककर चूर हो गए है। इसलिए खीचड़ी भात खाकर सो जाते हैं।

अगले दिन, आवासीय विद्यालय के टूटे खिड़की से तीर की तरह प्रवेश कर रहा सूर्य की रोशनी हमें बता रहा है कि काफी पहले ही सुबह हो चुकी है। विद्यालय का पहरेदार पांच बजे ही नहाधोकर तैयार है हमें जंगलों और पहाड़ों के बीच झरने के पास ले जाने के लिए। बिस्तर पर पड़े हुए आंख खोलते ही खंडहर के अंदर होने का एहसास होता है। खिड़कियां टूटे हुए हैं। बरसात में पानी टपकने के निशान स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। कई जगहों पर छट का भीतरी हिस्सा टूटकर गिरा है। आवासीय विद्यालय में वर्ग आठ तक की 88 बच्चियां रहती हैं। वे छुट्टिया मनाने अपने-अपने घर गये हुए हैं। 

विद्यालय परिसर के अंदर मौजूद चपाकल में पानी नहीं निकलता है और पानी टंकी में कभी पानी नहीं आया। विद्यालय के देखभाल का जिम्मा संभालने वाले मेलन असूर बताते हैं कि पानी की टंकी सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए बनाया गया है। यहां सिर्फ दो शौचालय हैं लेकिन उपयोग लायक नहीं। ये बच्चियां सुबह-सुबह शौच करने के लिए जंगल जाती हैं। झरना में नहाती हैं, कपड़े धोती हैं और उसी झरना के पानी को पीती भी हैं। यहां स्वच्छ भारत अभियान का नमोनिशानी नहीं है। लकड़ी के जलावन से खाना पकाया जाता है इसलिए कई कमरे में सखुआ की लकड़ी भर दी गई है। विद्यालय के चारो तरफ लगभग आठ-दस सोलर लाईट लगाये गये हं, लेकिन बैट्री के अभाव में ये सिर्फ शोभा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। कक्षा एक से आठ तक के बच्चियों को पढ़ाने के लिए सिर्फ तीन सरकारी शिक्षक हैं। इसे आसानी से समझा जा सकता है कि इन बच्चियों का भविष्य कैसे गढ़ा जा रहा है। 

विद्यालय कैम्पस से बाहर निकलते ही इलाका लाल दिखाई पड़ता है। विद्यालय के पास बाक्साइट खनन कार्यालय है, जहां ट्रक और धरती कोड़ मशीन खड़े हैं लेकिन कंपनी का कोई साईनबार्ड नहीं है। यह पहला इशारा है कि यहां सबकुछ अच्छा नहीं है। अमूमन खनन लीज मिलते ही खनन कंपनियां सबसे पहले अपना साईनबोर्ड गाड़कर घोषणा कर देते हैं कि यह इलाका उनका है। यहां की बेनामी कंपनियां ऐसे नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पकड़ाने का डर सताता है। थोड़ा आगे बढ़ने पर जंगल दिखाई पड़ते हैं और जंगल के बीच-बीच में बाक्साइट निकलने के लिए खुदाई की गई गड्डढ़े और लाल मिट्टी। ऐसा दिखाई पड़ता है मानो कोई रात में आकर बाक्साइट चुराकर भाग गया हो। गांव के लोग इसका राज खोलते हैं। यहां दो तरह का खनन होता है एक कानूनी और दूसरा गैर-कानूनी। इस क्षेत्र में अदित्या बिड़ला की बाक्साइट कंपनी ‘हिंडल्को’ सरकार से लीज लेकर खनन कार्य कर रही है। हिंडल्को बाक्साइट की सबसे बड़ी उत्खनन कंपनी है, जो प्रतिवर्ष 2.23 मिलियन टन बाक्साइट का उत्खनन करती है। लेकिन कई निजी बेनामी कंपनियां गैर-कानूनी तरीके से खनन कार्य कर रहे हैं। 
चैरापाट में आदिवासियों की रैयती जमीन और जंगलों के बीच-बीच में खोद-खोदकर बाक्साइट निकाला गया है और अब उत्खनन का काम जंगल में चल रहा है। इसके लिए बेनामी कंपनियों के पास एक छोटा सा कार्यालय, कई ट्रक और धरती कोड़ मशीन हैं। इन्होंने बड़ी चलाकी से स्थानीय युवाओं को अपने जाल में फंसा कर रखा है। ये कंपनियां स्थानीय युवाओं को ठेकेदार के रूप में खड़ा किये हुए हैं, जिनका काम बाक्साइट खनन हेतु रैयतों को जमीन देने के लिए तैयार करना होता है। इसके बदले में कंपनी इन्हें प्रति ट्रक 1500 रूपये देती है तथा जमीन मालिक को 200 रूपये। ये बेनामी कंपनियां कच्चा माल को हिंडल्को जैसी कानूनी लीजधारियों को 9500 रूपये प्रति ट्रक की दर से बाक्साइट बेचते हैं। यदि जमीन मालिक, स्थानीय ठेकेदार, मजदूर, ढुलाई एवं आफसर व नक्सली लेवी के खर्च को अलग कर दिया जाये तो ये बेनामी कंपनी के मालिक प्रति ट्रक कम से कम 5000 रूपये कमाते हैं। ये बेनामी कंपनियां वन संरक्षण कानून 1980, वन अधिकार कानून 2006 एवं पेसा कानून 1996 के तहत अनुमति लिये बगैर ही खनन कार्य कर रहे हैं। यह संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधान, वन संरक्षण कानून 1980, वन अधिकार कानून 2006 एवं पेसा कानून 1996 तथा सुप्रीम कोर्ट के समता एवं नियमगिरि जजमेंट का उल्लंघन है। यहां ग्रामसभा से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? क्या गांव वाले सवाल नहीं उठाते हैं? क्या बड़े पैमाने पर हो रहे गैर-कानूनी उत्खनन के बारे में सरकार को नहीं पता? इनमें से कुछ सवालों का जवाब हमें बहुत जल्द ही मिल जाता।   

गांव वाले बताते हैं कि 25 दिसंबर 2018 की रात यानी हमारे गांव पहुंचने से सिर्फ तीन दिन पहले ग्यारह माओवादी लड़ाके विद्यालय के पास स्थित खनन कंपनी के दफ्तर में पहुंचे थे। उनके लिए देसी मुर्गा पकाया गया था। वे खाना खाने के बाद निकल पड़े। गांव वालों ने हमें बताया कि वे पास के ही जंगल में हैं और हमारे मौजूदगी के बारे में उनको खबर मिल चुकी है। यदि हम उनके लिए खतरा पैदा करेंगे तो वे हमारे उपर हमला करेंगे। जब खनन माफिया और मोआवादियों के बीच इस तरह का गांठजोड़ हो तो कौन व्यक्ति या ग्रामसभा उनके खिलाफ आवाज उठा सकता है? क्या आवाज उठाने वालों को सरकार संरक्षण दे पायेगी? माओवादियों को आदिवासियों का मसीहा बताने वाले बौद्धिक जगत के लोगों के लिए यह एक तमाचा है। ये माओवादी यहां सड़क बनाने नहीं दे रहे हैं। इसलिए असूर आदिवासियों को 20 से 25 किलोमीटर की दूरी बाक्साइट पत्थरों से मुठभेड़ करते हुए गुजरना पड़ता है। माओवादियों को लगता है कि सड़क बनते ही खनन माफिया के साथ उनका गांठजोड़ टूट सकता है। पुलिस कभी भी यहां पहुंच सकती है। उनका सुरक्षित स्वर्ग असुरक्षित हो जायेगा। यहां माओवादियों ने बाक्साइट उत्खनन को उगाही का जड़िया बना दिया है। वे अब गांव के आदिवासियों के साथ बैठक नहीं करते हैं बल्कि उनकी बैठक खनन माफिया के साथ होती है। अब आप ही समझ लीजिये के वे किनके लिए लड़ रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वे असूरों के लिए नहीं लड़ रहे हैं बल्कि अपना पाकेट भर रहे हैं और पूंजीपतियों का भला कर रहे हैं।

अब गांव के आदिवासियों की आजीविका पर सवाल खड़ा हो गया है क्योंकि खेती लायक टांड को बाक्साइट उत्खननकर बर्बाद कर दिया गया है। अभी जंगलों के बीच और छोटे-छोटे टिल्हों पर खुदाई की जा रही है। लेकिन जब खेतों की खुदाई की जायेगी तब लोग क्या करेंगे? एक बार खुदाई हो गई तो खेत खेती करने लायक नहीं रह जायेंगे और प्रति ट्रक मिले 200 रूपये से कितना दिन जिन्दा रहा जा सकता है? यहां के आदिवासी पूर्णरूप से खेती पर ही निर्भर हैं। खेतों में धान के कटे तने और लकड़ी से बनाये गये मचान में मवेशियों के लिए सुरक्षित रखा गया पुआल इस बात के सबूत हैं कि इस वर्ष यहां धान की फसल अच्छी हुई है। यहां के आदिवासी खेती से खुश हैं। अपने दहिने हाथ के अंगली से इशारा करते हुए मेलन असूर बताते हैं कि यदि इन खेतों में बाक्साइट उत्खनन शुरू होता है तो यहां के आदिवासियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इन आदिवासियों के अस्तित्व के बारे में किनको चिंता है? लेकिन हकीकत में यहां कोई भी सुरक्षित नहीं है। आदिवासी, जंगल--पहाड़, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और नदी-झरना सभी का अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है। आदिवासी खनन कंपनियों के द्वारा जंगल, पहाड़ और जमीन से अलग कर दिये गये पत्थरों को बारी का घेरा बनाकर अपनापन का एहसास कराते हैं। 

गांव के बीच घरों से गुजरते हुए आदिवासी बच्चों के मन में बन रही तस्वीर उभर आती है। अब इन बच्चों के चित्रकला में फल-फूल, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी गायब हो चुके हैं। यहां प्रत्येक घर के दिवारों पर बाक्साइट से लदे ट्रक और धरती कोड़ मशीनों की तस्वीर भरी पड़ी है। मन में सवाल उठता है कि क्या अब ये बच्चे अपना भविष्य जमीन को बचाने के बजाय उसे कोड़कर बाक्साइट के रूप में वहां छिपे खजाना को बेचकर पैसा कमाने में देख रहे हैं? मैं सोचता हॅं कि इस क्षेत्र के विद्यालयों में शिक्षक बच्चों को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या पढ़ाते होंगे? क्या वे कभी बाक्साइट उत्खनन का पर्यावरण पर प्रभाव को लेकर बात करते हैं?

हमलोग बाक्साइट के पत्थरों से टकराकर गांव के नीचे ठंढ़ से ठिठुरते हुए झरना के पास पहुंचते हैं। बाक्साइट के पहाड़ों से निकलते हुए झरना का पानी खेतों की ओर बहते हुए नदी में मिल जाती है। नदी का पानी काफी ठंढ़ है। सूखी घास पर पडे ओस के बूंदें बर्फ में तब्दील होकर पूरे इलाके को सफेद चादर की तरह ढाक दिये हैं। नदी का पानी छूने भर से बिजली के करेंट की तरह झटका देते हैं।  गांव के आदिवासी पास के जंगल में शौच करने के लिए जाते हैं और इसी पानी का उपयोग करते हैं।  हम भी उनका ही अनुशरण करते हैं। यहां गांव में किसी के घर में शौचालय नहीं है। हालांकि झारखंड सरकार ने बिशुनपुर प्रखंड को खुले में शौच मुक्त प्रखंड के रूप में घोषित कर दिया है। गांव के लोग कहते हैं कि शौचालय बनाने से भी नीचे से पानी ढ़ोकर कौन यहां लायेगा। खाना बनाने और पीने के लिए लाना ही काफी है। हमारे साथियों को खुल्ले में शौच करते वक्त तस्वीर लेने की मनाही है क्योंकि ये तस्वीर राजसत्ता को असाहय कर सकते हैं और भारतीय मीडिया हमें मोदी विरोधी गैंग साबित करने में अपना वक्त बर्बाद कर सकती है। गांव के आदिवासी बच्चियां और महिलाएं झरना  के पानी में बर्तन धोती हैं और बाक्साइट को गलाकर बनाये गये अल्मुनियम के बर्तन में भरकर खाना बनाने और पीने के लिए सिर में ढोकर ले जाती हैं। इस पानी में काफी मात्रा में मिनरल है। 

इस इलाके में कोई अस्पाताल नहीं है। गांव के लोग बताते हैं कि बीमार पड़ने पर वे बिशनपुर जाते हैं जो गांव से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां जाने के लिए आवागमन की कोई सुविधान नहीं है। इसलिए लोग बाक्साइट के ट्रकों को ही भाड़ा देकर बस की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह ट्रक चालाक और सह-चालाक के उपरी अमदनी का बड़ा स्रोत है। मेलन असूर बताते हैं आवासीय विद्यालय के बच्चे बीमार पड़ते है तो उन्हें उनके माता-पिता को सौप दिया जाता है क्योंकि यहां इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी अस्पताल 40 से 50 मिलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। खनन कंपनियों को विद्यालय या अस्पताल चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। यदि यहां के आदिवासी बाक्साइट पहाड़ों को लादकर ले जाने वाले ट्रकों को रोकते तब उन्हें अपना सामाजिक दायित्व याद आती और वे विद्यालय एवं अस्पताल खोलने का प्रयास करते। लेकिन इन ट्रकों को रोकने की कोई साहस नहीं करता है। इस क्षेत्र में पांच सरकारी आवासीय विद्यालय हैं, जिनमें लड़कों के लिए तीन एवं लड़कियों के लिए दो है। लड़कों के विद्यालयों में छात्रों के लिए संख्या भी ज्यादा निर्धारित किया गया है। यह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं का नारा देने वाली सरकार के द्वारा लिंगभेद का एक अद्भूत नमूना है। आवासीय विद्यालय, जोभीपाट में प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत हुए चैत असूर बताते हैं कि इन विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है, शौचालय की व्यवस्था नहीं है और विद्यालय भवन जर्जर हालत में हैं। वे कहते हैं, ‘‘सिर्फ कागज में ही सबकुछ अच्छा है।’’ 

गांव में बिजली के पोल गाड़े गये हैं और कुछ पोलों को बिजली के तारों से एक-दूसरों को जोड़ा गया है लेकिन कई पोलों के बीच तार टूटे हुए हैं। झारखंड सरकार ने पहले ही घोषणा कर दिया है कि उसने राज्य के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंचा दिया है। भारत के आजादी के 70 साल बाद गांवों में बिजली पहुंचाने की खबरे अखबरों में सुर्खियां बनी सो बनी लेकिन राज्य सरकार ने विज्ञापन में करोड़ों रूपये खर्च कर अखबार और टीवी चैनलों के माध्यम से वोटरों को बताया कि झारखंड के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच दी गई है। अब कौन सा अखबार और टीवी चैनल वाले सच जांचने के लिए गांव जाते हैं? असल में सरकारी विज्ञापन मीडिया घरानों को दिया गया एक तरह का सरकारी रिश्वत है ताकि वे सच्चाई को छुपाकर रखें और सिर्फ विकास का ढोल पीटते रहें। लेकिन सच्चाई को कबतक छुपाया जा सकता है? 
       
आदिवासियत को समझने के लिए जंगल, खेत और जलस्रोतों के पास चिंतन करने, विकास के नामपर बाक्साइट पहाड़ों की लूट का गवाह बनने और गांव के विकास की हकीकत देखने के बाद अगले दिन हमलोग असूरों की दुनियां को छोड़कर लौटने लगे। ट्रकों के आवागमन से सड़क लाल दिखाई देने लगा। नियमतः सड़क पर पानी डालना है ताकि धूलकण हवा में न उड़े लेकिन यहां नियम लागू करने वाले ही नियमों को तोड़ते हैं। बाक्साइट के धूलकण से सखुआ के हरे पत्ते लालरंग में तब्दील हो गए हैं। ये धुलकंण हवा के द्वारा मनुष्य और जानवरों के फेफड़ों में जमा हो रहे हैं। यहां मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे सभी सांस लेने की परेशानियों को झेल रहे हैं। हमलोग टुटवामोड़ पहुंचते हैं। मन में प्रश्न उठता है कि शक्तिशाली भारतीय सेना की टुकड़ी को इसी मोड़ से कई बार वापस भेजने वाली आदिवासियों की शक्ति, बाक्साइट लदे ट्रको को रोकने में असफल क्यों है? कई दशकों से बाक्साइट के पहाड़ों को बेचने वाली सरकार और निजी कंपनियां यहां के आदिवासी, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं? क्या पहाड़ों को बेचना ही विकास है? क्या खेती की जमीन को खंडहरों में तब्दील करना विकास हैं? क्या यह विकास असूर आदिवासियों को नहीं चिढ़ा रहा है? 

मुंडा दिसुम के मौलिक सवाल?

 ग्लैडसन डुंगडुंग

3 दिसंबर 2018। चुकलू हातु में सनाटा पसरा हुआ है। यह मुंडा आदिवासियों का गांव है, जो झारखंड के खूंटी जिले में जंगल के अंदर स्थित है। सरकारी भाषा में यह सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। यहां प्रकृति का अद्भुत दृश्य है। दूर से सिर्फ घुमावदार जंगल दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जंगल के बीच में गांव है। खेतों में पके धान के पीले पौधे प्रकृति की खुबशूरती में चार चांद लगाते हैं। हवा शुद्ध है, पानी शुद्ध है और लोग भी। लेकिन औद्योगिकरण के प्रभाव से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने यहां भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस वर्ष समय पर बारिश नहीं होने से उपरी सतह के कई खेतों में धान के पौधे सूख गए हैं, उनमें अनाज नहीं है सिर्फ पुआल बचा हुआ है, जो मवेशियों के चारा का काम आयेगा। लेकिन अधिकांश गहरे खेतों में धान की फसल अच्छी हुई है। जीवन में ऐसा द्वंद अक्सर दिखाई पड़ता है। यह कटनी का समय है। सुबह से मुंडा आदिवासी अपने-अपने खेतों में धान काटने में व्यस्त हैं। मन में सवाल उठता है कि धान काटना छोड़कर सभा में शामिल होने कौन आयेगा?  

लेकिन दोपहर होते-होते आस-पास के 15 गांवों के आदिवासी अपनी पीड़ाओं को लेकर चुकलू हातु के अखड़ा में ईमली पेड़ों के नीचे आकर बैठ जाते हैं। यही मुंडा आदिवासियों की खासियत भी है। वे अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए तत्पर रहते हैं। मुंडाओं को लड़ाकू माना जाता है। अखड़ा के एक हिस्से में दो बड़े-बड़े टेबलनुमा पत्थर गाड़े गये हैं, जहां गांव एवं यहां के रैयतों के बारे में जानकारी स्पष्टरूप से लिखा हुआ है। यह गांव का खतियान है, जिसे राजसत्ता भयभीत है क्योंकि वह इस इलाके को कबजाकर पूंजीपतियों को सौपना चाहता है। लेकिन दीवार की तरह खड़े ये निर्जीव पत्थर मुडाओं को उलगुलान का हौसला देते हैं। ये याद दिलाते हैं कि इनके पूर्वजों के खून-पसीना इस मिट्टी से सने हुए हैं, जिसे बचाकर आने वाली पीढ़ी को सौपना इनका फर्ज है। इसलिए मुंडा आदिवासी अपनी जान की परवाह किय बगैर राजसत्ता को चुनौती देते रहते हैं। 

आमसभा की शुरूआत करते हुए गांव के बिरसा हंस दुरंग करते हैं - ‘‘अबु आदिवासी मुंडा को संगबोंगा कबु बागीया, हठि-कुठि राड़ी-बाड़ी जाति को ओते हासा को रेओं जद बुआ।’’ (हम आदिवासी मुंडा लोग सिंगबोंगा को नहीं छोड़ेगें, दिकु हमारी हमीन को लूट रहे हैं।) यह दुरंग बिरसा उलगुलान के समय का है लेकिन आज की हकीकत से पूर्णरूप से मेल खाता है। इसलिए मुंडाओं ने इसे अपने हृदय से लगाकर रखा है। बिरसा उलगुलान का मतलब उन्हें समझाने की जरूरत नहीं होती है। वे जानते हैं की उन्हें अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए अंतिम सांस तक लड़ते रहना होगा।   

125 साल पहले दिकुओं ने मंडा आदिवासियों की जमीन को कई हथकंडे अपनाकर लूटा था तब यह दुरंग गढ़ा गया था। बिरसा उलगुलान के प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू किया रैयतों की जमीन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन सत्ताधीशों ने इस कानून को ईमानदारी से लागू नहीं किया। इसलिए आदिवासियों की जमीन लूट आज और भी ज्यादा भयावह होता जा रहा है। इसी बीच एक युवा उठ खड़ा होता है। वह काफी गुस्से में है। वह ओजस्वी स्वर में सवाल उठाता है, ‘‘झारखंड सरकार ने हमारे गांवों की सामाजिक जमीन, सरना स्थल और जंगल-झाड़ की जमीन को लैंड बैंक में क्यों डाला है? यह ग्रामसभा की जमीन है तो फिर सरकार को इसकी इजाजत किसने दी? क्या सरकार के पास यह अधिकार है? हमारी जमीन कैसे बचेगी?’’ ऐसा ही सवाल प्रत्येक गांव के लोग पूछते हैं। क्या राजसत्ता इन्हें इन सवालों का जवाब दे सकता है?   

मुंडा दिसुम अब शांत प्रतीत होता है लेकिन मुंडाओं के अंदर असंतोष की आग धधक रही है जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह। सरकार ने पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का उपयोग कर जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक का दावा करने वाले अगुओं को जेलों में बंद कर दिया है देशद्रोह का आरोप लगाकर ठीक उसी तरह जिस तरह से अंग्रेज सरकार ने धरती आबा बिरसा मुंडा को जेल में बंद कर दिया था। अब यहां कोई भी सभा सरकार के इजाजत के बिना करना गुनाह है। सरकार से आदेश लेने के बावजूद इस आमसभा में भी सीआपीएफ के एक दिकु आफिर तीन आदिवासी जवानों के साथ आ धमके। वे लोगों के बातों को गौर से सुनते रहे ताकि उन्हें देशद्रोही घोषित कर सके लेकिन इस बार उन्हें खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि मुंडाओं ने इस सभा में सिर्फ अपने संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों को सख्ती से लागू करने की बात की।   

मुंडा दिसुम को पुलिस छवनी में बदल दिया गया है। विडंबना यह है कि यहां प्रत्येक पांच किलोमीटर की दूरी पर अर्द्धसैनिक बलों का एक स्थायी कैंप है। लेकिन बीमार पड़ने पर इलाज करने के लिए मुंडा आदिवासियों को 40 से 50 मिलोमीटर की दूरी तय कर सरकारी अस्पताल जाना पड़ता है जहां सही इलाज और दवा की गारंटी भी नहीं है क्योंकि सरकारी अस्पताल खूद बीमार पड़े हैं। भारत के लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले सतर वर्षों में इस क्षेत्र में एक अच्छी सड़क तक नहीं दिया है। गडढ़े और बोल्डरों का सामना करते हुए लोग किसी तरह अपना गंतब्य स्थानों में पहुंचते हैं। विद्यालय पुलिस कैंप में तब्दील हो चुके हैं। कई स्कूलों में बच्चें कैंप के अंदर ही पढ़ते हैं। उन्हें प्रतिदिन बंदूकों का सामना करना पड़ता है। वे खिचड़ी खाते हैं। इस क्षेत्र में एक भी उच्च विद्यालय नहीं है इसलिए बच्चों को आगे की पढ़ाई करने के लिए 30 से 40 मिलोमीटर की दूरी तय करना होता है, जो साईकिल से संभव नहीं है। इसलिए अधिकांश बच्चे विद्यालय जाना छोड़ देते हैं। निश्चितरूप से ये बच्चे भारत देश के भविष्य नहीं हैं।  

झारखंड सरकार ने इस क्षेत्र के ग्रामसभाओं को सरकारी ग्रामसभा में तब्दील कर दिया है। इसके लिए हातु मुंडा को एक हजार रूपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। असल में यह वेतन नहीं आदिवासियों की जमीन लूटने में मदद करने के लिए राजसत्ता के द्वारा दिया गया घुस है वरना आज तो मजदूर भी प्रतिमाह पांच से आठ रूपये कमाते हैं। यहां सरकार ही कानूनों का कत्ल करती है लेकिन मुंडाओं को देशद्रोही बताकर जेल में डालती है। 23 अक्टूबर 2018 को अड़की के अंचलाधिकारी ने कुरूंग और कोचंग गांवों में ग्रामसभा का आयोजन करने का फरमान जारी किया। आदेश-पत्र में लिखा था कि कुरूंग एवं कोचांग गांवों में सामुदायिक भवन निर्माण हेतु पुलिस अधीक्षक, खूंटी से अधियाचना प्राप्त हुआ है, जिसके लिए दोनों गांवों में 2.47-2.47 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसलिए उक्त योजना हेतु इन गांवों में 29 एवं 30 अक्टूबर को ग्रामसभा आयोजित है, जिसमें सभी सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है।  

भूमि अधिग्रहण को लेकर उक्त गांवों लोग सवाल उठा रहे हैं कि ग्रामसभा के आयोजन का आदेश अंचलाधिकारी कैसे दे सकते हैं? कौन से कानून के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है? गांवों के विकास का काम कब से पुलिस अधीक्षक के हाथों में सौपा गया है? यदि विकास का काम पुलिस अधीक्षक देखेंगे तो जिला के उपायुक्त क्या करेंगे? जब दोनों गांवों में सामुदायिक भवन पहले से मौजूद हैं फिर सामुदायिक भवन किसके लिए बनाना है? 2.47 एकड़ जमीन में किस तरह का सामुदायिक भवन बनेगा? झारखंड मं इतना बड़ा सामुदायिक भवन नहीं है। गांव का सामुदायिक भवन के लिए 10 से 15 डीसमील जमीन काफी है। लेकिन अंदर की बात यह है कि सामुदायिक भवन के नामपर जमीन का अधिग्रहण कर दोनों गांवों में स्थायी पुलिस कैंप बनाने की योजना है इसलिए पुलिस अधीक्षक ने अंचलाधिकारी को अधिसूचना भेजा है। पुलिस कैंप बनाने के लिए सरकार को जमीन नहीं मिल सकता है इसलिए आदिवासियों को अंधेरा में रखकर जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है।  

लेकिन सरकार की असली मांशा को समझकर मुंडा लोग जमीन नहीं देना चाहते है इसलिए पुलिस अपनी शक्ति का प्रयोग कर रही है। 29 अक्टूबर 2018 को कोचांग के हातु मुंडा सुखराम सोय को खूंटी पुलिस ने खूंटी बाजार में चाय पीते समय उठा लिया और थाना में कई घंटो तक रखा। पुलिस पदाधिकारियों ने उन्हें धमकाया कि यदि वे जमीन अधिग्रहण वाले दस्तावेज में दस्तखत नहीं करते हैं तब उसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। उन्हें ‘पत्थलगड़ी’ के केसा में फंसाकर जेल में सड़ा दिया जा सकता है। इसी तरह की धमकी अन्य लोगों को भी मिल रही है। ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन को असंवैधानिक और देशद्रोही कदम बताकर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता एवं कई हातु मुंडाओं को जेल भेज दिया गया है। असल में यह आंदोलन ने ‘भूमि अधिग्रहण’ के लिए खतरा बन चुका था। यह स्पष्ट हो चुका है कि जो आदिवासी अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को सरकार और पूंजीपतियों को देने से इंकार करेगा वह देशद्रोही है। लेकिन मुंडाओं को इसे फर्क नहीं पड़ता है। उनके पूर्व लड़े वे भी लड़ेंगे। 
मुंडा लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पत्थलगड़ी आंदोलन असंवैधानिक था? क्या संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून के खिलाफ ग्रामसभाओं से अनुमति लिये बगैर ग्रामसभाओं की जमीन को लैंड बैंक में डालना असंवैधानिक कार्य नहीं है? क्या अंचलाधिकारी के द्वारा पेसा कानून के खिलाफ ग्रामसभा के आयोजन का आदेश जारी करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या सामुदायिक भवन के नाम पर पुलिस कैंप के लिए जमीन अधिग्रहण करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी नहीं है? क्या उनके इलाके में पुलिस छवनी की स्थापना उनकी सुरक्षा के लिए है या उनकी जमीन लूटने के लिए? क्या राज्यपाल महोदय आदिवासी, उनकी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेगी? आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का हनन करने वाली सरकार देशद्रोही नहीं है तो फिर देशद्रोह का पैमाना क्या है? 

आदिवासी फिलोसिफी से ही बचेगी दुनिया

ग्लैडसन डुंगडुंग

मैं पिछले कुछ वर्षों से निरंतर पश्चिमी देशों का भ्रमण करते हुए यह समझने की कोशिश कर रहा हॅं कि जिन देशों ने प्रगति, विकास एवं आर्थिक तरक्की जैसे शब्दों को गढ़ने के बाद पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद कर सबसे पहले औद्योगिकरण का जाल बिछाया, आधुनिक विकास के पथ पर चला और सीमेंट, बालू एवं लोहा से बने काक्रीट जंगलों को खड़ा किया अब उनकी हालत कैसी है। क्या उन देशों के लोग बहुत खुश हैं? क्या उन्होंने अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचाकर रखा भी है? क्या भविष्य में उनके बच्चे प्रकृति के इस खुबसूरत सृजन को देख पायेंगे? यही आधुनिक विकास ने अबतक करोड़ों वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के अस्तित्व को धरती से मिटा दिया है। आज दुनिया विनाश के मुहाने पर खड़ी है। धरती, वन्यजीवन एवं मानव सभ्यता का अस्तित्व दांव पर लग हुआ है। कहीं ग्लोबल वार्मिंग तो कहीं ग्लोबल कूलिंग का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। इस जलवायु परिवर्तन ने विकसित देशों को चिंता में डाल दिया है। ऐसी परिस्थिति में धरती को कैसे बचाया जा सकता है? क्या कोई विज्ञानिक है जो इस काम को कर सकता है? प्रकृति, वन्यजीवन एवं मानव के सह-अस्तित्व की वकालत करने वाली आदिवासी फिलोसोफी को छोड़कर कोई दूसरा रास्ता बचा भी है?      

यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारे देश में भी गंभीर चिंतन के बगैर ही पश्चिमी देशों का नकल करते हुए आधुनिक विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद कर काक्रीट जंगल खड़ा करने का काम बड़ी तेजी से निरंतर चल रहा है। फलस्वरूप, देश में बड़ी तेजी से वायु, जल एवं घ्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण पर चर्चा जरूर होती है लेकिन धरती को क्षति पहुंचाने वाले इस विकास प्रक्रिया के खिलाफ प्रकृति के साथ जीने वाले आदिवासियों को पिछड़ा, जंगली, बोका, अनपढ़ एवं विकास विरोधी कहा जाता है। जबकि देश में प्राकृतिक संसाधन आदिवासियों के प्रतिरोध की वजह से ही सुरक्षित है। जब आदिवासी प्रतिरोध करना बंद कर देंगे तब जंगल खंडहरों में तब्दील हो जायेंगे क्योंकि कारपोरेट जगत को सिर्फ मुनाफा कमाने से मतलब है। भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जिनका मौलिक कार्य वन एवं पर्यावरण की सुरक्षा है, ने अक्टूबर 1980 से जुलाई 2016 तक 8,97,698.40 हेक्टेअर वनक्षेत्र को विकास के नामपर उजाड़ने की अनुमति दे दी और 40,000 हेक्टेअर अतिरिक्त वनक्षेत्र को कारपोरेट जगत को सौपने की तैयारी में जुटी हुई है जबकि देश में मात्र 21 प्रतिशत वनक्षेत्र बचा हुआ है, जो पर्यावरण के लिए निर्धारित न्यूनतम मानक से 12 प्रतिशत कम है।   

यह हास्यास्पद ही है कि सूचना क्रांति के इस दौर में भी शासक वर्ग आधुनिक विकास माडल के सिर्फ एकपक्ष से दुनिया को रू-ब-रू कराता है। आधुनिक विकास के नाम पर किये गये प्रकृति का विनाश, वन्य-जीवन की बर्बादी और आदिवासियों की तबाही पर चर्चा नहीं की जाती है। विज्ञान एवं टेक्नोलाजी के तरक्की पर वहवाही लूटी जाती है लेकिन उसके नकारात्मक प्रभाव पर चर्चा नहीं होती है चाद पर जाने की शोरगुल है लेकिन वहां जाते समय राके के द्वारा धरती पर छोड़े गये गर्मी और धुंआ के प्रभाव पर चर्चा नहीं होती है। पश्चिमी देशों ने आधुनिक विकास के नामपर किये कुकर्म को रेड कारपेट से ढांककर रखता था। लेकिन प्रकृति अपने नियम के अनुसार चलती है, जिसने समय के साथ दुनिया के सामने इन्हें नंगा कर दिया। अब पश्चिमी देश जलवायु परिवर्तन का रोना रो रहे हैं। पश्चिमी देशों ने आधुनिक विकास के नामपर पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को उजाड़कर एवं जंगलों को बर्बाद करते हुए बड़े-बड़े इमारत खड़े किये, जिससे विकास मान लिया गया। 

लेकिन आज फ्रांस जैसे कई देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ की पहाड़ी पिछलकर खत्म हो रहा है। पेरिस जैसे शहरों में न पेड़ दिखाई पड़ते हैं, न बरसात में मेंढ़कों का टर्राना सुनाई देता है और न ही सुबह-शांम पक्षी चहचहाते दिखाई पड़ते हैं। यहां का तापमान बढ़ने से लोग चिंतित हैं। पश्चिमी देशों के विकसित शहर अब शमशान या कब्रगाह जैसा विरान लगने लगे हैं। ऐसा लगता है कि अंधाधुंध विकास की दौड़ में इन शहरों को विकसित करते समय अपने वाले पीढ़ियों के लिए ठीक से सोचा नहीं गया। यह मूलतः आधुनिक विकास और मुनाफा आधारित आर्थिक माडल की देन है, जिसे नाकारना बहुत मुश्किल है। क्या आनेवाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों को नहीं कोसेंगे? इसी को ध्यान में रखकर आदिवासी अपने आने वाले कई पीढ़ियों के बारे में सोच-विचार कर कोई कदम उठाते हैं। वे प्रकृति, वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के अस्तित्व को अपने अस्तित्व के लिए जरूरी मानते हैं।        

आदिवासी भाषाओं में ‘लाभ, मुनाफा, लालच, शोषण एवं दोहन’ जैसे शब्द नहीं हैं। इसलिए वे न मुनाफा कमाने के लिए सोचते हैं, न किसी का शोषण करते हैं और न ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन। बल्कि वे प्रकृति के साथ जीते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं। आदिवासी जंगलों के अंदर रहते हैं, जंगलों की सुरक्षा करते हैं और वनोपज से अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते हैं न कि वे पूरा जंगल को ही काटकर रख लेते हैं। लेकिन स्वयं को मुख्यधारा, सभ्य, शिक्षित, विकसित एवं आधुनिक घोषित कर चुका गैर-आदिवासी समाज के शब्दकोष में ‘लाभ, मुनाफा, लालच, शोषण एवं दोहन’ शब्द मौजूद हैं। इसलिए यह समाज सिर्फ मुनाफा कमाकर अपनी लालच को पूरा करने के लिए एक-दूसरे का शोषण एवं प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन करता है। मुनाफा पर आधारित अर्थव्यवस्था एवं आधुनिक विकास ने दुनिया को तबाही की दिशा में लाकर खड़ा कर दिया है। दुनिया के महान वैज्ञानिक स्टेफन हाकिंग ने दुनिया छोड़ने से पहले कहा कि हमने धरती को तबाह करने के लिए बहुत कुछ अविष्कार किया है लेकिन धरती को बचाने के लिए एक भी नहीं। क्या कोई वैज्ञानिक है जो गर्म हो रही धरती को ठंढ़ा करने का मशीन बना सकता है? 

अब पश्चिमी देशों में हो रहे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में चर्चा चल रहा है कि धरती, वन्यजीवन और मानव सम्यता को बचाने के लिए आदिवासियों के जैसा जीना पड़ेगा यानी प्रकृति से प्यार करना, उसकी रक्षा करना और उसके साथ जीना। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करना न कि इसका दोहन करना। इतना ही नहीं मैंने देखा है कि लंदन में रहने वाले 25 समृद्ध परिवारों ने अपनी पूरी सम्पति बेचकर वेल्स नामक छोटे से देश में 175 एकड़ जंगल खरीदकर जंगल के अंदर छोटा-छोटा घर बनाकर रह रहे हैं। वे कहते हैं कि आधुनिक विकास पागलपन है। इससे दुनिया बर्बादी को ओर जा रही है। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि धरती को बचाने के लिए पेड़-पौधो, पहाड़ों और जंगलों से प्यार करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आदिवासी समाज उत्पत्ति से यही कर रहा है। दुनिया को आदिवासी समाज से अभी बहुत-कुछ सीखना बाकी है क्योंकि आदिवासी फिलोसोफी को छोड़कर दुनिया को बचाने का दूसरा रास्ता ही नहीं बचा है।      

क्या अर्जुन मुंडा अब क्रांतिकारी बन गये हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखंड सरकार के द्वारा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अनुपूरक अधिनियम 1949 में किये गये संशोधनों के खिलाफ उठे जनाक्रोश में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी शामिल होते हुए दिखाई पड़े थे। उन्होंने भारत मुंडा समाज के कई आयोजनों में अपनी ही सरकार के मंशा पर सवाल उठाया। इतनी ही नहीं उन्होंने सीएनटी/एसपीटी संशोधन को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को सात पेज का एक लंबा पत्र लिखकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया। उनके द्वारा कई मंचों पर उठाये गये प्रश्नों एवं इस पत्र को पढ़ने से ऐसा लगता है कि अब वे क्रांतिकारी हो गये हैं। उन्हें आदिवासियों की चिंता है। वे आदिवासियों की जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना चाहते हैं। वे आदिवासी समाज की सुरक्षा चाहते हैं। लेकिन क्या यह बदलाव स्थायी या सिर्फ दिखावा है? क्या यह बदलाव पिछले चुनाव में हार की वजह से हुई है? क्या आदिवासी समाज का भावनात्मक उपयोग कर राजसत्ता हासिल करने के लिए यह बदलाव है? 

ऐसे प्रश्न उठना लाजमी है क्योंकि झारखंड के मुंख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में अर्जुन मुंडा ने जो आदिवासी विरोधी काम किया है उसे उनपर इतना जल्दी विश्वास नहीं किया जा सकता है। इसे गंभीरता से समझने के लिए 2 दिसंबर 2016 को उनके द्वारा झारखंड के मुंख्यमंत्री रघुवर दास को लिखे गये पत्र के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गौर करना होगा। वे लिखते हैं कि ‘आज आदिवासियों के मन में कई सवाल कौंध रहे हैं। क्या भगवान बिरसा के अलगुलान के बाद आजादी पूर्व अंग्रेजों द्वारा बनाये सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर मिले अधिकारों व संरक्षण को अपने देश की सरकार ही उनसे छीन लेगी?’’ उन्होंने अपनी बातों पर वजन डालने के लिए धरती आबा बिरसा मुंडा का सहारा लिया। लेकिन उन्होंने अपने शासन काल में उलगुलान की धरती को ही मित्तल कंपनी के पास गिरवी रखने की पूरी कोशिश की थी। क्या अर्जुन मुंडा यह भूल गये कि कैसे उन्होंने मुंडा दिसुम को मितल नगर बनाने के लिए लंदन गये थे? मितल कंपनी के जिस 12 मिलियन टन स्टील उत्पादन करने के लिए लगभग 1000 एकड़ जमीन की जरूरत थी लेकिन अर्जुन मुंडा ने 25,000 एकड़ जमीन और 20,000 क्यूबिक पानी प्रतिदिन देने के लिए एम.ओ.यू. किया था और उस एम.ओ.यू. को अपने एक वर्ष के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बतायी थी। क्या अर्जुन मुंडा को तब बिरसा भगवान याद नहीं आये थे?      

अर्जुन मुंडा ने अपने पत्र में सबसे बड़ा सवाल उठाते हुए लिखा है, ‘‘क्या सरकार आदिवासियों की जमीन छीनना चाहती है? यह सवाल अर्जुन मुंडा को खूद अपने घेरे में लेने के लिए काफी है क्योंकि जब उन्होंने मितल कंपनी के साथ एमओयू किया तब उस मुंडा दिसुम के लोग गोलबंद होकर निरंतर प्रतिरोध करते रहे। लेकिन उन्होंने आदिवासियों की आवाज को कभी सुनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने आंदोलनकारियों के साथ एक बार भी वार्ता नहीं किया बल्कि मितल कंपनी के लिए आदिवासियों की 25,000 एकड़ जमीन छीनने के लिए पुलिस एवं प्रशासन को लगा दिया। आज अर्जुन मुंडा किस मुंह से बोल रहे हैं कि झारखंड सरकार आदिवासियों की जमीन छीनना चाहती है? 

उन्होने अपने पत्र में संविधान की पांचवीं अनुसूची का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘पांचवीं अनुसूची में ‘‘राज्यपाल होता है न कि मंत्री-परिषद्। इतना ही नहीं उन्होंने आदिवासी सलाहकार परिष्द, पेसा कानून 1996, समता जजमेंट 2007 एवं भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थान कानून 2013 का जिक्र किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उन्होंने अपने कार्यकाल के समय मितल कंपनी से एमओयू करने से पहले राज्यपाल, आदिवासी सलाहकार परिषद् और ग्रामसभाओं से सलाह-मशविरा किया था? जब ग्रामसभाओं ने मितल कंपनी के प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया तब उन्होंने ग्रामसभाओं की बात क्यों नहीं माना? 

अर्जुन मुंडा अपने पत्र के अंत में लिखते हैं कि ‘नए संशोधनों से आदिवासियों के शोषण और विस्थापन मे अप्रत्याशित बढ़ोतरी की प्रबल आशंका बनती है। यदि ऐसा हुआ तो वे अपने अधिकारों से वंचित हो कर जीवनयापन के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो जाएंगे। यह न केवल आपका नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है बल्कि आपकी व्यक्तिगत जिम्मवारी भी है कि आप आदिवासियों के पहली पंक्ति के संरक्षक बनकर उनके साथ खड़े रहें और यह सुनिश्चित करें कि झारखंड सरकार की नीतियां और कार्य संविधान सम्मत हो।’’ उपरोक्त पक्तियों को पढ़ने से कोई भी क्या अर्जुन मुंडा आदिवासियों के अंतिम पंक्ति के संरक्षक बने थे इसलिए मुंडा दिसुम को मितल कंपनी के हवाले कर दिया था? क्या आदिवासियों की 25,000 एकड़ जमीन मितल कंपनी को देकर अर्जुन मुंडा किस तरह से आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण कर रहे थे? क्या मितल के परियोजना से आदिवासी शोषित और विस्थापित नहीं होते? क्या मितल कपनी के परियोजना से विस्थापित होने वाले लाखों आदिवासी पलाचन करने को मजबूर नहीं होते? किस नैतिक एवं संवैधानिक जिम्मेवारी के तहत अर्जुन मुंडा ने आदिवासियों को विस्थापित करने वाली इतनी बड़ी परियोजना को स्वीकृति प्रदान की थी? क्या यह अर्जुन मंडा का संवैधानिक सम्मत कार्य था?

अर्जुन मुंडा न कभी क्रांतिकारी थे और न ही वे कभी क्रांतिकारी हो सकते हैं। अर्जुन मुंडा के क्रांतिकारी बनने के पीछे असली मकसद है आदिवासियों को एक सीढ़ी की तरह उपयोग कर सत्ता हासिल करना। झारखंड में देश का 40 प्रतिशत खनिज सम्पदा होने एवं औद्योगिक घरानों के साथ सैकड़ों एमओयू करने के बावजूद राज्य के पिछले एक दशक से कोई बड़ा कंपनी का परियोजना स्थापित नहीं हो पाया था। इसी को मद्देनजर रखते हुए कारपोरेट जगत एवं भाजपा ने राज्य में गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक षड्यंत्र रचा था। अर्जुन मुंडा एक कदावर नेता हैं, जिनके रहते भाजपा एक गैर-आदिवासी को मुंख्यमंत्री बनाने की हिम्मत नहीं कर सकती थी। इसलिए पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें एक षड्यंत्र के तहत हराया गया। मोदी लहर में भाजपा के अधिकांश नेता चुनाव जीत गये लेकिन अर्जुन मुंडा चुनाव हार गये क्योंकि भाजपा के लोगों ने विपक्ष के उम्मीदवार को वोट दिया। जब यह बात अर्जुन मुंडा को पता चला तब उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। अब उनको एहसास हो चुका है कि यदि उन्हें सत्ता तक पहुंचना है सिर्फ आदिवासियों पर भरोसा करना होगा। सीएनटी/एसपीटी संशोधन का मामला उन्हें आदिवासियों के करीब लायेगा और वे इसी का फायदा उठाने के लिए क्रांतिकारी बनने की कोशिश में जुटे हुए हैं।     

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

आदिवासियों के लिए विनाश है औद्योगिक विकास

- ग्लैडसन डुंगडुंग -

झारखंड की राजधानी रांची स्थित ‘खेलगांव’ में 16-17 फरवरी, 2017 को ‘मोमेंटम झारखंड’ के अन्तर्गत आयोजित ‘ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट’ के मद्देनजर राज्य में एक बार फिर से ‘औद्योगिक विकास’ का तूफान आ खड़ा हुआ था। राज्य के चारों तरफ ‘औद्योगिक विकास’ पर चर्चाओं का बाजार गर्म था। कोई बोलता, ‘‘झारखंड बदल रहा है’’ तो कोई कहता, ’‘देश बदल रहा है’’। ‘विकास’ के इस शोरगुल के बीच हमलोग भी ‘विकास’ देखना चाहते थे। लेकिन रांची में नहीं जहां सरकारी खजाना में जमा आम-जनता के टैक्स का 300 करोड़ रूपये को देश-विदेश से आये 11,000 पूंजीपतियों के आगवानी और उनको विकास दिखाने के लिए पानी की तरह बहाया गया। बल्कि हमलोग सिंहभूम में विकास देखना चाहते थे जहां देश के औद्योगिक विकास की नीव पड़ी थी। यह वही इलाका है जहां ‘हो’, ‘भूमिज’ और ‘मुंडा’ आदिवासी लोग रहते हैं तथा लौह-अयस्क का आकूत भंडार है। विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर एशिया का सबसे बड़ा सखुआ के जंगला को उजाड़कर और पहाड़ों को खोदकर यहां प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रूपये मूल्य का लौह-अयस्क का उत्खनन किया जाता है। लेकिन यहां रहने वाले आदिवासी लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जुझ रहे हैं। मन में कई सवाल उठता है। यह कैसा विकास है? किसके लिए विकास? और विकास की कीमत कौन चुका रहा है?  

28 मार्च 2017 को इंग्लैड के ससेक्स विश्वविद्यालय के पर्यावरण इतिहासकार प्रोफेसर विनिता दामोदरण, जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर रोहन डिसूजा और मैं ‘विकास’ की खोज में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले स्थित सारंडा जंगल की ओर निकल पड़े। पोड़ाहाट से लेकर सारंडा तक पूरे जंगल में आग लगा हुआ था। लेकिन इस आग को बुझाने वाला कोई नहीं दिखा क्योंकि शायद यह आग वन विभाग के पदाधिकारियों ने ही लगाया था। अब वन विभाग प्राकृतिक जंगलों को नष्ट कर सागवान का जंगल लगा रहा है, जिससे आदिवासी, वन्यजीवन और जैवविविधता तबाह हो जायेंगे। कम्पा कानून 2016 के तहत वृक्षारोपन के लिए केन्द्र सरकार ने झारखंड सरकार को 399 करोड़ रूपये दिया है। वन विभाग ने प्राकृतिक जंगलों को जलाकर नष्ट करने के बाद इस पैसे से सागवान का जंगल लगाने का काम भी कहीं-कहीं शुरू किया गया है। आदिवासी, जैवविविधता और पर्यावरण से सारोकार रखने वालों के लिए यह दर्दनाक खबर है। लेकिन यही आधुनिक विकास है, जहां आदिवासी, वन्यजीवन, पर्यावरण, जैवविविधता और प्राकृतिक जंगलों के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि ये पिछड़ेपन के द्योतक माने जाते हैं। आजकल आक्सीजन पार्क में टहलना, बोतल में बंद पानी खरीदकर पीना और चौमिन खाना विकास है। क्या हमलोग कभी यह सोचते हैं कि कैसे खुबसूरत प्रकृति को हम अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए बर्बाद कर रहे हैं? 

एक लंबा सफर तय करने के बाद हमलोग नोवामुंडी पहुंचे जहां झारखंड आंदोलन के एक क्रांतिकारी युवा नेता मंगल सिंह बोबोंगा, गितिलोर के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम एवं मेरालगड़ा के मुंडा जयराम बारजो हमारा इंतिजार कर रहे थे। स्वागत-परिचय का रस्म पूरा करने के बाद हम लोगों ने मिलकर सारंडा जंगल, आदिवासी और सिंहभूम में औद्योगिक विकास का इतिहास छानने की कोशिश की। आदिवासी समाज के पारंपरिक नेतृत्वकर्ता - मुंडा, मानकी या पाहन स्वंय में इतिहास की पोथी हैं। उनके पास कलम, कापी और पोथी शायद ही होता हैं लेकिन जब वे बोलना शुरू कर देते हैं तो उस क्षेत्र का सम्पूर्ण इतिहास को सामने लाकर रख देते हैं। इन लोगों ने भी हमें यहां के इतिहास से रू-ब-रू करवाया। सारंडा का अर्थ है ‘सात सौ पहाड़ों का जंगल’ जो 860 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एशिया का सबसे बड़ा सखुआ का जंगल है। नोवामुंडी का अर्थ भी पहाड़ है जो सारंडा जंगल के सात सौ पहाड़ों में से एक था, लेकिन लौह-अयस्क उत्खनन के कारण अब यह एक छोटा शहर में तब्दील हो चुका है। यहीं से देश में खनन और औद्योगिक विकास की शुरूआत हुई थी। 

ऐसा माना जाता है कि ‘हो’, मुंडा और ‘भूमिज’ लोग एक ही समूह से आते हैं जो सिंहभूम के प्रथम निवासी हैं। सारंडा वनक्षेत्र सिंहभूम का ही एक हिस्सा है जहां मूलतः ‘हो’ और ‘मुंडा’ आदिवासी लोग रहते हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 125,000 है। ये लोग इन पहाड़ों के बीच-बीच में समतल जगहों पर खेती करते है और गांव बसाकर सदियों से रह रहे हैं। लौह-अयस्क की खोज में इस इलाके का भ्रमण करते समय ‘हो’ आदिवासियों को लोहा से बना कुल्हाड़ी का उपयोग करते हुए देखकर भूगर्भ-वैज्ञानिक आश्चर्य चकित थे। उन्होंने इन आदिवासियों से पूछा कि यह लोहा उन्हें कहां से मिला? जवाब में आदिवासियों ने नोवामुंडी पहाड़ की ओर इशारा किया। और जब ये भूगर्भ-वैज्ञानिक नोवामुंडी पहाड़ पर गये तो उन्हें लौह-अयस्क का आकूत भंडार मिल गया जिसकी वे खोज में थे। लेकिन आदिवासियों का यह इशारा उनके लिए ही विनाश का कारण बन गया। टिस्को कंपनी जो अब टाटा स्टील लिमिटेड के रूप में जाना जाता है यहां लौह-अयस्क का उत्खनन शुरू किया, जिसके लिए कंपनी ने आदिवासियों को मुआवजा दिये बगैर ही उनकी जमीन और घर-बारी से बेदखल कर दिया। 

उद्योगपति जमशेद नासरवान टाटा ने कई देशों के अपने व्यापारिक भ्रमण के दौरान भारत में एक अत्याधुनिक ‘आयरन एवं स्टील’ कंपनी बनाने का सपना संजोया। भारत लौटने के बाद उन्होंने वर्तमान झारखंड राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले स्थित कालीमाटी नामक गांव में इंटिग्रेटेड स्टील प्लांट लगाने की योजना बनायी। इसी बीच जर्मनी यात्रा के दौरान 19 मार्च 1904 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनके सपने को पूरा करने के लिए उनके बेटे दोराबजी टाटा ने 26 अगस्त, 1907 को इंडियन कंपनी एक्ट 1882 के तहत ‘टाटा आयरन एवं स्टील कंपनी लिमिटेड’ (टिस्को) की स्थापना की। इस तरह से टिस्को ने 1907 में टाटा स्टील एवं 1911 में टाटा पावर की स्थापना की। कंपनी ने इसके लिए कालीमाटी और साकची के आप-पास के आदिवासियों का 24 गांवों को कब्जा किया, जहां भूमिज, हो एवं संताल आदिवासी निवास करते थे। आदिवासियों को अपनी जमीन, घर और बारी से बेदखल होना पड़ा लेकिन उन्हें मुआवजा के रूप में कुछ नहीं दिया गया। बल्कि उल्टे टिस्को जमींदार बनकर इन आदिवासियों से उनकी बची-खुची खेती की जमीन का लगान वसूलता था। 

इसी बीच 1925 में टिस्को ने नोवामुंडी में लौह-अयस्क का उत्खनन कार्य शुरू करने की प्रक्रिया प्रारंभ किया। गितिलोर के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम बताते हैं कि 1927 में टिस्को कंपनी ने लौह-अयस्क उत्खनन के लिए तीन गांवों - चिरूबेड़ा, बालीजोर एवं कोड़ता के आदिवासियों को विस्थापित करते हुए उनकी खेती की जमीन, घर और बारी को कब्जा कर लिया लेकिन उन्हें एक पैसा भी नहीं दिया। वे लोग आज भी मुआवजा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये विस्थापित आदिवासी लोग अपने गोत्र के मुंडाओं एवं संबंधियों के सहयोग से गितिलोर, डुकासाई, मसरीबेड़ा, मुर्गा एवं मेरालगड़ा में बस गये। इन विस्थापितों में से कोड़ता गांव के 10 परिवारों को ‘हेम्ब्रम’ गोत्र के होने के कारण गुंडीजोड़ा गांव के मुंडा रोबड़ो हेम्ब्रम ने गितिलोर में बसाया। ये लोग आज 10 परिवार से बढ़कर 60 परिवार हो गये हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 250 है। वर्तमान में टाटा कंपनी को नोवामुंडी में 1160.06 हेक्टेअर क्षेत्र का खनन लीज मिला है, जिसका कीमत चुकाये बगैर ही कंपनी अरबों रूपये कमा रहा है और आदिवासी लोग विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं। 

मंगल सिंह बोबोंगा बताते है कि टाटा कंपनी के द्वारा कोड़ता गांव में किये गये अधिगृहित जमीन पर ‘हो’ आदिवासियों का पूजास्थल ‘देशाउली’ है। ऐसा माना जाता है कि ‘देशाउली’ में ‘मरांग बुरू’ यानी हो आदिवासियों के भगवान रहते हैं इसलिए किसी भी व्यक्ति को ‘देशाउली’ से एक पत्ता भी लेने की इजाजत नहीं दी जाती है। लेकिन टाटा कंपनी ने ‘देशाउली’ को भी कब्जा कर लिया है, जिसके खिलाफ 2012 में आदिवासियों ने आंदोलन किया। फलस्वरूप, ‘देशाउली’ में पूजा करने हेतु आदिवासियों को घुसने के लिए टाटा कंपनी को गेट खोलना पड़ा। लेकिन टाटा कंपनी आज भी आदिवासियों को ‘देशाउली’ में पूजा करने के लिए वर्ष में सिर्फ एक ही बार घुसने की इजाजत देता है। क्या विकास का माडल कहलाने वाला टाटा कंपनी दूसरे धर्मावलंबियों के साथ भी ऐसा ही सुलूक करता? क्या यह आदिवासियों के धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या टाटा कंपनी आदिवासियों के भगवान के घर को भी कब्जा करने की ताकत रखता है? टाटा कंपनी को किसने यह अधिकार दिया है? क्या टाटा कंपनी को आदिवासियों से माफी नहीं मांगनी चाहिए? 
  
नोवामुंडी में औद्योगिक विकास और आदिवासियों के विनाश का इतिहास से रू-ब-रू होने के बाद हमलोग गितिलोर गांव की ओर चल पड़े क्योंकि हम विकास में उन आदिवासियों की भागीदारी देखना चाहते थे जिन्होंने अपनी खेती की जमीन, घर-बारी और सबकुछ देश के विकास के लिए टिस्को यानी टाटा कंपनी को सौंप दिया था। दिन के लगभग एक बज रहे थे। चाईबासा-नोवामुंडी मुख्यसड़क को छोड़ते ही हमारी गाड़ी गड्ढ़ों से भरे कच्ची सड़क पर हिचगोले खाने लगी। इसी से गांव के विकास की परिकल्पा की जा सकती थी। आजादी के सात दशक और टाटा कंपनी द्वारा इस क्षेत्र में विकास के नाम पर लौह-अयस्क का उत्खनन करते हुए नौ दशक बीत चुके हैं लेकिन जिन आदिवासियों की जमीन पर लौह-अयस्क का उत्खनन हो रहा है उनके गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए एक पक्का सड़क तक नसीब नहीं हुआ है। यह कैसा विकास है? लौह-अयस्क का उत्खनन किसके लिये? क्या विकास का अर्थ सिर्फ पूंजीपतियों को मुनाफा पहुंचाना है?

इसी बीच हम लोग गितिलोर पहुंचे। गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था मानो किसी का देहांत हो गया हो। गांव के एक हिस्से में आम के पेड़ों के नीचे ससानदिरी के पत्थरों पर गांव के कुछ लोग बैठे हुए थे। ऐसा नजारा था जैसे ये आदिवासी लोग अपने पूर्वजों के साथ ही रहते हैं। गांव में अधिकांश घर टूटा-फूटा था। केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा आवास योजना के तहत बनाये जाने वाले इंदिरा आवास या बिरसा आवास इनके लिये नहीं है शायद? झारखंड सरकार ने गांव में एक काम तो जरूर किया है। यहां प्रत्येक परिवार के लिए एक शौचालय की व्यवस्था है लेकिन 60 परिवारों में से कोई भी शौचालय का उपयोग नहीं करता है क्योंकि यहां पानी की किल्लत है। आधे से ज्यादा चपाकल बंद पड़े हैं। यहां के आदिवासियों के पास न तो रोजगार की व्यवस्था है और न ही रहने के लिए ठीक से घर लेकिन सरकार ने शौचालय बनवाया है। ये शौचालय बंद पड़े है या गांव वाले उसका उपयोग सामान रखने के लिए करते है। दरअसल सरकारी योजना ऐसा ही होता है। बस किसी तरह खानापूर्ति।

गांव में विकास देखते समय अचानक मेरी नजर गांव के उपर से गुजरने वाली बिजली तार पर पड़ी। मैंने गांव के मुंडा से पूछा, ‘‘क्या गांव में बिजली है?’’ बिजली तार को निराशा भाव से निहारते हुए मुंडा ने जवाब दिया, ‘‘बिजली नहीं है और हमें नहीं मालूम कि इस गांव में कभी बिजली भी आयेगी या नहीं?’’ टाटा कंपनी के नोवामुंडी स्थित प्लाट में बिजली पहुंचाने के लिए बोकारों के डिविसी से बिजली का तार खींचा गया है जो गितिलोर गांव से होकर गुजरती है। यह कितना दुःख है कि टाटा कंपनी के लिए बोकारो से बिजली सप्लाई किया जाता है लेकिन उन आदिवासियों के घरों में अबतक बिजली नहीं पहुंचायी गयी है जिनके जमीन से लौह-अयस्क निकालकर टाटा दुनियां में अपना व्यापार चला रहा है और देश में आधुनिक विकास का माडल बना हुआ है। गांव के आदिवासी प्रतिदिन सिर्फ बिजली तार को देखते रहते हैं। इन आदिवासियों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार करने के लिए क्या रतन टाटा को देश के सामने शर्म से अपना सिर नहीं झुका लेना चाहिए? 

गितिलोर गांव में एक सरकारी विद्यालय है, जहां बच्चों को दोपहर में प्रतिदिन खिचड़ी मिलता है लेकिन यहां मौलिक शिक्षा गायब है इसलिए माॅं-बाप अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के प्रति बहुत उत्साहित नहीं दिखे। विद्यालय चल रहा था लेकिन बहुत सारे बच्चे अपने मां-बाप के साथ महुआ चुन रहे थे या हवा के झोंके से गिरा हुआ छोटे-छोटे आम को चुन-चुनकर खा रहे थे। गांव में पांच लड़के इंटर पास हैं लेकिन एक भी लड़की ने आजतक यहां मैट्रिक पास नहीं किया है। इंटर पास युवा टाटा कंपनी से नौकरी मांगते हैं तो कंपनी के पदाधिकारी इन्हें आई.टी.आई. का प्रशिक्षण प्राप्त कर आने की सलाह देते हैं। युवा सवाल उठाते हैं कि हमारे पास आई.टी.आई. का ट्रेनिंग करने के लिए पैसा कहां है? यदि हमारे पास पैसा होता तो हम आगे नहीं पढ़ते? टाटा कंपनी के नोवामुंडी परियोजना में बाहर के लगभग 1600 लोग नौकरी कर रहे हैं लेकिन कंपनी इन आदिवासियों को काम नहीं देती है, जिनकी जमीन पर लौह-अयस्क का उत्खनन कार्य चल रहा है। झारखंड सरकार कहती है कि देशी-विदेशी कंपनियों के द्वारा राज्य में पूंजीनिवेश करने से लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। लेकिन हकीकत देखिये कि पूंजीनिवेश किसके जमीन पर हो रहा है और नौकरी किसको मिला है? क्या यह आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं है? जब स्थिति ऐसी है तो लोग कंपनियों को अपनी जमीन क्यों देंगे?  

गितिलोर गांव के आस-पास एक भी स्वस्थ्य केन्द्र नहीं है इसलिए बीमार पड़ने पर गांव के आदिवासी लोग जड़ी-बूटी से अपना इलाज करते हैं और गंभीर अवस्था में नोवामुंडी स्थित टाटा कंपनी द्वारा स्थापित अस्पाताल में जाते हैं। लेकिन टाटा कंपनी के व्यवहार से गांव के सुखराम हेम्ब्रम बहुत गुस्से में हैं। वे कहते हैं, ‘‘टाटा कंपनी हमारे जमीन पर खनन कार्य कर रहा है लेकिन जब हम गांव के बीमार लोगों को लेकर कंपनी के हास्पिटल में जाते हैं तो दवा खरीदने के लिए भी पैसा देना पड़ता है। क्या हमें दवा मुफ्त में नहीं मिलना चाहिए?’’ इन लोगों के साथ विकास की बात आप कैसे करेंगे जो पिछले नौ दशकों से अपनी खेती की जमीन, घर-बारी के साथ सबकुछ खोकर टाटा कंपनी को फूलते-फलते देख रहे हैं? क्या सरकार को इनकी सुधी नहीं लेनी चाहिए? विकास पर भाषण किसके लिये?

गांव के एक छोर पर कटहल पेड़ के नीचे बैठे बूजुर्ग इस बात से चिंतित दिखे कि मौसम बदलने से गांव में खेती और वनोपज दोनों पर जबर्दास्त प्रभाव पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों से एक तरफ जहां खेती ठीक से नहीं हो रही है तो वहीं वनोपज में भी भारी कमी आयी है। गांव की अर्थव्यवस्था खेती, वनोपज और पशुपालन पर ही किसी तरह टिका हुआ है। गांव के लोग मुश्किल से दो शांम खाना खाते हैं। खाने में मूलतः भात और जंगल से मिलने वाला साग। मंहगाई के कारण गांव में दाल और मांस तो पर्व-त्योहार और शादी को छोड़कर कभी किसी को नसीब ही नहीं होता है। मेरालगड़ा के मुंडा जयराम बारजो कहते हैं, ‘‘गांव के लोगों को दाल नसीब नहीं होता है क्योंकि उनके पास दाल खरीदने के लिए पैसा नहीं है। लोग किसी तरह जिन्दा हैं वही काफी है।’’ महिलाएं और बच्चे खून की कमी और कुपोषण से जुझ रहे हैं। गांव में कुपोषित बच्चों की भरमार है। गांव में नजर डालते ही चारों तरफ अर्द्धनग्न कुपोषित बच्चे दिखाई पड़ते हैं। इनके भविष्य के बारे में सोचकर डर लगने लगता है। क्या ये देश के बच्चे और भविष्य हैं भी जिनका वर्तमान ही अंधेरा है?   

गांव के दूसरे छोर पर कुसुम पेड़ के नीचे कुछ आदिवासी महिलाएं अपने कुपोषित बच्चों के साथ भात में पानी डालकर, नमक और प्याज के साथ खा रही थीं। ये महिलाएं महुआ के फूलों के गिरने का बेसब्री से इंतिजार कर रही थी, जो सूर्य की तपती धूप से एक-एक कर पेड़ से टपक रही थीं। ग्रीष्मकाल में महुआ इन आदिवासियों के आजीविका का एक बहुत बड़ा स्रोत है। वे प्रतिदिन महुआ के फूलों को चुनते हैं और उसे धूप में सुखाने के बाद स्थानीय बाजार में बेचते हैं। इसके अलावा महुआ से कई तरह का व्यंजन बनाकर खाते हैं। लेकिन झारखंड सरकार ने फरमान जारी किया है कि एक परिवार सिर्फ 15 किलो महुआ रख सकता है, जिससे लोग चिंतित हैं। यह कैसा फरमान है? आप व्यापारियों को बेहिस्साब समान इक्ट्ठा करने देंगे, अमीर लोग करोड़ों रूपये रख सकते हैं और पूंजीपतियों को आकूत सम्पति रखने की इजाजत है। लेकिन आदिवासी लोग 15 किलो से ज्यादा महुआ नहीं रख सकते हैं। यह कहां का न्याय है? सरकार आदिवासियों को क्यों सताना चाहती है? 

गांव के मुंडा रेकोंडा हेम्ब्रम बताते हैं कि टाटा कंपनी के द्वारा अधिगृहित जमीन का मुआवजा के लिए चिरूबेड़ा, बालीजोर एवं कोड़ता के विस्थापित आदिवासियों ने 1996 में एस.डी.ओ. कोर्ट, चाईबासा में एक मुकदमा दायर किया, जिसकी सुनवाई दो दशक तक चली, जिसके लिए इन विस्थापितों ने बेहिस्साब पैसा खर्च किया। लेकिन 28 जनवरी, 2017 को न्यायालय ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि यह बहुत पुराना मामला है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि न्यायालय को इस मामले को सिर्फ पुराना मामला बताकर खारिज करने के लिए बीस साल का समय क्यों लगा? क्या इन आदिवासियों के साथ टाटा कंपनी के द्वारा किये गये ऐतिहासिक अन्याय में न्यायालय ने स्वयं को भी भागीदार नहीं बना लिया? ये आदिवासी लोग कहां न्याय मांगने जायेंगे?  

देश के विकास के लिए गितिलोर में बसे कोड़ता गांव के विस्थापित आदिवासियों के साथ किया गया अन्याय और उनका विनाश देखने के बाद हमलोग टाटानगर जमशेपुर गये, जहां देश के औद्योगिक विकास का इमारत खड़ा है लेकिन आदिवासी गायब हैं। जमशेदपुर और नोवामुंडा के विकास की कहानी बताती है कि औद्योगिक विकास में आदिवासियों का अस्तित्व मिटना निश्चित है। टाटा कंपनी के 100 साल के सफर में कंपनी देश में विकास का माडल बन गया, आदिवसियों का गांव कालीमाटी टाटानगर जमशेदपुर में तब्दील हो गया तथा जमशेदपुर में आदिवासियों की जनसंख्या 95 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसी तरह नोवामुंडी एक पहाड़ से तब्दील होकर छोटा शहर बन गया और इस इलाके से आदिवासी गायब हो गये। जमशेदपुर और नोवामंडी में आदिवासियों को उनकी जमीन, घर और बारी से विकास के नाम पर बेदखल करने के बाद बिहार, बंगाल, ओड़िसा एवं अन्य राज्यों से नौकरी करने आये गैर-आदिवासी यहां स्थापित हो चुके हैं। यहां की व्यापारिक गतिविधि, राजनीति और अर्थव्यवस्था अब इनके नियंत्रण में है। यही है औद्योगिक विकास ही हकीकत, जिसको आदिवासियों को समझना होगा।  

भारत के आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने रूस से आधुनिक विकास माडल लाकर देश में औद्योगिक विकास को गति प्रदान की। उनका मानना था कि औद्योगिकरण से गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी दूर होगी और देश का सरकारी खजारी भी दुरूस्त होगा। लेकिन नेहरू का सपना आदिवासी समाज के बर्बादी का मूल कारण बना। औद्योगिक विकास ने खेती, वनोपज और पशुपालन पर आधारित आदिवासी समाज के अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ दिया क्योंकि उद्योग लगाने, डैम बनाने और खनन कार्यों के लिए आदिवासियों को उनकी खेती की जमीन, जंगलों, पहाड़ों, जलस्रोतों और खनिज से भरे इलाकों से बेदखकर कर दिया गया। इन विकास परियोजनाओं का लाभ सिर्फ पूंजीपतियों, जमींदारों, परियोजना पदाधिकारियों, इंजीनियरों, ठेकेदारों, राजनेताओं तथा बाहरी गैर-आदिवासियों को मिला। 

आज देश में औद्योगिक विकास आदिवासियों के लिए दानव बन चुका है। सिर्फ आदिवासी समाज ही विकास की कीमत चुका रहा है। इसके बावजूद झारखंड सरकार ने पिछले दिनों कारपोरेट घरानों के साथ 210 नये एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किया है। इसलिए आने वाले समय में ये कंपनियां जहां-जहां स्थापित होंगे आदिवासी वहां-वहां विस्थापित होंगे। ऐसी स्थिति में यदि आदिवासी समाज को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो उसे अपनी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को बचाने के लिए संघर्ष करना होगा क्योंकि औद्योगिक विकास आदिवासियों के विनाश का सबसे बड़ा कारण है। 

- लेखक एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं। 

रविवार, 11 दिसंबर 2016

झारखंड में जमीन का युद्ध

(सीएनटी/एसपीटी कानूनों में संशोधन से किसको लाभ?)


- ग्लैडसन  डुंगडुंग -

झारखंड फिर से सुलग रहा है, जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह जो बीच-बीच में धधक-धधक कर बाहर निकल आती है। यह आग पिछले तीन सौ सालों से लगी हुई है, जो कभी बुझने का नाम ही नहीं लेती। इसे आप युद्ध भी कह सकते हैं। पूर्वजों के विरासत - जल, जंगल और जमीन बचाने का युद्ध। आदिवासियों ने यह युद्ध पहले गोरे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा और अब अपने काले अंग्रेजों से लड़ रहे हैं। झाड़-जंगल का यह इलाका अचानक युद्ध भूमि में तब्दील हो जाता है। इस बार यह युद्ध जमीन बचाने के लिए हो रहा है। आदिवासी और उद्योगपति व व्यापारियों के गोद में बैठी सरकार के बीच। झारखंड सरकार ने आदिवासी जमीन का सुरक्षा कवच कहलाने वाले छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 का तानाशाही तरीके से संशोधन किया है, जिसका आदिवासी लोग जबर्दास्त विरोध कर रहे हैं।

आदिवासी लोग अपनी जमीन बचाने के लिए पारंपरिक हथियार उठ रहे हैं और सरकार उनकी जमीन लूटने के लिए बंदूक, कानून, विकास की पोथी, सम्प्रदायिक विभाजन और धर्मांतरण का सहारा ले रही है। आदिवासियों के द्वारा जमीन बचाने के लिए रैली, मार्च और बंद का ऐलान होते ही झारखंड की सड़कें भारत-पाकिस्तान सीमा की तरह पुलिस छवनी में तब्दील हो जाती हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटकर सरकार पूरे राज्य में धारा-144 लागू कर देती है। राज्य के मुखिया रघुवर दास आदिवासियों को विकास का पाठ पढ़ाते फिरते हैं। और जहां विकास की पोथी काम नहीं आती हैं वहां वे आदिवासियों को सरना और ईसाई के नाम पर बांटकर आपस में लड़ाने से भी परहेज नहीं करते। और तो और आवाज उठाने वाले आदिवासियों को मिशनरी प्रायोजित बताकर सरकार धर्मांतरण का आरोप लगाकर मिशनरी संस्थानों को निशाना बनाती है। इतना कुछ करने के बावजूद आदिवासी लोग सरकार के तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं है इसलिए उनके खिलाफ मोर्चा खोलकर रखा है।  

लेकिन राज्य के मुखिया इस युद्ध को आदिवासी और राज्य के विकास के लिए अनिवार्य मानते हैं। हैरत की बात यह है कि झारखंड विधानसभा के बाहर और भीतर भारी विरोध के बावजूद वे नहीं माने और 23 नवंबर 2016 को संशोधनों पर बहस के बगैर ही तीन मिनटों में संशोधन विधेयकों को पास कर दिया गया। सरकार ने आरोप लगाया कि विपक्षी पार्टियां सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं जबकि उन्होंने कोई संशोधन पेश नहीं किया। अब इस विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा गया है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि लोकतंत्र का चैथा स्तंभ भी उनके ही साथ है हमेशा की तरह। और रहे भी क्यों नहीं, विज्ञापन के रूप में गांधी छाप कागजों की बाढ़ तो सत्ता से ही आती है। आदिवासी उन्हें दे भी क्या सकते हैं प्रतिदिन पांच रूपये का एक अखबार खरीदने के अलावा? लोकतंत्र का चैथा खंभा लोगों के बीच उसी को परोस रहा है जो राज्य के मुखिया कह रहे हैं। कहीं कोई विश्लेषण दिखाई नहीं पड़ता है। इन कानूनों का उल्लंघन कर जमीन खरीदने वाले आदिवासी नेता और आफसरों के नाम और जमीन लूट की कहानियां अखबरों की सुर्खियां बनती है। लेकिन रांची, जमशेदपुर, बोकारों जैसे शहरों को गैर-कानूनी तरीके से कब्जा करने वाले गैर-आदिवासियों की सूची और कहानी मीडिया से गायब है। ऐसा प्रतीत होता है कि चैथा स्तंभ एकपक्षीय हो गया है। क्या लोकतंत्र और आदिवासियों के बुरे दिन आ गये हैं? 

झारखंड सरकार ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 की धारा 21, 49 एवं 71 तथा संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 की धारा 13 का संशोधन किया है। अब रघुवर दास डंके के चोट पर लगातार ऐलान कर रहे हैं कि जरूरत पड़ी तो इन कानूनों का और भी संशोधन करेंगे। क्या रघुवर दास लोकतंत्र पर विश्वास नहीं करते हैं? वे बार-बार कह रहे हैं कि इन भूमि कानूनों में बदलाव से आदिवासी समुदाय और झारखंड का सम्पूर्ण विकास होगा वहीं आदिवासी लोग उनके विचारों को नमक के भाव से भी लेने को तैयार नहीं हैं। हालांकि राज्य में सरना समिति चलाने वाले आदिवासियों का एक छोटा सा गुट उनका समर्थन कर रहा है लेकिन इसके लिए उनके पास अपना कोई तर्क नहीं है। इसलिए हमें विश्लेषण करना चाहिए कि संशोधन कितना तर्कसंगत है? इसका मूल मकसद क्या है? और सरकार की असली मंशा क्या है? क्या आदिवासियों का विरोध सिर्फ भावनात्मक है? क्या इन संशोधनों के लागू होने से आदिवासियों की जमीन उनके हाथों से निकल जायेगी? 

1) मूल भावना और मालिकाना हक
इसमें सबसे पहले कानूनों की मूल भावना और मालिकाना हक का सवाल है। रघुवर दास ने इस बात को बार-बार दोहराते हुए कहा है कि सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट के मूल भावनाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होगा तथा संशोधन में इस बात का ख्याल रखा गया है कि जमीन का व्यवसायिक उपयोग होने के बाद भी उसपर आदिवासियों का मालिकाना हक बना रहेगा। लेकिन कानूनी दृष्टिकोण से यह तर्क बिल्कुल ही बेबुनियाद है क्योंकि कृषि भूमि का उपयोग व्यवसायिक कार्यों के लिए होने के साथ ही जमीन की प्रकृति बदल जायेगी और वह सीएनटी/एसपीटी कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेगा। उक्त भूमि का लागान भी कृषि न होकर व्यवसायिक हो जायेगा, जो सरकार के द्वारा तय की जायेगी। इसी तरह यदि किसी गैर-आदिवासी के द्वारा उक्त जमीन का व्यवसायिक उपयोग करते समय आदिवासी रैयत के साथ किसी तरह का विवाद होने की स्थिति में आदिवासी रैयत उक्त जमीन को वापस भी नहीं ले सकेगा। कमल खेस बनाम स्टेट आफ झारखंड एवं अन्य, जून 2011, सीडब्ल्यूजेसी सं. 43 आफ 1999 में झारखंड उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सीएनटी एक्ट की धारा 71ए का उपयोग सिर्फ कृषि भूमि से बेदखल हुए रैयतों को दोबारा दखल दिहानी के लिए किया जा सकता है गैर कृषि भूमि के लिए नहीं। इसी तरह अश्विनी कुमार राय बनाम स्टेट आफ बिहार, 1987 बीएलटी रिट 332: 1988 बीएलजेआर 180 के मामले में पटना उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि जमीन की प्रकृति छप्परबंदी है इसलिए उक्त जमीन पर सीएनटी एक्ट की धारा 71ए लागू नहीं होती है। इसका अर्थ यह है कि संशोधनों के लागू होते ही इन कानूनों की मूल भावना और आदिवासियों का मालिकाना हक खत्म हो जायेगा और जमीन आदिवासियों के हाथ से निकल जायेगी। 

2) बैंकों से कर्ज
सरकार का तर्क है कि आदिवासियों के कृषि भूमि का व्यवसायिक उपयोग पर प्रतिबंध होने से बैंक उन्हें कर्ज नहीं देते हैं जिसके कारण आदिवासी बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। इसलिए संशोधन के बाद वे अपनी जमीन को बैंकों में गिरवी रखकर अपने सपनों को पूरा कर पायेंगे। क्या सचमुच आदिवासी बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बैंकों से कर्ज लेने की जरूरत है? कर्ज नहीं चुका पाने की स्थिति में उक्त जमीन का क्या होगा? बैंक उक्त कर्ज की भरपाई कैसे करेगा? क्या बैंक अपने कर्ज की भरपाई करने के लिए उक्त भूमि को सिर्फ आदिवासियों को ही बेचेगा? यदि आदिवासी उप-योजना के तहत आवंटित राशि का उपयोग योजना आयोग के दिशा-निर्देश के अनुसार किया जाये तो आदिवासियों को बैंकों से कर्ज लेने की जरूरत ही नहीं होगी क्योंकि वर्तमान समय में उक्त राशि का दूसरों मदों में खर्च किया जाता है जबकि उसके अधिकांश हिस्से का खर्च मानव संसाधन विकास के लिए करना है। दूसरी बात यह है कि कर्ज नहीं भर पाने की स्थिति में बैंक उक्त जमीन को किसी को भी बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने यूको बैंक एवं अन्य बनाम दीपक देबर्मा एवं अन्य सिविल अपील सं. 1125 आफ 2016 में स्पष्ट कर दिया है कि सेक्यूनिटाईजेशन एंड रिकास्ट्रक्शन आफ फाईनेनशियल एसेट एंड इंफोर्समेंट आफ सेक्यूरिटि इंटरेस्ट एक्ट 2002 के प्रावधानों के मुताबिक बैंक अपना कर्ज को चुकता करने के लिए गिरवी रखे गये सम्पति को किसी को भी बेच सकता है। त्रिपुरा में यूको बैंक ने एक आदिवासी का कर्ज चुकता करने के लिए उसकी जमीन को गैर-आदिवासी को बेच दिया और जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे वैध करार दे दिया। मतलब साफ है कि यह रास्ता आदिवासियों को अपनी जमीन से बेदखल करायेगा।    

3) आदिवासियों का विकास
सरकार कह रही है कि आदिवासियों के कृषि भूमि का व्यवसायिक उपयोग नहीं होने से उनका विकास नहीं हो पा रहा है। संशोधन के बाद वे अपनी जमीन पर दुकान, होटल, मैरिज हाल इत्यादि बना सकेंगे। यहां सवाल यह है कि कितने प्रतिशत आदिवासी लोग व्यवसायिक गतिविधियों में शामिल हैं? कितने आदिवासियों के पास दुकान, होटल या मैरिज हाल बनाकर व्यवसाय करने की क्षमता है? इसके लिए पूंजी कौन देगा? क्या सरकार पूंजी देगी? हकीकत यह है कि छोटे-बड़े व्यवसायों को एक साथ मिलाने पर भी व्यवसायिक गतिविधियों में जुड़े आदिवासियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं पहुंचती है। दुकान, होटल या मैरिज हाल बनाकर व्यवसाय करने की हैसियत रखने वाले आदिवासियों को उंगलियों में गिना जा सकता है। ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि उनके जमीन पर व्यवसाय करने की मंशा किसकी है और सरकार उनको क्यों इतनी तवज्जो दे रही है? असल में यह प्रावधान उन गैर-आदिवासी मध्यवर्ग के व्यवसायियों के लिए हैं, जो आदिवासी जमीन पर व्यवसायिक प्रतिष्ठान, होटल या मैरिज हाल बना चुके हैं या बनाने का इरादा रखते हैं लेकिन कानून उन्हें ऐसा करने से मना करता है। शायद आदिवासियों को प्रारंभ में कुछ पैसा मिल जाये लेकिन एक बार जमीन चले जाने के बाद उनका मालिकाना हक बरकरार नहीं रहेगा क्योंकि जमीन की प्रकृति बदल जायेगी।  

इसको समझने के लिए बोकारो का बरी कापरेटिव सटीक उदाहरण है। दो व्यवसायी आर.के. सिंह एवं बी.के.सिंह ने 1980 में बोकारों में संताल आदिवासियों की 50 एकड़ जमीन पर बरी कापरेटिव सोसाईटी की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने आदिवासियों से वादा किया कि वे एक कपड़ा उद्योग खोलना चाहते हैं और वहां उन्हें नौकरी मिलेगी तथा जमीन का मालिकाना हक उनका ही रहेगा। उन्होंने बरी काओपरेटिव के नाम से जमीन लिया जहां कुछ दिनों तक कपड़ा उद्योग चला। बाद में उक्त जमीन में उन्होंने 250 पोश बिल्डिंग बनाकर गैर-आदिवासियों को बेच दिया। 2006 में आदिवासियों ने न्यायालय का शरण लिया और जब यह मामला बाहर आया तो बोकारो के उपायुक्त ने इसकी जांच की और आरोप को सही पाया। बावजूद इसके आदिवासियों के हाथ अबतक कुछ नहीं लगा है जबकि यह मामला सीएनटी एक्ट 1908 का घोर उल्लंघन हैं। इस कानून के रहते ऐसा हुआ है तो जब कानून को कमजोर कर दिया जायेगा उसके बाद क्या होगा? आदिवासियों के जमीन का व्यवसायिक उपयोग के नाम पर उनसे उनकी जमीन गैर-आदिवासियों के द्वारा कब्जा कर लिया जायेगा और आदिवासियों के पास जमीन का कागज होने के बावजूद उनको फायदा नहीं मिलेगा। 

4) राज्य के विकास में बाधक
सरकार का एक तर्क यह है कि सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट राज्य के विकास के लिए बाधक हैं। लेकिन यह तर्क संगत नहीं है। इन कानूनों में संशोधन कर खनन एवं उधोगों के लिए जमीन लेने का प्रावधान है बसर्ते कि जमीन अधिग्रहण से पहले रैयतों का पुनर्वास हो लेकिन भूईंहारी एवं खूटकट्टी जैसे जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसका आदिवासी संस्कृति से गहरा जुड़ाव है। सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट के अस्तित्व में रहते हुए झारखंड में प्रतिवर्ष 15,000 करोड़ रूपये मूल्य के खनिज का उत्खनन होता है, जिसमें कोयला, लौह-अयस्क, बाक्साईट, इत्यादि प्रमुख हैं। राज्य में औद्योगिक विकास जारी है। 1951 से 1995 तक झारखंड में कुछ महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाई स्थापित की गई, जिसमें बोकारा स्टील प्लांट, सिंदरी खाद कारखाना, भारी इंजीनियरिंग निगम रांची, तांबा स्मेलटर घाटशिला, यू.सी.आई.एल. तथा कई खनन उद्योग। करीब 90 बड़े बांध, 400 मध्यम तथा 11,878 छोटे बांध बनाये गये जिसमें चांडिल की स्वर्ण रेखा बहुददेशीये परियोजना, दुमका की मयूराक्षी जलाशय परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, पलामू की कुटकू जलाशय परियोजना प्रमुख हैं। इन परियोजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण जरूरत से कहीं ज्यादा किया गया। इनमें औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए 17,5730.18, थर्मल पावर हेतु 6026.78, खान खनन कार्य के लिए 515124.59, प्रतिरक्षा प्रतिष्ठान हेतु 112289.11, जलाशय परियोजना हेतु 507952 हेक्टर व अन्य परियोजना के नाम पर 178824, कुल 14,95,947.04 हेक्टर जमीन का अधिग्रहण किया गया। किस आधार पर सरकार कह रही है कि ये कानून विकास में बाधक हैं? ये कानून राज्य के विकास में कहीं से भी बाधक नहीं हैं।

जहां तक शिक्षा और स्वस्थ्य के क्षेत्रों में आधारभूत सरंचना विकसित करने का सवाल है, सरकार को किसी ने नहीं रोका है। सरकार को खिचड़ी विद्यालयों में गुणवता लाकर प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए तथा बीमार पड़े उप-स्वस्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केद्र एवं सामुदायिक स्वस्थ्य केन्द्रों को बेहतर करना चाहिए। बेहतर शिक्षा, स्वस्थ्य, ग्रामीण सड़क, शुद्ध पेयजल, बिजली एवं संचार मध्यमों को गांवों तक पहुंचाने में सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट कहां रोक रहे हैं? असल में सरकार विकास के नाम पर निजी विद्यालयों एवं निजी अस्पतालों के लिए आदिवासियों की जमीन का उपयोग करना चाहती है जबकि यह संवैधानिकरूप से भी सही नहीं है। ऐसा करने से देश में असमानता की खाई बढ़ती ही जायेगी। सरकार का ध्यान राज्य के मूलभूत विकास के बजाये निजी व्यवसायिक घरानों के द्वारा शिक्षा और स्वस्थ्य के क्षेत्र में व्यवसाय को बढ़ाने का है इसलिए इन कानूनों पर विकास के नाम पर हमला किया जा रहा है। शिक्षा और स्वस्थ्य का व्यवसायिकरण संविधान के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।   
   
5) मुआवजा की स्थिति
सरकार की दलील है कि अधिगृहित जमीन का कीमत बाजार मूल्य से चार गुणा ज्यादा और दो महिने के अंदर ही मुआवजा देने का काम निपटा लिया जायेगा। इसे समझने के लिए झारखंड के तीन बड़े परियोजनाओं का आंकलन करना चाहिए। हेवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन, रांची, बोकारो स्टील लिमिटेड, बोकारो और तेनुघाट बिजली परियोजना। एक तो यह कि जमीन अधिग्रहण करने के बाद किये गये वादे के अनुसार विस्थापितों को न तो नौकरी मिली और न ही मुआवजा। और दूसरा जिन परिवारों को मुआवजा और नौकरी मिली उनकी भी स्थिति नहीं बदली। पहली पीढ़ि को मुआवजा और नौकरी मिला लेकिन आज उनकी चैथी पीढ़ि के लोग रिक्शा चला रहे हैं, मजबूरी करने को मजबूर है या दूसरे के घरों में जुठा बर्तन घोकर अपना गुजारा कर रहे हैं। सरकार को यह समझना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति पैसा से पैसा नहीं बना सकता है क्योंकि हर कोई व्यवसायी नहीं हो सकता है। ऐसी स्थिति में जिस तरह से कृषि से कई पीढ़ियों तक आजीविका चलती रहती है उसी तरह का प्रावधान करने की जरूरत है। मुआवजा, नौकरी और कृषि जमीन के बदले दूसरे जगह पर कृषि जमीन या उक्त परियोजना में शेयर धारक बनाने से ही रैयतों को उनके कई पीढ़ियों के लिए आजीविका सुनिश्चित की जा सकती है। सरकार की वर्तमान नीति से आदिवासी लोग सिर्फ बर्बादी की ओर जायेंगे। 

6) अनुपयोगी भूमि वापसी की स्थिति
झारखंड सरकार का एक तर्क यह है कि यदि किसी परियोजना के लिए अधिगृहित जमीन का उपयोग पांच वर्षों के अंदर नहीं किया गया तो उक्त जमीन को रैयतों को लौटा दिया जायेगा और भुगतान किया हुआ मुआवजा की राशि भी वापस नहीं ली जायेगी। यह निश्चित रूप से सुनने में अच्छा लगता है लेकिन पिछले सात दशकों का इतिहास इसके ठीक विपरीत है। बिहार भूमि सुधार कानून में भी इसी तरह की व्यवस्था की गई थी कि अधिगृहित भूमि का उपयोग 50 वर्षों के अंदर नहीं होने पर उक्त जमीन को मूल रैयतों को लौटा दिया जायेगा। उदाहरण के रूप में टाटा स्टील लि., जमशेदपुर में स्थापित स्टील प्लांट के लिए 12,708.59 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था लेकिन सिर्फ 2163 एकड़ जमीन का ही उपयोग हुआ और शेष जमीन बेकार पड़ी रही, जिसमें से 4031.075 एकड़ जमीन गैर-कानूनी तरीके से सब-लीज में दे दिया गया। इसी तरह एच.ई.सी. रांची के लिए वर्ष 1958 में 7199.71 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया, जिसमें से सिर्फ 4008.35 एकड़ जमीन का ही उपयोग मूल मकसद के लिए किया गया, 793.68 एकड़ जमीन गैर-कानूनी तरीके से निजी संस्थानों को सब्लीज में दे दी गयी एवं शेष जमीन अभी तक उपयोग रहित हैं। इसी तरह रांची के पास नगड़ी गांव में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अधिगृहित जमीन उपयोग किये बिना पड़ा रहा लेकिन रैयतों को नहीं लौटाया गया। एक बार जमीन का अधिग्रहण कर लेने के बाद सरकार जमीन वापस नहीं लौटाती है। 

हकीकत में झारखंड के भूमि रक्षा कानूनों को संशोधन करने के तीन मौलिक कारण हैं - 1) राज्य में विभिन्न तरह के उद्योग लगाने के लिए झारखंड सरकार और उद्योगपतियों के बीच अबतक 100 से ज्यादा समझौता-पत्रों पर हस्ताक्षर हुआ है लेकिन सीएनटी/एसपीटी को आधार बनाकर जनांदोलन होने से भूमि अधिग्रहण में भारी परेशानी हुई है। फलस्वरूप, पिछले डेढ़ दशक में राज्य में कोई बड़ा परियोजना नहीं लग पाया है। जनांदोलनों के कारण अर्सेलर मितल कंपनी को खूंटी क्षेत्र से भागना पड़ा और जिंदल स्टील लि. पोटका में परियोजना नहीं लगा सका। 2 ) राज्य में रीयल स्टेट कारोबार धीमा पड़ गया है क्योंकि मकानों के खरीददार सीएनटी/एसपीटी से मुक्त जमीन पर बने मकान चाहते हैं क्योंकि कई बिल्डर्स इसमें फांस चुके हैं। जैसे रांची का पंचवटी प्लाजा और हरिओम टावर इसका उदाहरण हैं। 3) छोटे व्यापारी कानूनी पचड़ों से मुक्ति चाहते हैं क्योंकि राज्य में अधिकांश होटल, शोपिंग काम्पलेक्स, अपार्टमेंट, निजी विद्यालय भवन एवं निजी अस्पातालों का निर्माण आदिवासियों के जमीन पर ही किया गया है, जिनके खिलाफ न्यायालयों में मुकदमा चल रहा है या मुकदमा करने की तैयारी चल रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण रांची का ‘अपोलो’ होस्पिटल’ है जो मुंडाओं की जमीन पर बनाया गया है। रैयतों ने एसएआर कोर्ट से लेकर कमिश्नर कोर्ट तक मुकदमा जीता है। रांची के कमिश्नर ने अपोलो को ध्वस्त करने का भी आदेश दिया था लेकिन यह मामला उच्च न्यायालय पहुंच गया जहां मामला लंबित है। कानून में संशोधन होने से अपोलो सुरक्षित हो जायेगा। राज्य में आपोलो जैसे कई उदाहरण हैं। 

इसमें सबसे बड़ा मसला यह है कि झारखंड सरकार आगामी 16 एवं 17 फरवरी 2017 को रांची में ग्लोबल इंवेस्टर समिट (वैश्विक निवेशक सम्मेलन) का आयोजन कर रही है, जिसके लिए भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व से झारखंड के मुख्यमंत्री को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि सम्मेलन से पहले भूमि अधिग्रहण में आने वाला सारा अडंगा दूर कर लिया जाना चाहिए, जिसे देश के प्रधानमंत्री मोदी निवेशकों को स्पष्ट संदेश देकर राज्य में निवेश को सुनिचित कर सकेंगे। केन्द्रीय नेतृत्व ने रघुवर दास को स्पष्ट कह दिया है कि व्यापार और पूंजीनिवेश में अड़ंगा लगाने वाले कानूनों को बदलें, अपना नेतृत्व क्षमता दिखाये या मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ें। इसलिए रघुवर दास अपना नेतृत्व क्षमता दिखाकर अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश में आदिवासी और मूलवासियों से घायल शेर की तरह व्यवहार कर रहे हैं तथा उन्होंने पांचवी अनुसूची क्षेत्र के संवैधानिक प्रावधान, पेसा कानून और आदिवासी परंपरा को ताख पर रख दिया है। 

लेकिन आदिवासी भी कहां मानने वाले हैं। उन्होंने सिर में कफन बांध लिया है। यह युद्ध दोनों पक्षों के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं जैसा हो गया है। आदिवासी जमीन को सम्पति की तरह नहीं देखते हैं बल्कि इसमें उनकी पहचान, संस्कृति और विरासत जुड़ी हुई है, वहीं जमीन को मात्र सम्पति का दर्जा देने वाला गैर-आदिवासी समाज इसे समझने को तैयार नहीं है। सीएनटी/एसपीटी कानूनों का संशोधन लागू होने से आदिवासी लोग बर्बाद हो जायेंगे। उनकी आजीविका, पहचान, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताना-बाना सब समाप्त हो जायेगा। क्योंकि सरकार बंदूक के बल पर औद्योगतियों के लिए कानूनी रूप से जमीन कब्जा करेगी और छोटे-व्यापारियों के द्वारा आदिवासियों की लूटी जमीन कानूनी हो जायेगी। इस युद्ध में सरकार को राजस्व मिलेगा, उद्योगपतियों को जमीन, खनिज एवं पानी, छोटे व्यापारियों को जमीन, मीडिया को विज्ञापन के रूप में नगदी और आदिवासियों दुःख का एक नया संसार। लेकिन सवाल यह भी है कि जमीन का युद्ध कब खत्म होगा? 

-  ग्लैडसन  डुंगडुंग एक एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता हैं।