गुरुवार, 3 जनवरी 2019

क्या आदिवासी जन्मजात हिन्दू हैं?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारत के आदिवासी बहुल इलाकों में पिछले कई दशकों से आदिवासियों का धार्मिक मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। संघ परिवार ;आर.एस.एस. एवं भाजपाद्ध के नेता दावा करते हैं कि आदिवासी सनातन हिन्दू हैं लेकिन वहीं आम चर्चाओं में सिर्फ सरना और ईसाई आदिवासी की मौजूदगी है। हिन्दू आदिवासी के सवाल पर कोई चर्चा नहीं है जबकि घर वापसी के नाम पर संघ परिवार बड़े पैमाने पर राजसत्ता के सहयोग से आदिवासियों का हिन्दूकरण करता रहा है। झारखंड का जनगणना 2011 दिखाता है कि 44.2 प्रतिशत आदिवासी सरना धर्म को मानते हैं, 39.7 प्रतिशत आदिवासी हिन्दू धर्म, 14.4 प्रतिशत आदिवासी ईसाई धर्म एवं 1.7 प्रतिशत आदिवासी अन्य धर्मों को मानते हैं, जो यह साबित करता है कि आदिवासी समाज का एक बड़ा तबका सनातन हिन्दू धर्म को मानता है। विगत कई दशकों से देश के विभिन्न इलाकों के आदिवासी अपनी अलग धार्मिक पहचान की मांग कर रहे हैं लेकिन उन्हें यह कहकर अनसुना किया जा रहा है कि वे सनातन हिन्दू हैं। इसलिए इस प्रश्न का जवाब ढूढ़ना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि क्या आदिवासी जन्मजात हिन्दू हैं? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके साथ आदिवासियों की पहचान, अस्मिता और अस्तित्व जुड़ा हुआ है। 

आदिवासियों के धार्मिक पहचान को नकारने मं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सबसे आगे है। संघ प्रमुख कहते रहे हैं कि आदिवासी हिन्दू हैं इसलिए उन्हं अलग धार्मिक पहचान की जरूरत नहीं है। झारखंड जहां सरना कोड की मांग को खारिज करने के लिए आर.एस.एस. और भाजपा के नेताओं की नयी खोज है कि सरना और सनातन हिन्दू दो अलग-अलग धर्म नहीं हैं बल्कि ये दोनों एक हैं। उनका तर्क है कि सरना और सनातन हिन्दू धर्म के पूजा पद्धति मिलते-जुलते हैं इसलिए ये दोनो एक ही धर्म के अलग-अलग अंग हैं। लेकिन क्या इस तर्क में दम है? हमें यह भी समझना होगा कि 125 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आर.एस.एस. क्यों मात्र 10 करोड़ आदिवासियों को हिन्दू धर्म का हिस्सा बनाना चाहता है जबकि उसे 20 करोड़ दलितों से ज्यादा मतलब नहीं है? इसे समझने के लिए हमें आदिवासी और सनातन हिन्दू धर्म को कई तरह से विश्लेषण करना होगा। 

सनातन हिन्दू धर्म का मूल आधार वर्ण व्यवस्था है। इसका अर्थ यह है कि जो भी समुदाय सनातन धर्म को मानता है वह वर्ण व्यवस्था का हिस्सा है। भारतीय जाति व्यवस्था वर्ण व्यवस्था का विस्तृत रूप है। यहां मूल प्रश्न यह है कि क्या आदिवासी समाज वर्ण एवं जाति व्यवस्था का हिस्सा है? यदि आदिवासी समाज वर्ण एवं जाति व्यवस्था का हिस्सा नहीं है तो इसका सीधा अर्थ है कि आदिवासी जन्मजात हिन्दू नहीं हैं। इसमें पहली बात तो यह है कि सनातन हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थों में आदिवासियों को असूर, दानव, राक्षस, वानर, भालू, इत्यादि कहा गया है यानी सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार आदिवासी मानव नहीं हैं। इसलिए वे वर्ण एवं जाति व्यवस्था के बाहर हैं। उनका अपना अलग समाज है। इसलिए मूल प्रश्न यह है कि जब सनातन हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थों में आदिवासियों को इंसान का दर्जा ही प्राप्त नहीं है तो वे जन्मजात सनातन हिन्दू कैसे हो सकते है?

इसमें दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हमारे देश में वर्ण एवं जाति व्यवस्था के अन्तर्गत 3,000 जातियां एवं 25,000 उप-जातियां हैं, जिनमें से सिर्फ ब्राहमण जाति के लोगों को ही धर्मग्रांथ पढ़ने का अधिकार है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो सिर्फ ब्राहमण जाति के लोग ही पुजारी बन सकते हैं। मंदिर एवं अन्य धर्मांस्थलों में जितना भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसपर सिर्फ ब्राह्मनों का ही हक है पूरे सनातन हिन्दू समाज के लोगों का नहीं। भारत में 700 से ज्यादा आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं, जिनमें सभी समुदायों के पास अपना-अपना पुजारी होता है। उदाहरण के लिए मुंडा आदिवासी समुदाय में पुजारी को पाहन, संताल समुदाय में नायके एवं उरांव समुदाय में पाहन कहा जाता है। इसी तरह आदिवासी समुदाय के लोग मुर्गा के खून से शुद्धीकरण करते हैं जबकि सनातन हिन्दू शुद्धीकरण के लिए गंगाजल का उपयोग करते हैं। आदिवासी पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करते हैं बल्कि वे मानते हैं कि मनुष्य के मरने के बाद उनकी आत्मा उसी घर वास करते हैं जबकि सरनातन हिन्दू पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं। इनके अलावा कई अन्य भिन्नताएं हैं। इससे स्पष्ट है कि न आदिवासी लोग जन्मजात सनातन हिन्दू हैं और न ही सरना और सनातन एक धर्म हैं। सरना और सनातन एक हैं बोलकर संघ परिवार के लोग आदिवासियों को भ्रमित करना चाहते हैं ताकि उनका हिन्दूकरण किया जा सके।  

इस मसले को समझने के लिए जनगणना भी एक अहम कड़ी है। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के समय 1971 में प्रथम जनगणना हुई लेकिन 1881 को ही पूर्ण जनगणना माना जाता है। प्रथम जनगणना से ही धार्मिक समूहों की जनसंख्या को अलग-अलग गिना गया था, जिसमें आदिवासियों को भी अलग धार्मिक पहचान दी गई थी। 1871 के जनगणना के धार्मिक कालम में आदिवासियों के लिए एबोर्जिन्स शब्द का प्रयोग किया गया था। इसी तरह 1881 में एबोर्जिनल, 1891 में एबोर्जिनल, 1901 में एनिमिस्ट, 1911 में एनिमिस्ट, 1921 में एनिमिस्ट, 1931 में ट्राईबल रिलिजन एवं 1941 में ट्राईब्स शब्द का प्रयोग किया गया था। इससे एक बात स्पष्ट होता है कि अंग्रेजों ने आदिवासियों के धर्म को मान्यता दिया था। लेकिन आजाद भारत में आदिवासियों के साथ बेईमानी की गई। 1951 के जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग से धार्मिक कालम न रखकर उन्हें हिन्दू धर्म में शामिल कर लिया गया। इस तरह से धीरे-धीरे आदिवासी समुदाय के लोग स्वयं को हिन्दू धर्म का हिस्सा मानने लगे। लेकिन क्या यह गैर-कानूनी नहीं था? 

ऐसी स्थिति में हमें कानूनी प्रावधानों पर भी गौर करना चाहिए, जिसे स्थिति और ज्यादा स्पष्ट हो जायेगी। इस संदर्भ में हिन्दू धर्म से संबंधित कानून क्या कहते हैं? हिन्दू धर्म से संबंधित प्रमुख कानूनों में आदिवासियों को हिन्दू नहीं माना गया है इसलिए ये कानून उनपर लागू नहीं होते हैं जबकि ये कानून बौद्ध, जैन, सिख, प्रार्थना समाज एवं आर्य समाज के सदस्यों पर लागू हैं। हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा-2(2), हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1955 की धारा-2(2), हिन्दू माईनोरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट 1955 की धारा-3(2) एवं हिन्दु एडोप्शन एंड मेंटेनेन्स एक्ट 1956 की धारा-2(2) में स्पष्ट लिखा हुआ है कि इन कानूनों का कोई भी हिस्सा संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत परिभाषित अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा। ऐसी स्थिति में आदिवासियों को जन्मजात हिन्दू कहना सिर्फ भ्रम फैलाना है। संघ परिवार झूठ के बुनियाद पर घरवापसी की आड़ में आदिवासियों का हिन्दूकरण करने में जुटा हुआ है। क्या आदिवासियों का हिन्दूकरण करना धर्मांतरण नहीं है? इस मसले पर न्यायालयों का क्या रूख है? 

सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट भी आदिवासियों को हिन्दू नहीं मानते हैं। 14 फरवरी 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने डा. सूर्यामनी स्टेला कुजूर बनाम दुर्गा चरण हांसदा एवं अन्य अपील क्रि 186 आफ 2001, एस.एल.पी. क्रि 2436 आफ 2000, ए.आई.आर. 2001 एस.सी. 939 में पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करने के मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अपीलकर्ता एवं प्रतिवादी दोनों आदिवासी हैं, जो हिन्दू धर्म को मानते हैं। लेकिन इनकी शादी हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा-2(2) के तहत नहीं आता है बल्कि वे सिर्फ संताल रूढ़ि-प्रथा से संचालित होते हैं। अपीलकर्ता ने कोई भी पुख्ता प्रमाण नहीं उपलब्ध कराया है, जिससे यह साबित किया जा सके कि संताल रूढ़ि-प्रथा के अंतर्गत दूसरी शादी पर प्रतिबंध है। इसलिए प्रतिवादी पर भारतीय दंड संहिता की धारा-449 के तहत कानूनी कार्रवाई नहीं किया जा सकता है। उपरोक्त जजमेंट को आधार मानते हुए 20 अगस्त 2015 को झारखंड उच्च न्यायालय ने राजेन्द्र कुमार सिंह मुंडा बनाम ममता देवी एफ.ए. न. 186 आफ 2008 के तलाक से संबंधित मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अपीलकर्ता आदिवासी समुदाय से है, जो हिन्दु मैरिज एक्ट 1955 की धारा-2(2) से संचालित नहीं होता है इसलिए उसे इस कानून के तहत तलाक नहीं दिया जा सकता है।   

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि आदिवासी जन्मजात हिन्दू नहीं है। लेकिन संघ परिवार आदिवासियों को हिन्दू इसलिए बनाना चाहता है ताकि उनके आदिवासी होने की मूल पहचान को नष्ट किया जा सके क्योंकि ये लोग आर्यों को भारत का मूल निवासी घोषित करने के रास्ते पर सबसे बड़ा रोड़ा हैं। इसीलिए संघ परिवार इनके लिए आदिवासी के जगह पर वनवासी शब्द का प्रयोग करता है। बहुसंख्यक आदिवासी आज भी दावा करते हैं कि वे ही भारत के असली निवासी हैं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कैलाश एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र सरकार एस.एल.पी. क्रि. न. 10367 आफ 2010 में फैसला देते हुए कहा है कि आदिवासी ही भारत देश के प्रथम निवासी और मालिक हैं। इसी तरह दुनिया के 92 वैज्ञानिकों ने जीनोम प्रोजेक्ट के तहत डी.एन.ए. की जांच करते हुए साबित किया है कि आदिवासी ही भारत देश के असली निवासी हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि अब आदिवासी स्कालर इन तथ्यों को पूरजोर तरीके से दुनिया के सामने लायें कि आदिवासी जन्मजात सनातन हिन्दू नहीं हैं बल्कि वे भारत देश के प्रथम निवासियों के संतान हैं। इसलिए उनके मूल पहचान के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। 

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