रविवार, 3 नवंबर 2019

सामूहिक आत्महत्या के लिए बेचैन लोग?

ग्लैडसन डुंगडुंग

भारत की राजधानी दिल्ली विगत कुछ वर्षों से निरंतर ‘‘गैस चैंबर’’ में तब्दील होती जा रही है, जहां पैसा खर्च किये बगैर शुद्ध हवा मिलना असंभव हो चुका है। अक्टूबर से दिसंबर महीने तक प्रतिवर्ष शहर की हवा इतनी जहरीली हो जाती है कि लोगों को अपने घरों से बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की सुरक्षा हेतु विद्यालयों को बंद करना पड़ता है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। इस वर्ष वायु प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ गया कि सरकार को ‘‘हेल्थ इमरजेंसी’’ घोषित करते हुए लाखों की संख्या में मास्क बांटना पड़ा। इतना कुछ होने के बावजूद लोग ‘‘दीपावली और छठ पूजा’ में बेहिस्साब पटाखे जलाकर खुशियां मनाये। ऐसा प्रतीत होता है कि लोग सामूहिक आत्महत्या करने के लिए बेचैन हैं। हवा जहरीली हो जाये, धरती का तापमान बढ़ जाये या धरती पर तबाही आ जाये उसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे जबतक जिन्दा हैं तबतक धर्म और परंपरा के नाम पर सबकुछ करेंगे जो करते आये हैं। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर बहस छेड़िये तो उसके जवाब में धर्म आधारित राजनीति प्रबल हो जाती है। 

मैं सोच में पड़ जाता हॅ कि सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा में होने का दंभ भरने वाले ये लोग क्यों बेवकूफों जैसे व्यवहार करने लगते हैं? वे थोड़ा भी क्यों नहीं सोचते हैं? क्या उन्हें अपने बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचना चाहिए? यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की समस्या है? क्या हमें ग्लोबल वार्मिंग के कारण हमारे देश में होने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सचेत नहीं होना चाहिए? अब पानी की तरह ही मुफ्त में मिलने वाली हवा को हमारे देश में कनाडा की कंपनी ‘‘विटालिटी एयर’’ एवं अस्ट्रेलिया की कंपनी ‘‘औजेर’’ ने बोतलों में बंदकर उसके उपर ‘‘हिमालय की शुद्ध हवा’’ का रैपर लगाकर 550 से 1500 रूपये प्रति बोतल बेच रहे हैं। एक व्यक्ति को औसत प्रति मिनट 8 से 10 लीटर हवा चाहिए। शुद्ध हवा लेने के लिए हमें प्रति व्यक्ति को प्रति मिनट कम से कम 500 रूपये खर्च करना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति पैदा होने के बाद भी यदि हम संवेदनशील नहीं होगें तो हमें कौन बचा सकता है? क्या हम सरकार के भरोसे अपना भविष्य को दांव पर लगा सकते हैं? 

हाल ही में क्लाइमेट इंपैक्ट और यूनिवर्सिटी आफ शिकागो के टाटा सेंटर फार डेवलपमेंट ने ‘‘जीवन एवं अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव’’ का अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी रफतार से बढ़ता रहा, तो 2050 तक भारत का औसत तापमान चार डिग्री तक बढ़ सकता है, जिसके कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख लोग बेमौत मारे जायेंगे। वायु प्रदूषण से होने वाले बीमारियों के कारण हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 7 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं लेकिन इस गंभीर विषय पर कहीं चर्चा तक नहीं होती है। यह मसला अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती। यदि हमलोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव को इसी तरह दरकिनार करते रहे तो वह समय दूर नहीं है जब देश में अत्याधिक गर्मी से लाशों की ढेर लग जायेगी लेकिन तब हमारे पास रोने-चिल्लाने के अलावा और कुछ नहीं बचेगा। क्या हमलोग तबतक चर्चा करना, सोचना और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए काम करना शुरू नहीं करेंगे जबतक आफत हमारे दरवाजे पर नहीं पहुंचती है?   
  
इससे पहले 8 अक्टूबर 2018 को संयुक्त राष्ट्र की संस्थान आईपीसीसी ने जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को आगह किया कि औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है। अभी औसतन तापमान प्रतिवर्ष 13.5 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, जिसे 1.5 डिग्री कम करना बहुत जरूरी है। संस्थान ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि धरती को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक दशक का समय बचा हुआ है। इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 से 2031 को परिस्थितिकी पुनस्र्थापना दशक घोषित करते हुए 26 गिगाटन ग्रीनहाउस गैस को वातावरण से खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस ग्रीनहाउस गैस को सिर्फ प्राकृतिक तरीके से खत्म करते हुए हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन पूंजीवाद पर सवार लोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन हेतु विकसित देशों के उपर जिम्मेवारी मढ़कर बचा-खुचा प्राकृतिक संसाधनों को बाजार भाव से बेचकर मुनाफा कमाने में लगे हुए है।  

हकीकत यह है कि हम सिर्फ विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार बनाकर धरती को नहीं बचा सकते हैं। जब धरती ही नहीं बचेगी तो हम कहां रहेंगे? जब लोग अत्याधिक गर्मी, बाढ़, बर्फबारी, भूकंप, महामारी जैसे मानव निर्मित अपदाओं से घिर जायेंगे तब विकसित देशों को कोसने से काम चलेगा? हमें जलवायु संकट से बचने के लिए कदम उठाना होगा। हमारे देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है इसलिए धरती को बचाने में हमारी भूमिका भी बड़ी होगी। 2015 में फ्रांस के पेरिस शहर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते में भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया है, जिसके तहत दुनियां के नेताओं ने धरती का तापमान 1.5 कम करने का वादा किया गया है। लेकिन भारत सरकार ठीक इसके विपरीत काम कर रही है यानी सरकार विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर जंगलों को उजाड़ने में लगी हुइ है। हमारे देश में विकास के नामपर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगल को उजाड़ा गया है। 

इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘‘चैम्पियन आफ अर्थ’’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगल को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा अभी कई जंगल और पहाड़ों को विकास के नामपर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। केन्द्र सरकार ने सिंचाई विभाग की उतरी कोयल सिंचाई परियोजना को पूरा करने के लिए पलामू टाइगर रिजर्व के 1007.29 हेक्टेयर वनभूमि क्षेत्र के 3,44,644 पेड़ों को काटने की मंजूरी प्रदान की है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के 1,70,000 हेक्टेयर जंगल को कोयला एवं लौह-अयस्क के उत्खनन के लिए अडानी एवं अन्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है एवं झारखंड के सारंडा जंगल के अंदर 45,000 हेक्टेयर प्रतिबंधित जंगल को लौह-अयस्क उत्खनन के लिए जिंदल, मित्तल, वेदांता, टाटा एवं एलेक्ट्रो स्टील जैसी कंपनियों को सौपने तैयारी हो रही है। ऐसी स्थिति में जंगलों को विकास और आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर पूंजीपतियों को सौपना सामूहिक आत्म हत्या की तैयारी करना नहीं तो और क्या है?    

जलवायु संकट के कारणों में ही इसका समाधान भी छुपा हुआ है। दिल्ली के गैस चैंबर बनने का प्रमुख कारण हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश के किसानों के द्वारा पराली जलाना बताया जाता है, जिसका इसमें 46 प्रतिशत योगदान है। लेकिन हमें 54 प्रतिशत प्रदूषण का कारण कारण भी ढ़ूढ़ना होगा? पराली जलाना तात्कालिक कारण हो सकता है। लेकिन जलवायु संकट का सबसे बड़ा कारण है औद्योगिकरण और प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन। कोयला, बाक्साईट और लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए अंधाधुंध जंगलों को उजाड़ा जा रहा है, काक्रीट जंगल बसाने के लिए जलस्रोतों को खत्म किया जा रहा है और कोयला, डीजल और पेट्रोल का बेहिसाब उपयोग किया जा रहा है, जिससे वातावारण में ग्रीन हाउस गैस भरता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैस, जिससे कार्बन डाई आक्साइट, जल-वाष्प, मिथेन, आदि हैं, जो वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृति अधिक बढ़ाते हैं, जिसे धरती गरम होती जा रही है, जो धरती के तबाही और जीवन की समाप्ति का इशारा है। यदि धरती और जीवन को बचाने के लिए हमने अभी कदम नहीं उठाया तो बाद में बहुत देर हो चुकी होगी।  

जलवायु संकट आधुनिक विकास की देन है, जिसका समाधान सरकारों के भरोसे कभी संभव नहीं है क्योंकि आज का लोकतंत्र कारपोरेट का गुलाम हो चुका है। यही कारपोरेट जगत चुनाव में अरबों रूपये पानी की तरह बहाकर सरकार बनाता है। इसलिए लोकतंत्र के आड़ में कारपोरेट के पैसे से बनी सरकारें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कभी नहीं रोक सकते हैं। इसके लिए देश के प्रत्येक व्यक्ति को सजग होकर दो स्तर पर कदम उठाना होगा। जंगलों को उजाड़ने, खनिज सम्पदा का दोहन करने एवं पेड़ों को काटकर काक्रीट का जंगल खड़ा करने की नीतियों को खत्म करने के लिए सरकारों पर निरंतर दबाव बनाना होगा। इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जरूरतों को कम करना और वातावरण को दूषित करने वाले वस्तुओं का उपयोग बंद करना तथा कोयला, रसोईगैस, पेट्राल-डीजल सहित प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग करना क्योंकि जलवायु संकट का एकमात्र समाधान है प्राकृतिक संसाधनों यानी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा की सुरक्षा। हम आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हेतु निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। अब हमारे देश के तथाकथित सभ्य, श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित एवं मुख्यधारा वालों को तय करना है कि वे बचना चाहते हैं या सामूहिक आत्महत्या करना।  

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